भारतकोश
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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
१०२६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पूर्वकालमें चक्रवर्ती राजा रन्तिदेवने देवता, असुर और मनुष्योंसहित अपने कुलको गोलोकमें पहुँचाया है।

विभिन्न तीर्थोंकी महाशक्तियोंके नाम इस प्रकार हैं— (१) काशीमें विशालाक्षी, (२) नैमिषारण्यमें लिंगधारिणी, (३) प्रयागमें ललिता देवी, (४) गन्धमादनमें कामुका देवी, (५) मानसमें कुमुदा, (६) अम्बरमें विश्वयोनि, (७) गोमन्त पर्वतपर गोमती, (८) मन्दराचलपर कामचारिणी, (९) चित्ररथ वनमें मदोत्कटा, (१०) हस्तिनापुरमें तपन्ती, (११) कान्यकुब्जमें गौरी, (१२) कमल पर्वतपर प्रभा, (१३) एकाग्रक्षेत्रमें कीर्तिमती, (१४) विश्वेश्वरक्षेत्रमें विश्वा, (१५) पुष्करमें पुरूहूता (१६) केदारमें मार्गदायिनी, (१७) हिमालयपर नन्दा, (१८) गोकर्णक्षेत्रमें भद्रकर्णिका, (१९) स्थानेश्वरमें भवानी, (२०) विल्वकमैं विल्व-पत्रिका, (२१) श्रीशैलपर माधवी, (२२) भद्रेश्वरमें भद्रा, (२३) वाराह पर्वतपर जया, (२४) कमलालयमें कमला, (२५) रुद्रकोटिमैं रुद्राणी, (२६) कालंजरेमें कोटि, (२७) महालिंगमें कपिला, (२८) माकोटमें मुकुटेश्वरी, (२९) शालग्राममें महादेवी, (३०) शिवलिंगमें जलप्रिया, (३१) मायापुरीमें कुमारी, (३२) सन्तानमें ललिता, (३३) उत्पलक्षेत्रमें सहस्राक्षी, (३४) हिरण्याक्षमें महोत्पला, (३५) तीर्थामैं मंगला, (३६) पुरुषोत्तमक्षेत्रमें विमला, (३७) विपाशामैं अमोघाक्षी, (३८) पुण्ड्रवर्धनमें पाटला, (३९) सुपार्श्वमें नारायणी, (४०) त्रिकूटमें भद्रसुन्दरी, (४१) विपुलमें विपुला, (४२) प्रलयाचलमें कल्याणी, (४३) विकोटितीर्थमें कोटी, (४४) यमुनामें मृगावती, (४५) करवीरमें महालक्ष्मी, (४६) विनायकमें उमादेवी, (४७) वैद्यनाथमें आरोग्या, (४८) महाकालमें महेश्वरी, (४९) कृष्णतीर्थमें अभया, (५०) विन्ध्य-गिरिकी कन्दरामें अमृता, (५१) माण्डव्यतीर्थमें माण्डुका, (५२) माहेश्वरपुरमें स्वाहा, (५३) प्रचण्डतीर्थमें छागलम्बा, (५४) अमरकण्टकमें चण्डिका, (५५) सोमेश्वरमें वाराही, (५६) प्रभासमें पुष्करावती, (५७) सरस्वतीमें देवमाता, (५८) पारावतमें पारा, (५९) महालयमें महाभागा, (६०) पयोष्णीमें पिंगलेश्वरी, (६१) कृतशौतीतर्थमें संहिता, (६२) कार्तिकेयमें शांकरी, (६३) उत्पलावर्षकमें लोला, (६४) शोणसंगममें सुभद्रा, (६५) मालासिद्धतलमें लक्ष्मी, (६६) भारताश्रममें अनन्ता, (६७) जालन्धरेमें सिद्धमुखी, (६८) किष्किन्धा पर्वतपर तारा, (६९) देवदारुवनमें पुष्टि, (७०) कश्मीरमण्डलमें मेधा, (७१) हिमालयमें भीमा देवी, (७२) वस्त्रेश्वरतीर्थमें तुष्टि, (७३) कपालमोचनमें सिद्धि, (७४) कायावरोहणमें माता, (७५) शंखोद्धारमें धृति, (७६) पिण्डारकमें ध्वनि, (७७) चन्द्रभागामें कला, (७८) अक्षोदमें शिवधारिणी, (७९) वैजयन्तीमें ऋता, (८०) बदरीमें ओषधि, (८१) उत्तरकुरुमें भी ओषधि, (८२) कुशद्वीपमें कुशोदका, (८३) हिमकूटमें मन्मथा, (८४) प्रमतमें सत्यवादिनी, (८५) अश्वत्थमें वन्दिनी, (८६) वैश्रवण (कुबेरतीर्थ)-में निधि, (८७) वेदवदनमें गायत्री, (८८) शिवके समीप पार्वती, (८९) देवलोकमें इन्द्राणी, (९०) ब्राह्मणके मुखमें सरस्वती, (९१) सूर्यबिम्बमें प्रभा, (९२) मातृकातीर्थमें मातृका, (९३) वैष्णवतीर्थमें वैष्णवी, (९४) सतियोंमें अरुन्धती, (९५) अप्सराओंमें तिलोत्तमा, (९६) सब देहधारियोंमें चिति, (९७) ब्रह्मकला तथा (९८) शक्ति।

ये नाम और तीर्थ संक्षेपसे बताये गये हैं। जो प्रातःकाल उठकर इनका पाठ करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। इन तीर्थोंमें स्नान करके जो मनुष्य इन शक्तियोंका दर्शन करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो इन देवियोंके तीर्थस्थानोंमें अपने शरीरका त्याग करता है, वह ब्रह्मलोकको भेदकर शिवजीके परम धामको प्राप्त करता है। गोदानके समय, श्राद्धमें, विवाह आदि मंगलकार्योंमें तथा देवार्चनके समय भी जो इन नामोंका पाठ करता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त होता है।

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२७

अशोकवनिकातीर्थमें महाराज रविश्चन्द्रके द्वारा यज्ञ, दान तथा मुनियोंका उद्धार

मार्कण्डेयजी कहते हैं—नर्मदाके दक्षिण भागमें माण्डव्यमुनिका आश्रम है। उसमें विभाण्डक, गार्ग्य तथा ऋष्यशृंग आदि उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि सहस्रोंकी संख्यामें निवास करते हैं। राजन्! अशोकवनिका नामसे प्रसिद्ध उत्तम तीर्थकी महिमा सुनो। वहाँ भगवान् शंकर पार्वतीदेवीके साथ निवास करते हैं। वहाँ विशोका नदी और नर्मदाका संगम हुआ है। वहाँ स्नान करनेवाले मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं और जिनकी वहाँ मृत्यु हो जाती है, वे मुक्त हो जाते हैं। वहीं अशोकेश्वरलिंग है, जो प्रत्यक्ष ही सिद्धि एवं कल्याण प्रदान करनेवाला है। उसी तीर्थमें देवर्षि नारदने शापभ्रष्ट ब्राह्मणोंको शापसे मुक्त किया था और अब वे ब्राह्मण उस तीर्थके माहात्म्यसे देवता होकर देवलोकमें आनन्द भोगते हैं।

स्वायम्भुव मन्वन्तरके आदिकल्पके सत्ययुगकी बात है। चन्द्रवंशमें रविश्चन्द्र नामसे प्रसिद्ध एक महायशस्वी चक्रवर्ती राजा हो गये हैं, जो कांची नगरीके नरेश थे। उन्होंने समस्त पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया था। एक समय वे अगस्त्येश्वरतीर्थमें गये जहाँ भगवान् शंकरका सुन्दर मन्दिर विद्यमान है। अगस्त्य आदि सभी तपस्वी मुनि उस तीर्थका सेवन करते हैं। वहाँ नर्मदा बहती हैं और अमरकण्टक पर्वत भी सुशोभित होता है। सूर्यग्रहणके समय राजा रविश्चन्द्र उस स्थानपर गये जहाँ मुनिमण्डलीसे घिरे हुए महर्षि अगस्त्य तपस्या करते थे। उस समय महातपस्वी शाण्डिल्यजीने महर्षि अगस्त्यको प्रणाम करके पूछा—'तपोनिधे! महातेजस्वी राजा रविश्चन्द्र आपके आश्रमपर पधारे हैं। मैं उनका पुरोहित हूँ। यदि आप कृपापूर्वक स्वीकार करें तो राजा आपके चरणारविन्दोंका अर्चन करना चाहते हैं।'

अगस्त्यजी बोले—नृपश्रेष्ठ रविश्चन्द्र यहाँ शीघ्र आवें और सिंहासनपर विराजमान हों। उनकी आज्ञा पाकर राजा वहाँ आये और उन्होंने मुनिके चरणोंका स्पर्श किया। मुनिने अर्घ्य और पाद्य आदिके द्वारा राजाका सत्कार किया और कुशल-समाचार पूछते हुए कहा—'महाभाग! आप अन्तःपुर और परिवारके साथ सकुशल तो हैं न?'

राजा बोले—मुनीश्वर! आज मेरा जन्म और जीवन सफल हुआ, जो आपके चरणारविन्दोंका दर्शन पाकर मैं सब पापोंसे मुक्त हो गया। मुनिश्रेष्ठ! सर्वतीर्थमयी नर्मदा नदी तो सर्वत्र शुभ और पावन हैं। मैं किस स्थानपर यज्ञ करूँ?

अगस्त्यजीने कहा—राजन्! एकमात्र नर्मदादेवी ही पुण्यमयी और शुभ हैं। जम्बूद्वीप एक लाख योजनका बताया गया है, उसमें जितने भी चराचर प्राणी हैं, उनमेंसे जो तपस्यासे हीन हैं वे भी नर्मदाका जलपान करनेसे भगवान् शिवके लोकमें जाते हैं। ॐकार आदि शिवलिंग और वैदूर्य आदि पर्वत, द्वापर और कलियुगमें परम पावन होते हैं। नर्मदाके दक्षिण और उत्तर भागमें जो यह देव-दानववन्दित भूमि है इसे यज्ञभूमि कहते हैं। इसीमें अशोकवनिका है, जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर निवास करते हैं। यहाँ किया हुआ यज्ञ बिना किसी विघ्न-बाधाके परिपूर्ण होता है। ऐसा भगवान् शंकरका कथन है।

राजा बोले—महामुने! आपका कल्याण हो, मैं आपके साथ वहीं चलूँगा।

ऐसा कहकर मुनियोंसे घिरे हुए राजा रविश्चन्द्र नर्मदाके दक्षिण तटपर वर्तमान सुन्दर पुण्यतीर्थ अशोकवनिकामें आये। वहाँ दस योजन विस्तृत भूमिमें यज्ञमण्डप बनाया गया और यूप गाड़े गये। उस मण्डपके सभी द्वार और स्तम्भ मणि-माणिक्य तथा रत्नोंकी राशिसे शोभा पा रहे थे। विश्वामित्र, भरद्वाज, कश्यप, भार्गव, ब्रह्मदृश्य, लोमश था दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ महर्षि उस यज्ञमें

१०२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


सम्मिलित हुए। प्रचुर दक्षिणा पानेवाले ब्राह्मणोंने यज्ञ प्रारम्भ किया। सब देवता बड़े प्रसन्न और तृप्त हुए। इसी समय महान् क्रोधी दुर्वासाजी, यमराज, चित्रगुप्त, काल और मृत्यु भी आये। उस यज्ञमें इनके लिये कोई भाग नहीं दिया गया था। यह देखकर ये सभी कुपित हो उठे। उन सबको रुष्ट देखकर राजा रविश्चन्द्रने कहा— 'यज्ञके समयमें कोई मनुष्य भी आ जाय तो वह चार भुजाधारी भगवान् विष्णुके समान पूजनीय होता है। आपलोगोंको भी मैं अभीष्ट वस्तु दूँगा। अतः प्रसन्न हों।' इस प्रकार राजाके द्वारा अर्घ्य, पाद्य आदि देकर प्रसन्न कराये जानेपर वे सब मुनि सन्तुष्ट हुए।

उस समय दुर्वासाजीने कहा—राजन्! पूर्वकालमें जटा और वल्कल धारण करनेवाले तपस्वीलोग नेपालमें देवताओंके देवता भगवान् पशुपतिकी भक्तिभावसे पूजा करते थे, परंतु उनके साथ उन्होंने पार्वतीजीकी पूजा नहीं की। इसलिये पार्वतीजीने उन ब्राह्मणोंको शाप दिया—'तुमलोग एक सहस्र वर्षोंतक कुत्तेकी योनिमें रहोगे।' तबसे वे मुनीश्वर लोग कुत्तेकी योनिमें पड़े हुए हैं। राजन्! हमारा प्रिय करनेकी इच्छासे तुम उन सबको शापसे मुक्त कर दो।

