भारतकोश
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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०५७

चाहिये और सबको एकत्रकर निवेदन करना चाहिये। तदनन्तर घरके लोगोंके साथ कथा सुनकर ब्राह्मणको दक्षिणा देनी चाहिये। इसके बाद ब्राह्मणोंको प्रसाद खिलाकर अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ भक्तिपूर्वक स्वयं प्रसाद ग्रहण करना चाहिये और भगवान्‌के सामने (प्रेमपरवश होकर) नाचना और गाना चाहिये। इसके बाद स्तुति करके सत्यनारायण भगवान्‌का स्मरण करते हुए घर जाना चाहिये। इस प्रकार करनेपर मनुष्योंको निश्चय ही मनोवांछित फल प्राप्त होगा। विशेषकर इस कलियुगमें तो सत्यनारायण-व्रतके अतिरिक्त पृथ्वीपर अभीष्टसिद्धिका और कोई उपाय ही नहीं है।

पूर्वकालमें एक ब्राह्मण इस व्रतको करके कृतकृत्य हो गये थे। अब उनकी कथा कहता हूँ। काशीपुर ग्राममें एक निर्धन ब्राह्मण रहते थे। वे भूख-प्याससे व्याकुल होकर सदा पृथ्वीपर भटका करते। ब्राह्मणको दुःखी देखकर ब्राह्मणप्रिय भगवान् वृद्ध ब्राह्मणका रूप बनाकर उनके पास आये और उन्होंने आदरके साथ पूछा—‘ब्राह्मण देवता! आप किसलिये अत्यन्त दुःखित होकर सारी पृथ्वीपर भटक रहे हैं। यदि आपकी अभिरुचि हो तो सारी बात मुझसे कहिये। मैं सुनना चाहता हूँ।’

ब्राह्मणने कहा—मैं बड़ा गरीब हूँ और भीख माँगनेके लिये ही इस प्रकार भटकता रहता हूँ। आप कोई उपाय जानते हों, तो हे प्रभो! कृपापूर्वक मुझे बताइये।

वृद्ध ब्राह्मणने कहा—सत्यनारायण विष्णु-भगवान् मनचाहा फल देते हैं। द्विजश्रेष्ठ! आप सत्यनारायणका उत्तम व्रत करें। मनुष्य इस व्रतको करके सब दुःखोंसे मुक्त हो जाता है।

श्रीभगवान् बोले—वृद्ध बने हुए सत्यनारायण ब्राह्मणको आदरपूर्वक व्रतकी पूरी विधि बताकर वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर वे ब्राह्मण मन-ही-मन भगवान्‌का चिन्तन करते हुए घर लौटे। उन्होंने समझा कि ‘नारायणने ही मुझको यह व्रत बतलाया है, अतएव मैं इस व्रतको करूँगा’ ब्राह्मण इसी सोच-विचारमें रहे। उनको रात्रिमें नींद नहीं आयी। प्रातःकाल उठते ही ‘मैं सत्यनारायण-व्रत करूँगा’ यह संकल्प करके ब्राह्मण भिक्षाके लिये चले। उस दिन ब्राह्मणको भिक्षामें प्रचुर द्रव्यकी प्राप्ति हुई। उसके द्वारा उन्होंने बन्धु-बान्धवोंके साथ सत्यनारायणका व्रत किया और उस व्रतके प्रभावसे वे श्रेष्ठ ब्राह्मण समस्त दुःखोंसे छूटकर सम्पूर्ण सम्पत्तिसे सम्पन्न हो गये। तबसे वे प्रतिमास सत्यनारायण-व्रत करने लगे।

श्रीभगवान्‌ने कहा—वे उत्तम ब्राह्मण वृद्धरूपधारी नारायणके द्वारा व्रतको जानकर सारे पापोंसे मुक्त हो गये और उन्होंने दुर्लभ मोक्षकी प्राप्ति की। नारद! जिस समय इस व्रतका पृथ्वीमें प्रचार होगा, उसी समय मनुष्योंके समस्त दुःख नष्ट हो जायँगे।

सूतजी बोले—ब्राह्मणो! नारायणने महात्मा नारदको जैसा कहा था, ठीक वैसा ही मैंने आपलोगोंसे कह दिया। अब और क्या कहूँ।

ऋषियोंने पूछा—इसके बाद पृथ्वीपर इस व्रतका अनुष्ठान किस मनुष्यने किया था? हे मुने! यह सब हम सुनना चाहते हैं। इस विषयमें हमारे मनमें बड़ी श्रद्धा उत्पन्न हो गयी।

सूतजी बोले—मुनियो! उसके बाद पृथ्वीपर किसने यह व्रत किया था, सो सुनो। एक दिन वे श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ अपने वैभवके अनुरूप व्रत कर रहे थे। इसी समय वहाँ एक लकड़हारा आया। लकड़हारेने लकड़ी बाहर रख दी और वह ब्राह्मणके घरके अंदर चला गया। उस समय वह प्याससे पीड़ित था। उन ब्राह्मणको कार्यमें लगे देखकर प्रणाम करके उसने पूछा—‘महाराज! आप यह क्या कर रहे हैं?’

ब्राह्मणने कहा—यह सत्यनारायण-व्रत है।

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यह व्रत दुःख-दारिद्र्यका नाश करता है, सब प्रकारकी इच्छित वस्तुओंको देता है और पुत्र-पौत्रादिकी वृद्धि करता है। इस व्रतके प्रभावसे ही धन-धान्यादि महान् समृद्धिसे मेरा घर भर गया है। ब्राह्मणकी इस बातको सुनकर लकड़हारेको बड़ा हर्ष हुआ। वह जल पीकर और प्रसाद लेकर स्थिर मनसे सत्यनारायणदेवका चिन्तन करता हुआ नगरमें गया। उसने मन-ही-मन कहा कि 'आज लकड़ियोंके बेचनेपर जो कुछ मिलेगा, उसीके द्वारा मैं सत्यदेवका उत्तम व्रत करूँगा।' इस प्रकार मनमें विचारकर वह लकड़ियोंके बोझेको सिरपर उठा नगरमें धनियोंके रमणीय स्थानमें पहुँचा। आज लकड़हारेको लकड़ियोंका दूना मूल्य मिला। उसका हृदय प्रसन्न हो गया। वह पके हुए केले, चीनी, घी, दूध और गेहूँका आटा—सब वस्तुएँ सवाये हिसाबसे लेकर घर पहुँचा। तदनन्तर बन्धु-बान्धवोंको निमन्त्रण देकर उसने विधिपूर्वक व्रत किया। उस व्रतके प्रभावसे वह लकड़हारा धन और पुत्रसे सम्पन्न हो गया तथा इहलोकमें सुख भोगकर अन्तमें सत्यपुरको प्राप्त हुआ।

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सत्यनारायण-व्रतकी महिमा, राजा उल्कामुख, साधु वणिक् और राजा वंशध्वजकी कथा

सूतजीने कहा— एक घटना और कहता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें उल्कामुख नामक एक जितेन्द्रिय, सत्यवादी, प्रबल पराक्रमी राजा थे। वे बुद्धिमान् राजा प्रतिदिन भगवान्‌के मन्दिरमें जाते और धन देकर ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट करते। उनकी पत्नीका नाम था भद्रशीला। वह सरोजवदना, प्रमुग्धा और पतिपरायणा सती थी। राजा रानीके साथ समुद्रके तीरपर जाकर सत्यनारायणका व्रत किया करते थे। एक दिन जब राजा व्रत कर रहे थे, एक साधु नामक वणिक् वहाँ आया। वह व्यापारके लिये नाना प्रकारके रत्नादि पदार्थोंको नौकामें भरकर लाया था। वणिक् समुद्रके किनारे नावको खड़ी करके तटके ऊपर आया और व्रत करते हुए राजाको देखकर उसने विनयपूर्वक पूछा।

साधुने कहा— राजन्! भक्तियुक्त चित्तसे आप यह क्या अनुष्ठान कर रहे हैं? इस समय मेरी इसे जाननेकी इच्छा है। अतएव आप समझाकर कहें।

राजा बोले— साधो! मैं अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ अतुलनीय तेजयुक्त भगवान् विष्णुकी पूजा कर रहा हूँ। मेरा यह व्रत पुत्रादिकी प्राप्तिके लिये है।

तदनन्तर साधुने राजाको आदरपूर्वक प्रणामकर कहा— राजन्! इस व्रतकी सांगोपांग विधि आप मुझे बतलावें; क्योंकि मैं भी यह व्रत करूँगा। मेरे भी सन्तान नहीं है। इस व्रतसे मुझे निश्चय ही सन्तानकी प्राप्ति होगी।

इतना कहकर वणिक्ने उन राजासे व्रतकी विधि अच्छी तरह पूछकर वहाँसे प्रस्थान किया और अपने वाणिज्यका काम पूरा करके वह आनन्दके साथ घर लौट आया। कुछ ही दिनोंके बाद उसकी पतिव्रता पत्नी गर्भवती हुई और समयपर उसने एक अति सुन्दरी कन्याको जन्म दिया। कन्या शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिनोंदिन बढ़ने लगी। वणिक्ने उसका जातकर्मादि संस्कार करवाकर उसका नाम रखा कलावती। तदनन्तर वणिक्पत्नी लीलावतीने मधुर वचनोंमें पतिसे कहा— 'स्वामी! आपने पूर्वमें जो (सत्यनारायण-व्रत करनेकी) प्रतिज्ञा की थी, उसे अब पूरी क्यों नहीं कर रहे हैं?'

साधुने उत्तर दिया— प्रिये! मैं कलावतीके विवाहके समय सत्यनारायणका व्रत करूँगा।

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०५९

पत्नीको इस प्रकार आश्वासन देकर साधु-वणिक् समुद्रके तटकी ओर चला गया। इधर पिताके घरमें कलावती बढ़ने लगी। इसके बाद धर्मके जाननेवाले पिताने जब अपनी पुत्रीको विवाहके योग्य देखा, तब अपने बन्धु-बान्धवोंसे परामर्श करके साधुने वर ढूँढ़नेके लिये दूतको भेजा। दूत साधुका आदेश पाकर कांचननगर गया और वहाँ कलावतीके योग्य एक उत्तम वरकी खोज करके वहाँसे उस वणिक्-पुत्रको साथ लेकर लौट आया।

साधु वणिक् उस सुन्दर और सद्गुणी वणिक् कुमारको देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और अपने जाति-बन्धुओंके साथ मिलकर प्रसन्नतापूर्वक यथाविधि अपनी कन्याको उसके अर्पण कर दिया।

दुर्भाग्यवश कलावतीके विवाहके समय भी वणिक् उस उत्तम व्रतकी बात भूल गया। इससे भगवान् उसपर रुष्ट हो गये। कुछ दिनोंके बाद वह व्यापारमें निपुण वणिक् अपने श्रीमान् जामाताको साथ लेकर व्यापारके लिये बाहर गया और राजा चन्द्रकेतुके राज्यमें समुद्रके समीप रमणीय रत्नसार नगरमें जा पहुँचा। वहाँ एक पुरी बनाकर वह अपना व्यापार करने लगा। उसी समय प्रभु सत्यनारायणने साधुको मिथ्यावादी जानकर उसे शाप देते हुए कहा—'आजसे कुछ ही दिनोंमें यहीं तुम दुःखको प्राप्त होओगे।' इधर उसी दिन एक चोरने राजमहलमें धन चुराया। चोर धनको लेकर साधुके मकानके बगलके रास्तेसे जा रहा था। उसने घूमकर पीछेकी ओर देखा, राजाके दूत उसके पीछे-पीछे दौड़े आ रहे थे। वह डर गया और चुराये हुए धनको वहीं छोड़कर जल्दीसे भाग निकला। दूतोंने आकर देखा, साधु वणिक्के घरके पास राजाका धन पड़ा है। तब उन्होंने जामाताके साथ साधुको पकड़ लिया और उन्हें बाँधकर प्रसन्न मनसे तुरंत राजाके समीप ले जाकर कहा—'प्रभो! दोनों चोर पकड़कर आ गये हैं। इनको देखिये और आज्ञा दीजिये कि क्या किया जाय?' तत्पश्चात् राजाकी आज्ञासे दूतोंने दोनों वणिकोंको अच्छी तरह बाँधकर बड़े कठिन कारागारमें डाल दिया।

उस समय उनके सम्बन्धमें कोई भी विचार नहीं किया गया। उन दोनोंने बहुत कुछ कहा; परंतु सत्यनारायणदेवकी मायासे किसीने उनकी एक भी नहीं सुनी। इसके बाद राजा चन्द्रकेतुने उनकी सारी धन-सम्पत्ति छीन ली। इधर सत्यदेवके शापसे घरमें लीलावती और कलावतीपर भी दुःख आ पड़ा। घरमें जो कुछ भी धन-सम्पत्ति थी, चोरोंने सारी अपहरण कर ली। लीलावती मानसिक और शारीरिक व्याधिसे तथा भूख-प्याससे पीड़ित हो दाने-दानेकी चिन्तामें नगरमें घर-घर भटकने लगी। इस प्रकार कलावती भी प्रतिदिन अन्नके लिये भटकने लगी। एक दिन भूखसे व्याकुल कलावती घरसे निकलकर किसी ब्राह्मणके घर पहुँची। उसने देखा, वहाँ सत्यनारायणका व्रत हो रहा है। वह वहाँ बैठ गयी और कथा सुनकर उसने भगवान्‌से मनोरथपूर्तिके लिये प्रार्थना की। इसके बाद प्रसाद लेकर उसी रातको वह अपने घर लौट आयी।

लीलावतीने कन्याको बहुत डाँटकर कहा—बेटी! तू इतनी राततक कहाँ थी? तेरे मनमें क्या है?

