भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *१००३

महर्षि दधीचि तथा अन्य देवताओंने वहीं बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। उसी यज्ञ पर्वतसे चतु नामकी एक महानदी निकली है, जो नर्मदामें जाकर मिली है। वह संगम विश्वविख्यात तीर्थ है। उसके तटपर पीले रंगके कुश पृथ्वीपर फैले हैं। उनसे श्राद्ध करनेपर वे पितरोंको मोक्ष देनेवाले होते हैं। जहाँ चतु और नर्मदाका संगम है और जहाँ यज्ञ पर्वत है, इन दोनोंके बीचकी भूमिमें जो श्राद्धका अनुष्ठान करता है, उसके पितर पूर्ण तृप्त होते हैं। जो वहाँ स्नान और सिद्धेश्वर एवं चतुष्केश्वर लिंगकी परिक्रमा करता है, उस मनुष्यकी लोकमें पुन: गणना नहीं होती—वह मुक्त हो जाता है। युधिष्ठिर! वहाँ महादेवजी संगममें स्थित हैं। मनुष्य उनका दर्शन नहीं कर पाते। देवता, असुर और नागकन्याओंद्वारा उनका पूजन किया जाता है।

सुपर्ण नामसे प्रसिद्ध एक जितेन्द्रिय ब्रह्मर्षि थे। उनकी पतिव्रता धर्मपत्नीका नाम पुरुहूता था। वे दोनों दम्पति नैमिषारण्यमें निवास करते थे। एक दिन पर्वकालमें ऋतुस्नाता होनेपर पुरुहूताने अपने पतिको प्रसन्न करके कहा—'महामुने! आज मेरे साथ सहवास कीजिये, जिससे मुझे सम्पूर्ण वंशको पवित्र करनेवाला पुत्र प्राप्त हो। पुत्रके द्वारा मनुष्य पुण्यलोकोंपर विजय पाता है। पुत्रसे देवता और पितर तृप्त होते हैं। अतः आप पुत्र उत्पन्न करें।'

ब्राह्मणने कहा—प्रिये! आज अमावास्या है। इसमें मैथुनका निषेध किया गया है। अतः आज यह नहीं करना चाहिये। पितरोंके लिये तो आजके दिन मैथुन विशेषरूपसे वर्जित है। जो अमावास्याके दिन ऋतुकालमें भी पत्नीसंगम करता है, पितर उसका मांस भोजन करते हैं। उनके इस कथनसे पत्नीको सन्तोष हो गया और दोनों शिवाराधनमें तत्पर हो गये।

नील गंगाके पश्चिम और नर्मदाके उत्तर व्यतीपातेश्वर नामक शिवलिंग है, जो परम सिद्धि देनेवाला है। उसे साक्षात् जगदीश्वर सोमनाथका ही स्वरूप समझो। वहाँ सावित्री और सप्तर्षियोंने तपस्या की थी। नर्मदाके तटपर सावित्रीकुण्ड एक विख्यात तीर्थ है। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्यको कन्यादानका फल प्राप्त होता है। वहाँ तिलसहित जल देने और अन्नदान करनेसे पितर सावित्रीलोकमें रहकर तृप्तिलाभ करते हैं।

पातालेश्वर नामसे प्रसिद्ध देवताओंके स्वामी जगदीश्वर सोमनाथका पूजन करके सब लोग शिवधामको प्राप्त होते हैं। सावित्रीकुण्डमें स्नान करके उसीके जलसे भगवान् सोमनाथका पूजन करे, इससे उस मनुष्यका पुन: इस संसारमें जन्म नहीं होता।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! सूर्यवंशमें इन्द्रद्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो अयोध्याके अधिपति थे। उन्होंने पर्वत, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीका पालन किया था। उनके राज्यकालमें चारों वर्णोंके लोग स्वधर्म-पालनमें तत्पर थे। प्रत्येक धेनु इच्छानुसार दूध देनेवाली कामधेनु थी और पृथ्वी हरी-भरी खेतीसे सुशोभित होती थी। एक दिन राजर्षि इन्द्रद्युम्नने महर्षि वसिष्ठसे पूछा—'महामुने! मैं अश्वमेध-यज्ञ करना चाहता हूँ, सो किस तीर्थमें उसका अनुष्ठान करूँ?'

वसिष्ठजी बोले—राजन्! वेदवेत्ता ब्रह्मर्षिगण! आपको जैसी सम्मति दें, उस प्रकार ब्राह्मण ऋत्विजोंके द्वारा आपको यज्ञका अनुष्ठान करना चाहिये। उस समय राजसभामें मरीचि, कश्यप, अंगिरा, गौतम, दुर्वासा, च्यवन, धूम्र, महामुनि कण्व तथा और भी बहुत-से उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर बैठे थे। महाराज इन्द्रद्युम्नने उन सबसे पूछा—'किस तीर्थमें किया हुआ यज्ञ मनोवांछित फल देनेवाला होता है?'

ऋषि बोले—राजन्! इस कार्यके लिये ऋषियोंने अनेक भिन्न-भिन्न तीर्थोंको श्रेष्ठ बताया है।

यह सुनकर दुर्वासाने हँसते हुए कहा—राजन्! ब्राह्मण ज्ञानकी अधिकतासे ज्येष्ठ माने जाते हैं, क्षत्रियोंमें जिसका बल और पराक्रम अधिक हो, वही ज्येष्ठ माना गया है, वैश्योंका ज्येष्ठत्व धन

१००४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

और धान्यकी अधिकतापर निर्भर है तथा शूद्र जन्म एवं आयुके अनुसार ही ज्येष्ठ माने जाते हैं।* सात कल्पोंतक जीवित रहनेवाले तीनों वेदोंके ज्ञाता त्रिकालज्ञ महर्षि मार्कण्डेयजीके रहते हुए धर्मका निरूपण एवं निश्चय करनेकी शक्ति किसमें है? महाराज! आप नर्मदाके तटपर विद्यमान धर्मारण्यमें जाइये। वहाँ मार्कण्डेयजी जहाँ बतावें, उसी स्थानपर अपना यज्ञ प्रारम्भ करें।

‘देवर्षे! आप जैसा कहते हैं, वैसा ही करूँगा’—यों कहकर राजा इन्द्रद्युम्नने अपने मन्त्री देवगर्भको यज्ञकी सब सामग्री ले चलनेका आदेश दिया और स्वयं वहाँके ब्राह्मणों एवं मुनियोंके साथ दिव्य वाहनपर बैठकर बड़ी प्रसन्नताके साथ यात्रा की। उनके साथ अन्तःपुरकी रानियाँ भी थीं। सबके साथ राजा इन्द्रद्युम्न धर्मारण्यमें पहुँचे, जहाँ मार्कण्डेयजी विद्यमान थे। वहाँ जाकर उन्होंने मार्कण्डेयजीको साष्टांग प्रणाम और उनका यथावत् पूजन किया। राजा इन्द्रद्युम्नको आया देख महामुनि मार्कण्डेयजीने पूछा—‘नृपश्रेष्ठ! कुशल तो है न? बहुत दिनोंके बाद दिखायी दिये हो। इन ब्रह्मर्षियोंके साथ यहाँ किस प्रयोजनसे तुम्हारा आगमन हुआ है?’

इन्द्रद्युम्न बोले—द्विजश्रेष्ठ! मैं यज्ञ करनेके लिये आया हूँ, सो किस तीर्थमें उसका अनुष्ठान करूँ?

मार्कण्डेयजीने कहा—राजन्! समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सब नर्मदा नदीमें स्नान करनेके लिये आते हैं। उत्तरमें जितने शिवलिंग हैं और दक्षिणमें जो-जो तीर्थ हैं, वे सब कोटितीर्थमें लीन होते हैं, इसीलिये उसका नाम कोटितीर्थ हुआ है। भगवान् शंकरने पूर्वकालमें पार्वतीदेवी, कार्तिकेयजी, ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्र आदि देवताओंके सम्मुख इस तीर्थके माहात्म्यका इस प्रकार वर्णन किया है—‘ॐकारेश्वरके समीप नर्मदामें कोटितीर्थ बताया गया है। वहाँ जो दान, होम, यज्ञ तथा दुष्कर तप आदि पुण्यकर्म किया जाता है, उसके पुण्यका अन्त नहीं है। ग्रहणकालमें कुरुक्षेत्रकी प्रशंसा की जाती है। परंतु नर्मदा सदा सब कार्योंके लिये पुण्यदायिनी कही गयी है। अतः तुम कोटितीर्थमें यज्ञ करो।

यह सुनकर परम धर्मात्मा राजा इन्द्रद्युम्नने अमित तेजस्वी मार्कण्डेय मुनिके चरण पकड़े और कहा—मुने! आपने जो कुछ कहा है, उसके लिये मैं अपने ऊपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह मानता हूँ। इसी समय सुन्दर यज्ञयूप, विभिन्न देशोंके क्षत्रियवृन्द, गौ, अश्व, हाथी तथा अन्यान्य आवश्यक सामग्री साथ लेकर मन्त्री देवगर्भ वहाँ आ पहुँचे। तब राजाने तीस योजनका एक विशाल यज्ञ-मण्डप बनवाया। उसमें बहुत-से यूप लगाये और अपने प्रमाणके अनुसार नाना प्रकारके कुण्ड निर्माण कराये। यज्ञ प्रारम्भ हुआ और वेदमन्त्रोंकी उच्चारण-ध्वनिसे भूमि और आकाशका मध्यभाग गूँज उठा। सूर्यके सदृश तेजस्वी अग्निदेव अपने धूमरहित स्वरूपसे प्रज्वलित हो रहे थे। महाराज इन्द्रद्युम्नने उस यज्ञमें ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवका भी आवाहन किया। इनके साथ सम्पूर्ण देवता भी पधारे। राजाके यज्ञमें घी और दूधकी नदियाँ बहती थीं, जहाँ दही और खीरकी कीच जमी हुई थी। अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ सदा सबके लिये प्रस्तुत रहते थे। देवता, मुनि तथा चार प्रकारके प्राणिसमुदाय भलीभाँति तृप्त हुए। अन्तमें ब्राह्मणोंको प्रचुर दक्षिणा दी गयी। इस प्रकार वह यज्ञ सम्पूर्ण हुआ।