राजा बोले—मैं उन ब्राह्मणोंको उस शापसे मुक्त करूँगा।

ऐसा कहकर राजाने अपने दूतोंको वनमें भेजा। दूतोंने उन वनवासी मुनियोंको नमस्कार करके उनके पूर्वजन्मका स्मरण कराया। तब वे सब लोग अशोकवनिकामें आये। उन सबको देखकर चक्रवर्ती राजा रविश्चन्द्रने बड़ी प्रसन्नताके साथ कहा—'भगवान् अशोकेश्वर एवं नर्मदादेवीकी महिमासे, मेरे दानके प्रभावसे तथा महर्षियोंके प्रसादसे ये सब मुनि कुत्तेकी योनि त्याग कर शिवलोकमें चले जायें और इनका सब पाप मुझमें आ जाय।'

राजाके ऐसा कहते ही वे सब मुनि तत्क्षण शापसे मुक्त हो गये और राजासे इस प्रकार बोले—आप ही हमारे माता-पिता और मोक्षदाता गुरु हैं। ऐसा कहकर वे सब महर्षि उमामहेश्वर-धामको चले गये।

तब सम्पूर्ण देवताओंने राजाको धन्यवाद दिया। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुई।

उस समय दुर्वासाजीने कहा—महाराज! क्षत्रियोंमें मैंने तुम्हारे समान दूसरे किसीको न तो देखा है और न सुना ही है। मनुष्योंके लिये अपने प्राणोंको त्याग देना तो सुकर है, परंतु अपने संचित धर्मका त्याग करना बहुत ही कठिन है। तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो।

तब राजा हँसते हुए बोले—मुने! हमारे दानके प्रभावसे पापबुद्धिवाले मनुष्य भी उत्तम पदको प्राप्त हों, यही मेरा प्रिय वर है।

'एवमस्तु'—ऐसा ही होगा—यह कहकर मुनिवर दुर्वासा वहीं अन्तर्धान हो गये। अमित तेजस्वी राजाके उस अद्भुत कर्मको देखकर धर्मराजने कहा—'राजन्! मैं तुम्हें वर देता हूँ, जिसने अपना उत्तम पुण्य दे दिया, उसने यमलोक और देवलोकको भी जीत लिया। राजेन्द्र! तुम अवश्य वर पानेके योग्य हो।'

रविश्चन्द्र बोले—सूर्यनन्दन! मेरे सौ यज्ञ, दान और तपस्याके प्रभावसे वे सभी पापी जीव शिवधामको प्राप्त हो जायँ, जो इस समय पापयोनिमें पड़े हुए हैं। मैं इसी वरको प्राप्त करना चाहता हूँ, आप मुझपर कृपा करें।

यमराजने कहा—सत्यधर्मका पालन करनेवाले राजेन्द्र! तुम्हारी यह इच्छा पूर्ण हो। सुव्रत! इस सत्यके प्रभावसे तुम उत्तम लोकको जाओ। राजन्! तुमने जिन सैकड़ों क्षत्रियों और सहस्रों अन्यान्य जीवोंका पापसे उद्धार किया है, उन सबकी कोई गणना नहीं है।

ऐसा कहकर धर्मराज देव-दानववन्दित कामिक विमानपर आरूढ़ हो अपने लोकको चले गये।

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  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२९

वागीश्वरतीर्थमें राजा ब्रह्मदत्तके यज्ञमें प्रेतोंका उद्धार तथा सहस्रावर्त आदि तीर्थोंकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—नर्मदाके उत्तर तटपर वागीश्वर नामका एक पुर है, वहाँ वागु नामवाली नदी नर्मदाके साथ मिली है। उस संगममें जो स्नान करते हैं वे स्वर्गको जाते हैं और जो मरते हैं वे मुक्त हो जाते हैं। वहाँ दानवोंका विनाश करनेवाली वागीशा चामुण्डा रहती हैं। मणिभद्र और वीरभद्र आदि सैकड़ों राजा उस तीर्थके प्रभावसे शापमुक्त हुए हैं। वहाँ तिलसहित पिण्डदान करनेसे पितरोंको उत्तम गति प्राप्त होती है। सूर्यवंशमें अयोध्याके चक्रवर्ती राजा ब्रह्मदत्त प्रसिद्ध हैं। वे धन-धान्यसे सम्पन्न तथा भय और दरिद्रतासे रहित थे। उनके शासनकालमें समस्त प्रजा बड़े आनन्दसे रहती थी। उन्होंने नर्मदा और वागुके संगममें एक श्रेष्ठ यज्ञ किया था, जिसमें ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, गणेश तथा महादेवजी आदिने प्रत्यक्ष प्रकट होकर अपना भाग ग्रहण किया। राजा ब्रह्मदत्तकी यज्ञभूमि दस योजनतक फैली हुई थी। उनका यह यज्ञ स्वारोचिष मन्वन्तरके आदि-कल्पवाले सत्ययुगमें हुआ था। उस समय ब्रह्मदत्तके यज्ञसे तथा वागीश्वर और नर्मदाके प्रसादसे प्रेतोंको भी बड़ी तृप्ति हुई। वे प्रेत पहलेके वानप्रस्थ ऋषि थे। उन्होंने स्त्रियोंके आग्रहसे सूर्यग्रहणके अवसरपर कुरुक्षेत्रमें बहुत-सा दान लिया था। इसीसे वे प्रेतभावको प्राप्त हुए थे। प्रेत होनेपर भी उन्हें पूर्वजन्मका स्मरण बना रहा। अतः एकान्तमें बैठकर वे अपने विषयमें इस प्रकार शोक करने लगे—'अहो! जिनके लिये हमने प्रतिग्रह स्वीकार किया, वे हमारे पुत्र, पत्नी, भृत्य और भाई-बन्धु तो ज्यों-के-त्यों बने हुए हैं; वे उस प्रतिग्रहकी आगमें दग्ध नहीं हुए हैं। हमें अकेले ही उस आगमें जलना पड़ा है। यमदूतोंसे पकड़े हुए प्राणियोंके साथ उनके माता-पिता, भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र और धन आदि भी नहीं जाते, एकमात्र धर्म ही उनका साथ देता है।'

इस प्रकार दीर्घकालतक शोक करके स्त्री-पुत्रसे रहित हुए वे प्रेतगण सारी पृथ्वीपर घूम-घामकर नारदजीके उपदेशसे उमापति शिवका ध्यान करते हुए उसी वागीशपुरमें चले आये। वहाँ स्नान करके उन्होंने भगवान् शिव, विष्णु और सूर्यदेवका पूजन किया। ब्रह्मदत्तके उस यज्ञमें आकर वे सभी पापमुक्त हो गये और ब्रह्माजीके लोकमें गये। तदनन्तर राजा ब्रह्मदत्तके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! प्रतिग्रह एक भारी ग्रह है। जो लोभ और मोहसे मोहित हो उस ग्रहसे ग्रस्त हो गये हैं, वे घोर नरकमें डूबते हैं। यद्यपि वेदोक्त यज्ञ और तीर्थयात्रा आदि सत्कर्म भी सफल होते हैं, उनके द्वारा सद्गतिमें सहायता मिलती है, तथापि प्रतिग्रह (दान) लेनेवाले मनुष्य अपने आत्माको क्लेश देते हैं। दाता और याचककी क्या गति होती है, इसकी सूचना उनके हाथोंसे ही मिल जाती है। देनेवाला ऊपरको जाता है और लेनेवाला नीचेको।

सहस्रावर्त नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ है। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करनेवाले पुरुषको वृषोत्सर्गका फल प्राप्त होता है और वह अपनी सात पीढ़ीहतकको पवित्र कर देता है। नर्मदाके उत्तर तटपर यह तीर्थ सहस्र धनुषतक फैला हुआ है। उसके अन्तमें काराका उत्तम वन है। वहाँ स्नान करनेसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है और मनुष्य स्वर्गलोकको जाता है। नर्मदाके उत्तर भागमें सौगन्धिक नामक परम सुन्दर वन है, जिसमें प्रवेश करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। तदनन्तर नदियोंमें उत्तम सरस्वती नदी हैं। उनके जलमें स्नान करना चाहिये। वहाँ देवताओं और पितरोंका तर्पण करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। वहीं ईशानाध्युषित नामक परम दुर्लभ तीर्थ है। नरश्रेष्ठ ! व्यतिपात योग, संक्रान्ति और ग्रहणके समय उस

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तीर्थमें स्नान करके मनुष्य सहस्र कपिला गौओं, सुगन्धित पदार्थों और सुवर्णोंके दानका तथा पंच-यज्ञोंके अनुष्ठानका फल पाकर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। भारत! वहीं त्रिशूल नामक तीर्थ है। वहाँ जाकर जो स्नान और देवता-पितरोंका पूजन करता है, वह देहत्यागके पश्चात् गणपति-पदको प्राप्त होता है। युधिष्ठिर! नर्मदाके उत्तर तटपर ब्रह्मह्रद नामसे विख्यात एक तीर्थ है जो इच्छानुसार भोग एवं फल देनेवाला है। यहाँपर श्राद्धका दान देनेसे पितर ब्रह्मलोकमें जाते हैं। नर्मदाके उत्तर भागमें अत्यन्त उत्तम सोमतीर्थ है। वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है।

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देवपथतीर्थ, शुक्लतीर्थ, दीप्तिकेश्वरकी महिमा, देवासुरोंके द्वारा महादेवजीकी स्तुति तथा वैष्णव तीर्थकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—तदनन्तर देवपथ नामक सर्वदेवमय शुभ तीर्थ है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करनेवाला पुरुष सब यज्ञोंका फल पाता है। वहीं देवपथ नामसे प्रसिद्ध शिवलिंग भी है, जिसका श्रद्धापूर्वक दर्शन करनेसे पितरोंकी उत्तम गति होती है। वहीं सहस्रयज्ञ नामका उत्तम तीर्थ है, जहाँ मार्गशीर्ष मासमें एकादशी तिथिको भगवान् विष्णुकी पूजा करके मनुष्य सहस्र यज्ञोंके अनुष्ठानका फल पाता है। उस तीर्थके प्रभावसे वह पापरहित हो जाता है। वह यमलोकको नहीं देखता और पशु-पक्षियोंकी योनिमें भी नहीं जाता। तदनन्तर शुक्लतीर्थमें जाय। उसमें स्नान करनेवाला मनुष्य दस गोदानका फल पाता है। शुक्लतीर्थ आठ हाथका है। वहाँ कालाग्निरुद्र तथा श्रीकण्ठदेव हैं। पूर्वकालमें इन्द्रने भी देवदेव उमापतिको नर्मदाके जलसे नहलाकर बिल्वपत्रोंद्वारा उनका पूजन किया था। शुक्लतीर्थके प्रभावसे ही देवता उद्दीप्त हो रहे हैं। वहीं कश्यपजीका देवताओं और सिद्धोंसे सेवित पुण्य आश्रम है। वहाँ दस हजार मुनि शुक्लेश्वरकी उपासना करते हैं। कुबेरने सूर्यग्रहणके अवसरपर शुक्लतीर्थमें चन्दन, अगर, कपूर, फूल-माला, चँदोवा, ध्वज तथा दीपमाला आदि उपचारोंसे महेश्वरका पूजन किया था। अतः उस तीर्थके प्रभावसे ही वे यक्षोंके राजा और धनके स्वामी हुए हैं। उसी तीर्थके प्रभावसे देवताओंने देवलोकमें नाना प्रकारके भोग प्राप्त किये हैं। वह तीर्थ सर्वतीर्थमय और सर्वदेवमय है। वहाँ स्नान और महादेवजीका पूजन करके मनुष्य सब देवताओं और दैत्योंके गणोंसे पूजित होता है।

राजन्! ययाति नामसे प्रसिद्ध एक चक्रवर्ती राजा हो गये हैं। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषका पूजन किया है। जहाँ पुण्यसलिला मधुमती नदी नर्मदाके साथ मिली है, वहाँ उन्होंने ब्राह्मण-ऋत्विजोंके साथ यज्ञ प्रारम्भ किया था। वहीं मध्येश्वरलिंग है जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर निवास करते हैं। वहाँ स्नान करनेवाले स्वर्गमें जाते हैं और जो वहाँ मरते हैं वे मुक्त हो जाते हैं। उसी स्थानपर भगवान् विष्णुने मधु और कैटभ नामक दैत्योंका वध किया था। वहाँ श्रीविष्णुदेवके पूजनसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। उस तीर्थमें तिलोंके साथ जलदान और पिण्डदान करनेसे पितर चौदह इन्द्रोंकी स्थिति-कालतक तृप्त रहते हैं। ययातिका यज्ञ पूर्ण होनेके पश्चात् वहाँ पातालसे कालाग्निके समान कान्तिमान् एक शिवलिंग प्रकट हुआ। भारत! उस लिंगकी प्रभासे सम्पूर्ण जगत् उज्ज्वल हो गया। तब लिंगरूपधारी भगवान् वृषध्वजने राजा ययातिसे कहा—'राजन्! तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो।'