कलावतीने उत्तर दिया—माता! ब्राह्मणके घर सत्यनारायण भगवान्‌का व्रत था। मैं उसीको देख रही थी। सत्यनारायणका व्रत मनोरथ पूर्ण करनेवाला है।

कन्याकी यह बात सुनकर लीलावती व्रत करनेको तैयार हुई और उस साध्वी साधुपत्नीने अपने सुहृद्-बन्धुओंके साथ सत्यनारायण-व्रत किया। 'मेरे स्वामी और जामाता शीघ्र घर लौट आवें'—सत्यनारायणदेवसे उसने बार-बार इस वरके लिये प्रार्थना की और कहा, 'प्रभो! मेरे

१०६० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पति और दामादका अपराध क्षमा कीजिये।' वणिक्पत्नीके व्रतसे प्रभु सत्यनारायण प्रसन्न हो गये और उन्होंने श्रेष्ठ राजा चन्द्रकेतुको स्वप्नमें दर्शन देकर कहा, 'राजन्! सबेरा होते ही दोनों वणिकोंको छोड़ देना और उनका जो धन छीना है, उससे दुगुना उन्हें दे देना। नहीं तो मैं राज्य, धन और पुत्रके साथ तुम्हारा विनाश कर दूँगा।' राजाको इतना कहकर प्रभु अन्तर्धान हो गये। प्रातःकाल होते ही राजा सभामें गये और स्वजनोंके साथ वहाँ बैठकर उन्होंने दूतोंको आज्ञा दी कि 'अभी जाकर दोनों बन्दी महाजनोंको तुरंत कैदसे छोड़ दो।'

राजाकी आज्ञा पाकर दूतोंने दोनों महाजनोंको मुक्त कर दिया और उन्हें साथ लेकर विनयपूर्वक राजासे कहा, 'दोनों वणिकोंकी हथकड़ी-बेड़ी खोलकर हम उन्हें यहाँ ले आये हैं।' इसी समय उन दोनोंके मनमें पुरानी बातका स्मरण हुआ और भगवान् सत्यनारायणकी महिमाको याद करके वे विस्मय और भयसे विह्वल हो गये। उन्होंने राजा चन्द्रकेतुको प्रणाम किया। राजाने भी उनको देखकर आदरपूर्वक कहा, 'दैवात् तुम्हें यह महान् कष्ट भोगना पड़ा। अब तुम्हें कोई भय नहीं है। तुम मुक्त हो, जाओ, क्षौर करा लो।' तदनन्तर श्रीमान् राजा चन्द्रकेतुने सोने और रत्नोंसे बने हुए गहनोंके द्वारा दोनों वणिकोंको अलंकृत किया। बड़ी मीठी वाणीसे उनको अति सुख पहुँचाया और छीने हुए धनसे दूना धन देकर उनसे कहा, 'साधो! अपने घर जाओ।'

साधुने राजाको प्रणाम करके कहा—आपकी कृपासे ही मैं घर जानेमें समर्थ हो सका हूँ। उस समय साधुने मंगलाचार करते हुए यात्रा की। ब्राह्मणोंको धनका दान किया और अपने नगरकी ओर दोनों चले।

कुछ ही दूर आगे बढ़नेपर प्रभु सत्यनारायणने दण्डीके वेशमें आकर उनसे पूछा—बताओ तो तुम्हारी नावमें क्या है? तब महाजनने प्रमत्त-से होकर बड़ी अवहेलनाके साथ हँसी उड़ाते हुए कहा, 'दण्डी! क्यों पूछ रहे हो? तुम्हें रुपये चाहिये क्या? मेरी नावमें तो लता-पत्र भरे हैं।'

दण्डीके वेशमें आये हुए सत्यनारायण भगवान्ने साधुके निष्ठुर वचन सुनकर कहा, 'तुम्हारे वचन सत्य हों।' और यह कहकर वे तुरंत वहाँसे चल दिये। दण्डीके कुछ दूर चले जानेपर साधु भी समुद्रके किनारे पहुँचा और नित्य-क्रियादि करके नावपर गया तो देखा, नावमें लता-पत्र भरे पड़े हैं। यह देखकर उसे बड़ा विस्मय हुआ और वह मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। थोड़ी देरके बाद चेत होनेपर वह बड़ी चिन्तामें डूब गया। श्वशुरकी यह दशा देखकर जामाताने उनसे कहा, 'आप किसलिये शोक कर रहे हैं? यह सब दण्डीके शापका फल है। वे सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। वे ही हर्ता-कर्ता हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं। हमलोग उन्हींकी शरण लें, तो हमारा मनोरथ पूर्ण हो जायगा।'

जामाताकी यह बात सुनकर साधु दौड़कर दण्डीके पास पहुँचा और उनके दर्शन करके भक्तिपूर्वक नमस्कार कर उनसे बोला—मैं बड़ा दुरात्मा हूँ। आपकी मायासे मुग्ध होकर मैंने जो कुछ कह दिया है, उसके लिये क्षमा करें। मैंने आपके सामने दुष्ट वाक्योंका प्रयोग किया है। हे नाथ! मुझे इसके लिये क्षमा करें। क्षमा ही साधुओंका धन है। साधु तो दूसरेका उपकार करनेमें ही लगे रहते हैं। यों कहकर शोक-विकल वणिक् बार-बार प्रणाम करने लगा और रोने लगा।

साधु वणिक्को विलाप करते देखकर दण्डीने कहा—रोओ मत, मेरी बात सुनो। दुर्मते! तुम मेरा अपमान करके मेरी पूजासे विमुख हो गये थे। उसीके फलस्वरूप बार-बार दुःखको प्राप्त होते हो।

भगवान्के इस प्रकारके वचनोंको सुनकर साधुने भगवान्की स्तुति की। साधु बोला—

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०६१

प्रभो! ब्रह्मादि स्वर्गवासी देवता आपकी मायासे मोहित होकर आपके आश्चर्यमय रूप और गुणोंको नहीं जान पाते। मैं भी आपकी मायासे मुग्ध हूँ, अतएव आपको कैसे जान सकूँगा। आप प्रसन्न हों। मैं अपने वैभवके अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मैं आपके शरणागत हूँ। मुझे पुत्र और वित्त दीजिये। मेरी रक्षा कीजिये।

साधुके इस प्रकारके भक्तियुक्त वचनोंको सुनकर भगवान् जनार्दन परितुष्ट हो गये और साधुको मनचाहा वर देकर वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर साधुने नावपर चढ़कर देखा, नाव रत्नादिसे भरी है। 'सत्यदेवकी दयासे मुझे वांछित फल मिल गया।' यों कहकर साधुने अपने मित्रोंके साथ विधिवत् सत्यनारायणकी पूजा की और बड़े हर्षके साथ यात्रा आरम्भ की। नौका बड़े वेगसे चलने लगी। दोनों अपने देशमें आ पहुँचे। साधुने जामातासे कहा—'वत्स ! वह देखो, मेरी पुरी दिखायी दे रही है।' तत्पश्चात् साधुने अपने धनके रखवाले दूतको नगरमें भेजा। दूतने साधुकी पत्नी लीलावतीके समीप जाकर हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कहा, 'आपके पतिदेव नाना प्रकारके धन-रत्नोंके साथ अपने जामाता और सुहृद्-मित्रोंसे घिरे हुए आ रहे हैं।' साध्वी वणिक्-पत्नी दूतके मुखसे स्वामी और जामाताके आनेका समाचार सुनकर बड़ी हर्षित हुई और सत्यदेवकी पूजा करके उसने अपनी लड़कीसे कहा, 'मैं पतिकी अगवानीके लिये जाऊँगी, तुम भी तुरंत मेरे साथ चलो।' माताकी बात सुनकर कलावतीने सत्यनारायणका व्रत किया; परंतु प्रसाद लिये बिना ही वह पतिके सामने चल पड़ी। इससे सत्यनारायणदेव रुष्ट हो गये। धन-रत्न और जँवाईको लेकर नौका जलमें अदृश्य हो गयी। कलावतीने जब पतिको नहीं देखा, तब वह शोकसे अत्यन्त व्याकुल होकर रोती हुई जमीनपर गिर पड़ी। वह अपने पति और नावके न दीखनेसे अत्यन्त शोकातुर थी। कन्याकी इस दशाको देखकर साधु बहुत डर गया। उसने सोचा, यह क्या आश्चर्य हो गया ! नाव खेनेवाले भी बड़ी चिन्ता करने लगे। यह सब देखकर पतिव्रता लीलावती अत्यन्त दुःखसे विह्वल होकर विलाप करती हुई स्वामीसे बोली, 'मैंने अभी-अभी जँवाईको देखा था। क्षणमात्रमें ही नौकाके साथ जामाता अदृश्य हो गये। अब वे कहीं नहीं दीख रहे हैं। पता नहीं, किस देवताने उन्हें इस प्रकार हरण कर लिया। आप क्या भगवान् सत्यदेवके प्रभावको नहीं जानते ?' लीलावती इस प्रकार कहकर विलाप करने लगी। उसीके साथ सारे बन्धु-बान्धव भी रोने लगे। लीलावती अपनी कन्याको गोदमें लेकर रुदन करने लगी। कन्या कलावतीने स्वामीको डूबा हुआ जानकर दुःखित हृदयसे पतिकी पादुकाको लेकर सती होनेका निश्चय किया। धर्मको जाननेवाला साधु वणिक् कन्याकी यह स्थिति देखकर अपनी पत्नीके साथ शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो उठा और उसने मन-ही-मन सोचा—'निश्चय ही सत्यदेवकी मायाके द्वारा ही मेरे जामाता हरे गये हैं। मैं अपने वैभवके अनुसार भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करूँगा।'

साधुने वहाँ सब लोगोंको बुलाकर यह बात कही और अपना मनोरथ व्यक्त करते हुए पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर वह बार-बार भगवान् सत्यदेवको प्रणाम करने लगा। इससे सत्यदेव प्रसन्न हो गये। उन्होंने आकाशसे ही साधुके प्रति कहा—'साधो ! तुम्हारी कन्या मेरे भोगका तिरस्कार करके पतिको देखनेके लिये आ गयी। इसीलिये उसका पति अदृश्य हो गया। अब वह घर जाय। प्रसाद लेकर लौटकर आवे, तब अवश्य ही उसे स्वामीका सुख प्राप्त होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं है।'

वणिक्-नन्दिनी कलावतीने गगनमण्डलसे यह प्राणदान करनेवाली वाणी सुनी और सुनकर

१०६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तुरंत ही वह घर चली गयी। वहाँ जाकर उसने प्रसाद लिया। तदनन्तर जब वह लौटकर आयी, तब अपने पतिको, नावको और समस्त बन्धुओंको देखकर अत्यन्त सुखी हुई। उसने पितासे कहा— 'पिताजी! आइये, हमलोग घर चलें। अब देर क्यों कर रहे हैं।' कन्याकी इस बातको सुनकर वणिक् प्रसन्न हो गया और विधि-विधानके साथ भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करके धन-रत्न और बन्धुओंके साथ वह अपने घर पहुँचा। तदनन्तर प्रत्येक संक्रान्ति और पूर्णिमाको यथाविधि सत्यनारायणकी पूजा करता हुआ वह इस लोकमें सुखी होकर अन्तमें सत्यपुरको प्राप्त हो गया।