तदनन्तर ध्रुव तथा ब्रह्मपुत्र महर्षियोंको विदा करके ॐकारेश्वरके स्वरूपको जानकर राजाने उनका पूजन किया। मणि-माणिक्य आदि रत्नोंसे पहले ॐकारलिंगको विभूषित किया। फिर गन्ध, नाना प्रकारके धूप, कपूर, अगर, चन्दन, ध्वज, छत्र, वितान, व्यजन और दिव्य चामरोंसे पूजा सम्पन्न करके इस प्रकार स्तुति की—‘जिस बिन्दुयुक्त ॐकारका योगीजन सदा ध्यान करते हैं तथा जो ॐकारस्वरूप काम और मोक्ष


* विप्राणां ज्ञानतो ज्यैष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः। वैश्यानां धान्यधनतः शूद्राणां चैव जन्मतः॥ (स्क० पु०, आव० रे० ३४। १९-२०)

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १००५

देनेवाले हैं, उनको बार-बार नमस्कार है। ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्रको भी वर देनेवाले सर्वदेवमय शिव! आपको नमस्कार है। रुद्र! पुण्यसे सुशोभित होनेवाली जो आपकी कल्याणमयी अघोर (सौम्य) मूर्ति है, उसके द्वारा आप मुझपर कृपा कीजिये। आपके सब ओर हाथ और पैर हैं। सब ओर नेत्र, सिर और मुख हैं। लोकमें सब ओर आपके कान हैं तथा आप सबको व्याप्त करके स्थित हैं। आपको नमस्कार है।' इस प्रकार स्तुति करनेपर ॐकारलिंगके मध्यभागमें एक दूसरा लिंग दिखायी दिया, जो प्रज्वलित कालाग्निके समान कान्तिमान् था। उसने इन्द्रद्युम्नसे कहा—'राजन्! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनमें जो कामना हो, उसके लिये वर माँगो।'

इन्द्रद्युम्न बोले—देव! वहाँ यज्ञ पर्वतपर देवद्रोणीमें भगवती पार्वतीके साथ पूजित होकर आप सदा निवास करें। देवदेवेश्वर! इस तीर्थमें जो प्राणत्याग करे, वह शिवलोकमें जाय।

ॐकारेश्वर बोले—नृपश्रेष्ठ! तुम्हारी यह सब कामना पूर्ण हो।

इतना कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये। उन्हींके साथ अन्यान्य देवता भी अपने-अपने स्थानको चले गये। भगवान् शंकर कैलाशधामको गये। राजा इन्द्रद्युम्नने वहाँ चार प्रकारके प्राणियोंको सुनाकर कहा—'तुम सब लोग मेरे यज्ञके प्रभावसे नीरोग हो जाओ और सभी तृप्त रहो।' तत्पश्चात् राजा इन्द्रद्युम्नने साष्टांग प्रणाम करके भगवान् विष्णुकी स्तुति की।

राजाने कहा—मैं केशव (जलमें शयन करनेवाले), माधव (लक्ष्मीपति), विष्णु (सर्वव्यापी), गोविन्द, मधुसूदन (मधु दैत्यको मारनेवाले), पद्मनाभ (नाभिसे कमल उत्पन्न करनेवाले), हृषीकेश (इन्द्रियोंके स्वामी), श्रीधर, त्रिविक्रम (तीन विशाल डगवाले विराट्रूपधारी वामन), दामोदर (माता यशोदाके द्वारा रस्सीसे कटिभागमें बँधनेवाले), वासुदेव (वसुदेवपुत्र) तथा श्रीहरि (पाप हरण करनेवाले) को प्रणाम करता हूँ। जो शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष और वनमालासे विभूषित हैं, सम्पूर्ण लोकोंके रक्षक, जगत्के स्वामी, लक्ष्मीजीके पति तथा सर्वज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं, उन भगवान् श्रीकान्त, श्रीधर, श्रीश एवं श्रीनिवासको मैं नमस्कार करता हूँ। अच्युत! अनन्त! यज्ञेश! यज्ञाधिप! आपको नमस्कार है। ऋक्, साम, अथर्व और यज्ञ (यजुर्वेद)-स्वरूप आपको नमस्कार है। नृसिंह, मत्स्य, वाराह और कूर्मरूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। पवित्र वाहनपर आरूढ़ होनेवाले गरुड़ध्वज! आपको नमस्कार है। जो सहस्र मस्तकोंवाले, सकल-निष्कल, जाननेयोग्य, पुरुष (अन्तर्यामी), अध्यक्ष (साक्षी) तथा सबके आदिकारण हैं, उन भगवान् नारायणदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। दैत्योंका अन्त करनेवाले देवता श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। हिरण्य, पृथ्वी तथा यज्ञको अपने गर्भमें धारण करनेवाले, अमृतकी उत्पत्तिके हेतुभूत श्रीविष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। वासुदेव! श्रीगर्भ एवं ज्ञानगर्भस्वरूप आपको नमस्कार है। प्रभो! आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्की सृष्टि की है। आप ही प्रत्येक युगमें सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं। आपके सब ओर नेत्र हैं, सब ओर मुख हैं। आप अव्यक्त एवं जाननेयोग्य हैं। सम्पूर्ण विश्वके आत्मा, प्रकाशक और सबके भीतर निवास करनेवाले आपको नमस्कार है। आप सूर्य, वायु, अग्नि और चन्द्रमा हैं। देवदेवेश्वर! आप ही धाता, इन्द्र और प्रजापति हैं। सुरश्रेष्ठ! आपके ही प्रसादसे मेरे यज्ञकी सिद्धि हुई है।

राजाके द्वारा की हुई यह स्तुति सुनकर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने कहा—राजन्! तुम कोई वर माँगो।

राजा बोले—ॐकारलिंगके उत्तर भागमें वैदूर्य पर्वतकी चोटीपर आप जनार्दन लिंगके रूपमें निवास करें। यहाँ विधिपूर्वक आपकी पूजा करके मनुष्य श्रीविष्णुधामको प्राप्त हों, पशु-पक्षियोंकी योनिमें न जायँ तथा यमलोकमें भी प्रवेश न करें। यहाँ प्राणत्याग करनेपर मनुष्योंको

१००६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


आपके परम धामकी प्राप्ति हो और इस तीर्थमें पितरोंके निमित्त अन्नदान करनेपर वे पितर आपके प्रसादसे विष्णुधामको प्राप्त करें।

भगवान् विष्णुने कहा—नृपश्रेष्ठ ! मैं यहीं अवतार धारण करूँगा और तुमने जो कुछ माँगा है, वह सब मेरे प्रसादसे पूर्ण होगा।

ऐसा कहकर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु अपने धामको चले गये। युधिष्ठिर ! इस प्रकार राजा इन्द्रद्युम्नके महान् यज्ञका वर्णन किया गया। उस यज्ञसे ही वह पर्वत समस्त संसारमें पुण्यतीर्थके रूपमें विख्यात हुआ। सिद्धेश्वरलिंगको ब्रह्माका और नारायणेश्वरको श्रीहरिका स्वरूप समझो। इसके श्रवण और कीर्तनसे मनुष्य विष्णुलोकमें सम्मानित होता है।

तत्पश्चात् सत्यव्रतपरायण राजाने तीर्थोंका स्तवन किया—पितरोंका उद्धार करनेके लिये समस्त तीर्थोंको मेरा बार-बार नमस्कार है।

तीर्थ बोले—महाभाग ! तुम हमसे मनोवांछित वर माँगो।

इन्द्रद्युम्नने कहा—तीर्थगण ! आप सब लोग मुझपर अनुग्रह करके ॐकारके समीपवर्ती तीर्थमें निवास करें।

'एवमस्तु' कहकर तीर्थोंने नर्मदा नदीका इस प्रकार स्तवन किया—अनेक कल्पपर्यन्त स्थित रहनेवाली तथा महादेवजीकी सर्वोत्कृष्ट कलास्वरूपा नर्मदादेवीको हम नमस्कार करते हैं। सब लोकोंमें अत्यन्त प्रसिद्ध एवं नदियोंमें श्रेष्ठ नर्मदाको हम मस्तक नवाते हैं। देवि ! आप हम तीर्थोंके प्रभावसे नहीं, किंतु स्वभावसे ही परम पवित्र हैं, ठीक उसी तरह जैसे भगवान् सूर्यकी प्रभा और अग्निदेवकी कान्ति पवित्र होती है।

नर्मदाकी स्तुति करके तीर्थोंने इन्द्रद्युम्नसे कहा—राजेन्द्र ! जैसे चन्द्रमाकी कला पवित्र होती है, उसी प्रकारसे महानदी नर्मदा भी हैं। यों कहकर सब तीर्थ अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नने अर्घ्य देकर गंगाजीकी स्तुति की—'गंगा, भागीरथी, देवि, भोगवती, शुभा, जाह्नवी, मोक्षदा, भद्रा, तारिणी और पापनाशिनी इत्यादि नामोंसे प्रसिद्ध गंगादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ। मातः ! आप ही स्वर्गमें देवाधिदेवोंसे वन्दित मन्दाकिनी कहलाती हैं। आप ही वेदमाता गायत्री, उमा और कात्यायनी हैं। देवि ! आपको साक्षात् महादेवजीने अपने सिरपर धारण किया है। इससे अधिक आपके विषयमें और क्या कहा जा सकता है। भगवान् चन्द्रार्धशेखरको छोड़कर दूसरा कौन आपकी स्तुति करनेमें समर्थ है?'