ययाति बोले—देव! आप भगवती पार्वतीके साथ यहाँ रहें और इस स्थानका कभी त्याग न करें। यहाँ किये हुए यज्ञ, दान आदि सब

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०३१

कार्य सदा अक्षय हों। तपस्या और दानसे रहित पापी मनुष्य भी यहाँ स्नान करके शुक्लतीर्थके प्रभावसे आपके लोकमें चले जायें।

महादेवजीने कहा—राजन्! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब सत्य होगा।

तत्पश्चात् सब देवता अपने-अपने विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको चले गये। राजर्षि ययाति भी दीर्घकालतक राज्यका पालन करके अन्तमें स्वर्गलोकको गये।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—दीप्तिकेश्वर नामसे प्रसिद्ध एक सिद्धलिंग कहा गया है, जिससे श्रेष्ठ तीनों लोकोंमें दूसरा कोई भी प्रसिद्ध नहीं है। दीप्तिकेश्वर देवका दर्शन, स्पर्श और पूजन करनेसे अनेक जन्मोंका घोर पाप क्षणभरमें नष्ट हो जाता है। जो मानव एक दिन या दो घड़ी भी उनकी पूजा करता है वह इस भयानक संसार-समुद्रमें फिर जन्म नहीं लेता।

देवताओंके स्वामी विष्णु, ब्रह्मा तथा अन्यान्य देवताओंके द्वारा विभिन्न नामोंसे उन उमावल्लभ महादेवजीकी स्तुति इस प्रकार की गयी— भगवान् शिव सदा रहनेवाले, अचल, प्रभा, प्रकाशरूप, दीप्तिमान्, श्रेष्ठ वर देनेवाले, अभीष्ट मनोरथ, पापहारी, श्वेतवर्ण, सब प्राणियोंका संहार करनेवाले, सर्वसमर्थ, संसारके कारण, वैराग्य एवं मोक्षके कारण, संयमरूप, सनातन, अटल, श्मशानवासी, भगवान्, आकाशमें विचरनेवाले, इन्द्रियोंमें व्याप्त, वन्दना करनेयोग्य, महान् कर्म करनेवाले, तपस्वी, समस्त प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले, मतवाले वेषमें अपने स्वरूपको छिपाये रखनेवाले, सम्पूर्ण लोकोंकी प्रजाके पालक और स्वामी, विराट्स्वरूप, विशाल शरीरवाले, समस्त लोकोंकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा, समस्त प्राणियोंके परमात्मा, विविध रूपोंवाले, छोटे रूपवाले, मनन करनेवाले, सम्पूर्ण विश्वके पालक, छिपे रूपवाले, सदाप्रसन्न, संसार-बन्धनका नाश करनेवाले, प्रवृत्तिमार्गमें स्थित, महान् अंगोंवाले, समष्टिरूप, सबके सुनिश्चित आधार, सब कामनाओंसे सम्पन्न, स्वतः प्रकट होनेवाले, आदि और अन्त अर्थात् सृष्टि और संहार करनेवाले, जीवोंके आश्रय, सहस्रों नेत्रोंवाले, भयंकर नेत्रोंवाले, चन्द्रस्वरूप अथवा उमासहित, नक्षत्रोंको सिद्ध करनेवाले, चन्द्र, सूर्य, शनि, केतु, ग्रह, ग्रहपति, श्रेष्ठ, तपस्याके साक्षी, बलस्वरूप, खड़े रहनेवाले, यज्ञरूपी मृगपर बाण चलानेवाले, पापरहित, महान् तपस्वी, दीर्घकालतक तपस्या करनेवाले, सबकी उत्पत्तिके आदिकारण, दीनोंपर दया करनेवाले, सूर्यरूपसे वर्ष पूरा करनेवाले, मन्त्र, प्रमाण, परम तपःस्वरूप, योगी, योगकी महान् शक्तिसे सम्पन्न, महान् वीर्यवाले, हर, महाचेता, सर्वज्ञ, कारणसहित, संहारकारी, हरण करनेवाले, कमण्डलुधारी, धनुष धारण करनेवाले, सबके प्राणोंको अपने हाथपर रखनेवाले, प्रतापवान्, जीवात्मारूप, अपनेसे भिन्न अन्य किसी ईश्वरसे रहित, शूलधारी, खट्वांगधारी, पट्टिशधारी, पवित्र, पवित्रस्वरूप, तेजःस्वरूप, तेज प्रकट करनेवाले, आश्रयस्वरूप, मुकुट धारण करनेवाले, सुमुख, जलमें रहनेवाले, विस्तार करनेवाले, सूर्यरूप, सूर्य और चन्द्रमारूपी नेत्रवाले, सुन्दर तीर्थरूप, अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले, शृगालेश्वररूपसे प्रकट, सर्वप्रयोजनरूप, सूँड धारण करनेवाले गणेशरूप, निर्मल, जलके आधारभूत कमण्डलुकी भाँति सम्पूर्ण संसारके आश्रय, अजन्मा, सुगन्धित माला धारण करनेवाले, हरिणरूपधारी, कपाल धारण करनेवाले, जिनके वीर्यकी गति ऊपरकी ओर है ऐसे, ऊपरके लोकोंके साक्षी, ऊँची उठी हुई भुजाओंवाले, नभ, अष्टमूर्तियोंमेंसे आकाशरूप, तीन जटा धारण करनेवाले, सब जीवोंके आवासस्थान, रुद्र, कार्तिकेयरूपसे देवताओंके सेनानायक, सर्वव्यापक, दिनमें चलने-फिरनेवाले, रातमें विचरनेवाले, जिनके श्रीअंगोंसे उत्तम सुगन्ध निकल रही है ऐसे, सम्पूर्ण दिशाओंके स्वामी राजाओंको मारनेवाले परशुरामरूप, त्रिपुरासुर-अन्धकासुर आदि दैत्योंको मारनेवाले, धारण-पोषण करनेवाले, रूपगुणस्वरूप, सिंह और

१०३२संक्षिप्त स्कन्दपुराण

शार्दूलरूपसे प्रकट—व्याघ्रेश्वर, गजासुरका गीला चमड़ा धारण करनेवाले, पीड़ा हरनेवाले, समयसे योगसाधनामें तत्पर, महानादस्वरूप, सबके निवासस्थान, चारों ओर जानेवाले मार्गस्वरूप, दुर्धर्ष प्रेतोंमें विचरनेवाले, समस्त प्राणियोंमें रहनेवाले, महान् ईश्वर, अनेक रूपोंमें प्रकट, बहुत धनवाले, समस्त पुरुषार्थस्वरूप, उत्तम गतिस्वरूप, ताण्डव-नृत्यको पसंद करनेवाले, ताण्डव-नृत्य करनेवाले, नाचनेवाले, मेघस्वरूप, भयंकर, बड़ी भारी तपस्या करनेवाले, सबमें वास करनेवाले, अविनाशी, पर्वतोंको धारण करनेवाले आकाशरूप, सहस्रों रूपोंमें प्रकट, जाननेयोग्य, उद्योग एवं निश्चयरूप, निर्णय एवं सिद्धान्तरूप, अन्याय न सहनेवाले, क्षमाशील, चतुर, दक्ष-यज्ञका विध्वंस करनेवाले, दक्षयज्ञका अपहरण करनेवाले, उत्तम उत्सवरूप, मध्यस्थ, विरोधियोंके तेजका अपहरण करनेवाले, दक्ष-यज्ञमें देवताओंके यज्ञभागका हनन करनेवाले, प्रसन्न, पूजित, सबके उत्पादक, गम्भीर गर्जना करनेवाले, गाम्भीर्ययुक्त, गम्भीर, हविष्य पहुँचानेवाले अग्निस्वरूप, वटवृक्षरूप, बरगद या अक्षयवटरूप, नक्षत्रोंकी भाँति चमकनेवाले, समर्थ, विभु, तीखे बाणवाले, सूर्य और चन्द्ररूप नेत्रोंवाले, महादेव, कर्म और कालके ज्ञाता, यज्ञ एवं व्रतकी दीक्षा देनेवाले, भक्तोंद्वारा प्रसन्न किये जानेवाले, यज्ञस्वरूप, समुद्ररूप, समुद्रान्तर्वर्ती बडवानल नामक अग्नि, यज्ञमें आहुतिरूपसे प्राप्त हविष्यके भोक्ता, अग्निमुख, प्रसन्नात्मा, अग्निरूप, महान् तेजस्वी, उत्तम तेजस्वी, विजय, जय, ज्योतिर्मण्डलके आश्रय, सिद्धिरूप, शत्रुओंसे मेल रखनेकी नीतिरूप, अवसर देखकर शत्रुके साथ युद्ध करनेकी नीतिरूप, शिखाधारी, दण्डधारी, जटा धारण करनेवाले, लपटवाले, मूर्तिमान् जलरूप, बलहीन, बाह्यस्वरूप, बाँसका डंडा धारण करनेवाले, पापियोंको वेतालकी भाँति भय देनेवाले, कालाग्नि, कालको भी दण्ड देनेवाले, तारास्वरूप अथवा अविनाशी शरीरवाले, अभ्युदयरूप, ब्रह्मारूप, सुगन्ध वहन करनेवाले वायुरूप, सबसे ज्येष्ठ, प्रजाजनोंके रक्षक, विष्णुस्वरूप, भुजाकी भाँति सबके सहायक, यज्ञमें विशिष्ट भाग ग्रहण करनेवाले, सब ओर मुखवाले, संसार-बन्धनसे मुक्त करनेवाले, देवसमुदायरूप, सुवर्णमय कवच धारण करनेवाले, जगत्स्वरूप रजोगुणरहित, भस्म लगानेवाले, बड़े आचारवान्, विख्यात यशवाले, आदिरहित, सब प्राणियोंके आदिकारण, सबके आदिपुरुष, सबके जन्मदाता, सबके ज्ञानदाता, सर्पस्वरूप, महान् आवाससे युक्त, तुच्छ वस्तु (धतूरों)-की माला धारण करनेवाले, मस्तकपर उठती हुई गंगाकी लहरोंको जाननेवाले, तीन वेद और तीनों लोक जिनके पद अर्थात् स्थान हैं, वे भगवान् शिव त्रिनेत्रधारी, अव्यक्त, सब बन्धनोंसे मुक्त करनेवाले, ज्ञानसे प्रसन्न होनेवाले, असुन्दर वस्त्र धारण करनेवाले, समस्त साधनोंसे सेवित, अपने मस्तकसे गंगाजीका स्रोत बहानेवाले, विभागरहित, सदा एकरस, यज्ञविभागके ज्ञाता, सबमें सदा रहनेवाले, सर्वत्र विचरनेवाले, दुर्वासामुनिस्वरूप, भैरव, यमराजस्वरूप, शीतल, चन्द्रस्वरूप, यज्ञस्वरूप, सबका धारण-पोषण करनेवाले, विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ, लाल-लाल आँखोंवाले, बड़े-बड़े नेत्रोंवाले, विजयस्वरूप, विशिष्ट विद्वान्, संग्रह, विग्रह, कर्म, नागेन्द्र-हारसे विभूषित, सबमें प्रमुख, विमुक्तदेह, शरीरमें रहनेवाले प्राणस्वरूप, कर्दमरूप, सर्वाचारस्वरूप, प्रसन्नतारूप, खेचरस्वरूप, बल और रूप धारण करनेवाले, आकाशवृत्तिरूप, निपात, सर्परूप, खलरूप, रौद्ररूप, देवताओंमें सूर्यरूप, रत्नस्वरूप किरणोंसे युक्त, उत्तम तेजवाले, वायुके समान वेगवाले, महान् वेगवाले, मनके समान वेगवाले, रात्रिचारी, सर्वावास, लक्ष्मीके निवासस्थान, व्यापक, लोकेश जिनकी कलाएँ हैं वे, हर, मुनि, आत्मगति, लोक, सहस्रमुख, विभुस्वरूप, यक्षोंसे युक्त, कुबेररूप, बाज पक्षीके समान वेगवाले, प्रकाशरूप, प्रजाओंके स्वामी, मतवाले, कामदेवके तुल्य रूपवाले, अर्थ और अनर्थकी प्राप्तिमें कारण, महान् सिद्धयोगस्वरूप, भक्तोंके क्लेशोंका अपहरण

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * / १०३३

करनेवाले, सिद्ध, सर्वार्थसाधक, भिक्षु, भिक्षुरूप, छः प्रकारके ऐश्वर्योंके स्वामी, कोमल चमड़ीवाले, विशाल सेनावाले कार्तिकेयरूप, विशाख—स्कन्द, जिनका भाग लाठीमें बाँधा जाता है वे, गौओंके पालक, हाथमें वज्र धारण करनेवाले, रोकनेवाले, विशेष रूपसे स्थित, स्तब्ध करनेवाले, नक्षत्ररूप, शत्रुको भी सहारा देनेवाले, काल, वसन्तरूप, महुआके समान नेत्रोंवाले, बृहस्पतीरूप, अन्न ही जिनकी सेना है ऐसे, निष्ठावान् आश्रमसूचक, ब्रह्मचारी, लोकचारी, सर्वचारी, उत्तम रत्नोंके ज्ञाता, ईशान, ईश्वर, काल, निशाचारी, एकमात्र सबके धारण करनेवाले, अमित प्रमाणातीत, नदों और नदियोंको उत्पन्न करनेवाले, अव्यय, नन्दीश्वर, सुनन्दी, नन्दन, नन्दवर्धन, नागहारी, विहारी, काल, ब्रह्मवेत्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ, चतुर्मुख, महालिंग, चतुर्लिंग, लिंगाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, कालाध्यक्ष, युगोंको धारण करनेवाले, उमापति, उमाकान्त, गंगाधर, वर, सर्वार्थ, सब प्राणियोंका अर्थ सिद्ध करनेवाले, नित्य, सब व्रतोंके पालक तथा शुचि (पवित्र) हैं। नाथ! ब्रह्मा आदि देवताओं और महर्षियोंको भी जिनका ज्ञान नहीं होता, उन्हीं आप परात्पर परमात्माकी स्तुति कैसे की जा सकती है?