सूतजी बोले—श्रेष्ठ मुनियो! एक उपाख्यान और सुनिये। पूर्वकालमें वंशध्वज नामक एक प्रजापालनमें तत्पर राजा थे। उन्होंने सत्यदेवके प्रसादका परित्याग किया था। इसलिये वे दुःखको प्राप्त हुए। एक दिन राजाने वनमें जाकर विविध प्रकारके मृगोंका शिकार किया। फिर जब विश्रामके लिये वे बरगदके वृक्षके नीचे आये, तब उन्होंने देखा, ग्वाले लोग बड़े सन्तुष्ट-मनसे मित्रोंको साथ लेकर भक्तिपूर्वक सत्यनारायणदेवकी पूजा कर रहे हैं। राजाने सत्यनारायणकी पूजा होती देखी, पर घमण्डके कारण न तो वे वहाँ गये और न प्रणाम ही किया। ग्वाले राजाके पास प्रसाद रख आये और पूजाकी जगह आकर प्रसाद लेकर अपने घरोंको चले गये। राजाने प्रसाद नहीं लिया। इसीलिये वे बड़े दुःखमें पड़े। उनके सौ पुत्र मर गये। धन-धान्यादि समस्त सम्पत्ति नष्ट हो गयी। तब उन्होंने सोचा, 'सत्यदेवने ही मेरा सब कुछ नष्ट कर दिया है, इसलिये जिस स्थानपर ग्वाले पूजा कर रहे थे, मैं वहाँ जाऊँगा।' राजाने मन-ही-मन ऐसा निश्चय किया और ग्वालोंके पास जाकर उनके साथ भक्ति-श्रद्धापूर्वक यथाविधि सत्यदेवकी पूजा की। तब सत्यदेवकी कृपासे वे धन-पुत्रादिसे सम्पन्न हो गये और इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें विष्णुपुरमें जा पहुँचे।

जो मनुष्य इस परम दुर्लभ सत्यनारायण-व्रतका आचरण करता है, भुक्ति-मुक्तिदायिनी इस पवित्र कथाका श्रवण करता है, वह भगवान् सत्यदेवके प्रसादसे धन-धान्यादि समृद्धिको प्राप्त होता है। इससे दरिद्र धन पाता है, बन्दी बन्धनसे छूटता है, भयभीत भयसे छुटकारा पाता है और मनुष्य इस लोकमें मनोवांछित फलको पाकर अन्तमें सत्यपुरमें गमन करता है। यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं।

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! आपलोगोंको मैंने श्रीसत्यनारायण-व्रत सुनाया। इस व्रतका आचरण करके मनुष्य सारे दुःखोंसे छूट जाता है। विशेषतः कलिकालमें सत्यपूजा महान् फल देनेवाली है। इन देवको कोई 'सत्यनारायण' कहते हैं और कोई-कोई 'सत्यदेव' कहते हैं। ये नाना रूप धारण करके सबके मनोरथको प्रदान करते हैं। ये सनातन सत्यदेव कलियुगमें सत्यव्रतके रूपमें अवतीर्ण होंगे।

श्रेष्ठ मुनियो! जो मनुष्य नित्य इसका पठन या श्रवण करता है, सत्यदेवके प्रसादसे उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं*।

रेवा-खण्ड सम्पूर्ण

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आवन्त्यखण्ड समाप्त

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* यह सत्यनारायण-व्रत-कथा बंगवासी प्रेस, कलकत्तासे प्रकाशित बंगला संस्करणके रेवाखण्डसे अनुवादित है।

१७. नागरखण्ड (पूर्वार्ध व उत्तरार्ध)

ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः

संक्षिप्त श्रीस्कन्दमहापुराण

नागरखण्ड (पूर्वार्ध)

राजा त्रिशंकुका वसिष्ठपुत्रोंके शापसे चाण्डाल होकर विश्वामित्र-मुनिकी शरणमें जाना, तीर्थसेवनसे राजाका उद्धार और विश्वामित्रजीके द्वारा उनसे यज्ञ करानेका उद्योग

स धूर्जटिजटाजूटो जायतां विजयाय वः।<br>यत्रैकपलितभ्रान्तिं करोत्यद्यापि जाह्नवी॥*<br><br>सूतजी बोले—पूर्वकालमें त्रिशंकु नामसे प्रसिद्ध एक सूर्यवंशी राजा थे। वे महर्षि वसिष्ठके शिष्य थे और सदा यज्ञ-याग आदि किया करते थे। उन्होंने प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन किया था। एक दिन राजसभामें बैठे हुए मुनिवर वसिष्ठजीसे राजाने विनयपूर्वक कहा—'भगवन्! अब मैं ऐसे यज्ञके द्वारा भगवान्‌की आराधना करना चाहता हूँ, जिससे इस शरीरके साथ ही स्वर्गलोकमें शीघ्र जाना सम्भव हो सके।'<br><br>वसिष्ठजीने कहा—राजन्! ऐसा कोई यज्ञ नहीं है जिसके द्वारा इसी शरीरसे मनुष्य स्वर्गमें जा सके। स्वयम्भू ब्रह्माजीने जिन अग्निष्टोम आदि यज्ञोंका प्रतिपादन किया है, उनके करनेपर भी दूसरे ही शरीरसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है।<br><br>त्रिशंकु बोले—प्रभो! यदि इसी शरीरसे स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला यज्ञ आप मुझसे नहीं करा सकते तो मैं किसी दूसरे ब्राह्मणको आचार्य बनाकर उस यज्ञका अनुष्ठान करूँगा।<br><br>सूतजी कहते हैं—त्रिशंकुका यह वचन सुनकर महर्षि वसिष्ठने हँसते हुए कहा—'पृथ्वीनाथ! आज ही वैसा यज्ञ कीजिये (मुझे कोई आपत्ति नहीं है)।' तब राजा वसिष्ठ मुनिको प्रणामकरके उस स्थानपर गये जहाँ उनके सौ पुत्र रहते थे। उनके सामने भी राजाने अपना वही प्रयोजन रखा। तब उन्होंने भी वही उत्तर दिया जो वसिष्ठजीने कहा था। यह सुनकर राजाने पुनः उनसे कहा—'गुरुपुत्रो! आपके पिताजी इस समय मुझे सशरीर स्वर्ग भेजनेमें असमर्थ हो गये हैं, अतः मैंने उनको छोड़ दिया है। अब मेरे पुरोहित वे नहीं रहे। यदि आपलोग भी मुझसे वैसा यज्ञ नहीं करवायेंगे तो आपको भी छोड़कर मैं शीघ्र दूसरे पुरोहितका वरण करूँगा।' यह सुनकर वे सभी गुरुपुत्र कुपित हो उठे और कठोर वाणीमें बोले—'पापी! तूने हितैषी गुरुका त्याग किया है, इसलिये तू सब लोगोंके द्वारा निन्दित चाण्डाल हो जा।' उनका यह वाक्य पूरा होते ही राजा त्रिशंकु उसी क्षण विकृत एवं विकराल शरीरधारी चाण्डाल हो गये। अपनेको विकृत चाण्डालके रूपमें देखकर राजाको बड़ी लज्जा हुई। वे बहुत दुःखी होकर इधर-उधर घूमने लगे। सोचने लगे—'क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, किस प्रकार मुझे शान्ति मिलेगी? मैं जलती हुई आगमें समा जाऊँ अथवा विष खा लूँ? किस उपायसे आज मेरी मृत्यु हो जाय। ऐसे घृणित शरीरके द्वारा उन स्त्रियोंको मैं कैसे देखूँगा, जिनके साथ वैसे दिव्य शरीरसे क्रीड़ा की है।'<br><br>इस प्रकार शोक करते हुए राजाने रात्रिके

* भगवान् शंकरका वह जटा-जूट आपलोगोंको विजय देनेवाला हो, जिसके एक भागमें आज भी श्रीगंगाजी उसके पके होनेका भ्रम उत्पन्न करती है।

१०६४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

समय अपने नगरमें प्रवेश किया तथा राजद्वारपर ठहरकर मन्त्रियोंसहित पुत्रको बुलाकर शापसम्बन्धी सब बातें बतायीं। दूर खड़े हुए राजाका यह वचन सुनकर वे मन्त्री और पुत्र भी शोकमग्न हो रोने लगे। तब राजाने मन्त्रियोंसे कहा—'यदि मेरे प्रति तुम्हारे हृदयमें अविचल भक्तिभाव हो तो अब मेरे पुत्रका मन्त्रित्व स्वीकार करो। मेरा ज्येष्ठ पुत्र हरिश्चन्द्र मुझे बहुत ही प्रिय है, अतः शान्तचित्त होकर इसीको मेरे स्थानपर यथासम्भव शीघ्र राजा बनाओ। मैं तो अब अपने संकल्पको पूरा करूँगा। या तो इसी प्रयत्नमें प्राण दे दूँगा या सदेह स्वर्गलोकमें जाऊँगा।' ऐसा कहकर त्रिशंकु वनमें चले गये और मन्त्रियोंने उनके पुत्रको राजसिंहासनपर बिठा दिया।

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर त्रिशंकुने यह निश्चय किया कि इस समय त्रिलोकीमें विश्वामित्र मुनिको छोड़कर दूसरा कोई ऐसा नहीं है जो मुझे इस भयंकर दुःखसे बचावे। ऐसा विचारकर उन्होंने कुरुक्षेत्रको प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर वे विश्वामित्रका आश्रम ढूँढ़ने लगे। इतनेमें ही दूरसे उन्हें काले धूएँका पुंज दिखायी दिया और जलका स्पर्श करके आती हुई शीतल वायुने उनकी सारी थकावट दूर कर दी। इससे जलाशय और आश्रमका अनुमान करके वे जल्दी-जल्दी चलने लगे। थोड़ी ही देरमें नदीके तटपर एक मनोहर आश्रम दृष्टिगोचर हुआ, जो सब ओरसे फूले-फले वृक्षोंद्वारा घिरा था। वहाँ नेवले सर्पोंके, उल्लू कौवोंके, बिलाव चूहोंके और व्याघ्र नाना प्रकारके मृगोंके साथ खेल रहे थे। उस आश्रमपर पहुँचकर त्रिशंकुने तपस्याके निधान विश्वामित्र मुनिको देखा। उनका दर्शन करके दूर खड़े हो अपने नामका परिचय देते हुए उन्होंने मुनिको साष्टांग प्रणाम किया और कहा—'विप्रवर! मैं शापसे छूटनेके लिये सम्पूर्ण जगत्के मित्र महर्षि विश्वामित्रकी शरणमें आया हूँ।'

विश्वामित्रजी बोले—नृपश्रेष्ठ! तुम तो वसिष्ठजीके यजमान हो, वसिष्ठ अथवा उनके पुत्रोंको ही तुम्हारा यज्ञ कराना चाहिये; फिर उन्होंने तुम्हें शाप क्यों दिया ? तुमने उनका क्या अपराध किया था?

त्रिशंकुने कहा—मुने! मैंने वसिष्ठजीसे ऐसा यज्ञ करानेके लिये प्रार्थना की थी, जिसके द्वारा मेरा इसी शरीरसे स्वर्गलोकमें जाना हो सके। मेरी प्रार्थना सुनकर उन्होंने उत्तर दिया—'राजन्! ऐसा कोई यज्ञ नहीं है, जिससे देहान्तर ग्रहण किये बिना इसी शरीरसे स्वर्गलोकमें जाया जा सके।' इसपर मैंने उनसे कहा—'यदि आप किसी उत्तम यज्ञके प्रभावसे मुझे इस शरीरके साथ ही स्वर्गलोकमें नहीं पहुँचायेंगे तो मैं आज ही अपने इस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये किसी दूसरे ब्राह्मणको अपना पुरोहित बनाऊँगा।' मेरा यह विचार जानकर वे बोले—'जिससे तुम्हारा भला हो, वह करो।' तब मैंने उनके पुत्रोंके पास जाकर वसिष्ठजीके साथ की हुई सारी बातें कह सुनायीं। इसपर उन सबने मुझे शाप देकर चाण्डालकी दशामें पहुँचा दिया। मुनीश्वर! तब मैंने मन-ही-मन आपका स्मरण किया और बहुत दूरसे बड़ी भारी आशा लगाकर आपके पास यहाँ कुरुक्षेत्रमें आया हूँ। मुने! आपके लिये त्रिलोकीमें कुछ भी असाध्य नहीं है। अतः आप मुझ दुखियाके दुःख-निवारणका कोई उपाय करें।'

त्रिशंकुकी यह बात सुनकर विश्वामित्रजीने कहा—राजन्! मैं तुमसे वैसा यज्ञ कराऊँगा जिससे क्षणभरमें तुम स्वर्गलोकमें चले जाओगे। आओ, मेरे साथ तीर्थयात्राके लिये चलो, जिससे चाण्डालतासे मुक्त होकर यज्ञ करनेके योग्य हो जाओ। यों कहकर विश्वामित्रजी त्रिशंकुको अपने पीछे-पीछे आनेका आदेश दे तीर्थयात्राके लिये चल दिये। उन महात्माके साथ तीर्थोंमें विचरते हुए त्रिशंकुका बहुत समय बीत गया, किंतु वे पाप और चाण्डालत्वसे छुटकारा न पा सके। क्रमशः यात्रा करते हुए वे दोनों अर्बुदाचल (आबू)-

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १०६५ ---|---

के समीप आये। उस पर्वतपर चढ़कर उन्होंने पापनाशक अचलेश्वरका दर्शन किया। मन्दिरसे निकलनेपर वहीं मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेयजीसे भेंट हो गयी। विश्वामित्रजीको देखकर मार्कण्डेयजीने पूछा—'मुनीश्वर! इस समय आप कहाँसे आ रहे हैं और आपके पीछे यह कौन दिखायी देता है?'