गंगाजीने कहा—महाराज ! मैं प्रसन्न हूँ। तुम कोई वर माँगो।

राजाने कहा—देवेश्वरि ! आप सदा यहीं निवास करें।

गंगा बोली—राजेन्द्र ! ऐसा ही होगा। मैं अपने एक अंशसे सदा यहीं प्रवाहित होऊँगी।

ऐसा कहकर गंगा अपने स्थानको चली गयीं। इसके बाद राजा इन्द्रद्युम्नने नर्मदादेवीकी स्तुति की—'देवि ! तुम्हारे जलके प्रभावसे मैंने देवताओं और पितरोंको सन्तुष्ट किया है। तुमने चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीको पवित्र किया है। तुम सम्पूर्ण प्राणियोंकी माता और मनुष्योंको संसार-सागरसे पार उतारनेवाली हो। महादेवि ! मेकला, कल्पगा, नर्मदा और जलपूर्णा इत्यादि नामोंसे विख्यात होकर तुम विन्ध्यपर्वतकी शोभा बढ़ाती हो। शुभे ! सहस्रों वर्षतक तुम्हारी स्तुतिमें संलग्न रहनेपर भी कौन तुम्हारा भलीभाँति स्तवन कर सकता है।'

इस स्तोत्रसे सन्तुष्ट होकर नर्मदाने कहा—'राजन् ! तुम क्या चाहते हो, कहो। मैं तुम्हें वर दूँगी, जिससे सिद्धिको प्राप्त होओगे।' नर्मदाका यह वचन सुनकर ब्राह्मणोंसहित शिवभक्तिपरायण राजाने हँसते हुए कहा—'देवि !

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *१००७

यदि मुझे वर देना चाहती हो तो अपने दक्षिण तटसे लेकर उत्तर तटतक सात धाराएँ कर लो।'

नर्मदा बोलीं—राजन् ! मेरे प्रभाव और प्रसादसे यह सब हो जायगा। इस बीचमें जो कुछ दान दिया जायगा, उसका पुण्य असंख्य होगा। यहाँ दान देनेवालोंका पुनः इस संसारमें जन्म नहीं होगा। शूद्र, चाण्डाल, मृग, पशु और सर्प आदि भी नीलगंगा-संगममें स्नान करने अथवा प्राण त्यागनेपर स्वर्गधामको जायँगे। | तत्पश्चात् नर्मदाको नमस्कार करके राजा इन्द्रद्युम्न अपने वाहनपर आरूढ़ हुए और सहस्रों राजाओंके साथ अपनी राजधानी देवनिर्मित पुरी अयोध्याको चले गये। वहाँ दीर्घकालतक राज्य करनेके पश्चात् वे स्वर्गलोगमें गये।<br><br>युधिष्ठिर! यह प्राचीन इतिहास तुमको सुनाया गया है। जो इसे कहते और सुनते हैं, वे यमलोक नहीं देखते और पापयोनिमें नहीं जाते हैं।

<div align="center">~~ ० ~~</div>

पुराणलक्षण, कलिकालका प्रभाव तथा राजर्षि वसुदानके यज्ञमें प्रकट हुई कपिला और नर्मदाके संगमका माहात्म्य

मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—ये पुराणके पाँच लक्षण हैं*। कलियुगमें मनुष्य प्रायः असमर्थ और अल्पजीवी होंगे। बुद्धिहीन तथा दुराचारपरायण होंगे। स्वाध्याय, वषट्कार, तप और यज्ञ आदि कोई भी सत्कर्म उनके द्वारा न होगा। वे स्त्रियोंकी कामना रखनेवाले और विषयलोलुप होंगे। ब्राह्मण सकामभावसे ही कर्म करनेवाले और याचक होंगे। सदा दान लेंगे और परिवारके भरण-पोषणमें ही आसक्त रहेंगे। स्त्रियोंके प्रति आसक्ति होनेके कारण वे आत्माको नहीं जानेंगे। धर्मिष्ठ और तपस्वी भी कुकर्म करेंगे। कलिकाल आनेपर अधिकांश लोग वाममार्गी और दिगम्बर हो जायँगे। सब प्रजा एक वर्णकी हो जायगी। राजा म्लेच्छ होगा। हीनयुग आनेपर जब भगवान् विष्णुका बौद्धावतार होगा, तब मनुष्य अल्पायु, अल्पवीर्य तथा अल्पपराक्रमी होंगे। नाना प्रकारके देशव्यापी उपद्रव होते रहेंगे। चाण्डालोंके वंशमें उत्पन्न ब्राह्मण वेदोंको पढ़ावेंगे। दूसरोंको वेदका उपदेश करेंगे और अपने वेद बेचेंगे। धन पानेके लोभसे राजाओंके दरबारमें जायँगे। अग्निहोत्र और कन्याओंका विक्रय करेंगे। कलियुगके वेदपाठी ब्रह्मचर्यव्रतसे रहित होंगे। दस-बारह | वर्षोंकी बालिका भी गर्भ धारण करेगी। स्त्री अपने पतिका और पुत्र अपने माता-पिताका आदर नहीं करेंगे। बहू सासकी और पुत्री माताकी बात नहीं मानेगी। ये सब बातें यहाँ संक्षेपसे बतायी गयी हैं।<br><br>युधिष्ठिर! एक दिव्य कथा श्रवण करो, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है।<br><br>पूर्वकालमें वसुदान नामवाले एक चक्रवर्ती राजर्षि थे। उनकी राजधानी अयोध्या थी। उनके राज्यमें कोई दीन, दुःखी अथवा दरिद्र नहीं होता था। प्रत्येक गाय स्वयं ही इच्छानुसार दुग्ध देनेवाली और पृथ्वी हरी-भरी खेतीसे सुशोभित थी। एक समय राजर्षि वसुदान वेदके पारंगत ब्राह्मण ऋत्विजोंके साथ यज्ञकी सब सामग्रीका संग्रह करके अमरेश्वरतीर्थमें गये। वहाँ उनका यज्ञ प्रारम्भ हुआ और निर्विघ्न समाप्त भी हो गया। अवभृथके जलसे वहाँकी स्वर्णनिर्मित समूची पृथ्वी भीग गयी। उस यज्ञमें ब्रह्मा, विष्णु और शिवका एक साथ ही पूजन किया गया और वहाँ होमसे दूध और घीकी पृथक्-पृथक् धाराएँ बह निकलीं। गोमूत्रकी भी एक धारा बहने लगी और वेदोंके पारंगत विद्वान् ऋषि-मुनियोंने देवताओंको जो स्नान कराया था, उस जलकी भी एक धारा बह


* सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चेति पुराणं पञ्चलक्षणम्॥ (स्क० पु०, आव० रे० ३५। १५)

१०८८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

चली। इन सब धाराओंके आपसमें मिल जानेपर ब्रह्मर्षियों और देवताओंने देखा, एक नदी बह रही है। वह नदी कपिला नामसे प्रसिद्ध हुई। कपिला और नर्मदाका जहाँ संगम है, वहाँ रुद्रावर्ततीर्थ बताया गया है।

तदनन्तर दक्षिणाओंद्वारा सब ब्राह्मणोंका भलीभाँति सत्कार किया गया। उन्हें नाना प्रकारके वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके हाथी, घोड़े और रथपर बिठाया गया। देवताओंको भी ऐसा ही सत्कार प्राप्त हुआ। सब देवता सन्तुष्ट होकर राजर्षि वसुदानसे बोले—‘महाभाग! इस यज्ञसे हम बहुत प्रसन्न हैं, तुम कोई वर माँगो।’

वसुदान बोले—देवताओ! नर्मदा और कपिलाके संगममें स्नान करके जो मनुष्य महादेवजीकी पूजा करते हैं, वे दिव्य विमानोंद्वारा स्वर्गलोकमें जायँ और जिनकी यहाँ मृत्यु हो, वे पुनः संसारमें जन्म न लेकर मुक्त हो जायँ।

देवताओंने कहा—राजन्! तुम्हारे सभी अभीष्ट मनोरथ यथेष्ट सफल होंगे।

ऐसा कहकर सब देवता अपने-अपने विमानपर आरूढ़ हो प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गलोकको चले गये। राजर्षि वसुदान भी वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके साथ परम आनन्दसे युक्त हो अयोध्यापुरीमें लौट आये। उस तीर्थके प्रभावसे अन्तःपुर एवं परिवारसहित उन्होंने प्रचुर भोगोंका उपभोग किया और अन्तमें वे भगवान् शिवके परम धाममें गये। युधिष्ठिर! इस प्रकार नर्मदा और कपिलाके संगमका वृत्तान्त बताया गया। इसके श्रवण और कीर्तनसे मनुष्यको संसार-बन्धनसे छुटकारा मिल जाता है।

$\sim\sim\circ\sim\sim$

अमरावतीमें भगवान्‌का दैत्यसूदनरूपसे निवास तथा वहाँके अन्यान्य तीर्थों और शिवलिंगोंका माहात्म्य