मार्कण्डेयजी कहते हैं—इस स्तोत्रको सुनकर श्रीमान् द्वीपेश्‍वर शिव प्रसन्नतापूर्वक मुसकराते हुए बोले—‘देवताओ! तुमलोग वर माँगो।’

देवता बोले—महेश्वर! आप दैत्योंके विनाश और हमारी रक्षाके लिये उद्यत रहें। जो पापपरायण अधम मनुष्य भी यहाँके पाँच लिंगोंका अर्चन करे उसे वह उत्तम गति प्राप्त हो, जो बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा भी दुर्लभ है।

पूर्वकालमें उसी तीर्थमें इन्द्रने देव-दानववन्दित देवाधिदेव उमापतिकी सहस्र नामोंद्वारा स्तवन किया था। इससे भगवान् शंकरका प्रसाद प्राप्त करके वे देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुए। इसी प्रकार कुबेरने लक्षेश्वर देवका स्तवन किया था। युधिष्ठिर! उस तीर्थमें जो मोक्षदा नामवाली देवी हैं, उन्हींको पार्वती जानो। मोक्षेश्वर सिद्धलिंग है, वहाँ देवता और असुर भी मस्तक नवाते हैं।

तदनन्तर परम उत्तम वैष्णवतीर्थको जाय। वह तीर्थ कोकिला नामसे विख्यात है और सब पापोंका नाश करनेवाला है। देवाधिदेव भगवान् जनार्दन उसे वैष्णवक्षेत्र कहते हैं। जो मनुष्य वहाँ परम पवित्र एकादशी व्रत करके दीपमालाको जगाता है, उसकी इस दुःखद मर्त्यलोकमें पुनः आवृत्ति नहीं होती। वहाँपर श्राद्ध आदि करनेसे पितरोंको अनन्त कालतक तृप्ति बनी रहती है। इसी तीर्थमें किये हुए पुण्यसे ध्रुव नक्षत्रोंके तेजसे परम उज्ज्वल होकर ध्रुवपदको प्राप्त हुए हैं। नर्मदा सर्वतीर्थमयी है, महादेवजी भी सर्वदेवमय हैं, बुद्धि सर्वधर्ममयी है तथा तपस्या क्षमा और सत्यमय है। पाँचों इन्द्रियोंको वशमें करना ब्रह्मचर्य है और यह ब्रह्मचर्य ही तपस्याका मूल है। क्षमा, सत्य, जप, स्वाध्याय और तप—इन्हींका नाम संयम है। राजन्! जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर द्वीपेश्‍वर, कपिलेश्वर और नरकेश्वर—इन सबका नाम लेता है, वह सब तीर्थोंका फल पाकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

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नर्मदाजीकी तथा भगवान् विष्णुकी स्तुति

मार्कण्डेयजी कहते हैं—पूर्वकालमें जब नर्मदा इस लोकमें आ रही थीं, उस समय देवताओं और ब्रह्मर्षियोंने उन्हें नमस्कार करके उनका स्तवन किया—‘देवि! आपने चराचर प्राणियोंसहित मर्त्यलोकको पवित्र एवं पुण्यमय कर दिया है। जलके रूपमें प्राप्त हुई नर्मदाजी महादेवजीकी उत्तम कला हैं। आप ही उमा, कात्यायनी, गंगा, यमुना, सरस्वती, चामुण्डा, चर्चिकादेवी तथा रेवा हैं। देवि! आपका प्रादुर्भाव भगवान् शंकरसे हुआ है। आप पुण्यमय प्रवाहस्वरूपा हैं। मेकल नामक

१०३४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


पर्वतसे प्रकट होनेके कारण आपको उसकी कन्या कहते हैं। सबने आपका स्तवन किया है। आपके तट यज्ञयूपसे सुशोभित हैं। आप समस्त तीर्थोंकी मुकुटमणि हैं और स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं। आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंको तारनेवाली और उनके पापोंका नाश करनेवाली हैं। लक्ष्मी, स्वाहा, स्वधा और यशस्विनी पुरुहूता भी आप ही हैं। सुव्रते! आपने जलरूपसे सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है। आपके संगम और सिद्धलिंगको देवता तथा असुर भी नमस्कार करते हैं।

युधिष्ठिरने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! जिस मनुष्यके कर्मरूप बन्धन नहीं टूटे हैं, उसे किस प्रकार परमपदकी प्राप्ति हो सकती है ?

मार्कण्डेयजी बोले—राजन् ! पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने महात्मा ब्रह्माजीको परमपद-प्राप्तिका उपाय बताया था। वह उपाय है—भगवान् विष्णुका स्तवन, जो इस प्रकार है—

'मैं कमलके समान नेत्रोंवाले पापहारी हरि श्रीनारायणदेवकी शरण लेता हूँ। जो सम्पूर्ण लोकोंके रक्षक, सहस्रों नेत्रोंसे विभूषित, अविनाशी एवं परम पदस्वरूप हैं तथा भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। जो सब भूतोंकी सृष्टि करनेवाले तथा अनन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं, जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है, जो इन्द्रियोंके स्वामी, सत्यस्वरूप तथा विकाररहित हैं, उन श्रीविष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। जो हिरण्यगर्भस्वरूप, पृथ्वीको अपने गर्भमें रखनेवाले, अमृत (अविनाशी), सब ओर मुखवाले, नाशहीन तथा अपने सिवा किसी अन्य स्वामीसे रहित हैं, उन सूर्यके सदृश कान्तिमान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ। जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो द्युतिमान् देव, वैकुण्ठधामके अधिपति, सूक्ष्म, अचल, वरेण्य और अभयदाता हैं, उन भगवान् गरुड़वाहनकी मैं शरण लेता हूँ। जिन्हें नारायण और हरि कहा गया है, जो योगात्मा, सनातन पुरुष तथा सब लोकोंको शरण देनेवाले हैं, उन अविनाशी ईश्वरकी मैं शरण लेता हूँ। जो सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी हैं, जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है तथा जो संहारकारी देवता हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। पूर्वकालमें जिनसे कमलयोनि प्रजापति ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ है, वे पितामह ब्रह्मासे भी परे विराजमान भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। प्राचीन कालमें जब महाप्रलय हो गया था, सम्पूर्ण चराचर जगत् नष्ट हो चुका था, उस समय जो योगस्वरूप परमात्मा अकेले ही शेष थे, वे श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जो पृथुरूपसे इस पृथ्वीको जीत लेते हैं, अथवा वाराहरूप धारण करके पृथ्वीको अपने अधिकारमें करते हैं, जो सत्य, काल, धर्म, क्रिया, फल और गुणस्वरूप हैं, सत्पुरुषोंकी वाणीरूप वे भगवान् वासुदेव मुझपर प्रसन्न हों।'

'योगावास ! आपको नमस्कार है। सबके आवासस्थान ! वरदायक ! यज्ञभोगी और पंचभोगी नारायण ! आपको नमस्कार है। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार रूपोंवाले जगद्धाम ! लक्ष्मीनिवास ! वरप्रद ! विश्वावास ! साक्षीभूत ! जगत्पते ! आपको नमस्कार है। ज्ञानसागर ! आप अजेय हैं। छः प्रकारकी ऊर्मियोंसे जिसका विभाग किया जाता है, वह सम्पूर्ण विश्व एकमात्र आपका ही स्वरूप है। आप वृषाकपि (शिव और विष्णु), मृगाधिप (नृसिंह) और काल हैं, आपको नमस्कार है। अव्यक्त प्रकृतिसे इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति हुई है और प्रभु श्रीविष्णु अव्यक्तसे परे हैं। जिनसे परे कोई वस्तु नहीं है, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ। ब्रह्मा और शिव आदि जिन शक्तिशाली श्रीहरिका नित्य चिन्तन करते हैं, जो व्यापक परमात्मा अपने एक अंशसे सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त करके स्थित हैं, जिनका किसी भी इन्द्रियसे ग्रहण नहीं होता, जो निर्गुण होकर भी सम्पूर्ण जगत्‌के शासक हैं, उन श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ। जो सूर्यनाड़ी पिंगला और चन्द्रनाड़ी इडाके मध्यभाग—सुषुम्णामें ज्योतिर्मय स्वरूपसे विराजमान हैं, जिन्हें क्षेत्रज्ञ कहते हैं, वे महात्मा श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जो कोई सिद्ध और महर्षि

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०३५


ज्ञानयोगके द्वारा जिनके तत्त्वको जानकर संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं, वे महात्मा मुझपर प्रसन्न हों। सब ओरसे कल्याणमय परमेश्वर! आपको नमस्कार है। आपके नेत्र, सिर और मुख सब ओर हैं। निर्विकार! आदिकल्प! हृदयस्थित परमेश्वर! आपको नमस्कार है। इन्द्रियातीत! आपको नमस्कार है। परमात्मन्! आपको नमस्कार है। जो राग-द्वेषसे मुक्त और लोभ-मोह आदिसे रहित पुरुष आपको जानते हैं, वे संसारमें आसक्त नहीं होते। आप शरीरसे रहित और अव्यक्त होते हुए भी सम्पूर्ण शरीरोंमें तदाकार हुए-से रहते हैं। अव्यक्त प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, पंचमहाभूत और इन्द्रियाँ—ये सब आपमें स्थित हैं, आप उनमें नहीं हैं। वे आपके आश्रयके बिना स्वयं नहीं टिक सकतीं। आप अव्यक्त पुरुष हैं, अति कूटस्थ हैं, गुणोंके स्वामी और ईश्वर हैं, हेतुरहित आवर्त, प्रभु तथा अपने-आपमें स्थित हैं। पुण्डरीकाक्ष! आपको नमस्कार है। वासुदेव! आपको नमस्कार है। जगन्नाथ! आप ईश्वर हैं; इससे परे और क्या कहा जा सकता है। आप भक्तोंको मुक्ति देनेवाले, गुरु और देवताओंके स्वामी हैं। समस्त प्राणियोंका पालन करनेवाले वे ही आप श्रीहरि जन्म-जन्ममें मेरे स्वामी हों। मैं अहंकार तथा सत्त्व आदि तीनों गुणोंसे बँधा हूँ। मेरी नासिका अपने कारणभूत पृथ्वीतत्त्वमें मिल जाय, मेरी जिह्वा जलतत्त्वमें विलीन हो जाय, मेरे नेत्र तेजस्-तत्त्वमें समा जायँ, स्पर्शेन्द्रिय वायुमें विलीन हो जाय, श्रोत्रेन्द्रिय आकाशमें लीन हो जाय, मन अपने कारणतत्त्व अहंकारमें लीन हो जाय और मेरा अहंकार मेरी बुद्धिमें प्रवेश कर जाय तथा मेरी बुद्धि आपमें तल्लीन हो जाय। समस्त इन्द्रियों, शब्दादि विषयों और पंचभूतोंसे मेरा वियोग हो जाय। मेरे सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण अपनी आश्रयभूता प्रकृतिमें समा जायें। मैं तो प्रभुओंके भी प्रभु, दोषरहित श्रीहरिकी शरण लेता हूँ। जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो महान् ऋषि तथा सम्पूर्ण भूतोंको उत्पन्न करनेवाले हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। जो ब्रह्मस्वरूप और सम्पूर्ण विश्वके उत्पत्तिस्थान हैं, वे श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। महाप्रलयकालमें जब स्थावर-जंगम नष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण भूत ब्रह्मपत्नी—मायामें विलीन हो जाते हैं और महत्तत्त्व प्रकृतिमें लीन हो जाता है तथा वह प्रकृति जिनके आश्रित रहती है और वैदिक मन्त्रोंद्वारा जिनके लिये आहुति दी जाती है, वे श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, देवता, ब्रह्म, रुद्र, इन्द्र तथा योगियोंके तेजोंको जो सदा बढ़ाते हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। प्रभो! आप अजन्मा हैं, जगत्के लिये वास्तविक मार्ग आप ही हैं। आपकी कोई मूर्ति नहीं है तो भी विश्वकी सब मूर्तियोंपर आपका अधिकार है। आप नित्य नूतन हैं। प्रकृति, महत्तत्त्व और चेतन पुरुष रूपसे आप ही सुशोभित होते हैं। जो आत्मरूपसे अगोप्य (अपरोक्ष अनुभवके योग्य) और सबसे श्रेष्ठ हैं, उन श्रीहरिकी मैं शरणमें आया हूँ। चन्द्रमा और सूर्यके सदृश जो अपने तेजको स्वयं ही इस धराधामपर उतारते हैं, जिनसे सम्पूर्ण दिशाएँ प्रकट हुई हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों। जो सगुण, निर्गुण, चेतन, अचेतन, स्थूल, सूक्ष्म, सर्वगत और देहरहित हैं, वे महात्मा श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। सूर्यके समीपमें चन्द्रमाकी स्थिति है अर्थात् पिंगला नाड़ीके निकट जो इड़ा नाड़ी है—इन दोनोंके मध्यभाग अर्थात् सुषुम्णा नाड़ीमें जिनका चिन्तन किया जाता है, जो वहाँ अविचल, तेजोमय स्वरूपसे प्रकाशित होते हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों। प्रभो! जो नानात्वमें भी आपके एकत्वका दर्शन करते हैं, वे परमगतिको प्राप्त होते हैं। जो सब प्राणियोंमें सम, शत्रु, मित्र और उदासीन जनोंको प्रिय हैं, सबको समभावसे ग्रहण करते हैं, किसीसे कोई इच्छा नहीं रखते तथापि अपने भक्तोंको विशेषरूपसे अपनाते हैं, जो सब प्रकारसे जाननेयोग्य हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। यह समस्त चराचर जगत् और अण्डज, पिण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज—इन चार भेदोंवाला

