संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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करते हैं। मांस न तो आयु बढ़ानेका साधन है और न आरोग्य तथा बलका ही हेतु है। उसे जो गुणकारक बताया जाता है, वह सब झूठ है। इसका दृष्टान्त मुझसे सुनो—मांसभोजी मनुष्य भी रोगसे पीड़ित, दुर्बल और स्वल्पायु देखे जाते हैं तथा जो मांस नहीं खाते, वे भी पृथ्वीपर नीरोग, दीर्घायु और हृष्ट-पुष्ट अंगोंवाले देखे जाते हैं। इसलिये मांसको सर्वथा त्याग देना चाहिये। जो जीवनकी इच्छा रखनेवाले जीवोंके मांस खाता है, वह घोर नरकमें जाता है और वहाँ उन्हीं प्राणियोंद्वारा वह स्वयं भक्षण किया जाता है। मांसकी उत्पत्ति घास, काठ या पत्थरसे नहीं होती, किसी जीवकी हिंसा करनेपर ही मांस मिलता है, अतः उसे सर्वथा त्याग देना चाहिये*। विद्वान् पुरुषोंको उचित है कि वे सब जीवोंको अपने ही समान देखें और पूरी शक्ति लगाकर उनकी रक्षा करें। जो जीवोंको मारता है, जो मारनेकी अनुमति देता है, जो उसे काट-काटकर अलग करता है, जो खरीदता और बेचता है, जो उसे पकाकर तैयार करता है, जो उसे परोसता है तथा जो खानेवाला है—ये आठ प्रकारके व्यक्ति घातक (हिंसक) माने गये हैं। खरीदनेवाला धनसे मारता है, खानेवाला भक्षणके द्वारा हत्या करता है तथा घातक वध और बन्धनके द्वारा मारता है। इस प्रकार जीवोंका तीन तरहसे वध होता है। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी जीवकी हिंसा नहीं करता, वह जरा-मृत्युसे रहित परम धामको प्राप्त होता है†। शाक, मूल और फलका भोजन करनेवाला ब्रह्मचर्यपरायण पुरुष भी यदि हिंसा-कर्ममें तत्पर है, तो उसे अपने नियम और व्रतका कोई फल नहीं मिलता। एक मनुष्य सौसे भी अधिक वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या करता है और दूसरा दयासे प्रेरित होकर केवल अहिंसा-व्रतका पालन करता है तो इन दोनोंमें जो दयालु पुरुष है, वही श्रेष्ठ है। जो मानव-दया-धर्मसे युक्त है, वह जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, दुर्लभ होनेपर भी उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है।' ऐसा कहकर वे महात्मा पुरुष मेरे देखते-देखते उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर स्वर्गलोकको चले गये। महामते! षडक्षर मन्त्रके माहात्म्यसे गन्धर्वलोग उनका यशोगान और किन्नर स्तुति करते थे।
उन महात्माके चले जानेपर मैंने भक्तिपूर्वक शिवमन्त्रकी दीक्षा ग्रहण की और तीनों सन्ध्याओंमें श्रद्धायुक्त हो भगवान् सिद्धेश्वरके समीप बैठकर मैं प्रतिदिन दस हजार मन्त्रका जप करने लगा। इसीसे मेरी युवावस्था स्थिर हो गयी है और मुझे लोकान्तरोंका ज्ञान एवं आकाशगमनकी शक्ति प्राप्त हो गयी है। द्वापरका अन्त होनेपर मैं सिद्धेश्वरजीका दर्शन करूँगा और सदा शिवलोकको प्राप्त होऊँगा। यह मैंने सत्य बात बतलायी है। सूतनन्दन! मैंने यह मोक्षदायक षडक्षरमन्त्रका माहात्म्य तुम्हें सुनाया है। जो मनुष्य उत्तम श्रद्धासे युक्त हो इसका सदा श्रवण करेगा, वह जन्मसे लेकर मृत्युतकके समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा। महाभाग! तुम भी इस मन्त्रका सदा जप किया करो।
**सूतजी कहते हैं—**महर्षियों! इस प्रकार पहले सद्गुरुके मुखसे सुना हुआ यह षडक्षर-माहात्म्य मैंने तुम्हारे समक्ष कहा है।
* न हि मांसं तृणात् काष्ठादुत्पलादपि जायते। हते जन्तौ भवेन्मांसं तस्मात्तत्परिवर्जयेत्॥
(स्क० पु०, ना० २९। २३२)
† हन्ता चैवानुमन्ता च विशस्ता क्रयविक्रयी। संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चाष्टघातकाः॥
धनेन क्रयकृद्धन्ति भक्षणेन च खादकः। घातको वधबन्धाभ्यामित्येवं त्रिविधो वधः॥
कर्मणा मनसा वाचा यो हिनस्ति न किञ्चन। स प्राप्नोति परं स्थानं जरामरणवर्जितम्॥
(स्क० पु०, ना० २९। २३४-२३७)