मार्कण्डेयजी कहते हैं—महाराज! नर्मदाके दक्षिण और कपिलाके पश्चिम तटपर भगवान् विष्णुकी मनोहर पुरी अमरावती है, जिसमें भगवान् लक्ष्मीपति कोटि कल्प और युगोंतक निवास करते हैं। प्राचीन कालमें देवताओं और असुरोंके युद्धमें देवकण्टक दानवोंद्वारा सब देवता परास्त हो गये। उस समय दानवोंके अत्याचारसे पीड़ित होकर पृथ्वीदेवी और ब्रह्मा आदि देवता क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे—‘दैत्योंका अन्त करनेवाले जनार्दन! देव! जगन्नाथ! आपकी जय हो। वेदोंके मूलस्थान जगदीश्वर! हम आपकी शरणमें आये हैं, आप हमारी रक्षा करें।’

इस स्तोत्रको सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—ब्रह्मन्! भूलोकमें जो-जो दुर्धर्ष दानव हैं, उन सबका मैं शीघ्र ही नाश करूँगा। ऐसा कहकर भगवान् विष्णु देवताओंके साथ आये और सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये अपने सुदर्शनचक्रसे दैत्योंके मस्तक काटने लगे। तब समस्त दानव भगवान् विष्णुके भयसे थर्रा उठे और पृथ्वी छोड़कर रसातलमें भाग गये। तदनन्तर पुनः ब्राह्मण, देवता और तपस्वीजनोंके यज्ञ पूर्ववत् होने लगे। युधिष्ठिर! उस पुरी (अमरावती)-में भगवान् विष्णु दैत्यसूदनके नामसे प्रतिष्ठित हुए। जो मनुष्य वहाँ प्राणत्याग करता है, वह विमानके द्वारा विष्णुलोकमें सम्मानित होता है। कपिलाके पश्चिममें नीलगंगाका आगमन हुआ है। उसमें स्नान करके मनुष्य कोटितीर्थके सेवनका फल पाता है। सुदर्शन, दैत्यसूदन, विष्ण्वावर्त, शिवावर्त और लक्ष्म्यावर्त—इन तीर्थोंमें जो दान दिया जाता है, उसका पुण्य असंख्य होता है। वहाँ श्रीविष्णुको प्रसन्न करके मनुष्य अनन्त फलका भागी होता है। श्रीविष्णुक्षेत्रका

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | १००९ ---|---

प्रमाण एक कोसका बताया गया है। उसके भीतर ब्रह्महत्याका प्रवेश नहीं होता। जो वहाँ एक मासतक उपवास तथा अग्निहोत्र करता है, जो स्त्री वहाँ पातिव्रत्यधर्मका पालन करती है तथा जो मनुष्य स्वाध्याय, यज्ञ, चान्द्रायण, पराक तथा पितरोंका तिल और जलसे तर्पण करते हैं, उनके पितर तृप्त होकर भगवान् विष्णुके धाममें विहार करते हैं और उन मनुष्योंको भी अपने सत्कर्मोंका उत्तम फल प्राप्त होता है। जो एकरात्र, त्रिरात्र, कृच्छ्र, सान्तपन, अतिकृच्छ्र, पर्णकृच्छ्र तथा अन्यान्य वैष्णवव्रत करता है और जो दोनों पक्षोंकी एकादशीको भोजन नहीं करता है, वह इन व्रतोंके द्वारा भगवान् विष्णुके लोकमें पूजित होता है। चाण्डाल, श्वपच अथवा पशु-पक्षीकी योनिमें पड़ा हुआ प्राणी भी यदि इस तीर्थमें अपने प्राणोंका त्याग करता है, तो वह भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। इस तीर्थमें मासोपवासव्रत करनेवाले पुरुषों तथा पतिव्रता स्त्रियोंको देखकर धर्मराज स्वयं ही वहाँ जा उनके लिये अर्घ्य समर्पण करते हैं और उन महात्माओंको वैष्णवलोकका दर्शन कराकर लौट आते हैं। ब्रह्माजीके मानसपुत्र सप्तर्षियोंने एक समय धर्मराजसे पूछा- 'धर्म ! क्या कारण है कि आप यहाँ स्वयं पैदल विचर रहे हैं? इससे हमें बड़ा विस्मय हुआ है। महाभाग! इसका कारण बताइये?'

यह सुनकर धर्मराजने हँसते हुए कहा- मुनिवरो ! मेरे भयंकर दूत पतिव्रता स्त्रियों, मासोपवासी पुरुषों तथा इन सबके विमानोंकी उज्ज्वल दीप्तिकी ओर दृष्टिपात करनेमें असमर्थ हो रहे हैं। इसलिये वे लौट गये हैं। इसीलिये मैं पैदल गया था।

मार्कण्डेयजी कहते हैं- राजन् ! अमरावतीमें अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुका निवास है। वहाँ किया हुआ श्रीहरिका पूजन कलियुगके दोषोंका नाश करनेवाला है। नर्मदाके उत्तर तटपर एक अन्य श्रेष्ठ देवता हैं, जो ब्रह्मेश्वरके नामसे विख्यात हैं। वे सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। उनके पूजनसे पापराशि नष्ट होती है और पितर तृप्त होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं। लंकेश्वरसे दक्षिण सिद्धलिंग बताया गया है। उसके पूजन और स्पर्शसे गणपतिपदकी प्राप्ति होती है। विश्वेश्वर नामक महालिंग सर्वदेवमय और शुभ है। वैशाख शुक्ला अष्टमीको उसके पूजनसे मनुष्य दस हजार शिवलिंगोंकी पूजाका फल पाता है और भगवान् शिवका अनुचर होता है। महाराज ! तत्पश्चात् नर्मदा नदीके उत्तर तटकी यात्रा करे। वहाँ परम सिद्धिदायक पापनाशन लिंग है। वहाँ स्नान, तर्पण और पूजन करनेसे ब्रह्महत्याका नाश होता है। उसके बाद सब पापोंका नाश करनेवाला ऋणमोचन लिंग है। उसके पूजनसे अनेक जन्मोंका ऋण नष्ट हो जाता है। ऋणमोचनके दर्शनपूर्वक तिल और जलकी अंजलि देनेसे पितर तबतक तृप्त रहते हैं, जबतक कि सूर्य, चन्द्रमा और ताराओंकी स्थिति बनी रहती है। नर्मदा और चरुके संगममें शास्त्रोक्त रीतिसे स्नान करके संगमके जल और बिल्वपत्रसे जो महादेवजीको स्नान कराता और उनकी पूजा करता है, उसकी उमा-महेश्वरधामसे कभी पुनरावृत्ति नहीं होती। चतुष्केश्वर नामक एक सिद्धलिंग है, जो आँवलेके फलके बराबर है। देवता और दैत्य उसका पूजन करते हैं। मनुष्य उसे नहीं देख पाते। जो परम धार्मिक पुत्र उस तीर्थमें श्राद्ध करता है, उसके पितर महाप्रलय कालतक तृप्त रहते हैं। चरु नामवाली नदी यज्ञ पर्वतसे निकली है। पूर्वकालमें अपने पुरोहित बृहस्पतिजीके साथ देवराज इन्द्रने यहाँ यज्ञ किया था। तबसे लोकमें समस्त देवताओंद्वारा इसकी परम पवित्र महिमाका गान किया जाता है। वहाँ दारुवन नामसे विख्यात एक तीर्थ है, जो पृथ्वीपर सबके द्वारा सेवित होता है। त्रेतामें साठ हजार तपस्वी मुनियोंने उस तीर्थमें निवास किया था। वे सभी कन्द-मूल-फलका आहार करनेवाले और अग्निहोत्रपरायण थे। इस तीर्थके प्रभावसे उन्हें ब्रह्मलोककी प्राप्ति हुई है। दारुवनमें सब पापोंका नाश करनेवाला एक शिवलिंग है,

१०१०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

जिसके पूजनसे मनुष्य गणपति होता है। वहीं सर्वदेवमय शुभ विमलेश्वर लिंग है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं और जो मरते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। उस तीर्थमें देवता और असुर सबको निर्मल करके पिनाकधारी महादेव अपने धाममें ले जाते हैं। जो वहाँ तिल, जल और पिण्डदान देकर पितरोंको तृप्त करता है, वह भगवान् महेश्वरके परम धामको जाता है। युधिष्ठिर! विमलेश्वर लिंगको तुम साक्षात् महेश्वर ही समझो। वहीं एक व्याघ्रेश्वर लिंग भी है, जहाँ व्याघ्रीको स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई थी। उस तीर्थमें तिल, जल और हविष्यका पिण्डदान देनेसे पुत्र अपने पहले और पीछेकी सौ-सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है और स्वयं जबतक चौदह इन्द्र व्यतीत होते हैं तबतक वरुणलोकमें निवास करता है। व्याघ्रेश्वरदेवके पूजन, कीर्तन और श्रवणसे मनुष्य इन्द्रलोकको प्राप्त होता है।


अमरकण्टकपर सूत्रयागका माहात्म्य, कावेरी-संगम और पयोष्णी-संगमकी महिमा तथा वहाँके अन्य तीर्थोंके सेवनकी महत्ता