१०३६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

प्राणिसमुदाय आपमें उसी प्रकार गूँथा हुआ है, जैसे डोरेमें मनके पिरोये होते हैं। आपके लिये धर्म और अधर्म नहीं है, आपका गर्भवास और जन्म भी नहीं होता। मैं जरा-जन्म और मृत्युके संकटोंसे मुक्ति पानेके लिये आप श्रीहरिकी शरणमें आया हूँ। श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ, शब्द आदि विषय तथा श्वास-प्रश्वास आदि चेष्टाएँ सभी योनियोंमें सुलभ हैं। यह शरीर काष्ठकी भाँति एक दिन नष्ट हो जानेवाला है। आत्माके लिये तो यह बड़ी भारी विपत्तिरूप है। अपने-आपका अकेला होना तो स्वयंसिद्ध है। केवल शरीरके जन्मसे ही इसमें पुनर्जन्मकी प्रतीति होती है। भगवन्! मैं अपने मन, बुद्धि और प्राणोंको आपमें ही लगाकर, आपके भजनमें तत्पर और आपकी ही शरण प्राप्त होकर मृत्युकालमें भी आपका ही स्मरण करूँगा। प्रभो! मेरे द्वारा पूर्वजन्ममें जो अशुभ कर्म किये गये हों वे वातादिजनित रोगोंके रूपमें मेरे शरीरमें प्रवेश करें, जिससे उन सबका ऋण उतर जाय।'

अन्यान्य यशस्वी पुरुषोंके लिये भी कल्याणका सबसे श्रेष्ठ उपाय यही है कि वे इस स्तोत्रका पाठ करें। यह सब पापोंकी शुद्धि करनेवाला, पुण्यस्वरूप तथा परमपदरूप है। सदा प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और सायंकालमें उठकर सब पापोंकी शान्ति करनेवाले इस जपनीय स्तोत्रका निरन्तर जप करना चाहिये—'मैं हरि, कृष्ण, हृषीकेश, वासुदेव, जनार्दन तथा जगन्नाथको प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापोंका निवारण करें। शंख, चक्र तथा शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले, मधुसूदन, लक्ष्मीपति श्रीविष्णुको प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापोंका नाश करें। जो जगत्‌का पालन करनेके लिये उद्यत रहनेवाले हैं, यशोदा माताके द्वारा कटिमें रस्सीसे बँधनेके कारण जो दामोदर नाम धारण करते हैं, सदा प्रसन्न रहते हैं तथा कमलके समान जिनके नेत्र हैं, उन अविनाशी विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ—वे मेरे पापोंका नाश करें। जो सब भूतोंके ईश्वर, अक्षर और अनिर्देश्य हैं और इसी रूपमें महात्मा पुरुष जिनका सदैव ध्यान करते हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं शरणमें आया हूँ। सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हुआ पुरुष जिनमें प्रवेश करके पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होता, उन श्रीहरिकी मैं शरणमें आया हूँ। जो ब्रह्माजीका शरीर धारण करके देवता, असुर और मनुष्यसहित सम्पूर्ण जगत्‌की बार-बार सृष्टि करते हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरणमें आया हूँ। सम्पूर्ण जगत्‌की योनिरूप जो भगवान् जनार्दन ब्रह्माजीका शरीर धारण करके सदा सृष्टिकर्ममें संलग्न रहते हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनसे परे दूसरी कोई वस्तु नहीं है, जिनमें यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है, जो सबके भीतर अन्तर्यामीरूपसे विराजमान एवं अनन्त हैं, उन सर्वव्यापी श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सम्पूर्ण चराचर भूतोंमें व्याप्त हैं, वे श्रीविष्णु ही मेरे समस्त पापोंका नाश करें। मेरे द्वारा जो निवृत्तिप्रधान कर्म अथवा भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये कर्म किया गया है, उससे मेरे अनेक जन्मोंके कर्मोंद्वारा संचित पाप अभी नष्ट हो जायँ। रात्रि, प्रातःकाल, मध्याह्न तथा अपराह्नकालमें अज्ञानवश मन, वाणी और क्रियाद्वारा जो कोई अशुभ कर्म किया गया हो, वह अभी क्षणभरमें नष्ट हो जाय। जैसे पानीमें नमक घुल-मिल जाता है, उसी प्रकार वह पापराशि भी विलीन हो जाय। दूसरोंको पीड़ा देना और परायीं निन्दा करना आदि दोष जो मैंने जन्मभर किये हैं, उनसे तथा दूसरोंके धन, खेत आदिके प्रति लोभ होनेके कारण क्रोध होनेसे जो मेरे द्वारा पापराशिका संग्रह किया गया है, वह पानीमें पिघलनेवाले नमककी भाँति विलीन हो जाय। विष्णु, वासुदेव, हरि, केशव, जनार्दन तथा श्रीकृष्णको नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है।'

युधिष्ठिर! इस स्तोत्रको ब्रह्माजीसे अंगिराने और अंगिरासे इन्द्रने प्राप्त किया। इधर, वसिष्ठजीने इस स्तोत्रको राजाओंमें श्रेष्ठ नाभागको सुनाया था। प्रजापालक राजर्षि नाभागने अतुल प्रभावशाली

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०३७


इस विष्णुस्तोत्रका सदैव पाठ किया। तत्पश्चात् नर्मदाके जलमें स्नान और अनेक प्रकारके दान करके राजा नाभाग अपनी पुरीको गये।

जो इस स्तोत्रद्वारा भगवान् जनार्दनकी स्तुति करता है, उसका इस घोर संसार-सागरमें पुनरागमन नहीं होता।


मेघनादतीर्थका प्राकट्य और उसकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! प्राचीन त्रेतायुगकी बात है। पुलस्त्यपौत्र त्रिलोकविजयी रावण देवताओंके लिये कण्टक हो गया था। वह वरदान पाकर देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग तथा राक्षस सबके लिये अवध्य हो गया था और पृथ्वीपर सब ओर इच्छानुसार विचरण करता था। उन दिनों परम सुन्दर देवगिरिपर मय नामसे विख्यात एक बलोन्मत्त दानव रहता था। रावण वहाँ मयको उपस्थित जान उसके समीप जाकर विनीतभावसे खड़ा हो गया। मयने दान और सम्मानपूर्वक रावणका स्वागत-सत्कार किया। तब रावणने मयसे पूछा—'प्रभो! यह किसकी कन्या है, इसका नाम क्या है और यह किसलिये उग्र तपस्या कर रही है?'

मय बोला—राक्षसराज! मैं दानवोंका राजा मय हूँ, मेरी पत्नीका नाम तेजवती है। यह सुन्दरी कन्या भी मेरी ही है। इसका नाम मन्दोदरी है। यह पतिके लिये तपस्या कर रही है।

मयका यह वचन सुनकर मदोन्मत्त रावण मयसे विनीत होकर बोला—महाभाग! मैं देवताओं और दानवोंका दर्प दलन करनेवाला पुलस्त्यपौत्र राजा रावण हूँ और आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप अपनी कन्या मुझे दे दें। उसे पितामह ब्रह्माजीके कुलमें उत्पन्न जान महात्मा मयने भी विधि-विधानसे उसके साथ अपनी पुत्रीका ब्याह कर दिया। मन्दोदरीको लेकर दुरात्माद्वारा पूजित राक्षस दिव्य विमानोंपर बैठकर उसके साथ क्रीड़ा करने लगा। कुछ कालमें पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ रावणने एक पुत्रको जन्म दिया। उस पुत्रने जन्म लेते ही संवर्तक मेघके समान बड़ी भारी गर्जना की, इसलिये ब्रह्माजीने उसका नाम मेघनाद रख दिया। मेघनादने बड़े होनेपर उत्तम व्रतका आश्रय लिया और उमासहित देवेश्वर भगवान् शंकरकी आराधना प्रारम्भ की। वह विधिपूर्वक व्रत, नियम, दान, होम, जप एवं दिव्य कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रतोंद्वारा अपने शरीरको कष्ट देने लगा। एक दिन मेघनाद कैलास पर्वतपर गया और वहाँसे एक शिवलिंग लेकर दक्षिण दिशाकी ओर लौट पड़ा। नर्मदाके किनारे पहुँचनेपर उसने उस लिंगको एक स्थानपर रख दिया और स्नान करके महादेवजीका पूजन किया। फिर अपना जप पूरा करके जब वह लंकामें जानेको उद्यत हुआ तब उसने वहाँ पड़े हुए एक अन्य शिवलिंगको बायें हाथसे उठाया। इस प्रकार जब वह पहलेवाले और दूसरे शिवलिंगको भी भक्तिपूर्वक ले जाने लगा, तब महादेवजीका वह महालिंग नर्मदाके जलमें गिर पड़ा और दूसरा भी नर्मदाके उत्तर तटपर गिर गया। जो नर्मदाके उत्तर तटपर गिरा, वह शोभायमान लिंग वहाँ मेघनादेश्वरके नामसे विख्यात हुआ और जो जलके भीतर गिर पड़ा, उसका नाम मध्यमेश्वर हुआ। मेघनाद उस लिंगको उठाना चाहता था, पर सफल न हुआ। उन दोनों विग्रहोंका अभिप्राय जानकर वह राक्षस आकाशमार्गसे लौट गया। तभीसे वह तीर्थ मेघनाद तथा मेघारव नामसे विख्यात हुआ। उत्तर तटपर खेटक नामक उत्तम तीर्थ हुआ। उसके पूर्वभागमें सब पापोंका नाश करनेवाला गर्जन नामक तीर्थ है। राजेन्द्र! जो उस तीर्थमें स्नान और एक दिन-रातका उपवास करता है, वह सनातन कल्याणका भागी होता है। जो उस तीर्थमें पिण्डदान करता है, उससे देवलोकमें पितृगण बारह वर्षोंतक तृप्त रहते हैं। जो वहाँ ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह योगीजनॉंको मिलनेवाले उत्तम फलको पाता है।