विश्वामित्रजी बोले—मुने! ये राजाओंमें श्रेष्ठ त्रिशंकु हैं। वसिष्ठके पुत्रोंने क्रोध करके इन्हें चाण्डालकी दशाको पहुँचा दिया है। मैंने इनसे प्रतिज्ञा की है कि जबतक तुम पवित्र नहीं हो जाओगे तबतक मैं तुम्हारे साथ सब तीर्थोंमें भ्रमण करूँगा। मैंने पृथ्वीके सभी तीर्थों और मन्दिरोंमें भ्रमण कर लिया। परंतु ये अभीतक पवित्र न हो सके। अतः अब मैं इस पृथ्वीको त्यागकर कहीं अन्यत्र चला जाऊँगा।

मार्कण्डेयजीने कहा—मुने! यदि ऐसा है तो आप इस पृथ्वीको त्यागकर कहीं न जाइये। इस पर्वतसे नैर्ऋत्यकोणमें आनर्त देशके भीतर एक स्थान है, जहाँ श्रेष्ठ देवताओंने पहले सुवर्णमय शिवलिंगकी स्थापना की थी। पातालमें जो हाटकेश्वर लिंग प्रसिद्ध है उसीके नामपर इस शिवलिंगको भी लोकमें हाटकेश्वर कहते हैं। द्विज श्रेष्ठ! वहीं पातालगंगाका जल है जो रसातलसे प्रकट हुआ है। उसीके द्वारा यत्नपूर्वक पातालमें प्रवेश करके श्रद्धापूर्वक आपलोग पातालगंगाके जलमें स्नान करें। तत्पश्चात् ये त्रिशंकु हाटकेश्वरका दर्शन करके चाण्डालत्वसे मुक्त एवं शुद्ध हो जायँगे। | मार्कण्डेयजीका यह वचन सुनकर विश्वामित्र मुनि त्रिशंकुको साथ लेकर वहाँ गये और पातालमें प्रवेश करके राजाको पातालगंगाके जलमें नहलाया। स्नानके पश्चात् हाटकेश्वरका दर्शन करके वे चाण्डालत्वसे मुक्त होकर सूर्यके समान तेजस्वी हो गये। निष्पाप होकर त्रिशंकुने मुनिवर विश्वामित्रको प्रणाम किया। मुनि बोले—'राजेन्द्र! सौभाग्यकी बात है, जो तुम इस समय चाण्डालत्वसे छुटकारा पा गये। मित्र! तुम्हारे लिये मैं स्वयं ब्रह्माजीके पास जाकर प्रार्थना करूँगा कि वे तुम्हारे यज्ञमें यज्ञभाग ग्रहण करें। अतः जबतक मैं ब्रह्मलोकसे आता हूँ, तबतक तुम यज्ञके सब सामान यहीं मँगाओ।' राजाने 'बहुत अच्छा' कहकर मुनिकी आज्ञा स्वीकार की। तब वे ब्रह्माजीके समीप जा उन्हें प्रणाम करके बोले—'प्रपितामह! मैं राजा त्रिशंकुके द्वारा इस संकल्पसे यज्ञ कराऊँगा कि वे मनुष्य-शरीरसे ही आपके लोकमें जा सकें। अतः आप शिव, विष्णु आदि सब देवताओंके साथ यज्ञमण्डपमें पधारें।'

ब्रह्माजीने कहा—ब्रह्मन्! देहान्तर ग्रहण किये बिना केवल यज्ञकर्मसे स्वर्गकी प्राप्ति नहीं हो सकती। हम सब देवताओंके मुख अग्नि हैं। वेदोक्त विधिसे भलीभाँति आहुति देनेपर हम सब लोग यज्ञमें अपना भाग ग्रहण करेंगे। अतः राजा अग्निमुखमें ही आहुति दें। फिर उस यज्ञके प्रसादसे देहत्यागके पश्चात् वे अवश्य स्वर्ग प्राप्त करेंगे।

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विश्वामित्रजीके द्वारा त्रिशंकुका यज्ञ पूरा करके नूतन सृष्टि-रचनाका उद्योग, त्रिशंकुका ब्रह्माजीके साथ स्वर्गगमन

सूतजी कहते हैं—ब्रह्माजीका वचन सुनकर विश्वामित्रजी बोले—'अच्छा तो आप मेरी तपस्याका बल देखिये। मैं त्रिशंकुसे विधिवत् दक्षिणायुक्त यज्ञ कराकर उसीके द्वारा उन्हें यहाँ ले आऊँगा।' ऐसा कहकर विश्वामित्रजी पृथ्वीपर | लौट गये और महात्मा त्रिशंकुके यज्ञको सम्पन्न करनेकी चेष्टामें संलग्न हो गये। यज्ञ-प्रारम्भके लिये योग्य शुभ समय आनेपर उसी श्रेष्ठ वनमें उन्होंने वेदोंके पारंगत ब्राह्मणोंको बुलाकर राजाको यज्ञकी दीक्षा दी। उस यज्ञमें वे स्वयं ही अध्वर्यु

१०६६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

(यजुर्वेदपाठी) हुए। शाण्डिल्य मुनि होता (ऋग्वेदी)-के पदपर प्रतिष्ठित हुए, महर्षि गौतमको ब्रह्माका पद प्राप्त हुआ, मित्रावरुण कर्ममें महर्षि च्यवन आग्नीध्र बनाये गये। याज्ञवल्क्य उद्गाता (सामवेदी), जैमिनि प्रतिहर्ता, शंकुकर्ण प्रस्तोता, गालव उन्नेता, पुलस्त्यजी उच्छंसी तथा मुनीश्वर गर्ग होता हुए। अत्रि नेष्टा तथा भृगुजी अच्छावाक बनाये गये। श्रद्धालु त्रिशंकुने इन सबको ऋत्विज बनाया और स्वयं बाल कटवाकर मृगचर्म धारण किया। हाथमें हरिणका सींग लिया और दूध पीकर रहने लगे। उपर्युक्त सब महर्षियोंको वरण करके उन्हें यज्ञकर्ममें लगाया। इस प्रकार दीर्घकालतक चालू रहनेवाले उस यज्ञके आरम्भ होनेपर सब दिशाओंसे वेद-वेदांगोंके पारगामी ब्राह्मण वहाँ आने लगे। बहुत-से दीन, अन्ध, कृपण (कंगाल) गृहस्थ आये। वहाँ सब ओर अन्नमय पर्वत खड़े किये गये थे और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दान देनेके लिये अनेक प्रकारकी असंख्य वस्तुएँ संग्रह की गयी थीं। देवता अग्निमुखसे राजाके हविष्यको ग्रहण करते रहे। इस प्रकार यज्ञ करते हुए राजाके बारह वर्ष व्यतीत हो गये, किंतु उन्हें अभीष्ट फलकी प्राप्ति नहीं हुई। तत्पश्चात् उन्होंने यज्ञान्त-स्नान किया तथा ऋत्विजोंको यथायोग्य दक्षिणाएँ देकर तृप्त किया। ब्राह्मणोंको विदा करनेके पश्चात् राजा त्रिशंकुने वहाँ आये हुए अन्य सम्बन्धियों और मित्रोंको भी विदा किया। तदनन्तर वे विश्वामित्रजीसे बोले—'ब्रह्मन्! आपके प्रसादसे मुझे दुर्लभ फलकी प्राप्ति हुई। चाण्डालता भी नष्ट हो गयी, परंतु इसी शरीरसे स्वर्गलोक नहीं मिला। केवल यही एक दुःख मेरे हृदयमें काँटेकी तरह चुभ रहा है। मुने! अब वसिष्ठके पुत्र यह सब बात सुनकर मेरा उपहास करेंगे। अतः अब मैं वनमें रहकर तपस्या करूँगा। राज्य नहीं करूँगा।'

त्रिशंकुकी यह बात सुनकर विश्वामित्रजी बोले—राजन्! खेद न करो, मैं तुम्हें इसी शरीरसे स्वर्गलोकमें भेजूँगा। इतना कहकर विश्वामित्रने चन्द्रशेखर भगवान् शंकरका दर्शन किया और इस प्रकार उनकी स्तुति की—

विश्वामित्रजी बोले—अचिन्त्य महादेव! आपकी जय हो। पार्वतीवल्लभ! आपकी जय हो। कृष्ण! जगन्नाथ! कृष्ण! जगद्गुरो! आपकी जय हो। अचिन्त्य! अमेय! अनन्त! अच्युत! आपकी जय हो। अमर! अजेय! अव्यय! सुरेश्वर! आपकी जय हो। सर्वव्यापक! सर्वेश्वर! सर्वदेवाश्रय! सबके ध्यान करनेयोग्य शिव! आपकी जय हो। सर्वपापनाशन! आप ही धाता, विधाता, कर्ता और रक्षक हैं। देवेश! चार प्रकारके प्राणियोंका कल्याण करनेवाले भी आप ही हैं। जैसे तिलमें तेल और दहीमें घी व्याप्त रहता है, उसी प्रकार समस्त संसार आपसे व्याप्त है। आप ही ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और अग्नि हैं। आप ही वषट्कार, यज्ञ तथा सूर्य हैं। अथवा बहुत कहने या स्तुति करनेकी क्या आवश्यकता है, प्रभो! मैं आपकी वेदवर्णित विभूतिको बहुत संक्षेपमें बतला रहा हूँ। भगवन्! तीनों लोकोंमें चर और अचर जो कुछ दिखायी देता है, सबमें आप व्याप्त हैं। ठीक उसी तरह, जैसे काष्ठमें अग्नि व्याप्त रहती है।

श्रीभगवान् बोले—मुने! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।

विश्वामित्रजीने कहा—महेश्वर! आपकी कृपासे मुझमें संसारकी सृष्टि करनेका सामर्थ्य हो जाय।

'एवमस्तु' कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये और विश्वामित्रजी वहीं स्थित हो ध्यानपूर्वक चार प्रकारकी सृष्टि रचने लगे। इस प्रकार जलमें प्रवेश करके सृष्टिचिन्तन करनेवाले विश्वामित्रने जिन-जिन वस्तुओंकी सृष्टि की, वे सब आज भी दृष्टिगोचर होती हैं। उन्होंने समस्त देवगण, नक्षत्र, ग्रह, मनुष्य, नाग, राक्षस, वृक्षयुक्त लता, सप्तर्षि और ध्रुव आदि सबकी रचना की तथा उन सबको अपने-अपने कर्तव्यकर्मोंमें नियुक्त किया। तब आकाशमें एक ही साथ दो सूर्य और दो चन्द्रमा उदित हुए तथा अन्यान्य ग्रह भी दुगुने उत्पन्न हो गये। सप्तर्षियोंसहित सम्पूर्ण नक्षत्र भी

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०६७


दुगुने भासित होने लगे। इस प्रकार आकाशमें सभी ग्रह, नक्षत्र द्विगुण हो एक-दूसरेसे स्पर्धा रखकर लोगोंके मनमें भ्रम उत्पन्न करने लगे। यह देख इन्द्र सब देवताओंके साथ ब्रह्माजीके पास गये और प्रणाम करके बोले—‘सुरश्रेष्ठ! इस समय विश्वामित्रजीने सृष्टिरचना प्रारम्भ की है। अतः जबतक उनकी सृष्टिसे यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त न हो जाय, तबतक ही आप स्वयं जाकर उन्हें रोकिये।’ तब ब्रह्माजी मुनिवर विश्वामित्रके पास गये और इस प्रकार बोले—‘ब्रह्मर्षे! तुम मेरे कहनेसे सृष्टि-रचनाका कार्य बंद करो।’