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! चन्द्रग्रहण, सूर्य्यग्रहण, षडशीतिमुख, युगादि, विषुव, व्यतिपात, संक्रान्ति, कार्तिक, माघ तथा वैशाखकी पूर्णिमा, कपिलषष्ठी, वैशाख शुक्ला तृतीया, कार्तिक शुक्ला नवमी, माघकी अमावास्या तथा भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी—ये युगादि तिथियाँ हैं। इन पर्वोंमें सूत्रयाग करना चाहिये। भगवान् शंकरके तुल्य जो पर्वत है, उसे उमासहित महादेवजी तथा गणेशजीका स्वरूप समझकर जो सूतसे लपेटता है, वह सहस्रों युगोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो स्त्री उस पर्वतको सूतसे आवेष्टित करती है, वह पतिसे संयुक्त एवं पुत्रवती होती है। राजन्! रेशमी सूत अथवा कपासका सूत लेकर उसे नौ तागोंका या दस, बारह, अठारह अथवा चौबीस तागोंका कर ले। फिर उसे कोटितीर्थमें धोवे और गन्ध एवं धूपसे सुवासित करे। तत्पश्चात् उसमें फूलकी माला बाँधे और रातमें दीपावली जलावे। ॐकारतीर्थमें विधिपूर्वक रातमें जागरण करते हुए भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर रहे और निराहार रहकर रात्रि व्यतीत करे। फिर प्रातःकाल ॐकारेश्वरका पूजन एवं उत्सव करे। एकाग्रचित्त होकर अक्षयवटमें सूत बाँधे और सर्वतीर्थमय शुभस्वरूप कोटितीर्थकी यात्रा करे। वहाँसे ऋणमोचन, पापनाशन, नरकेश्वर, गन्धर्वेश्वर और अंगारेश्वरतीर्थमें होते हुए सर्वतीर्थमय ब्रह्मावर्तमें जाय। वहाँ स्नान करके मनुष्य शिवलोकको पाता है। उस तीर्थमें तिल और जल देनेसे पितरोंकी सद्गति होती है। सर्वपापनाशक दारुकेश्वर लिंगके पूजनसे मनुष्य विद्याधर होता है। दारुकेश्वरसे भृगुलिंगके समीप जाय। वहाँ जानेमात्रसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। वहाँसे जालेश्वरतीर्थको जाय, जो सब तीर्थोंमें उत्तम है। वहाँ स्नानमात्र करनेवाला मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जालेश्वरमें तिल और जलकी अंजलि देनेसे पितरोंको अक्षय गति प्राप्त होती है। जालेश्वरसे पुनः कोटितीर्थमें आवे और विधिपूर्वक स्नान करके ॐकारेश्वर महादेवके श्रीअंगोंमें श्वेत सूत बाँधे। फिर ॐकारेश्वरकी पूजा करके दीपमाला जलावे। तत्पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे—‘महेश्वर! आपके प्रसादसे मेरा यह सूत्रयाग सफल हो।’ तदनन्तर यतियोंको भोजन करावे और ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा दे। उसके बाद भाई-बन्धु और भृत्यवर्गके साथ पारण करे। जो शारीरिक कष्ट उठाकर शिवपर्वतकी परिक्रमा करता है, उसे पग-पगपर यज्ञका फल प्राप्त होता है।

उत्तर और दक्षिणमें जो तीर्थ हैं, वे भगवान् शिवके साक्षात् स्थान कोटितीर्थमें विलीन होते हैं। समुद्रपर्यन्त पृथ्वीमें जो तीर्थ हैं, वे परम-

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०११


पदस्वरूप कोटितीर्थमें लयको प्राप्त होते हैं। नृपश्रेष्ठ! नर्मदा और अमरावती तथा नर्मदा और ॐकारेश्वरके मध्यभागमें कोटितीर्थ विद्यमान है, जिसमें पातालके एक लाख तीर्थ निवास करते हैं। साक्षात् महादेवजीने कपिला और नर्मदाके बीचमें उन सब तीर्थोंकी स्थापना की है। महाराज ! इसके बीच रुद्रावर्तके जलमें जो मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करते हैं, वे शिवलोकमें जाते हैं तथा जो नर्मदाके उत्तर तटमें निवास करते हैं, वे रुद्रलोकके निवासी होते हैं। जो वाम भाग (दक्षिण तट)-पर निवास करते हैं, वे विष्णुलोकमें जाते हैं। जो अमरकण्टक पर्वतपर पूर्व और पश्चिम भागमें निवास करते हैं, वे रुद्र, ब्रह्मा और विष्णुके लोकमें जाते हैं। सूर्यग्रहणके समय न्यायोपार्जित धनका कोटितीर्थमें दान करनेसे अनेक प्रकारके पुण्य होते हैं। कावेरीके पूर्वभागमें जहाँतक पर्यंक पर्वत है, उसके बीचमें तीर्थोंकी संख्या दस लाख बतायी गयी है। नर्मदासे लेकर जमदग्नि आश्रमके बीचमें श्रीकण्ठ और नीलकण्ठ नामक शिवलिंग स्थित हैं। नर्मदाके उभय तटोंपर एक कोसके भीतर जितने भी स्वयम्भू देवता हैं, उन सबको सिद्धिदायक जानना चाहिये। वे सभी इच्छानुसार काम, भोग और फल देनेवाले हैं। भारत ! यह अमरकण्टक पर्वत जिस प्रकार सब ओरसे पवित्र है, वैसा पवित्र मुझे तीनों लोकोंमें दूसरा कोई पर्वत नहीं दिखायी देता। कोटितीर्थ और अमरकण्टक दोनों ही परम पवित्र हैं। इन्हें स्वर्ग, मोक्ष तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंका दाता समझो। चतुर्दशी मंगलवारको जब व्यतिपात योग हो, तब कावेरीसंगममें स्नान करनेसे सहस्रगुना पुण्य होता है। जो शस्त्रद्वारा मारे गये हैं, ऐसे लोगोंके निमित्त वहाँ तिलमिश्रित जलकी अंजलि देनेसे और एकोद्दिष्ट श्राद्ध करनेसे वे स्वर्गलोक पाते हैं। नर्मदा और कावेरीके जल और जंगली तिलसे तृप्त किये हुए पितर परम गतिको प्राप्त होते हैं। सहस्रों धाराओंसे कावेरी नदी इस भूतलपर प्रसिद्ध है। कावेरीके जलसे समस्त पृथ्वी व्याप्त है।नर्मदाके दक्षिण तटपर वाराह और विन्ध्याचलमें सम्पूर्ण देवताओंको प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाली पयोष्णी नदी प्रकट हुई है। पूर्वकालमें महादेवजीके आराधना करनेपर साक्षात् पार्वतीस्वरूपा पयोष्णी नदीका प्रादुर्भाव हुआ है। वह यशस्वी वाराह पर्वतके शरीरसे निकली है। उसमें स्नान करनेपर मनुष्य निश्चय ही इस संसारमें जन्म नहीं लेता। युधिष्ठिर ! वहाँ तिलोदक देनेसे पितर लाखों वर्षोंतक भगवान् शिवके लोकमें क्रीडा करते हैं। चन्द्रग्रहणके समय वाराह और विन्ध्याचल पर्वतपर कुरुक्षेत्रके समान पुण्य होता है। यह साक्षात् भगवान् शंकरका कथन है। वाराह पर्वतसे लेकर पयोष्णी नदीके संगमतक एक करोड़ तीर्थ बताये गये हैं। पयोष्णीसंगममें सोमावर्त नामक तीर्थकी स्थिति कही जाती है। वह स्थान सब ओरसे पवित्र है। जहाँ चार भुजाधारी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीपति निवास करते हैं, उस एक कोसके क्षेत्रको विष्णुक्षेत्र जानना चाहिये। आश्विनमासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी और अमावास्या तथा शुक्ल पक्षकी प्रतिपदा—ये क्रमशः उस तीर्थके पर्व हैं। चतुर्दशीको चारका योग होनेपर अर्थात् मास, पक्ष, तिथि और विष्णुक्षेत्रका संयोग होनेपर वहाँ अमृतकी धारा बहती है। उस दिन वहाँ तर्पण करनेसे पितर अवश्य ही तृप्त होते हैं। सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें जो फल बताया गया है, वह तापी और पयोष्णीके संगममें भी प्राप्त होता है। नर्मदाके दक्षिण पातालसे एक तीर्थ प्रकट हुआ है, जो तीनों लोकोंमें कावेरीकुण्डके नामसे विख्यात हुआ है। उसमें स्नानमात्र करनेसे मनुष्य गणाध्यक्ष पदको प्राप्त करता है। वहाँ कुण्डेश्वर नामक एक सिद्धलिंग है, जो देवताओं और सिद्धोंसे सुसेवित है। उस पवित्र लिंगका जो भूलसे भी पूजन कर लेता है, उसके पुण्यकी कोई संख्या नहीं है। स्वयं प्रकट हुए जो स्वयम्भू लिंग हैं, वे स्वर्ग और मोक्ष देनेवाले हैं। कावेरीमें मनुष्य जहाँ-कहीं भी स्नान करता है, वह अश्वमेधके फलको पाकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

$\sim\sim\infty\sim\sim$

१०१२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भद्ररुद्रेश्वरकी महिमा, दुर्वासाजीके द्वारा अमरकण्टकका गयातीर्थके तुल्य होना तथा राजा भरतका यज्ञ