१०३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


करंजेश्वर तथा कुण्डलेश्वरतीर्थका प्रादुर्भाव और माहात्म्य

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! पहले सत्ययुगमें ब्रह्माजीके मानसपुत्र मरीचि हुए, जो वेद-वेदांगोंके तत्त्वज्ञ थे। मरीचिसे दीर्घकालके बाद महर्षि कश्यपका जन्म हुआ, जो द्वितीय ब्रह्माके समान थे। उनमें अपने पिताके क्षमा, दम, दया, दान, सत्य, शौच तथा सरलता आदि सभी सद्गुण शोभा पाते थे। महर्षि कश्यपके इन गुणोंको जानकर प्रजापति दक्षने अपनी तेरह कन्याओंका विवाह उनके साथ कर दिया। उनके नाम अदिति और दनु आदि थे। भैया युधिष्ठिर! इन दक्ष-कन्याओंके पुत्रों और पौत्रोंकी संख्या बहुत अधिक है। अदितिने इन्द्र आदि पुत्रोंको जन्म दिया। इसी प्रकार अन्य कन्याओंने नाग, प्रेत, पिशाच, पक्षी, यक्ष, राक्षस, सिंह, व्याघ्र, वराह आदिको उत्पन्न किया। महाबाहो! प्रजापति कश्यपके पुत्रोंसे चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी व्याप्त हो गयी।

युधिष्ठिर! दक्षकन्या दनुके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम करंज था। दानव करंजमें राजा बलिकी भाँति सभी प्रकारके उत्तम गुण विद्यमान थे। उसने बड़ी भारी तपस्या की, तब महादेवजीने उसे दर्शन देकर कहा—'करंज! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।'

करंज बोला— प्रभो! मुझे पुत्र और पौत्रोंके साथ धन दीजिये।

'तथास्तु' कहकर पार्वतीसहित शिव वृषभपर आरूढ़ हो वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तब वह दैत्य भी प्रसन्नतापूर्वक अपने नामसे महादेवजीकी स्थापना करके घरको लौट गया। तभीसे उस स्थानकी करंजेश्वर तीर्थके नामसे प्रसिद्धि हुई। राजन्! वहाँ स्नानमात्र करनेवाला मनुष्य ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे भी मुक्त हो जाता है। जो उस तीर्थमें देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, वह निश्चय ही अश्वमेध-यज्ञका पुण्यफल प्राप्त करता है। जो वहाँ प्राणत्याग करता है, वह बीस हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है और अन्तमें उत्तम कुलमें जन्म लेकर धनवान्, वेद-वेदांगोंका तत्त्वज्ञ, सर्वशास्त्रविशारद, राजा अथवा राजाके तुल्य होता है।

मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! प्राचीन त्रेतायुगमें पुलस्त्यपुत्र विश्रवाने भरद्वाज मुनिकी पुत्रीसे विवाह किया। उससे धनंजय नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो पुत्रोचित गुणोंसे सम्पन्न था। उसके जन्मका समाचार सुनकर लोकपितामह ब्रह्माजीने ऋषियों और देवताओंके साथ बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उस बालकका नामकरण-संस्कार किया और इस प्रकार कहा—'हे अनघ! यह बालक तुझ विश्रवासे प्रकट होकर मेरा पौत्र हुआ है। इसलिये मैंने तुम्हारे इस पुत्रको वैश्रवण नाम दिया है। यह सब देवताओंके धनका रक्षक होगा। लोकपालोंमें यह चौथा होगा। अविनाशी और यक्षोंका स्वामी होगा।'

आगे वही यक्षश्रेष्ठ कुण्डधार हुआ। उसने उत्तम स्वरूप और अवस्था पाकर माता-पिताकी आज्ञासे नर्मदाके तटपर बैठकर बड़ी भारी तपस्या की। तब दीर्घकालके पश्चात् महादेवजी उसपर प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—'वत्स! तुम अपनी इच्छाके अनुसार वर माँगो।'

कुण्डधार बोला— देव! यह तीर्थ और लिंग मेरे नामसे प्रसिद्ध हो।

तब 'एवमस्तु' कहकर पार्वतीसहित भगवान् शिव अन्तर्धान हो आकाशमार्गसे कैलास पर्वतको चले गये। तदनन्तर उस यक्षने भी आनन्दयुक्त हो वहाँ कुण्डलेश्वर महादेवको स्थापित किया। विविध उपचारोंके साथ शिवलिंगका पूजन और अन्न-पानादि तथा वस्त्राभूषणादिके द्वारा ब्राह्मणोंको तृप्त करके महादेवजीको सन्तुष्ट करनेके अनन्तर वह अपने घरको लौट गया। तबसे वह तीर्थ तीनों लोकोंमें कुण्डलेश्वरके नामसे विख्यात

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *१०३९

हुआ। युधिष्ठिर! जो कोई भी उस तीर्थमें उपवासपूर्वक ईशान देवका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। उस तीर्थमें स्नान करके जो ब्राह्मण ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदकी एक-एक ऋचाका भी पाठ करता है, उसे चारों वेदोंके पाठका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य वहाँ ब्राह्मणोंके लिये गोदान अथवा अन्नदान करता है, उस गौ तथा उसकी सन्तानोंके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है।


पिप्पलेश्वर, विमलेश्वर, विश्वरूपा-नर्मदासंगम तथा एक दिनमें मेघनादेश्वर आदि पाँच लिंगोंकी यात्राका माहात्म्य, राजा धर्मसेनकी कथा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—नर्मदाके तटपर पिप्पलाद नामक एक मुनि थे। वे माता-पितासे रहित थे। उन्होंने सोलह वर्षोंतक निराहार रहकर एकचित्त हो पार्वतीसहित भगवान् शंकरको प्रसन्न किया।

तब महादेवजी बोले—ब्रह्मन्! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे सन्तुष्ट हूँ। तुम मनोवांछित वर माँगो।

पिप्पलाद बोले—देव! आप इस तीर्थमें सदा मेरे नामसे प्रसिद्ध होकर निवास करें।

पिप्पलादके ऐसा कहनेपर 'तथास्तु' कहकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके चले जानेपर पिप्पलादने नर्मदाकी महाजलराशिमें स्नान किया और भगवान् शिवकी स्थापना करके वे उत्तर पर्वतपर चले गये। जो मनुष्य उस तीर्थमें भक्तिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण एवं महेश्वरका पूजन करता है, वह अश्वमेध यज्ञका उत्तम फल पाता है। पिप्पलेश्वरके समीप जिसकी मृत्यु होती है, वह भगवान् शिवके धाममें जाता है। पिप्पलेश्वर तीर्थमें भक्तिपूर्वक पितरोंकी तृप्तिके उद्देश्यसे जो ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, उसके पितर बारह हजार वर्षोंतक तृप्त रहकर उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं।

राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम विमलेश्वरतीर्थको जाय। जहाँ एक मनोहर देवशिला है, जहाँ गर्जन और खेटक नामसे प्रसिद्ध तीर्थ है। वहीं उत्तम देवशिला भी है। जो मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितर बारह वर्षोंतक परम तृप्त हो देवलोकमें आनन्द भोगते हैं। जो देवशिलातीर्थमें भक्तिभावसे थोड़े-से दानके द्वारा भी ब्राह्मणोंका सत्कार करता है, उसके पुण्यफलका अन्त नहीं है।

युधिष्ठिर! तदनन्तर नर्मदाके उत्तर तटकी यात्रा करे। मेघनादतीर्थके समीप सरिताओंमें श्रेष्ठ विश्वरूपा नदी बहती है। एक समय नर्मदाके तटपर विराजमान होकर भगवान् शंकर तपस्या करते-करते विश्वरूप हो गये। तब उन्हींके शरीरसे सरिताओंमें श्रेष्ठ विश्वरूपा प्रकट हुई और नर्मदाके जलमें जाकर मिल गयी। दोनोंका संगम बड़ा ही गुणवान् है। जो मनुष्य उस तीर्थमें जाकर स्नान करता है, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। वहाँ जो कर्म किया जाता है वह सब अक्षय होता है। उस तीर्थमें किया हुआ श्राद्ध, यज्ञ और शिवपूजन कोटिगुना फल देनेवाला होता है। वहाँ पाँच शिवलिंग प्रसिद्ध हैं—मेघनादेश्वर, गोष्ठेश्वर, वागीश्वर, काकडेश्वर और लक्षेश्वर। जो इन पाँचों लिंगोंका एक दिनमें पूजन करता है, वह इसी शरीरसे भगवान् शिवको पा लेता है और मोक्षका भागी होता है।

पूर्वकालमें अयोध्यापुरीमें धर्मसेन नामक बलवान् राजा राज्य करते थे। उन्होंने धर्मपूर्वक राज्यका पालन तथा बहुत-सी दक्षिणावाले अनेकानेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया। एक समय धर्मशास्त्र सुनते हुए राजाने नर्मदा नदीका चरित्र सुना। सुनकर वे नर्मदाके उत्तर तटपर गये और नर्मदामें स्नान करके उन्होंने मेघनादेश्वरका पूजन किया। तत्पश्चात् सूर्योदय होते-होते घोड़ेपर सवार हो

१०४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

वे उत्तर दिशामें गोष्ठेश्वर शिवके समीप पहुँचे। गोष्ठेश्वरकी विधिपूर्वक पूजा करके राजा धर्मसेन वागीश्वर तीर्थमें गये। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके चन्दन, अगर, कपूर और धूप-दीप आदि विधानोंसे शिवकी पूजा सम्पन्न करके पुनः घोड़ेपर सवार हो वे श्रेष्ठ राजा काकडेश्वरमें आये। काकडेश्वरकी पूजा करके वे लक्षेश्वर तीर्थमें गये और वहाँ नर्मदाके जलमें स्थित लक्षेश्वरका विधिपूर्वक पूजन करके मेघनादतीर्थमें लौट आये। इतनेमें सूर्य अस्त हो गये। उस समय कालरूपधारी भगवान् शिवका ध्यान करते हुए राजा धर्मसेन ज्यों ही घोड़ेसे उतरकर खड़े हुए, त्यों ही वह दिव्य शरीर धारण करके इन्द्रके विमानमें जा बैठा और इन्द्रलोकको चला गया। राजाके पीछे-पीछे एक कुतिया भी तीर्थयात्रा कर रही थी। उसने भी दिव्य देह धारण करके स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। यह सब देखकर धर्मसेनके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने दिव्यदेहधारी अश्वसे पूछा—'यह सब क्या है?' तब उसने आकाशसे ही उत्तर दिया, 'राजन्! आप अपने मनमें खेद क्यों मानते हैं? शारीरिक कष्ट सहन करनेसे और तपस्यासे दिव्य विभूतियोंकी प्राप्ति होती है। अभीतक तो आपने दूसरेके पैरोंसे यात्रा की है, अब पैदल जाइये। जब पुनः अपने पैरोंसे यात्रा करेंगे तब आपको अवश्य सिद्धि प्राप्त होगी।'

यह सुनकर राजाने दूसरे दिन पुनः लिंग-पूजनके लिये प्रस्थान किया। उन पाँचों लिंगोंका पूजन करके नर्मदा-तटपर आकर जब उन्होंने मेघनादेश्वरका दर्शन किया तब द्वारपर ही उन्हें भगवान् शिवका दर्शन हुआ। उनके पाँच मुख, दस भुजाएँ और प्रत्येक मुखपर तीन-तीन नेत्र थे। हाथमें त्रिशूल शोभा पा रहा था। संसारको अपने गर्भमें धारण करनेवाले भगवान् शिव वृषभपर आरूढ़ थे और उनके मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट अपनी चाँदनी छिटका रहा था। उन देवदेवेश्वर परमेश्वरका दर्शन करके राजाने इस प्रकार स्तुति की—'देव! महादेव!! आपकी जय हो। महा-पातकोंका नाश करनेवाले शिव! मैं संसार-समुद्रमें डूबा हुआ हूँ, आप इस समय मेरा उद्धार कीजिये।'

महादेवजी बोले—महाभाग! तुम मेरे भक्त हो। अतः तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो। उसे मैं तुम्हें दूँगा।

राजाने कहा—देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे अपने साथ रहनेवाला सेवक बना लीजिये और जो लोग एक दिनमें इन पाँचों लिंगोंका पूजन करें, वे सभी आपके अनुचर हों। यही मेरे लिये वर है।

धर्मसेनकी बात सुनकर महादेवजीने 'एवमस्तु' कहा तथा उन्हें साथ लेकर वे कैलास पर्वतपर चले गये। युधिष्ठिर! भगवान् शिवने राजा धर्मसेनको अपने-आपमें लीन कर लिया।

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मृकण्ड-आश्रममें दो गन्धर्वोंका उद्धार तथा चन्द्रमती-नर्मदासंगम आदि अन्य तीर्थोंकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! नर्मदाके दक्षिण तटपर मृकण्ड मुनिका पवित्र आश्रम है। उसमें परम धर्मात्मा मेरे पिता मृकण्डजीने दीर्घकालतक तपस्या की है। उनके आश्रममें उत्तम व्रतका पालन करनेवाले बहुत-से अन्य महर्षि भी निवास करते थे। इसी समय हेति और प्रहेति नामवाले दो गन्धर्व इन्द्रकी सभामें गये। वहाँ उन्होंने एक श्रेष्ठ अप्सराको देखा। देखते ही वे दोनों कामबाणसे पीड़ित हो गये। तब हेतिने मुर्गेकी और प्रहेतिने मोरकी बोली बोलकर मधुर स्वरसे उसे रिझानेकी चेष्टा की। उनका यह अभिप्राय जानकर देवराज इन्द्रने उन्हें शाप

