भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1054, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1054

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२५


पुराणों और श्रुतियोंके उपदेश किये हुए धर्मका आचरण करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं। जो शिवजीका ध्यान करनेवाले ब्राह्मणको श्रद्धापूर्वक रूई भरा हुआ बिस्तर, कटिसूत्रसहित लाल वस्त्र, नवीन वस्त्रमें लपेटा हुआ तथा पवित्र धूपसे सुवासित किया हुआ यज्ञोपवीत देता है, वह रूईके उन वस्त्रोंमें जितने तन्तु होते हैं और उन तन्तुओंमें जितने रोम होते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो भगवान् शिवके उद्देश्यसे शिवभक्तको नैवेद्य देता है अथवा शाक, मूल, फल आदि अर्पण करता है, वह तण्डुल, फल और दल आदिकी जितनी संख्या होती है, उतने सहस्र वर्षोंतक शिवलोकमें सम्मानित होता है। जो शिवभक्तको दही-भातसे भरा हुआ सुन्दर भिक्षापात्र अर्पण करता है, वह शिवधाममें निवास करता है। जो अपनी शक्तिके अनुसार शैवव्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणको भोजन कराता है, वह भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो भक्तिपूर्वक शिवकी पूजा करते हैं, वे शिवलोकमें जाते हैं।

इस प्रकार प्रसंगवश शिवलोक, गोलोक* और नर्मदालोकका वर्णन किया गया है, जहाँ शिवभक्त पुरुषोंका निवास है। जो ज्ञानयोगसे शान्तचित्त हो परम शिवका जप करते हैं, वे सब दुःखोंसे मुक्त हो सदा सुखी बने रहते हैं। पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार, सत्त्वगुण और प्रकृति—इन आठ आवरणोंसे युक्त शिवलोक है। वह दस हजार सूर्योंके समान कान्तिमान् परम स्थान है। ज्ञान और ध्यानमें संलग्न, शान्त, भिक्षान्नभोजी, जितेन्द्रिय, भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये सत्कर्म करनेवाले और जिनके पाप दग्ध हो गये हैं, ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मण ही उस परम धाम शिवलोकको पानेके अधिकारी हैं। जिस सत्यस्वरूप लोकमें शुद्धचित्त एवं अविद्या आदिके क्लेशोंसे रहित महात्मा पुरुष निवास करते हैं, उसी उत्तम पदको नर्मदाजीका सेवन करनेवाले मनुष्य भी पा लेते हैं।

जो नर्मदाके तटपर मेरे बताये अनुसार दान करते हैं, वे सब कुछ जाननेवाले, सर्वत्र जानेकी शक्ति रखनेवाले शुद्ध एवं परिपूर्ण हो जाते हैं। जो शुद्धकर्मोंमें तत्पर रहते हैं, वे परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो अपनी इच्छाके अनुसार साकार या निराकार रूपमें स्थित होते हैं। सम्पूर्ण जगत्के स्वामी पार्वतीवल्लभ भगवान् नीलकण्ठका यह दिव्य स्थान नित्य, विशुद्ध, अविनाशी एवं सदा एकरस रहनेवाला है। जो लोग नर्मदाके तटपर रहकर शिवजीके ज्ञानका अभ्यास करते हैं, वे काम-तृष्णासे मुक्त होकर शिवलोकमें जाते हैं। जो एक दिन भी शिवधर्मका पालन करते हुए भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर होता है, उसके धर्मका अन्त नहीं है।


अमरावतीके दक्षिण विष्णु-मन्दिरकी महिमा, मेघवनका महत्त्व तथा विभिन्न तीर्थोंकी महाशक्तियोंके नाम

मार्कण्डेयजी कहते हैं— गौएँ बड़ी पवित्र वस्तु हैं; वे सब प्रयोजनोंकी सिद्धि करनेवाली हैं। अतः गोदान और शिवभक्तिसे मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। वैवस्वत मन्वन्तरमें राजर्षि वीरणके पुरोहित मैत्रेयजी हुए थे, जिन्होंने नर्मदाके तटपर भगवान् विष्णुका मन्दिर बनवाया है। वह मन्दिर अमरावती पुरीके दक्षिण दिशामें नर्मदा-तटपर विद्यमान है। उसके माहात्म्यसे और नर्मदाके प्रभावसे वे द्विजश्रेष्ठ भगवान् विष्णुके लोकमें आनन्द भोगते हैं।

युधिष्ठिर ! नर्मदाके पश्चिम और उत्तर तटपर जो-जो उत्तम तीर्थ हैं, उनका वर्णन सुनो। यज्ञ पर्वतपर मेघवन नामसे प्रसिद्ध एक वन है, जहाँ


* यह गोलोक शिवलोकका ही एक अंग है।

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