विश्वामित्रजी बोले—यदि नृपश्रेष्ठ त्रिशंकु इसी शरीरसे आपके लोकमें चले जायें, तो मैं नयी सृष्टि नहीं करूँगा।

ब्रह्माजीने कहा—मुनीश्वर! मुझे स्वीकार है, ये राजा त्रिशंकु इसी शरीरसे मेरे साथ स्वर्गलोकमें चलें। तुम सृष्टिरचनासे मुक्त हो जाओ।

ऐसा कहकर ब्रह्माजी त्रिशंकुको साथ लेकर चले गये और महर्षि विश्वामित्र हर्षमें भरकर वहीं टिके रहे।

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नागबिलका महत्त्व, इन्द्रकी ब्रह्महत्यासे मुक्ति, रक्तशृंग-पर्वतके द्वारा नागबिलका भरा जाना और मृगीके शापसे राजा चमत्कारका कोढ़ी होना

सूतजी कहते हैं—तबसे लेकर स्थान तीनों लोकोंमें उत्तम तीर्थके रूपमें विख्यात हुआ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पदार्थोंके देनेवाला है। जो मनुष्य श्रद्धायुक्त चित्तसे वहाँ रहकर मृत्युको प्राप्त होता है, वह पापाचारी हो तो भी मोक्षको प्राप्त होता है। कीट, पक्षी, पतंग, पशु और मृग आदि जितने जन्तु हैं, वे भी वहाँ मरनेपर निश्चय ही भगवान् शिवके लोकमें जाते हैं। जो श्रद्धासे पवित्र किये हुए मनके द्वारा वहाँ स्नान करते हैं वे स्वर्गलोकमें जाते हैं। तदनन्तर विश्वामित्र मुनिने उस तीर्थका उत्तम माहात्म्य देखकर कुरुक्षेत्र छोड़कर वहीं निवास किया तथा अन्यान्य शान्त स्वभाववाले मुनि भी दूसरे तीर्थोंको त्यागकर बहुत दूर-दूरसे वहाँ आ गये और वहीं आश्रम बनाकर रहने लगे। इस प्रकार उस तीर्थके प्रभावसे सब मनुष्य स्वर्गको जाने लगे। तब कोई भी न यज्ञ करता था, न व्रत; न दान देता और न दूसरे किसी तीर्थका सेवन ही करता था। केवल उसी तीर्थमें एकाग्रचित्त होकर लोग स्नान करते और उत्तम विमानपर चढ़कर स्वर्गलोकमें चले जाते थे। उस समय स्वर्गलोक मनुष्योंसे भर गया। श्रेष्ठ देवताओंसे स्पर्धा करनेवाले मनुष्योंद्वारा स्वर्गको भरपूर हुआ देख संवर्तक वायुने इन्द्रकी आज्ञा पाकर पृथ्वीतलपर स्थित उस हाटकेश्वर-क्षेत्रको चारों ओरसे धूलसे आच्छादित कर दिया। इस प्रकार वह तीर्थभूमि केवल स्थलमात्र रह गयी। उसके बाद सर्वत्र यज्ञादि सत्कर्म होने लगे।

तदनन्तर पातालसे नागलोग बिलके मार्गसे मर्त्यलोकमें आते, पृथ्वीपर सब ओर घूमते और यहाँके भोगोंका इच्छानुसार उपभोग करके फिर उसी मार्गसे अपने निवासस्थानको लौट जाते थे। इससे वह स्थान इस पृथ्वीपर नागबिलके नामसे विख्यात हुआ।

एक समय वज्रके द्वारा वृत्रासुरका वध करनेसे इन्द्रको ब्रह्महत्या लग गयी थी, तब उनको इसका बड़ा दुःख हुआ। इस प्रकार दुःखको प्राप्त हुए इन्द्र एक पर्वतपर चढ़कर मृत्युका निश्चय करके वहाँसे अपने शरीरको नीचे गिराना ही चाहते थे कि आकाशवाणी सुनायी दी—‘इन्द्र! ऐसा दुःसाहस न करो, इस पातकसे शुद्ध होनेके लिये सावधान होकर उपाय सुनो। हाटकेश्वरक्षेत्रमें, जहाँ भगवान् शिव स्वयं विराजमान हैं, जाओ

१०६८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


और वहाँ जिस बिलके मार्गसे नागलोग इस पृथ्वीपर आते-जाते हैं उसी मार्गसे तुम भी पातालमें प्रवेश करो और वहाँ पातालगंगामें स्नान करके हाटकेश्वर महादेवकी पूजा करो। इससे तुम अवश्य ही पापसे मुक्त हो जाओगे।'

यह आकाशवाणी सुनकर इन्द्र शीघ्र ही उस क्षेत्रमें गये और नागबिलके मार्गसे पातालमें प्रवेश करके वहाँकी गंगामें स्नान किया। स्नानके पश्चात् हाटकेश्वर लिंगका पूजन किया। इससे क्षणमात्रमें उनका शरीर निर्मल हो गया और तेज बढ़ गया। इसी समय ब्रह्मा-विष्णु आदि सब देवता वहाँ आये और अत्यन्त प्रसन्न हो पापमुक्त इन्द्रसे इस प्रकार बोले—'देवराज! तुम ब्रह्महत्यासे मुक्त होकर परम पवित्र हो गये हो। अतः आओ, हम साथ ही स्वर्गलोकको चलें।' तदनन्तर सब देवता स्वर्गलोकको चले गये। इन्द्रको पुनः देवताओंका राज्य प्राप्त हुआ और स्वर्गमें वृत्रासुरके मारे जानेसे बड़ा भारी उत्सव मनाया गया।

जो कोई मनुष्य एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक इस प्रसंगका कीर्तन और श्रवण करता है वह जरा-मृत्युसे रहित परमधामको प्राप्त होता है।

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर देवगुरु बृहस्पतिजीने इन्द्रसे कहा—'देवराज! पृथ्वीपर हिमालय नामसे विख्यात एक पर्वत है। उसके तीन पुत्र हैं—मैनाक, नन्दिवर्धन और रक्तशृंग। उनमेंसे तीसरे पुत्र रक्तशृंगको ले आओ और उसीके द्वारा नागलोकके इस बिलको भर दो।'

बृहस्पतिजीका यह वचन सुनकर इन्द्र हिमालय पर्वतपर गये। वहाँ उन्होंने हिमाचलसे उनके पुत्रको माँगा। हिमाचलने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और पुत्रको उनके साथ जानेकी आज्ञा दे दी। तब रक्तशृंग बोला—'पिताजी! मेरे दोनों पंख इन्हीं इन्द्रने काट डाले हैं। अतः अब मुझमें यहाँसे जानेकी शक्ति नहीं है। ये मुझे ले जानेका विचार छोड़कर कोई दूसरा उपाय सोचें।'

इन्द्र बोले—रक्तशृंग! मैं तुम्हें अपने हाथपर रखकर ले चलूँगा। वहाँ भी तुम्हारे ऊपर हरे-भरे शोभासम्पन्न वृक्ष उत्पन्न होंगे। तुम्हारे सब ओर पुण्यतीर्थ एवं देवमन्दिर बनेंगे। मुनियोंके आश्रम बनेंगे। उस भूमिमें पापी पुरुष भी तुम्हारा दर्शन पाकर तृप्त हो जायेंगे। इसलिये तुम मेरे साथ शीघ्र चले चलो। यदि आनाकानी करोगे तो इस वज्रसे तुम्हारे सैकड़ों टुकड़े कर दूँगा।

इन्द्रकी यह बात सुनकर रक्तशृंग डर गया और सहसा वहाँ जाकर उस नागबिलमें घुस गया। इस प्रकार हिमवान्कुमार रक्तशृंगको उस बिलपर बिठाकर इन्द्रने कहा—'तुम मुझसे कोई वर ग्रहण करो।'

पर्वत बोला—देवेश! मेरे लिये यही वरदान है कि मुझपर आप सन्तुष्ट हैं। मैं आपके प्रसादसे सुखी हूँ।

इन्द्र बोले—स्वप्नावस्थामें भी मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं जाता, फिर साक्षात् दर्शन होनेपर कैसे निरर्थक होगा।

रक्तशृंगने कहा—देवराज! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं तो यही वर दें कि मेरा सम्पूर्ण ऐश्वर्य सदा ब्राह्मणोंके ही काम आये।

इन्द्र बोले—चमत्कार नामसे विख्यात एक राजा होंगे, जो तुम्हारे शिखरपर ब्राह्मणोंके रहनेके लिये एक नगर स्थापित करेंगे। उस नगरमें वेद-वेदांगोंके पारगामी विद्वान् (नागर) ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक रहकर तुम्हारे सम्पूर्ण ऐश्वर्यका उपभोग करेंगे तथा चैत्र कृष्णा चतुर्दशीको मैं स्वयं तुम्हारे शिखरपर आकर हाटकेश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिवकी पूजा करूँगा। इससे त्रिलोकमें तुम्हारे प्रभावका विस्तार होगा। अच्छा, अब मैं स्वर्गको जाऊँगा। तुम्हारा कल्याण हो।

ऐसा कहकर देवराज इन्द्र स्वर्गमें चले आये तथा रक्तशृंग उस नागबिलको ढककर स्थित हुआ। उसके शिखरपर मुख्य-मुख्य तीर्थ और मन्दिर स्थापित हो गये और मुनियोंके भी बहुत-से आश्रम बन गये।

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०६९

इसी समय आनर्तदेशके राजा चमत्कार वहाँ वनमें दुष्ट मृगोंका शिकार खेलनेके लिये आये। उन्होंने देखा, कुछ दूरपर एक वृक्षके नीचे एक मृगी स्थिर होकर खड़ी है और निर्भय होकर अपने बच्चेको दूध पिला रही है। उसे देखकर राजाने कानतक धनुषको खींचा और उसके मर्मस्थानपर बाणका प्रहार किया। उस बाणसे घायल होकर वह मृगी व्यथासे पीड़ित हो चारों ओर देखने लगी। इतनेमें ही थोड़ी दूरपर धनुष धारण किये राजाको देखकर उसने कहा—‘राजन्! यह तुमने बड़ा अनुचित कार्य किया, जो कि छोटे बच्चेकी माता मुझ दीन हरिणीका वध किया। मैं अपनी मृत्युके लिये उतना शोक नहीं करती, जैसा कि इस दूध पीते दीन मृगछौनेके लिये मुझे दुःख हो रहा है। तुमने बड़ा निर्दय कर्म किया है, इसलिये तुम इसी समय कोढ़ी हो जाओ।’

राजा बोले—शिकार खेलना तो राजाओंका धर्म है, अतः अपने धर्ममें तत्पर हुए मुझ निर्दोषको तुझे शाप नहीं देना चाहिये।

मृगी बोली—भूपाल! तुम्हारा कहना ठीक है, परंतु शिकारमें भी क्षत्रियोंके लिये यह विधान है कि जो सोया हो, मैथुनमें आसक्त हो, बच्चेको दूध पिला रहा हो या स्वयं जल पीता हो—ऐसे हिंसक पशुका वध न करे उसका वध करनेपर मनुष्य पापसे लिप्त होता है। इसीलिये मैंने तुझे शाप दिया है।

ऐसा कहकर व्यथासे पीड़ित हुई मृगीने अपने प्राणोंको त्याग दिया और राजा चमत्कार भी कोढ़ी हो गये। अपने शरीरको कोढ़युक्त देखकर दुःखी हुए राजाने सेवकोंको बुलाकर कहा—‘अब मैं तबतक तपस्या और भगवान् शिवकी पूजा करूँगा जबतक कि मेरे इस कुष्ठरोगका सर्वथा नाश न हो जाय।’ ऐसा कहकर उन्होंने अपने सभी सेवकोंको विदा कर दिया।

~~ ० ~~

शंखतीर्थकी उत्पत्ति, उसमें स्नानसे राजा चमत्कारके कुष्ठरोगकी निवृत्ति और राजाका ब्राह्मणोंके लिये श्रेष्ठ नगर निर्माण कराकर दान देना