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *१०४१

दिया—'अरे! तुम दोनों वास्तवमें मुर्गा और मोर हो जाओगे। देवताओंके सौ वर्ष पूरे होनेपर फिर यहाँ आ सकोगे।'

युधिष्ठिर! इन्द्रके इस शापसे दोनों दुराचारी गन्धर्व पक्षीकी योनिमें आ गये। उस समय भी वे बड़े सुन्दर थे। उन्हें देखना सबको प्रिय लगता था। वे अपने पूर्वजन्मके वृत्तान्तको स्मरण करके सब तीर्थोंमें भ्रमण करने लगे। एक दिन उन्होंने देवर्षि नारदको देखा और इस प्रकार पूछा, 'शुभाचार ब्रह्मपुत्र! हम दोनों किस कर्मसे इस योनिसे मुक्ति पा सकेंगे।'

नारदजीने कहा—नर्मदाजीके दक्षिण तटपर मृकण्ड मुनिका शुभाश्रम है। वह पशु-पक्षियोंकी योनिसे मुक्ति देनेवाला उत्तम तीर्थ है। तुम दोनों वहाँ नर्मदाजीके जलमें गोता लगाओ, इससे तुम्हारा सब कार्य सिद्ध होगा।

तदनन्तर हेति और प्रहेति—दोनों उस तीर्थमें स्नान करके पूर्ववत् दिव्यरूपधारी हो गये। फिर विधिपूर्वक स्नान करके उन्होंने सदाशिव देवका ध्यान किया और कुछ कालतक ध्यानमें ही स्थित रहे। इसी समय पातालसे सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान दो शिवलिंग वहाँ प्रकट हुए। एकका कुक्कुटेश्वर और दूसरेका मयूरेश्वर नाम हुआ। वे दोनों गन्धर्व विमानपर बैठकर इन्द्रलोकको चले गये। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। स्नानके पश्चात् वहाँ तिल और जलसे तर्पण करनेपर पितरोंकी उत्तम गति होती है। जो वहाँ मृत्युको प्राप्त होता है, वह फिर इस घोर संसार-सागरमें लौटकर नहीं आता।

तत्पश्चात् चन्द्रमती और नर्मदाके संगममें जो उत्तम तीर्थ हैं, उनकी यात्रा करे। वहाँ चन्द्रेश्वर, सिद्धेश्वर, घण्टेश्वर तथा महिषेश्वर—ये चार सिद्धलिंग हैं। तदनन्तर अश्वतीर्थ, वृषसेनतीर्थ, हयग्रीवतीर्थ और शुकतीर्थ हैं। उनसे आगे रमेश्वरतीर्थकी यात्रा करे, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। राजन्! नर्मदाके तटपर रमेश्वरतीर्थ महापातकोंका भी नाश कर देता है। वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य फिर संसारमें जन्म नहीं लेता। पितरोंके लिये वहाँ विधिपूर्वक तिलोदक और पिण्डदान देना चाहिये। इससे पितरोंकी परम गति होती है। इससे आगे उत्तम हारिणीतीर्थ है। वहाँ सिद्धलिंग हरिणेश्वर, धनुरीश्वर, बाणेश्वर तथा लुब्धकेश्वर—इन सबकी पूजा करके मनुष्य शिवलोकमें जाता है।


भानुमतीका तीर्थसेवन, शूलभेदतीर्थमें शबर-दम्पतिका उद्धार और सती भानुमतीको कैलासधामकी प्राप्ति

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! भगवान् शंकरकी पूजा करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह शास्त्रोक्त आठ मानस मन्त्रोंद्वारा आठ फूल निवेदन करे। उन फूलोंके नाम इस प्रकार हैं—वारिज, सौम्य, आग्नेय, वायव्य, पार्थिव, वानस्पत्य, प्राजापत्य और शिवपुष्प। अब इनके स्वरूपका निर्णय सुनो—जलको ही वारिज समझना चाहिये, मधुयुक्त दूध सौम्य कहलाता है, धूप और दीप आग्नेय पुष्पके अन्तर्गत हैं, चन्दन आदि वायव्य पुष्प हैं, कन्द-मूल आदि पार्थिव पुष्प और फल वानस्पत्य पुष्प है। अन्न आदि भोज्य पदार्थ प्राजापत्य पुष्प कहलाते हैं तथा उपासनाका ही नाम शिवपुष्प है। इनके सिवा अहिंसा प्रथम पुष्प है, इन्द्रियनिग्रह द्वितीय पुष्प और दया तृतीय पुष्प है। इन आध्यात्मिक पुष्पोंसे सब देवता सन्तुष्ट होते हैं। राजन्! इस हारिणीतीर्थमें तपस्या और भक्तिके द्वारा भगवान् शिवकी पूजा करनी चाहिये। जो ब्राह्मण रुद्रसूक्त, पुरुषसूक्त और अपनी-अपनी शाखाके अनुसार गृह्यसूत्र—'इषे त्वा' इत्यादि मन्त्र, ज्योतिर्ब्राह्मण, गायत्रीमन्त्र, मधुब्राह्मण, मण्डल ब्राह्मण

१०४२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तथा देवव्रत नामसे प्रसिद्ध दैव्यसूक्त आदि यजुर्वेदोक्त सूक्तोंका भक्तिपूर्वक जाप करते हैं, वे भगवान् शिवके लोकमें जाते हैं।

पूर्वकालमें वीरसेन नामसे विख्यात एक महापराक्रमी राजा हो गये हैं, वे चेदिदेशके स्वामी थे। बड़े-बड़े मण्डलाधीश्वर भी उनकी अधीनता स्वीकार कर चुके थे। राजा वीरसेनके राज्यमें कोई किसीका शत्रु नहीं था, किसीको रोग नहीं होता था और चोर आदिका उपद्रव भी नहीं था। उस राज्यमें कहीं भी अधर्म नहीं होता था, सदा सर्वत्र धर्मका ही पालन किया जाता था। राजा अपनी पत्नी और अनेक पुत्रोंके साथ सदा आनन्दसे रहते थे। उनके एक पुत्री थी, जो गिरिराजनन्दिनी उमाकी भाँति सुन्दरी थी। उसपर माता-पिता, भाई-बन्धु सभीकी स्नेहदृष्टि बनी रहती थी। समय आनेपर बारहवें वर्षमें चेदिराजने विधिपूर्वक अपनी पुत्रीका वैवाहिक कार्य सम्पन्न किया। विवाहके बाद उस कन्याका पति मृत्युको प्राप्त हो गया। बेटीको विधवा हुई देख राजा शोकमें डूब गये। उन्होंने दुःखसे पीड़ित होकर रानीसे कहा—'कल्याणी! यह तो जीवनभरके लिये अत्यन्त दुःसह दुःख आ पड़ा है। मेरी पुत्री रूप और यौवनसे सम्पन्न है, इसकी रक्षा कैसे की जा सकती है। भानुमतीके शीलकी रक्षाका अब कोई उपाय दिखायी नहीं देता।'

माता-पिता जब आपसमें इस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे, उस समय उनकी बात सुनकर राजकुमारी भानुमती उनके समीप जाकर बोली—'पिताजी! मैं शोकाग्निसे जल रही हूँ, इसलिये आज आपके सामने संकोच छोड़कर बोलती हूँ। मेरे कारण कोई दोषकी बात नहीं होने पायेगी, यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ। आजसे मैं कभी श्रृंगार नहीं धारण करूँगी, मोटे वस्त्रोंसे अपना शरीर ढक लूँगी, संयमपूर्वक रहकर पुराणोक्त सभी व्रतोंका आचरण करूँगी और श्रीहरिके सन्तोषके लिये तपस्या करती हुई अपनी कायाको सुखा डालूँगी। तात! यदि आपकी सम्मति हो तो मैं ऐसा ही जीवन व्यतीत करना चाहती हूँ।

भानुमतीका यह वचन सुनकर राजा वीरसेन स्नेहसे कातर हो गये। उन्होंने कन्याकी तीर्थयात्राके उद्देश्यसे बहुत अधिक धन देकर उसे विदा किया। कुछ विश्वासपात्र वृद्ध पुरुषोंको पुत्रीकी रक्षामें नियुक्त किया और एक हथियारबंद सिपाही तथा पुरोहित ब्राह्मणको भी साथमें लगा दिया। भानुमती गंगाके तटपर गयी और वहाँ स्नान करके भगवान्‌के ध्यानमें तत्पर हुई। स्नान, ध्यान और पूजन यह उसका प्रतिदिनका नियम हो गया। उसकी रक्षा करनेमें समर्थ जो दास-दासियाँ आदि थे, वे भी उसके पिता राजा वीरसेनकी आज्ञासे वहीं गंगाके किनारे टिके रहे। इस प्रकार वह राजकुमारी बारह वर्षोंतक गंगाजीके तटपर रही। तदनन्तर किसी समय गंगाको छोड़कर अपने सहायक मन्त्रियोंके साथ दक्षिण दिशामें गयी, जहाँ महानदी नर्मदा बहती थीं। वहाँ अमरकण्टक पर्वत एवं ॐकारतीर्थमें वह छः महीनेतक रही। फिर एक तीर्थसे दूसरे तीर्थमें होती हुई अनेकानेक तीर्थोंमें भ्रमण करने लगी। प्रत्येक तीर्थमें स्नान करके भक्ति-भावसे पूजन करती हुई वह निवास करती थी। तत्पश्चात् वह पश्चिम दिशामें देवनदी और नर्मदाके संगमपर गयी। वहाँ ऋषियोंके समुदायसे सेवित एक पुण्य आश्रम दिखायी दिया। ऋषिवृन्दका दर्शन करके भानुमतीने सबको प्रणाम किया और पूछा—'महात्माओ! इस तीर्थका नाम और माहात्म्य क्या है? यह बतानेकी कृपा करें।'

तब एक ऋषिने कहा—'तपस्विनि! यह स्थान चक्रतीर्थके नामसे विख्यात है। पूर्वकालमें त्रिशूलधारी देवाधिदेव महादेवने सन्तुष्ट होकर यहीं श्रीहरिको चक्र प्रदान किया था। जो इस तीर्थमें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, उसे पुनरावृत्तिरहित उत्तम गति प्राप्त होती है। दूसरे दिन यहाँसे शूलभेदतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ रात्रिमें जागरण करके पुराणकी कथा पढ़े और सुने। पुष्प, धूप, दीप आदि निवेदन करके

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०४३

भगवान् विष्णुकी पूजा करे। तीसरे दिन प्रातःकाल होनेपर ब्राह्मणोंको भोजन करावे और अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें भक्तिपूर्वक दान दे। फिर चौथे दिन जहाँ प्राची सरस्वती हैं, वहाँ जाना चाहिये। वे सरस्वती सम्पूर्ण जगत्‌को पावन करनेके लिये साक्षात् ब्रह्माजीसे प्रकट हुई हैं। पाँचवें दिन मार्कण्डेयेश्वर लिंगके समीप जाय और वहाँ स्नान करे। वह परम उत्तम स्थान सर्वदेवमय और सर्वतीर्थमय है। जो पवित्र एवं जितेन्द्रिय होकर वहाँ एक वर्ष या छः मास या पंद्रह दिन अथवा तीन रात्रि भी निवास करता है, उसका फिर मर्त्यलोकमें निवास नहीं होता। वह सदा स्वर्गलोकमें अक्षय निवास पाता है। जो नियमपूर्वक वहाँ निवास करता है, वह तीन जन्मोंके पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा जो विधवा नारी उत्तम व्रतका पालन करती हुई बारह वर्षोंतक वहाँ निवास करती है, वह अनन्त कालतक रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होती है।

मुनिका यह वचन सुनकर भानुमतीको बड़ी प्रसन्नता हुई। वह आलस्य छोड़कर अहर्निश तीर्थसेवन एवं स्नान करने लगी। उस तीर्थका प्रभाव देखकर राजकुमारीने पुरोहितजी और ब्राह्मणोंसे कहा—‘आपलोग मेरी यह बात सुनें। मैं जबतक जीऊँगी, यहीं रहूँगी। ऐसे उत्तम स्थानका त्याग नहीं करूँगी। आपलोग जाकर मेरे माता-पिता तथा भाईसे यह बात कह दें कि ‘भानुमती नियमपूर्वक व्रतका पालन करती हुई इस समय शूलभेदतीर्थमें रहती है और एक-एक दिनका अन्तर देकर उपवास करती हुई धीरे-धीरे एक मासतक उपवास करनेकी चेष्टा कर रही है। वह देवशिलापर रहकर प्रतिदिन भगवान् विष्णुका ध्यान करती और भूमिपर ही सोती है।’