मार्केण्डेयजी कहते हैं—राजन्! एक भद्र-रुद्रेश्वर नामक लिंग है, जो उत्तम सिद्धियोंको देनेवाला है। पूर्वकल्पमें भद्र और रुद्र नामवाले दो गन्धर्व थे। वे दोनों भाई थे। उन्होंने विधिपूर्वक इस शिवलिंगकी अर्चना करके विद्याधरलोक प्राप्त किया।<br><br>आदिकल्पके चाक्षुष मन्वन्तरमें सत्ययुग आनेपर निमि नामसे प्रसिद्ध एक चक्रवर्ती राजा हुए। वे ब्राह्मणके क्रोधसे पक्षी-योनिमें पड़ गये थे। उन्होंने सोमवती अमावास्यामें यहाँ स्नान करके इस तीर्थके माहात्म्यसे पक्षी-योनि त्यागकर स्वर्गलोक प्राप्त किया।<br><br>एक समय उग्र तपस्वी दुर्वासा मुनि सब तीर्थोंमें घूम रहे थे। घूमते-घूमते वे पितरोंके हितकी कामनासे पितृतीर्थ गयाजीमें गये। वहाँ स्नान करके महादेवजी तथा ब्रह्माजीकी पूजा करनेके पश्चात् उन्होंने कुश और तिलयुक्त जलांजलि तथा पिण्ड पितरोंके लिये अर्पण किये। पिण्डदान करके दुर्वासाजीने मुनियोंसे कहा—'मुनिवरो! मैंने सुना था कि इस तीर्थमें पितरलोग उपस्थित होकर अपने हाथसे पिण्ड ग्रहण करते हैं, वह बात आज मैं नहीं देखता। अतः मेरी तो तीर्थयात्रा व्यर्थ हो गयी।'<br><br>मुनि बोले—अमावास्याको यहाँ दिया हुआ पिण्डदान पितरलोग अपने हाथमें लेते हैं, अतः आप अमावास्यातक प्रतीक्षा कीजिये।<br><br>दुर्वासाने कहा—अब न तो यहाँ पिण्ड दूँगा और न स्नान एवं दान ही करूँगा।<br><br>इसके बाद उन्होंने मुनिवर एरण्डसे कहा—आप क्यों अपने शरीरको क्लेश दे रहे हैं? कमण्डलु हाथमें लेकर ॐकारतीर्थ और नर्मदा नदीकी यात्रा कीजिये। ऐसा कहकर दुर्वासा मुनि ऋषियोंके साथ अमरकण्टक पर्वतपर आये और ॐकारेश्वरकी पूजा करके उनका इस प्रकारस्तवन किया।<br><br>दुर्वासा बोले—कालस्वरूप महादेवजीको नमस्कार है। त्रिमूर्तिधारी शिवको नमस्कार है। अव्यक्त और व्यक्तस्वरूप अनन्तानन्तगामी भगवान् शंकरको नमस्कार है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद जिनके स्वरूप हैं, उन सर्वज्ञ शिवको नमस्कार है। भवोद्भव! जगन्नाथ! उमाकान्त! आपको नमस्कार है। कल्याणकारी सुखदाता भवको नमस्कार है। मंगलकारी शंकरको नमस्कार है। तीन नेत्रोंवाले आपको नमस्कार है। अर्धचन्द्रधारी, श्रीकण्ठ और नीलकण्ठको नमस्कार है। सर्पोंका आभूषण धारण करनेवाले त्रिशूलधारी रुद्रको नमस्कार है। पिनाक धनुष धारण करनेवाले महादेवको नमस्कार है। प्रभो! आप शर्व, सर्वरूप और चराचर जगत्स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। सुरेश्वर! इस लोक और परलोकमें मेरे अपराधको आप क्षमा करें। देवेश! उमापते! आपके समान दूसरा कोई नहीं है।<br><br>यह दिव्य स्तुति सुनकर ॐकारस्वरूपधारी भगवान् शिव बोले—महाभाग! तुम वर माँगो।<br><br>दुर्वासाने कहा—देव! यह तीर्थ गयाके समान हो जाय।<br><br>भगवान् ॐकार बोले—तपोधन! मेरे प्रसादसे यह तीर्थ आजसे ही गयातुल्य हो जायगा।<br><br>इस प्रकार वरदान पाकर ब्रह्मर्षि दुर्वासा अमरकण्टकके पूर्वभागमें मुनियोंके साथ रहने लगे।<br><br>मार्कण्डेयजी कहते हैं—महाभाग! तदनन्तर नर्मदात्तटपर विद्यमान शल्या और विशल्या तीर्थमें जाय। वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकको जाता है। उस तीर्थमें अतिशय उत्तम यज्ञेश्वर तथा धूपेश्वर लिंग हैं। उनको सिद्धिदाता और मोक्षदाता जानो। उस तीर्थमें तिल और जलसे तर्पण करनेपर पितर सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्रोंके स्थिति-कालतक तृप्त रहते हैं।<br><br>राजन्! सूर्यवंशमें भरत नामसे प्रसिद्ध एक
* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *१०१३

राजा हो गये हैं, जो सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन करते थे। एक समय राजा भरतने यज्ञकर्ममें तत्पर हो भृगुपर्वतके दक्षिण भागमें दस योजन विस्तृत यज्ञभूमि निर्माण करायी, जो कुण्ड और यज्ञमण्डपसे सुशोभित थी। यज्ञकी सब सामग्रियोंसे सम्पन्न हो वेदमन्त्रोंके उच्चारणकी ध्वनिसे आकाश और पृथ्वीको गुँजाते हुए महाराज भरतने यज्ञ प्रारम्भ किया। उन्होंने होमसे सप्तलोकवासी देवताओंको तृप्त किया। इस प्रकार अमित तेजस्वी राजाका यज्ञ अभी चल ही रहा था कि उसका विध्वंस करनेके लिये भयानक रूपवाले राक्षस माल्यवान्, सुमाली, सुकेशी, शंख और दूषण आदि सहस्रोंकी संख्यामें आ धमके। उन्होंने यज्ञकी समस्त वस्तुएँ नष्ट-भ्रष्ट कर डालीं। सब देवता भाग चले, ऋत्विज मार गिराये गये। इस प्रकार राक्षसोंद्वारा उस यज्ञके नष्ट किये जानेपर राजा भरत आहुतिसे प्रज्वलित हुए अग्निकी भाँति क्रोधसे जल उठे और समस्त राक्षसोंका उन्होंने संहार कर डाला। तत्पश्चात् अपने ब्राह्मण ऋत्विजोंको राक्षसोंद्वारा भयभीत, धराशायी तथा मारे गये देख उन्हें बड़ा शोक हुआ। वे देवमन्त्री बृहस्पतिजीसे बोले—'ब्रह्मन्! आप सब देवताओंके गुरु, तीनों कालकी बातें जाननेवाले तथा त्रिवेदवेत्ता हैं। देवकण्टक राक्षसोंने मेरे लिये आये हुए इन ब्राह्मणोंकी हत्या कर डाली है। इसका प्रायश्चित्त मुझे क्या करना चाहिये।'

बृहस्पतिजी बोले—नृपश्रेष्ठ! मैं तुम्हें संजीवनी विद्या देता हूँ।

उस विद्याके प्रभावसे राजाने सब ब्राह्मणोंको जीवित किया। नूतन जीवन पाकर ब्राह्मणोंने देवगुरु बृहस्पतिकी बड़ी प्रशंसा की। तदनन्तर पूर्ण तथा उत्तम दक्षिणासे युक्त वह यज्ञ समाप्त हुआ। यज्ञमें जो यूप गड़े थे, उन्हींके मूलसे वहाँ शल्या और विशल्या नामवाली दो नदियाँ प्रकट हुईं। वे दोनों लोकपावनी नर्मदामें मिल गयीं। इसके बाद देवतालोग अपने-अपने विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गको चले गये। राजा भरतने भी ब्राह्मणोंके साथ अपनी पुरीमें प्रवेश किया। भरतेश्वरलिंग ब्रह्मयोनिमें स्थित है।


ब्रह्माजीके द्वारा सौम्या दृष्टिसे दानवोंका निवारण तथा रुद्रके एक सौ एक नामोंद्वारा शिवजीका स्तवन

मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! जो 'ॐ' इस एक अक्षरका जप और उसके अर्थभूत परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करते हुए शरीरका त्याग करता है वह परम गतिको प्राप्त होता है।* वेदमाता गायत्री ॐकारसे ही प्रकट हुई हैं। 'ॐ' इस एक अक्षरवाले तत्त्वमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों प्रतिष्ठित हैं। ॐकार ही वेदका मूल है। उसीसे श्रुतिरूपा शाखाएँ फैली हुई हैं। स्मृति और आगम ये फल, फूल एवं पत्ते हैं। जैसे ॐकार सब विद्याओंका आदि है, उसी प्रकार भगवान् महेश्वर सम्पूर्ण देवताओंके आदि हैं। तीनों सन्ध्याएँ, तीनों काल, त्रिविध अग्नि, तीनों लोक तथा धर्म, अर्थ और काम—ये तीन वर्ग—सभी ॐकारमें ही स्थित हैं।

युधिष्ठिर! स्वायम्भुव मन्वन्तरके आदिकल्पके सत्ययुगमें नर्मदाके तटपर रहनेवाले देवताओंको कंकोल, कालिकेय और कालक नामवाले दानवोंने परास्त करके वहाँसे मार भगाया। वे देवता ब्रह्माजीके साथ महादेवजीकी शरणमें गये। तब सात पातालोंको भेदकर 'ॐ भूर्भुवः स्वः' का उच्चारण करते हुए पर्वतसे एक लिंग प्रकट हुआ, जो प्रज्वलित कालाग्निके समान कान्तिमान् था। उन लिंगरूपी


* ओमित्येकाक्षरं राजन् व्याहरन् समनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥
(स्क० पु०, आव० रे० ४७। १९-२०)