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर राजा चमत्कार तपस्यामें तत्पर हो भिक्षान्नका नियमित आहार करते हुए प्रभास आदि सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें भ्रमण करने लगे, परंतु उन्हें कहीं कोई ऐसा मन्त्र, ओषधि या तीर्थ नहीं प्राप्त हुआ जिससे उनके रोगका भलीभाँति निवारण हो जाय। इससे राजाके मनमें बड़ा वैराग्य हुआ और वे अपने मन और बुद्धिको वशमें करके उस पुण्यक्षेत्रमें अकेले रहने लगे। वे अपने-आप गिरे हुए सूखे पत्ते चबाते और रातमें भूमिपर सोते थे। मद और अहंकार तो उन्हें छू भी नहीं गये थे। तदनन्तर कुछ कालके बाद उन्होंने तीर्थयात्राके लिये जानेवाले बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको देखा और उन सबको विनीत भावसे प्रणाम करके कहा—‘विप्रवरो! मैं आनर्तदेशका सूर्यवंशी राजा हूँ। मेरा नाम चमत्कार है। इस समय मेरे सारे शरीरमें कोढ़ फैल गयी है। क्या यहाँ ऐसा कोई दैव या मानवी उपाय है जिससे मेरा कुष्ठरोग शान्त हो जाय? यदि है तो आपलोग मुझपर कृपा करके बतावें।’

तब उन दयालु ब्राह्मणोंने कहा—नृपश्रेष्ठ! यहाँसे थोड़ी ही दूरपर सुप्रसिद्ध शंखतीर्थ है, जो सब रोगोंका नाश करनेवाला है। जो मनुष्य रोगग्रस्त, काने, अन्धे, मूर्ख, किसी अंगसे हीन या अधिक अंगवाले कुरूप और विकृत मुखवाले हैं, वे भी चैत्रमासके कृष्णपक्षकी* आदितिथि (चैत्रपूर्णिमा)—को चित्रा नक्षत्रके योगमें वहाँ स्नान करके उपवास


* यहाँ शुक्लपक्षसे मासका आरम्भ और अमावास्याको मासकी समाप्ति समझनी चाहिये। अतः जहाँ कृष्ण पक्षसे मासका आरम्भ माना जाता है, उनकी दृष्टिसे यह चैत्रका कृष्णपक्ष वास्तवमें वैशाखका कृष्णपक्ष है।

१०७०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करनेपर उसी क्षण रोगसे रहित हो जाते हैं।

राजाने पूछा— विप्रवरो! शंखतीर्थका ज्ञान मुझे जैसे हो और उसकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई है। यह सब आपलोग विस्तारपूर्वक बतावें।

ब्राह्मण बोले— राजन्! पूर्वकालमें इस पृथ्वीपर लिखित नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ मुनि रहते थे। वे शिण्डिलमुनिके पुत्र थे। उनके छोटे भाईका नाम शंख था। शंख भी अपने बड़े भाईकी भाँति धर्मशास्त्रके ज्ञाता थे और कन्द, मूल, फलका आहार करते हुए सदैव तपस्यामें संलग्न रहते थे। एक दिन शंख भूखसे अत्यन्त पीड़ित होकर लिखितके आश्रमपर गये। महात्मा लिखितका आश्रम सूना था तो भी 'ये फल अपने ही हैं' ऐसा मानकर शंखने बहुत-से फल तोड़ लिये और उन्हें खा लिया। इसी समय लिखित अपने शिष्यके साथ वहाँ आये और शंखको फल लिये हुए देखकर क्रोधपूर्वक बोले—'तुमने मेरे दिये बिना ही ये फल कैसे ले लिये? क्या तुम यह नहीं समझते कि इस प्रकार बिना पूछे लेनेसे चोरीरूप दोषसे बँध जाना पड़ता है?'

शंख बोले— द्विजश्रेष्ठ! आपने जो कुछ कहा है, वह सत्य है। मैंने आपके सूने आश्रममें ये फल लिये हैं, अतः मेरे लिये चोरीका उचित दण्ड दीजिये जिससे मेरा इहलोक और परलोक दोनों सुखद हो।

तब लिखितने उसी क्षण अपने भाई शंखके दोनों हाथ कटवा दिये। हाथ कट जानेपर शंख अपने आश्रममें लौट आये। वहाँ उन्होंने पुनः बड़ी घोर तपस्या की। इससे सन्तुष्ट होकर महादेवजीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'ब्रह्मन्! तुम मनोवांछित वर माँगो।'

शंख बोले— देव! मेरे दोनों हाथ पुनः पूर्ववत् हो जायें और यह तीर्थ मेरे नामसे प्रसिद्ध हो। जो कोई अंगहीन, अधिकांग अथवा रोगग्रस्त यहाँ स्नान करे वह शीघ्र ही फिरसे नवीन हो जाय—नूतन निर्दोष शरीर प्राप्त कर ले।

भगवान् शिवने कहा— विप्रेन्द्र! आजसे यह तीर्थ तुम्हारे नामसे विख्यात होगा। चैत्रमासके शुक्लपक्षमें जब चन्द्रमा चित्रा नक्षत्रपर स्थित हों, उस समय जो कोई न्यूनांग या अधिकांग मनुष्य भी यहाँ स्नान करेगा, वह सुवर्णके समान गौर और सर्वांगसुन्दर हो जायगा। उस दिन वहाँ श्राद्ध करनेसे पितरलोग उत्तम तृप्तिको प्राप्त होंगे। विप्रवर! आज चैत्रमासका शुक्लपक्ष है। आज तीसरे पहर चन्द्रमाका चित्रा नक्षत्रसे योग हो जायगा। उस समय उपवासपूर्वक भलीभाँति स्नान करनेपर तुम्हारे दोनों हाथ तत्काल पूर्ववत् सुन्दररूपसे युक्त हो जायेंगे।

ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये और शंखमुनिने कुतप काल (दिनके तीसरे पहर)-में स्नान किया। स्नान करते ही उनके दोनों हाथ पूर्ववत् हो गये।

नृपश्रेष्ठ! इसलिये तुम भी चैत्र शुक्लपक्षमें, जब चन्द्रमा चित्रा नक्षत्रपर स्थित हों, उस तीर्थमें स्नान करो। इससे तुम सब रोगोंसे मुक्त हो जाओगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। इस तीर्थके लिये जो समय और योग बताया गया है, उसके प्राप्त होनेपर हम साथ चलकर तुमको उस तीर्थका दर्शन करायेंगे।

सूतजी कहते हैं— तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद चैत्र शुक्लपक्ष आया और चित्रानक्षत्रमें चन्द्रमाके योगसे युक्त चतुर्दशी तिथि प्राप्त हुई तब वे राजाके हितैषी ब्राह्मण उन्हें साथ लेकर उसी समय शंखतीर्थमें गये। वहाँ राजाने अपने मनमें कुष्ठरोगके नाशका संकल्प लेकर बड़ी श्रद्धा-भक्तिसे विधिपूर्वक स्नान किया। स्नान करते ही वे कुष्ठरोगसे मुक्त एवं तेजस्वी हो गये और बड़े हर्षके साथ तीर्थके जलसे बाहर निकले, फिर उन ब्राह्मणोंको प्रणाम करके राजाने हाथ जोड़कर कहा—'विप्रवरो! आपलोगोंके प्रसादसे ही मैं इस कुष्ठरोगसे मुक्त हुआ हूँ। अब मैं राज्य नहीं करूँगा। इसी तीर्थमें रहकर सदा उत्तम तप करूँगा।

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०७१

यह राज्य, देश, हाथी, घोड़ा तथा और जो भी कुछ वैभव मेरे अधीन है, वह सब मुझपर अनुग्रह करनेके लिये ही कृपापूर्वक आपलोग ग्रहण करें।'

ब्राह्मण बोले—नृपश्रेष्ठ! हमलोग राज्यकी रक्षा करनेमें असमर्थ हैं। फिर उसे लेनेसे क्या लाभ हुआ, जिससे राज्यमें बड़ा भारी विप्लव मच जाय। पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुरामने इक्कीस बार इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे हीन करके हम ब्राह्मणोंको सौंप दिया था, परंतु बलवान् क्षत्रियोंने फिर समस्त ब्राह्मणोंका तिरस्कार करके अनायास ही बार-बार इसे छीन लिया था।

राजाने कहा—विप्रवरो! मैं तपस्यामें स्थित होकर भी आपलोगोंकी रक्षा करता रहूँगा, अतः इस कार्यमें आप लोगोंको किसी प्रकार भय नहीं मानना चाहिये।

ब्राह्मण बोले—यदि आपके मनमें हमें कुछ देनेकी दृढ़ श्रद्धा है, तो इस महापुण्यमय क्षेत्रमें एक श्रेष्ठ नगरका निर्माण कराके उसे दे दें। वह श्रेष्ठ नगर चहारदीवारी और खाईसे घिरा हुआ हो, जिससे हम वहाँ सुखपूर्वक रहें और तीर्थस्नान किया करें। हम सब लोग सदा वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर और गृहस्थधर्मका पालन करनेवाले हैं, अतः हमें गृहकी आवश्यकता है।

यह सुनकर राजाने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और उस स्थानमें एक बहुत बड़े नगरका निर्माण कराया। नगरके चारों ओर ऊँची-ऊँची चहारदीवारी और गहरी खाई तैयार करायी गयी। उस मनोहर नगरकी लंबाई और चौड़ाई एक कोसकी थी। इस प्रकार उत्तम नगरका निर्माण हो जानेपर उन राजाने ब्राह्मणोंके पैर धोये और जो जैसी-जैसी योग्यतावाले थे, उन्हें वैसे ही गृह शास्त्रोक्तविधिसे दान किये।

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राजा चमत्कारकी तपस्यासे सन्तुष्ट हुए शिवका अचलेश्वररूपसे निवास और रक्तशृंग पर्वतकी परिक्रमा आदिका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको वह उत्तम नगर दान करके राजा चमत्कार कृतकृत्य हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने अपने पुत्र-पौत्र तथा सेवकोंको बुलाकर कहा—'मैंने यह नगर बनवाकर ब्राह्मणोंको निवेदन किया है। अतः तुमलोगोंको मेरी आज्ञासे इस नगरकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये, जिससे सब ब्राह्मण यहाँ सन्तुष्टचित्त एवं सुखी रह सकें। जो राजा भक्तियुक्त होकर इन सब ब्राह्मणोंका पालन करेगा, वह इस भूतलपर महान् तेज प्राप्त करेगा। ब्राह्मणोंके प्रसादसे और मेरे वचनसे वह दीर्घायु एवं नीरोग रहेगा। इसके विपरीत जो कोई इनके प्रति द्वेष रखकर इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको कष्ट पहुँचायेगा, वह निश्चय ही नरकमें पड़ेगा।' ऐसा कहकर राजा चमत्कार तपस्यामें तत्पर हो गये। उनके पुत्र-पौत्र आदिने भी उनकी दी हुई शिक्षाके अनुसार ही बर्ताव किया।

पुत्रोंको राज्य और ब्राह्मणोंको नगर देकर राजाने अपने लिये शंखतीर्थमें आश्रम बनाया और वहीं रहकर बड़ी श्रद्धाके साथ देवाधिदेव महेश्वरकी आराधना की। उनकी आराधनासे प्रसन्न होकर महादेवजीने प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'राजन्! मुझसे मनोवांछित वर माँगो।'

राजा बोले—प्रभो! अनेक तीर्थोंका आश्रयभूत यह पुण्यतम क्षेत्र आप भगवान् हाटकेश्वरके माहात्म्यसे सब पापोंको नाश करनेवाला है। सम्पूर्ण देवताओंके अधीश्वर! मैंने श्रद्धायुक्त पवित्रचित्तसे इस उत्तम नगरका निर्माण कराके इसे ब्राह्मणोंकी सेवामें समर्पित किया है। इस नगरमें आप अपने समस्त पार्षदगणोंके साथ सदा अचलरूपसे निवास करें।

भगवान् शिवने कहा—राजन्! मैं इस नगरमें अचल होकर निवास करूँगा, अतएव तीनों लोकोंमें अचलेश्वर नामसे मेरी ख्याति होगी। जो मनुष्य यहाँ स्थित हुए मेरे स्वरूपका भक्तिपूर्वक दर्शन करेगा, उसके यहाँ सम्पूर्ण देवताओंकी विभूतियाँ अविचलरूपसे निवास करेंगी। जो माघमासके

१०७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

शुक्लपक्षकी चतुर्दशीमें श्रद्धापूर्वक मेरे लिंगमय विग्रहको घृतसे स्नान करायेगा उसका समस्त पाप सूर्योदयसे अन्धकारकी भाँति नष्ट हो जायगा। अतः भूपाल! तुम यहीं मेरे लिंगमय स्वरूपकी स्थापना करो, मैं यहाँ अचलरूपसे निवास करूँगा।

