भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1055
१०२६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पूर्वकालमें चक्रवर्ती राजा रन्तिदेवने देवता, असुर और मनुष्योंसहित अपने कुलको गोलोकमें पहुँचाया है।

विभिन्न तीर्थोंकी महाशक्तियोंके नाम इस प्रकार हैं— (१) काशीमें विशालाक्षी, (२) नैमिषारण्यमें लिंगधारिणी, (३) प्रयागमें ललिता देवी, (४) गन्धमादनमें कामुका देवी, (५) मानसमें कुमुदा, (६) अम्बरमें विश्वयोनि, (७) गोमन्त पर्वतपर गोमती, (८) मन्दराचलपर कामचारिणी, (९) चित्ररथ वनमें मदोत्कटा, (१०) हस्तिनापुरमें तपन्ती, (११) कान्यकुब्जमें गौरी, (१२) कमल पर्वतपर प्रभा, (१३) एकाग्रक्षेत्रमें कीर्तिमती, (१४) विश्वेश्वरक्षेत्रमें विश्वा, (१५) पुष्करमें पुरूहूता (१६) केदारमें मार्गदायिनी, (१७) हिमालयपर नन्दा, (१८) गोकर्णक्षेत्रमें भद्रकर्णिका, (१९) स्थानेश्वरमें भवानी, (२०) विल्वकमैं विल्व-पत्रिका, (२१) श्रीशैलपर माधवी, (२२) भद्रेश्वरमें भद्रा, (२३) वाराह पर्वतपर जया, (२४) कमलालयमें कमला, (२५) रुद्रकोटिमैं रुद्राणी, (२६) कालंजरेमें कोटि, (२७) महालिंगमें कपिला, (२८) माकोटमें मुकुटेश्वरी, (२९) शालग्राममें महादेवी, (३०) शिवलिंगमें जलप्रिया, (३१) मायापुरीमें कुमारी, (३२) सन्तानमें ललिता, (३३) उत्पलक्षेत्रमें सहस्राक्षी, (३४) हिरण्याक्षमें महोत्पला, (३५) तीर्थामैं मंगला, (३६) पुरुषोत्तमक्षेत्रमें विमला, (३७) विपाशामैं अमोघाक्षी, (३८) पुण्ड्रवर्धनमें पाटला, (३९) सुपार्श्वमें नारायणी, (४०) त्रिकूटमें भद्रसुन्दरी, (४१) विपुलमें विपुला, (४२) प्रलयाचलमें कल्याणी, (४३) विकोटितीर्थमें कोटी, (४४) यमुनामें मृगावती, (४५) करवीरमें महालक्ष्मी, (४६) विनायकमें उमादेवी, (४७) वैद्यनाथमें आरोग्या, (४८) महाकालमें महेश्वरी, (४९) कृष्णतीर्थमें अभया, (५०) विन्ध्य-गिरिकी कन्दरामें अमृता, (५१) माण्डव्यतीर्थमें माण्डुका, (५२) माहेश्वरपुरमें स्वाहा, (५३) प्रचण्डतीर्थमें छागलम्बा, (५४) अमरकण्टकमें चण्डिका, (५५) सोमेश्वरमें वाराही, (५६) प्रभासमें पुष्करावती, (५७) सरस्वतीमें देवमाता, (५८) पारावतमें पारा, (५९) महालयमें महाभागा, (६०) पयोष्णीमें पिंगलेश्वरी, (६१) कृतशौतीतर्थमें संहिता, (६२) कार्तिकेयमें शांकरी, (६३) उत्पलावर्षकमें लोला, (६४) शोणसंगममें सुभद्रा, (६५) मालासिद्धतलमें लक्ष्मी, (६६) भारताश्रममें अनन्ता, (६७) जालन्धरेमें सिद्धमुखी, (६८) किष्किन्धा पर्वतपर तारा, (६९) देवदारुवनमें पुष्टि, (७०) कश्मीरमण्डलमें मेधा, (७१) हिमालयमें भीमा देवी, (७२) वस्त्रेश्वरतीर्थमें तुष्टि, (७३) कपालमोचनमें सिद्धि, (७४) कायावरोहणमें माता, (७५) शंखोद्धारमें धृति, (७६) पिण्डारकमें ध्वनि, (७७) चन्द्रभागामें कला, (७८) अक्षोदमें शिवधारिणी, (७९) वैजयन्तीमें ऋता, (८०) बदरीमें ओषधि, (८१) उत्तरकुरुमें भी ओषधि, (८२) कुशद्वीपमें कुशोदका, (८३) हिमकूटमें मन्मथा, (८४) प्रमतमें सत्यवादिनी, (८५) अश्वत्थमें वन्दिनी, (८६) वैश्रवण (कुबेरतीर्थ)-में निधि, (८७) वेदवदनमें गायत्री, (८८) शिवके समीप पार्वती, (८९) देवलोकमें इन्द्राणी, (९०) ब्राह्मणके मुखमें सरस्वती, (९१) सूर्यबिम्बमें प्रभा, (९२) मातृकातीर्थमें मातृका, (९३) वैष्णवतीर्थमें वैष्णवी, (९४) सतियोंमें अरुन्धती, (९५) अप्सराओंमें तिलोत्तमा, (९६) सब देहधारियोंमें चिति, (९७) ब्रह्मकला तथा (९८) शक्ति।

ये नाम और तीर्थ संक्षेपसे बताये गये हैं। जो प्रातःकाल उठकर इनका पाठ करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। इन तीर्थोंमें स्नान करके जो मनुष्य इन शक्तियोंका दर्शन करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो इन देवियोंके तीर्थस्थानोंमें अपने शरीरका त्याग करता है, वह ब्रह्मलोकको भेदकर शिवजीके परम धामको प्राप्त करता है। गोदानके समय, श्राद्धमें, विवाह आदि मंगलकार्योंमें तथा देवार्चनके समय भी जो इन नामोंका पाठ करता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त होता है।