१०१४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भगवान् शिवने कहा—'ब्रह्मन्! तुम लोकोंमें शान्ति स्थापित करनेवाली सौम्या इष्टिको अपने रुचिके अनुसार करो। इसके लिये मैंने तुम्हें वेद समर्पित किये हैं।' तब ब्रह्माजीने दैत्योंका विनाश करनेवाली रौद्री इष्टि तथा लोकोंमें शान्ति स्थापित करनेवाली सौम्या इष्टिका अनुष्ठान किया। उस भयंकर इष्टिको देखकर ब्रह्माजीके शापके भयसे उद्विग्न हो सब दानव दसों दिशाओंमें भाग गये। भगवान् ॐकारके प्रभावसे देवता निर्भय हो गये। उस समय सुरेश्वर शिवका पूजन करके देवताओंने स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। मार्कण्डेयलिंग, अविमुक्तलिंग, केदारलिंग, अमरेश्वर ओंकारलिंग तथा महाकाललिंग—इन पाँच पवित्र शिवलिंगोंका जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर कीर्तन करता है, वह सब तीर्थोंके सेवनका फल पाकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जिसके चार कोसके अंदर ब्रह्महत्या नहीं प्रवेश करती, उस कावेरीके तटपर आग्नेयलिंग और सिद्धलिंग विद्यमान हैं। वहीं शिवखात नामक तीर्थ है, जिसमें स्नानमात्र करनेवाला मनुष्य फिर संसारमें जन्म नहीं लेता। जो कोई वहाँ पितरोंके लिये श्राद्ध एवं तिलोदक देता है, उसने मानो कोटिसहस्र युगोंतकके लिये पितरोंको तृप्त कर दिया है।

युधिष्ठिर! तदनन्तर भगवान् ॐकारने ब्रह्माजीको मन्त्रोपदेश किया। ब्रह्माजीने उनका उपदेश सुनकर इस प्रकार उनकी स्तुति की—'जो आकाशके तुल्य सर्वत्र व्यापक तथा आकाशका भी संहार करनेवाले हैं, जिनका कहीं अन्त नहीं है, कोई स्वामी नहीं है, जो अमृत एवं ध्रुवस्वरूप हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। जो कल्याणकी उत्पत्तिके स्थान, सनातन, योगासनपर विराजमान, योगाभ्यासपरायण तथा आकाशको हर लेनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरको नमस्कार है। ॐकारस्वरूप एवं सबकी उत्पत्तिके कारण शिवको नमस्कार है। सर्वेश्वर शिवको नमस्कार है। सबकी उत्पत्तिके कारण शिवको नमस्कार है। सर्वेश्वर शिवको नमस्कार है। मूर्द्धारूप तत्पुरुषको, मुखस्वरूप अघोरको, हृदयस्वरूप वामदेवको, गुह्यस्वरूप सद्योजातको और सर्वमूर्ति ॐकारको बार-बार नमस्कार है। (यहाँतक भगवान् रुद्रके सोलह नाम पूरे होते हैं *।) (१७) कलातीत, (१८) अव्यय, (१९) बुद्ध, (२०) वज्रदेहोपमर्दन, (२१) अध्यक्ष, (२२) विधु, (२३) शास्ता, (२४) पिनाकी, (२५) त्रिदशाधिप, (२६) अग्नि, (२७) रुद्र, (२८) हुताश, (२९) पिंगल, (३०) पावन, (३१) हर, (३२) ज्वलन, (३३) दहन, (३४) वस्तु, (३५) भस्मान्त, (३६) क्षमन्तक, (३७) अपमृत्युहर, (३८) धाता, (३९) विधाता, (४०) कर्त्ता, (४१) काल, (४२) धर्मपति, (४३) शास्ता, (४४) वियोक्ता, (४५) अनवम (न्यूनतारहित), (४६) प्रिय, (४७) निमित्त, (४८) वारुण, (४९) हन्ता, (५०) क्रूरदृष्टि, (५१) भयावह, (५२) ऊर्ध्वदृष्टि, (५३) विरूपाक्ष, (५४) दंष्ट्रावान्, (५५) धूम्रलोचन, (५६) बाल, (५७) अतिबल, (५८) पाशहस्त, (५९) महाबल, (६०) श्वेत, (६१) विरूप, (६२) रुद्र, (६३) दीर्घबाहु, (६४) जडान्तक, (६५) शीघ्र, (६६) लघु, (६७) वायुवेग, (६८) भीम, (६९) वडवामुख, (७०) पंचशीर्षा, (७१) कपर्दी, (७२) सूक्ष्म, (७३) तीक्ष्ण, (७४) क्षपान्तक, (७५) निधीश, (७६) रौद्रवान्, (७७) धन्वी, (७८) सौम्यदेह, (७९) प्रमर्दन, (८०) अनन्त-पालक, (८१) धार, (८२) पातालेश, (८३) सधूम्र, (८४) शाश्वत, (८५) शर्व, (८६) सर्वपिंग, (८७) करालवान्, (८८) विष्णु, (८९) ईश, (९०) महात्मा, (९१) सुख, (९२) मृत्युविवर्जित,


* (१) व्योमसंख्यायी, (२) सर्वव्यापी व्योमहर, (३) अनन्त, (४) अनाथ, (५) अमृत, (६) ध्रुव, (७) शाश्वतशम्भव, (८) योगपीठसंस्थित, (९) नित्ययोगयोगी, (१०) शिव, (११) सर्वप्रभव, (१२) ईशान, (१३) तत्पुरुष, (१४) अघोर, (१५) वामदेव, (१६) सद्योजात।

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०१५

(९३) शम्भु, (९४) विभु, (९५) गणाध्यक्ष, (९६) त्र्यक्ष, (९७) दिवस्पति, (९८) समवाद, (९९) विवाद, (१००) प्रहविष्णु, (१०१) बिवर्धन। ये एक सौ एक रुद्रोंके नाम बताये गये हैं। ये सभी ॐकारमें प्रतिष्ठित हैं। इस प्रकार स्तुति करके ब्रह्माजीने भूमिपर लोटकर देवाधिदेव महेश्वरको साष्टांग प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके मन-ही-मन उनके स्वरूपका चिन्तन करते हुए वे खड़े हो गये।'

ब्रह्माजीद्वारा किया हुआ यह स्तवन सुनकर महादेवजीने कहा—ब्रह्मन्! मैं तुम्हारे इस दिव्य स्तोत्रसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।

ब्रह्माजी बोले—देवेश्वर! जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आपमें मन लगाकर ॐकारस्वरूप आपके आगे इस रुद्रस्तोत्रका पाठ करेंगे, वे इहलोक और परलोकमें समस्त कामनाओंको प्राप्त करेंगे। एकोत्तरशत नामका नित्य पाठ करके मनुष्य स्वर्गमें जाता है और जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, उस-उसको अवश्य प्राप्त कर लेता है।

ऐसा कहकर ब्रह्माजी भगवान् महेश्वरको नमस्कार करके दिव्य विमानपर आरूढ़ हो प्रसन्नतापूर्वक अपने लोकको चले गये।


कपिला-नर्मदा-संगम और ईशान आदि तीर्थोंकी महिमा, यमलोकके मार्गके कष्टों तथा अट्ठाईस नरककोटियोंका वर्णन

मार्कण्डेयजी कहते हैं—महाभाग! जहाँ कपिला और नर्मदाका संगम हुआ है, वहाँ चार हाथके भीतर सप्तपातालवासिनी पिप्पला नदी आकर मिली है। वहीं दो आवर्त बताये गये हैं—कपिलावर्त और पिप्पलावर्त। उस तृप्तिदायक तीर्थको प्राप्त करनेकी पितरलोग भी इच्छा करते हैं। अतः पुत्रको चाहिये कि उस तीर्थमें जाकर पितरोंके लिये यत्नपूर्वक जलांजलि और पिण्डदान दे। जो कोई इस तीर्थमें अमरनाथका दर्शन करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण आदि पर्वके अवसरपर उसका विशेष फल होता है। एक दूसरा ईशानतीर्थ है, जिसके विषयमें पहले सामान्यरूपसे चर्चा की गयी है। वह कपिलाके पूर्व भागमें थोड़ी ही दूरपर स्थित है। उस ईशान-लिंगकी अर्चनासे मनुष्य गणाध्यक्ष पदको प्राप्त होता है। भगवती पार्वतीजीने स्त्रियोंके लिये प्रसन्नतापूर्वक यह वरदान दिया है कि 'कपिलामें चतुर्दशी और अष्टमीको स्नान करनेसे नारी सौभाग्यवती होती है और उसका पुत्र चिरंजीवी होता है। शिवजीने भी इस वरदानका अनुमोदन किया है। कपिला नदी जहाँसे निकली है और जहाँ नर्मदामें जाकर मिली है, वहाँतक आठ हजार तीर्थ हैं, जो इच्छानुसार फल देनेवाले हैं। उन तीर्थोंमें कपिला गौका दान करे और यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन करावे। वहाँ सदा उपवास करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करे। वहीं हेमजालेश्वर नामक सिद्धिदायक लिंग है, हेमजालेश्वर देवकी अर्चना करनेसे मनुष्य यमलोकको नहीं देखता। पूर्वकालमें वसुदान नामवाले एक राजर्षि हो गये हैं, जिन्होंने धुन्धु दैत्यको मारकर धुन्धुमार नाम धारण किया था। वे इस तीर्थके माहात्म्यसे स्वर्गलोकमें देवभावको प्राप्त हुए। नृपश्रेष्ठ! वहाँ जम्बुकेश्वर नामसे प्रसिद्ध एक शिवलिंग है जो पशु-पक्षियोंकी योनिसे छुटकारा दिलानेवाला है। इस पृथ्वीपर नैमिषारण्यतीर्थ, काशीतीर्थ और प्रयागतीर्थ हैं, परंतु अमरेश्वरतीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है, जिसे तैंतीस कोटि देवता तथा असुर भी मस्तक नवाते हैं। महाराज! वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। सारस्वतलिंग ब्रह्महत्याका नाश करनेवाला है।