ऐसा कहकर देवेश्वर शिव अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर राजाने शीघ्रतापूर्वक एक परम मनोहर मन्दिर तैयार कराया और उसमें शिवलिंगको स्थापित किया। उसके दर्शन, स्पर्श, ध्यान और पूजनसे मनुष्य जन्मसे लेकर मृत्युतकके पापोंसे मुक्त हो जाता है। शिवलिंगकी स्थापना हो जानेपर आकाशवाणी हुई, 'नृपश्रेष्ठ! मैं इस लिंगमें नित्य, निरन्तर निवास करूँगा। मेरे इस विग्रहकी छाया सदा अचल होगी। वह केवल पृष्ठभागकी ओर रहेगी, दूसरी किसी दिशामें स्थित न होगी।'

तत्पश्चात् राजाने सब दिशाओंमें सूर्यके स्थित होनेपर उस शिवलिंगकी छायाको सदा एक ही रूपसे अविचल देखा। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने भूमिमें मस्तक रखकर उस शिवलिंगको प्रणाम करके अपने-आपको कृतार्थ माना।

सूतजी कहते हैं—'महर्षियो! आज भी उस शिवलिंगकी छाया वैसी ही दिखायी देती है जो सबको विस्मयमें डालनेवाली है। जिसकी मृत्यु छः महीनेके भीतर ही होनेवाली है। वह उस छायाको नहीं देख पाता। उस क्षेत्रमें रहनेवाले सब मनुष्य भगवान् अचलेश्वरके माहात्म्यसे सम्पूर्ण मनोवांछित फलको पाते हैं।'

महर्षियो! उस तीर्थमें चैत्र कृष्ण चतुर्दशीको ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सब देवता, सम्पूर्ण तीर्थ, सभी मन्दिर, नदी और समुद्र आदि जो भी पवित्र करनेवाली शक्तियाँ हैं वे सब उपस्थित होती हैं। जिस समय इन्द्र रक्तश्रृंग पर्वतको उस प्रदेशमें ले आये थे उसी समय उन्होंने यह कह दिया था कि तुम्हारे समीप सब देवता आवेंगे; इसलिये उस समय एक बार उस पर्वतकी प्रदक्षिणा कर लेनेपर उत्तम कल्याणकी प्राप्ति होती है। उस दिन वहाँ जो कुछ भी आदरपूर्वक दान किया जाता है, वह सूर्य और चन्द्रमाके स्थितिकालतक अक्षय पुण्य देनेवाला होता है। जो कोई मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक उत्तम अन्नसे ब्राह्मणोंको भोजन कराता है उसे गयातीर्थका फल प्राप्त होता है। जो जिस कामनाका चिन्तन करते हुए उस पर्वतकी परिक्रमा करता है वह उसी कामनाको पाता है और जो निष्कामभावसे परिक्रमा करता है वह मोक्षका भागी होता है। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि वे सब कार्य छोड़कर प्रयत्नपूर्वक रक्तश्रृंग पर्वतके समीपकी भूमिका सेवन करें। ब्राह्मणो! भगवान् हाटकेश्वरका वह क्षेत्र स्मरण करनेसे भी मनुष्यको पवित्र कर देता है; फिर दर्शन और स्पर्शसे पवित्र कर दे इसके लिये तो कहना ही क्या है?


## चमत्कारपुरमें गयाशीर्षतीर्थकी महिमा—राजा विदूरथके द्वारा तीन प्रेतोंका उद्धार

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! उस क्षेत्रकी लंबाई-चौड़ाई पाँच कोसकी है। उसके पूर्वमें गयाशीर्ष, पश्चिममें नृसिंहजीका स्थान और दक्षिण तथा उत्तरमें गोकर्णेश्वर शिव हैं। पहले वह हाटकेश्वरक्षेत्र कहलाता था। आगे चलकर वही संसारमें सर्वपातकनाशक उत्तम तीर्थके रूपमें विख्यात हुआ। राजा चमत्कारने जबसे वह स्थान ब्राह्मणोंको दे दिया, तबसे उन्हींके नामसे उसकी प्रसिद्धि हुई—लोग उसे चमत्कारपुर कहने लगे।

पूर्वकालमें विदूरथ नामसे प्रसिद्ध एक हैहयवंशी राजा हो गये हैं, जो बड़े-बड़े यज्ञ करनेवाले, दानपति तथा प्रत्येक कार्यमें दक्ष थे। एक समय
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १०७३ ---|---

राजा विदूरथ अपनी सेनाके साथ हिंसक पशुओंसे भरे हुए वनमें शिकार खेलनेके लिये गये। वहाँ उन्होंने सर्पोंके समान विषैले बाणोंसे कितने ही चीता, शम्बर तथा व्याघ्र और सिंह आदि पशुओंको मारा। उन वन-जन्तुओंमेंसे एक पशु उनके बाणसे घायल होकर भी धरतीपर नहीं गिरा। बाण लिये जोरसे भागा। राजाने भी कौतूहलवश उसके पीछे अपना घोड़ा दौड़ाया। इस प्रकार वे अपनी सेनाको छोड़कर दूसरे घोर वनमें जा पहुँचे जो मनमें भय उत्पन्न करनेवाला था। उसमें प्रायः काँटेदार वृक्ष भरे हुए थे। वहाँकी सारी भूमि रूखी, पथरीली तथा जलसे हीन थी। उस वनमें जाकर राजा विदूरथ भूख और प्याससे व्याकुल हो गये और उस दुर्गम वनका अन्त ढूँढ़ते हुए अपने घोड़ेको कोड़ेसे पीट-पीटकर हाँकने लगे। घोड़ा हवासे बाते करने लगा और उसने राजाको सब जन्तुओंसे रहित दूरस्थ दुर्गम मार्गमें पहुँचा दिया। अन्तमें वह अश्व भी भूमिपर गिर पड़ा।

तदनन्तर भूख-प्याससे व्याकुल राजा उस वनके भीतर पैदल ही चलने लगे और एक जगह लड़खड़ाकर गिर पड़े। इतनेमें ही उन्होंने आकाशमें अत्यन्त भयंकर तीन प्रेत देखे। उन्हें देखकर वे भयसे थर्रा उठे और जीवनसे निराश होकर बड़े क्लेशसे बोले—'तुमलोग कौन हो। मैं भूख-प्याससे पीड़ित राजा विदूरथ हूँ। शिकारके पीछे जीव-जन्तुओंसे रहित इस वनमें आ पहुँचा हूँ।'

तब उन तीनों प्रेतोंमें जो सबसे ज्येष्ठ था, उसने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर कहा—महाराज! हम तीनों प्रेत हैं और इसी वनमें रहते हैं। अपने कर्मजनित दोषसे हमलोग महान् दुःख उठा रहे हैं। मेरा नाम मांसाद है, यह दूसरा मेरा साथी विदैवत है और तीसरा कृतघ्न है, जो हम सबमें बढ़कर पापात्मा है। हमें जिस-जिस कर्मके द्वारा यहाँ एक ही साथ प्रेतयोनिकी प्राप्ति हुई है, वह सुनो। राजन्! हम तीनों वैदेशपुरमें देवरात नामक महात्मा ब्राह्मणके घरमें उत्पन्न हुए थे। हमने नास्तिक होकर धर्म-मर्यादाका उल्लंघन किया और हमलोग सदा परायी स्त्रियोंके मोहमें फँसे रहे। मैंने जिह्वाकी लोलुपताके कारण सदा मांस ही भोजन किया है, अतः मुझे अपने कर्मके अनुसार ही मांसाद नाम प्राप्त हुआ है। महाराज! यह दूसरा जो तुम्हारे सामने खड़ा है, इसने देवताओंका पूजन किये बिना ही सदा अन्न ग्रहण किया है, उसी कर्मके फलसे इसे प्रेत-योनिमें आना पड़ा है और देवताओंके विपरीत चलनेके कारण इसका नाम विदैवत हुआ है और जिस पापीने सदा दूसरोंके साथ कृतघ्नता—विश्वासघात किया है वही अपने कर्मके अनुसार कृतघ्न कहलाता है।

राजाने पूछा—इस मनुष्यलोकमें सब प्राणी आहारसे ही जीवन धारण करते हैं। यहाँ तुमलोगोंको कौन-सा आहार प्राप्त होता है, सो मुझे बताओ।

मांसाद बोला—जिस घरमें भोजनके समय स्त्रियोंमें युद्ध होता है, वहाँ प्रेत भोजन करते हैं। राजन्! जहाँ बलिवैश्वदेव किये बिना और भोजनमेंसे पहले अग्राशन—गोग्रास आदि दिये बिना भोजन किया जाता है, उस घरमें भी प्रेत भोजन करते हैं। जिस घरमें कभी झाड़ू नहीं लगता, जो कभी गोबर आदिसे लीपा नहीं जाता है तथा जहाँ मांगलिक कार्य और अतिथि आदिके सत्कार नहीं होते, उसमें भी प्रेत भोजन करते हैं। जिस घरमें फूटे बर्तनका त्याग नहीं किया जाता तथा वेदमन्त्रोंकी ध्वनि नहीं होती, वहाँ प्रेत आहार करते हैं। जो श्राद्ध दक्षिणासे रहित और शास्त्रोक्त विधिसे हीन होता है तथा जिसपर रजस्वला स्त्रीकी दृष्टि पड़ जाती है, वह श्राद्ध एवं भोजन हमारे अधिकारमें आ जाता है। जो अन्न केश, मूत्र, हड्डी और कफ आदिसे संयुक्त हो गया है और जिसे हीनजातिके मनुष्योंने छू दिया है, उसपर भी हमारा अधिकार हो जाता है। जो मनुष्य असहिष्णु, चुगली खानेवाला, दूसरोंका कष्ट देखकर प्रसन्न होनेवाला, कृतघ्न तथा गुरुकी

१०७४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

शय्यापर सोनेवाला है और जो वेदों एवं ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है, ब्राह्मणकुलमें पैदा होकर मांस खाता है और सदा प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह प्रेत होता है। जो परायी स्त्रीमें आसक्त, दूसरेका धन हड़प लेनेवाला तथा परायी निन्दासे सन्तुष्ट होनेवाला है और जो धनकी इच्छासे नीच एवं वृद्ध पुरुषके साथ अपनी कन्याका व्याह कर देता है, वह प्रेत होता है। जो मनुष्य उत्तम कुलमें उत्पन्न, विनयशील और दोषरहित धर्मपत्नीका त्याग करता है, जो देवता, स्त्री और गुरुका धन लेकर उसे लौटा नहीं देता है तथा जो ब्राह्मणोंके लिये धनका दान होता देख उसमें विघ्न डालता है, वह प्रेत होता है।

राजाने पूछा—मांसाद! अब यह बताओ कि कौन-सा कर्म करनेसे मनुष्य प्रेत नहीं होता है?

मांसाद बोला—जो परायी स्त्रियोंको माताके समान, दूसरोंके धनको मिट्टीके ढेलेके समान तथा सब प्राणियोंको अपने समान देखता है, वह प्रेत नहीं होता। जो सदा अन्नदानमें तत्पर, विशेषतः अतिथि-सत्कारमें प्रेम रखनेवाला, स्वाध्यायशील और व्रतपरायण होता है, वह प्रेत नहीं होता। जो शत्रु और मित्रमें समभाव रखनेवाला और मान तथा अपमानमें भी समताका त्याग न करनेवाला है, वह प्रेत नहीं होता। जो धर्ममें लगे हुए तथा धर्ममार्गपर चलनेवाले मनुष्योंका उत्साह बढ़ाता है, वह भी प्रेत नहीं होता। जो सदा यज्ञकर्ममें तत्पर, सदैव तीर्थयात्रापरायण तथा सर्वदा शास्त्र-श्रवण करनेवाला है, वह मनुष्य प्रेत नहीं होता। जो बावली, कुआँ और पोखरा बनवाता, बगीचे लगाता और पौंसले (प्याऊ) चलाता है, वह प्रेत नहीं होता। राजन्! हम इस प्रेतयोनिसे बहुत कष्ट पा रहे हैं। तुम हमारा उद्धार करनेवाले हो जाओ। गयाशीर्ष नामक पवित्र तीर्थमें जाकर तुम हम तीनोंके लिये पृथक्-पृथक् श्राद्ध करो, जिससे हमारी यह प्रेतयोनि निवृत्त हो जाय।

राजा बोले—जिस योनिमें इस प्रकार पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण होता है, आकाशमें भी चलनेकी शक्ति प्राप्त है और धर्म तथा अधर्मका सम्यक् ज्ञान है, उसकी तुम निन्दा क्यों करते हो?