यह सन्देश लेकर जब ब्राह्मणलोग चले गये, तब एक दिन दो शबर (भील) वहाँ आये। वे दोनों पति-पत्नी थे। शबरने अपनी स्त्रीसे कहा—‘प्रिये! यहाँ जितने कमलपुष्प मिलें, उन्हें राजकुमारीको देकर तुम शीघ्र भोजन कर लो। मैंने आज यहाँ देवपूजनका विचार किया है, इसलिये मुझे आज भोजन नहीं करना चाहिये। मैंने कभी किसी विधि-निषेधका पालन नहीं किया है। सदा पाप बढ़ाया और अशुभ कर्म किया है। अतः आज मैं धर्मका पालन करना चाहता हूँ।’

शबरी बोली—प्राणनाथ! मैंने किसी भी दिन आपसे पहले भोजन नहीं किया है। जहाँतक मुझे स्मरण है, आपके भोजनसे बचा हुआ अन्न ही मैंने भोजन किया है।

पत्नीका यह निश्चय जानकर शबर स्नान करनेके लिये गया। उसने आधे उत्तरीय वस्त्रसे स्नान करके सब देवताओंको भक्तिपूर्वक स्नान कराया और देवशिलाके पास डरते-डरते जाकर खड़ा हुआ। वह मन-ही-मन भगवान् विष्णुका चिन्तन करता था। शबरीने कुमुदके दो फूल राजकुमारीकी दासीके हाथमें दिये। रानीने उन फूलोंको देखकर दासीसे पूछा—‘तुमने ये दोनों फूल कहाँ पाये हैं, बताओ। शीघ्र जाओ और पता लगाओ। यदि और फूल मिलें तो ले आओ। धन देकर कमलके फूल खरीद लाना।’

भानुमतीकी यह बात सुनकर दासी शबरके पास गयी और बोली—बहुत-से श्रीफल तथा फूल मुझे ला दो।

शबरी बोली—मैं श्रीफल और विशेषतः फूल दूँगी, परंतु मुझे मूल्य लेनेकी इच्छा नहीं है।

तब दासी लौट गयी और रानीसे सब बात बता दी। तब रानी स्वयं आयीं और शबरसे बोलीं—तुम मूल्य लेकर मुझे फूल दो।

शबर बोला—देवि! मैं फल और फूलका मूल्य नहीं लेना चाहता। आपको जितनी आवश्यकता हो, मुझसे श्रीफल और फूल ले लें तथा विधिपूर्वक जगत्पति भगवान् वासुदेवकी पूजा करें।

रानी बोलीं—मैं मूल्य दिये बिना तुम्हारे कमलके फूल नहीं लूँगी। इन फूलोंके बदलेमें तुम धान्यका यह ढेर ले जाओ।

१०४४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

शबर बोला— भद्रे! आज मैं भगवान्‌का चिन्तन छोड़कर आहारका चिन्तन नहीं करूँगा। देवपूजन किये बिना अन्य किसी कार्यमें मेरी बुद्धि नहीं लगती।

रानी बोलीं— तुम्हें अन्नका त्याग नहीं करना चाहिये, क्योंकि सब कुछ अन्नमें ही प्रतिष्ठित है। अतः प्रयत्न करके मेरे अन्नको ग्रहण करो।

शबर बोला— मैं पहलेसे आज अन्न न लेनेका निश्चय कर चुका हूँ। यह सत्य है। सत्य ही सम्पूर्ण जगत्‌का मूल्य है और सत्यमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। सत्यसे ही सूर्य तपते हैं, सत्यसे ही चन्द्रमा प्रकाशित होते हैं, सत्यसे ही वायु चलती है तथा सत्यके ही आधारपर यह पृथ्वी टिकी हुई है। अतः पूरा प्रयत्न करके मनुष्य सत्यकी रक्षा करे। सत्यका लोप कदापि न करे।

रानी बोलीं— फूल चार प्रकारके बताये गये हैं—एक तो बगीचेसे चुनकर लाया हुआ, दूसरा जंगलसे तोड़ा हुआ, तीसरा मूल्य देकर खरीदा हुआ और चौथा दानके रूपमें प्राप्त हुआ। इनमें उत्तम फल तो उसका माना गया है, जो स्वयं ही जंगलसे तोड़कर लाया गया हो। बगीचेके फूलका मध्यम फल बताया गया है। खरीदे हुए फूलको निकृष्ट श्रेणीमें रखा गया है तथा जो प्रतिग्रहसे प्राप्त हुआ फूल है, उसे विद्वानोंने निष्फल बताया है।

तब पुरोहितजीने कहा— रानी! फूल ले लो और भगवान्‌की पूजा करो।

पुरोहितकी आज्ञासे रानीने शबरका उपकार करते हुए वे फूल ले लिये और उनके द्वारा भगवान् विष्णुका विधिवत् पूजन किया। रातको जागरण करके उन्होंने पुराणकी कथा भी सुनी। तदनन्तर शबरने भी धूप-दीप आदि निवेदन करके श्रीहरिका पूजन किया और भगवान् केशवका ध्यान करते हुए वह रातभर जागता रहा। फिर प्रातःकाल होनेपर उसने स्नानके लिये उत्सुक मनुष्योंकी भीड़पर दृष्टिपात किया। कोई शूलभेदमें नहाते हैं तो कोई देवनदीमें। कोई प्राची सरस्वतीमें स्नान करते हैं, कोई मार्कण्डेय ह्रदमें गोता लगाते हैं और कितने ही मनुष्य भक्तिभावसे चक्रतीर्थमें स्नान कर रहे हैं तथा स्नानसे पवित्र हुए सब लोग देवशिलापर यत्नपूर्वक श्राद्ध करते हैं। यह सब देखकर शबरने भी बेलका पिण्डदान किया और भानुमतीने भी सत्तूके पिण्ड बनाकर पितरोंके लिये अर्पण किये। फिर दम्भ-दोषरहित उत्तम ब्राह्मणको खीर, दही, शक्कर, मधु, घी, पायस और कृसर (खिचड़ी) आदि पदार्थ भोजन कराये। तदनन्तर भानुमतीके साथ सब ब्राह्मण शूलभेदतीर्थमें गये। वहाँ सबने देखा, शबर अपनी स्त्रीके साथ कुण्डमें खड़ा है। तत्पश्चात् शबर भृगु पर्वतके शिखरपर जाकर स्त्रीके साथ कूदकर प्राण देनेको उद्यत हुआ। यह देख राजकुमारीने कहा— 'महासत्त्व! ठहरो-ठहरो, मेरी बात सुनो—तुम तो अभी जवान हो, किसलिये प्राणोंका त्याग करते हो? तुम्हें कौन-सा सन्ताप या उद्वेग हुआ है, कौन-सा दुःख अथवा रोग हुआ है?'

शबर बोला— मेरे प्राणत्याग करनेका कोई कारण नहीं है और न मुझे कोई दुःख ही है, परंतु संसारमें कुछ सार तत्त्व है, यह बात मेरी बुद्धिमें नहीं आती। मनुष्यका जन्म बड़े दुःखसे प्राप्त होता है। इस मनुष्य-जन्मको पाकर जो धर्माचरण नहीं करता, वह इस थोड़ेसे दोषके कारण घोर नरकमें पड़ता है। अतः तपस्विनि! मैं इस तीर्थमें गिरकर प्राण देना चाहता हूँ।

राजपुत्री बोली— शबर! अब भी समय है। तुम स्वधर्म पालन करते हुए नाना प्रकारके सत्कर्म कर सकते हो। मैं तुम्हें अन्न, वस्त्र और धन दूँगी। तुम भगवान्‌का ध्यान करते हुए सदैव धर्मका आचरण करो।

शबर बोला— देवि! मुझे अन्न और वस्त्र नहीं चाहिये; क्योंकि जो दूसरेका अन्न खाता है, वह पाप ही खाता है।

राजपुत्री बोली— कन्द, मूल, फलका आहार

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *
१०४५


करते हुए उत्तम भिक्षान्न भोजन करके तीर्थोंमें स्नान करो तो सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे।<br><br>शबर बोला—देवि! मैंने अपना हित देखकर इस तीर्थमें प्राण त्यागनेका विचार कर लिया है। अब मैं सत्यका लोप नहीं कर सकता, यह मेरा निश्चित मत है। आप सब लोग मुझे क्षमा करें।<br><br>इतना कहकर उसने उत्तरीय वस्त्रसे अपनेको प्रयत्नपूर्वक बाँधा और स्त्रीके साथ भगवान्‌का ध्यान करके वह नीचे गिर पड़ा। लुढ़कता हुआ जब आधे पर्वतपर आ गया, तब उसके प्राण निकल गये। कुन्दके ऊपर जाकर उसका शरीर निश्चेष्ट हो गया। इसी समय शबर अपनी स्त्रीके साथ दिव्य विमानपर चढ़कर उत्तम गतिको प्राप्त हुआ।<br><br>तीर्थका यह माहात्म्य देखकर रानी भानुमती हर्षमें भर गयीं और मन-ही-मन कुछ सोच-विचारकर कुण्डके समीप पहुँचीं। फिर बहुत-से ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्होंने पूजन किया औरउन सबको नाना प्रकारके दान दिये। उसके बाद रानी पर्वतके ऊपर चढ़ गयी। उस दिन चैत्र मासकी अमावास्या तिथि थी। पर्वतके शिखरपर आरूढ़ होकर उसने दोनों हाथ जोड़ लिये और सब ब्राह्मणोंसे इस प्रकार कहा—‘आप सब लोग मेरे माता-पिता, भाई तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंसे यह कहियेगा कि सब लोग मेरी त्रुटियोंको क्षमा करेंगे और उन्हें यह सूचित कीजियेगा कि भानुमती शूलभेदतीर्थमें कठोर तपस्या करके शरीर त्यागकर स्वर्गको चली गयी।’<br><br>ऐसा सन्देश देकर रानीने सब लोगोंको विदा कर दिया और स्वयं पर्वतके शिखरपर खड़ी हुई। उसने अपने आधे उत्तरीय वस्त्रको खूब कसकर बाँध लिया और एकचित्त होकर पर्वतपरसे अपने शरीरको छोड़ दिया। वह आधे पर्वततक गिरकर आयी थी, इतनेमें ही देवताओं और दैत्योंने देखा—भानुमती दिव्य विमानपर आरूढ़ हो कैलास धामको चली गयीं।
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आदित्येश्वरतीर्थकी महिमा, मुनियोंद्वारा नर्मदाका स्तवन और उस तीर्थमें गोदानकी महिमा

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मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! अब मैं आदित्येश्वरतीर्थका माहात्म्य बतलाता हूँ। एक समय दुर्भिक्षके मारे हुए ब्राह्मणलोग नर्मदाजीके तटपर आये और फल तथा फूलोंसे भरे हुए एक उत्तम वनमें घुसे। वहाँसे पुनः नर्मदाजीके समीप जाकर उन्होंने दर्शन किया। दर्शन करके कुछ लोग नतमस्तक हुए और कुछ लोग ‘देवि! तुम्हारी जय हो, तुम्हें नमस्कार है’ ऐसा कहते हुए उनकी स्तुति करने लगे।<br><br>ऋषि बोले—सिद्धगणोंसे सेवित नर्मदादेवी! आपको नमस्कार है। सबको पवित्र करनेवाली मंगलमयी देवि! तुम्हें नमस्कार है। सहस्रों ब्राह्मणोंद्वारा पूजित तथा भगवान् शंकरसे प्रकट हुई पराशक्ति नर्मदे! तुम्हें नमस्कार है। देवि!तुम स्वयं पवित्र होकर सबको पवित्र करनेवाली हो, श्रेष्ठ हो, तुम्हें नमस्कार है। हमपर प्रसन्न होओ। शीतल जलसे सुशोभित सुखदायिनी नर्मदे! तुम सरिताओंमें श्रेष्ठ, पापहारिणी और दयावती हो, तुम्हें नमस्कार है। अनेक प्राणियोंके शरीरसे तुम्हारे अंगोंकी शोभा हो रही है। तुम्हारा एक-एक अंग गन्धवों, यक्षों तथा नागगणोंको पवित्र करनेवाला है। तुम उत्तम वर और सुख प्रदान करनेवाली हो, हम सब लोग तुम्हें नमस्कार करते हैं। तुम दुःखसे व्याकुल प्राणियोंको अभयदान देती हो। अनेक देवताओंने तुम्हारा पूजन किया है। मर्त्यलोकके मानव विष्ठा और मूत्रके समुद्ररूप इस शरीरमें डूबे रहकर तभीतक नरकोंमें निवास करते हैं, जबतक कि वेगसे