मांसादने कहा—राजन्! यह प्रेतयोनि अधम देवयोनि कहलाती है। इसमें केवल तीन ही गुण हैं—पूर्वजन्मका स्मरण, आकाशगमनकी शक्ति तथा धर्म और अधर्मका निश्चय। इसके सिवा इसमें सब दोष-ही-दोष भरे हैं। यदि हमलोग इस वनकी सीमासे बाहर जाते हैं तो हमारे ऊपर बिना देखे हुए मुद्गरोंकी मार पड़ती है। इसके सिवा समस्त धार्मिक क्रियाओंका अनुष्ठान केवल मनुष्यके लिये विहित है, प्रेतयोनि अथवा देवयोनिमें गये हुए जीवोंके लिये नहीं। राजन्! जब सूर्य वृष राशिपर स्थित होते हैं तब ज्येष्ठकी चिलचिलाती हुई धूपमें हम प्याससे व्याकुल होकर दूरसे ही जलसे भरे हुए जलाशयोंको देखते हैं। यदि उनके समीप चले जायें तो हमारे ऊपर अदृष्ट मुद्गरोंकी मार पड़ती है। इसी प्रकार हम दूरसे देखते हैं, गृहस्थोंके घरोंमें नाना प्रकारकी रसोई तैयार करके रखी हुई है। हम भूखसे व्याकुल रहते हैं किंतु उस रसोईको ले नहीं सकते। अच्छे फलवाले वृक्षोंको हम देखते हैं, किंतु उन्हें सेवनका अवसर नहीं पाते। अधिक क्या कहूँ, जो-जो घृणित एवं क्लेशदायक कर्म हैं, सब हमारे पास स्वतः उपस्थित हो जाते हैं। बिना किसी दोषके हमारी प्राणयात्रा नहीं चलती। जल, छाया, अन्न और सवारी—ये सब हमारे लिये नहीं हैं। इसीलिये प्रदोषकाल आनेपर हम सदा छिद्र ढूँढ़ते हुए घूमते रहते हैं। हमारे आकाशगमनकी शक्तिकी बात जो तुमने कही है, वह भी व्यर्थ है। उस आकाशगमनकी शक्तिसे, धर्माधर्म-विवेकसे और पूर्वजन्मकी स्मृतिसे भी क्या लाभ है, जिसके द्वारा मोक्षकी सिद्धि नहीं हो सकती?* अतः राजन्! यद्यपि ये आकाशगमन आदि प्रेतोंके गुण बताये जाते हैं


* क्रियते खेचरत्वेन किं किं धर्मविनिश्चयैः। यया न सिद्ध्यते मोक्षो याति स्मृत्या हि किं तया॥ (स्क० पु०, ना० १८।६७)

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०७५

तथापि इनके द्वारा कोई सिद्धि नहीं मिलती। उलटे इन गुणोंके कारण खेद ही अधिक होता है, क्योंकि प्रेतयोनियाँ किसी भी शुभ कर्मके करनेमें समर्थ नहीं हैं।

राजा बोले—यदि मैं इस महान् वनसे घरको लौट जाऊँगा तो निश्चय ही तुम सब लोगोंके लिये गयाश्राद्ध करूँगा और यत्नपूर्वक सब उपायोंसे तुम्हारा उद्धार करूँगा। इस समय तुम मुझे मनुष्योंसे सेवित कोई जलाशय बतलाओ जिससे जल प्राप्त करके मैं तुम्हारा उपकार करूँ।

मांसादने कहा—महाराज! इस स्थानसे थोड़ी ही दूरपर एक जलाशय है, जो नाना प्रकारके वृक्षोंसे घिरा हुआ और चित्तको आह्लाद प्रदान करनेवाला है। तुम यहाँसे सीधे उत्तरकी ओर चले जाओ।

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर राजा विदूरथ धीरे-धीरे उत्तर दिशाकी ओर चले। थोड़ी ही दूरपर हरे-भरे वृक्षोंका समुदाय दिखायी दिया। वहाँ हंस, बक तथा सारस आदि पक्षी उड़ रहे थे। वहाँ पहुँचकर राजाने सौम्य प्राणियोंसे सुसेवित एक मनोहर आश्रम देखा। वहाँ एक वृक्षके नीचे तपस्वीजनोंसे सेवित मुनिश्रेष्ठ जैमिनि विराजमान थे। उनके समीप जाकर महाराजने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और भूमिपर बैठे हुए मुनिके शिष्योंको भी प्रणाम किया। उन सबने राजाको देखकर पूछा—'महाराज! इन निर्जन वनमें तुम कहाँसे आये हो?'

राजाने कहा—इस समय मुझे प्यास सता रही है, अतः पहले पानी पीकर पीछे मैं अपना सब हाल बताऊँगा।

तब उन्होंने राजाको जल दिखा दिया। राजाने उसमें प्रवेश करके जल पीकर प्यास बुझायी और नीचे गिरे हुए वृक्षोंके फल लेकर इच्छापूर्वक भोजन किया। पूर्णतः तृप्त होनेपर वे पुनः महर्षि जैमिनिके समीप आये और प्रणाम करके बैठ गये। तदनन्तर अपना वृत्तान्त कहना प्रारम्भ किया—

‘मुनिवरो! मैं विदूरथ नामसे प्रसिद्ध राजा हूँ। माहिष्मती पुरीमें मेरा निवासस्थान है। मैंने अपनी सेना साथ लेकर इस भयंकर वनमें प्रवेश किया था। मेरे सब सैनिक लताओं और झाड़ियोंकी आड़में छिपकर मुझसे अदृश्य हो गये। पता नहीं उन सैनिकोंका क्या हाल है। मेरा घोड़ा भी एक स्थानपर गिर गया। मेरी आयु शेष थी कि मैं घूमता हुआ यहाँ आ पहुँचा। मुनिवरो! अब सन्ध्याका समय आ गया है। अतः हम सब लोगोंको यथायोग्य सन्ध्योपासन आदि विधि करनी चाहिये।'

तत्पश्चात् मुनियों तथा राजाने सन्ध्योपासना की। धीरे-धीरे रात्रि हो गयी। इसी समय राजाकी सेनाके कुछ मनुष्य उन्हें ढूँढ़ते हुए वहाँ आ पहुँचे और उन्हें देखकर बड़े आदरसे बोले—'अहोभाग्य! जो महाराज मिल गये।' यों कहकर वे राजाके चरणोंमें गिर गये। फिर उठकर उन्होंने राजासे सैनिकोंके कष्ट, जो देखे और सुने थे, बतलाये। तदनन्तर उन सब सेवकोंके साथ राजा वृक्षके नीचे पत्ते बिछाकर सो रहे। प्रातःकाल उठकर उन्होंने पूर्वाह्निककृत्य—स्नान, सन्ध्योपासन आदि पूरा किया। तत्पश्चात् मुनिवर जैमिनिको प्रणाम करके उनकी आज्ञा ले अपने सेवकोंके साथ माहिष्मती पुरीकी ओर प्रस्थान किया। मार्ग पूछते हुए धीरे-धीरे चलकर राजा कुछ कालमें अपने निवासस्थानपर जा पहुँचे और कुछ समय विश्राम करके उन्होंने शीघ्र ही गयाशीर्षकी यात्रा कर दी। समयानुसार वहाँ पहुँचकर राजाने स्नान किया और धुले हुए वस्त्र पहनकर पवित्र हो श्रद्धायुक्त हृदयसे पहले मांसादका श्राद्ध किया। तदनन्तर रातमें सोते समय स्वप्नमें उन्होंने देखा, मांसाद दिव्य माला और वस्त्र धारण किये दिव्य विमानपर आरूढ़ है। उस समय मांसादने राजासे कहा—'भूपाल! तुम्हारे प्रसादसे मैं प्रेतयोनिसे मुक्त हो गया हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, मैं स्वर्गलोकको जाऊँगा।'

तब प्रातःकाल उठकर हर्षमें भरे हुए राजा

१०७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

विदूरथने विदैवतके लिये यथायोग्य श्राद्ध किया। फिर वह भी उसी प्रकार राजाको स्वप्नमें दिखायी दिया और मांसादकी ही भाँति कृतज्ञता प्रकट करके स्वर्गलोकमें चला गया। फिर तीसरे दिन राजाने पूर्ववत् श्रद्धापूर्ण हृदयसे कृतघ्नके लिये श्राद्ध किया। रातको उसने भी स्वप्नमें दर्शन दिया, किंतु वह उसी प्रेतरूपमें आया था और बड़े दुःखसे घिरा हुआ था।

कृतघ्न बोला—महाराज ! तड़ागके लिये नियत धनकी जिसने चोरी की है और जो सदा कृतघ्न रहा है—ऐसे मुझ पापात्माकी अभीतक मुक्ति नहीं हुई। अतः जिस प्रकार मुझे भी इस दुःखसे छुटकारा मिल जाय, वैसा कोई उपाय करो और अपनी की हुई सत्यप्रतिज्ञा पूरी करो। सत्य ही परब्रह्म है, सत्य ही परम तप है, सत्य ही परम ज्ञान है और सत्य ही परम शास्त्र है। सत्यके बलसे वायु चलती है। सत्यसे सूर्य तप रहा है और सत्य वचनसे ही समुद्र अपनी मर्यादाका लंघन नहीं करता। सत्यहीन मनुष्यके द्वारा किये हुए तीर्थ-सेवन, तप, दान, स्वाध्याय और गुरुसेवा—ये सब धर्म व्यर्थ हो जाते हैं। एक समय देवताओंद्वारा कौतूहलवश अपनी तुलापर एक ओर तो सम्पूर्ण धर्मोंको रखा और दूसरी ओर केवल सत्यको, परंतु सत्यका ही पलड़ा भारी रहा।^* इसलिये महामते ! तुम भी सत्यको ही आगे रखकर मेरा उद्धार करो। यह पुण्य तुम्हारे लिये तपस्यासे भी बढ़कर कल्याणका साधक होगा।

राजा विदूरथने पूछा—प्रेत ! तुम्हारी मुक्ति किस उपायसे हो सकती है, शीघ्र बताओ। दुष्कर होनेपर भी मैं उसे अवश्य करूँगा।

प्रेतने कहा—राजन् ! चमत्कारपुरमें जो हाटकेश्वरक्षेत्र है, वहीं कलियुगसे डरा हुआ गयाशीर्षतीर्थ प्लक्ष (पाकड़) नामक वृक्षके नीचे धूलमें छिपा हुआ है। उसके चारों ओर समयोचित शाक, कुशा और जंगली तिलके पौधे हैं। वहीं जाकर तुम तिल, अन्न, शाक और कुश आदि सामग्रियोंके द्वारा मेरे लिये श्राद्ध करो। ऐसा करनेपर शीघ्र मेरी मुक्ति हो जायगी।

प्रेतकी यह बात सुनकर दयालु राजा वहाँ गये और उसके बताये अनुसार उन्होंने सब कुछ किया। पहले जलके लिये वहाँ एक छोटा-सा कुआँ खोदा। फिर वेदोंके पारंगत श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बुलाकर कृतघ्नके उद्देश्यसे शास्त्रोक्तविधिके अनुसार श्राद्ध किया। उस श्राद्धके पूर्ण होते ही कृतघ्न दिव्यरूपधारी पुरुष होकर श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हुआ और विदूरथसे बोला—'प्रभो ! तुम्हारे प्रसादसे मैं इस भयंकर प्रेतशरीरसे मुक्त हो गया। अब मैं स्वर्गको जा रहा हूँ।'

सूतजी कहते हैं—तबसे लेकर गयाशीर्षक्षेत्रमें वह 'लघुकूप' प्रसिद्ध हो गया। वह उस क्षेत्रमें पितरोंको पुष्टि देनेवाला है। जो आश्विनमासमें पितृपक्षकी अमावास्याको वहाँ कालशाक, जंगली तिल, तैयार किये हुए अन्न तथा कुशा आदिके द्वारा श्रद्धापूर्वक पितरोंका श्राद्ध करता है वह उत्तम फलका भागी होता है। अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, आज्यप और सोमप—ये पितृगण वहाँ सदा निवास करते हैं; अतः उस तीर्थमें जाकर समय या असमयमें सदा ही प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध करना चाहिये।


^* सत्यमेव परं ब्रह्म सत्यमेव परं तपः। सत्यमेव परं ज्ञानं सत्यमेव परं श्रुतम्॥
सत्येन वायुर्वहति सत्येन तपते रविः। सागरः सत्यवाक्येन मर्यादां न विलङ्घयेत्॥
तीर्थसेवा तपो दानं स्वाध्यायो गुरुसेवनम्। सर्वं सत्यविहीनस्य व्यर्थं सञ्जायते यतः॥
सर्वे धर्मा धृताः पूर्वमेकतोऽन्यत्र वै ऋतम्। तुलाया कौतुकाद्देवैर्जातं तत्र ऋतं गुरु॥
(स्क० पु०, ना० १९। २०—२३)