युधिष्ठिरने पूछा—विप्रवर! कौन मनुष्य

१०१६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

यमराजके लोकमें जाते हैं और यमलोकके नरक कैसे हैं? ये सब मुझे बताइये।

**मार्कण्डेयजीने कहा—**सब दानोंमें अन्नदानको उत्तम माना गया है। वह सबको प्रसन्न करनेवाला, पुण्यजनक तथा बल और पुष्टिको बढ़ानेवाला है। तीनों लोकोंमें अन्नदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है। अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते और अन्नका अभाव होनेपर मर जाते हैं। शरीरमें रक्त, मांस, मज्जा और वीर्य—ये सब अन्नसे ही क्रमशः बनते हैं। वीर्यसे ही प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है। इसलिये सम्पूर्ण जगत् अन्नमय है। सुवर्ण, रत्न, अश्व, हाथी, स्त्री, माला और चन्दन आदि भोगसामग्रियोंसे भी अन्नभोजनके समान सुख नहीं मिलता। युधिष्ठिर! इस कारण अन्नदान महान् पुण्यदायक है। अन्नदाताको प्राणदाता कहा गया है। अतः सदा ही अन्नदान करना चाहिये। इस लोक और परलोकमें अन्नपान आदि जो कुछ भी ऐश्वर्य है, वह सब अन्नदानका ही फल बताया गया है। जो पापी मनुष्य कुकर्म करते और ऐसे दानसे मुँह मोड़ते हैं, वे अत्यन्त भयानक दक्षिण मार्गसे यमलोकको जाते हैं। यमलोक सब ओरसे छियासी हजार योजन विस्तृत है। वहाँ नाना प्रकारके भयानक रूप धारण करनेवाले यमदूत रहते हैं और उन्हींके कारण वह पुरी बड़ी भयंकर प्रतीत होती है। दुष्टात्मा, क्रूर एवं पापी पुरुषोंके लिये यमपुरी दूर होनेपर भी निकट-सी ही प्रतीत होती है। वे तीखे काँटोंसे युक्त, कंकड़-पत्थरोंसे विभूषित, छुरेकी धारोंसे आच्छादित और तीक्ष्ण पत्थरोंसे निर्मित मार्गसे यात्रा करते हैं। कहीं लकड़ी चीरनेवाले घातक आरोंसे और कहीं लोहेकी भयंकर सूइयोंसे वे मार्ग भरे होते हैं। कहीं फैली हुई लताओंके कारण दुर्गम एवं वृक्षश्रेणियोंसे व्याप्त पर्वत उन मार्गोंको रोके रहते हैं। यमपुरीके मार्गमें कहीं भयंकर गड्ढे तथा तपे हुए ढेले और ईंटें रहती हैं, कहीं तपायी हुई बालू बिछी होती है, कहीं तीखी नोकवाली कीलें गड़ी होती हैं और अनेक टूटी हुई गलियोंसे मार्ग आच्छादित रहता है। ऐसे भयंकर अन्धकारसे ढके हुए कष्टदायक मार्गसे पापियोंको यमलोकमें जाना पड़ता है। उन मार्गोंमें तपे हुए अंगारे बिछे होते हैं और दहकते हुए दावानलका सामना करना पड़ता है। कहीं तपायी हुई शिलाएँ रखी रहती हैं और कहीं इतनी कीचड़ होती है कि चलनेवाले जीवका शरीर कटि (कमर)-तक उसमें डूब जाता है। कहीं दूषित जल और कहीं कण्डियोंकी सुलगती हुई आगसे वह मार्ग व्याप्त रहता है। कहीं गीध, वक, व्याघ्र, दुष्ट कीट, बिच्छू, अजगर, भयानक मच्छर और जहरीले साँप, मतवाले हाथी, सिंह और भैंसे आदि जीवोंसे यमपुरीका मार्ग भरा रहता है। भयंकर डाकिनी, शाकिनी, विकराल राक्षस, महाघोर व्याधि, दुर्धर्ष अग्नि, प्रचण्ड आँधी, बड़े-बड़े पत्थरोंकी भारी वर्षा आदिका कष्ट सहन करते हुए पापी जीव यमलोककी यात्रा करते हैं। कहीं-कहीं उनपर चारों ओरसे बाणवर्षा की जाती है और कहीं बिजलियाँ गिरती हैं। कहीं दारुण उल्कापात होता है और कहीं दहकते हुए अंगारोंकी वृष्टि होती है तथा इन सबका आघात सहते हुए उन्हें आगे बढ़ना पड़ता है। कहीं बड़ी भयानक आवाज होती है, जिससे वे बार-बार थर्रा उठते हैं। कहीं सब ओरसे पैने अस्त्र-शस्त्रोंकी बौछारसे भरे हुए मार्गके बीचसे निकलना पड़ता है। कहीं अत्यन्त खारे जलकी धारासे वे बार-बार नहा उठते हैं। अत्यन्त सर्दी और छुरेकी धार आदिका कष्ट भोगते हैं। अनेक प्रकारके सहस्रों क्लेशोंका सामना करते हैं। इस प्रकार यमलोकका मार्ग सन्तापपूर्ण, भयंकर, दुर्गम तथा विश्रामरहित होता है। वह सब दुःखोंका आश्रय एवं कष्टप्रद होता है। यमकी आज्ञाका पालन करनेवाले महाघोर यमदूत उसी मार्गसे बलपूर्वक पापियोंको ले जाते हैं। वे सभी जीव अकेले, पराधीन तथा मित्र और बन्धु-बान्धवोंसे रहित होते हैं। अपने कुकर्मोंके लिये बार-बार शोक करते और दग्ध होते रहते हैं। वे प्रेतों

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *१०१७

और भूतोंके साथ होते हैं। उनके कण्ठ, तालू और ओठ सूखे रहते हैं। शरीर दुर्बल और मन अत्यन्त भयभीत होता है। उन्हें बार-बार आगसे जलाया जाता है। कोई सींकचोंमें बँधे होते हैं, कुछ पापी गंदगीमें डूबे रहते हैं और कुछ प्रचण्ड बलवान् यमदूतोंद्वारा जलाये और खींचे जाते हैं। किसीकी छातीमें, किसीके मुँहके नीचेके भागमें और किसीके केशोंमें रस्सी बाँधकर घसीटा जाता है। कितने ही जीवोंके ललाटमें बाण धँसाकर उन्हें खींचा जाता है। कितनोंको उत्तान लिटाकर उस दुर्गम मार्गपर घसीटते हुए ले जाया जाता है। कोई पसलीमें बँधे होते हैं, कोई भुजाओंमें, कोई पेट या कमरमें बाँधे जाते हैं; किन्हींके गलेमें फंदा डालकर घसीटा जाता है और वे अत्यन्त दुःखी होते हैं। किन्हींकी जीभमें कील धँसायी जाती है। किन्हींको अर्धचन्द्राकार हाथसे गलेमें पकड़कर (गरमेंचा देकर) इधर-उधर धक्का दिया जाता है। किन्हींके लिंग और अण्डकोषमें रस्सी बाँधकर उन्हें खींचा जाता है। कितने ही पापियोंके हाथ, पैर, कान, ओठ, नासिका, शिश्न, अण्डकोष, मस्तक तथा अन्यान्य अंग काट लिये जाते हैं। कोई अंकुशोंसे छेदे जाते हैं। किन्हींको साँप और बिच्छू काट खाते हैं तथा वे पापी जीव अनाथ, निराश्रय होकर इधर-उधर भागते और चिल्लाते रहते हैं। मुद्गरों और लोहेके डंडोंसे उनपर बार-बार मार पड़ती है। उन्हें भयंकर कोड़ोंसे भी पीटा जाता और भिन्दिपालोंद्वारा पीड़ित किया जाता है। उनके मुँहसे रक्त निकलता रहता है। वे कभी पानीमें गिरा दिये जाते हैं और कभी धूपसे सन्तप्त होकर छायाके लिये प्रार्थना करते हैं।

दानहीन मनुष्योंको इसी प्रकार दुर्दशा भोगते हुए यमलोकमें जाना पड़ता है। जिन्होंने अपने पापोंका प्रायश्चित्त कर लिया है, वे यमलोकमें सुखपूर्वक जाते हैं। इस तरह उस निकृष्ट मार्गसे यमराजके नगरमें गये हुए पापी जीव आज्ञा मिलनेपर दूतोंद्वारा यमराजके सम्मुख पहुँचाये जाते हैं। वहाँ चित्रगुप्त उन पापियोंको धर्मोपदेश करते हुए उनके पापोंका स्मरण कराते हैं और इस प्रकार कहते हैं—'अरे ओ पापाचारियो! ओ पराये धनको हड़प लेनेवाले लुटेरो! तुमलोगोंने अपने रूप और बलके घमण्डमें आकर परायी स्त्रियोंका सतीत्व नष्ट किया है। तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि जो जिस कर्मको करता है, उसीको उस कर्मका फल भोगना पड़ता है। फिर तुमने अपना ही सत्यानाश करनेके लिये पाप क्यों किया? और अब अपने उन्हीं कर्मोंके कारण जब क्लेश भोगना पड़ता है, तब दुखी क्यों होते हो? सबको अपने-अपने कर्म ही भोगने पड़ते हैं, इसमें किसीका कोई दोष नहीं है।'

तदनन्तर चित्रगुप्तजी यमराजसे कहते हैं—'स्वामिन्! ये भूलोकसे राजालोग आये हैं। इन्हें अपनी बुद्धि और बलपर बड़ा घमण्ड था; ये सभी नरेश अपने भयंकर दुष्कर्मोंसे प्रेरित होकर यहाँ आये हैं।' यमराजसे ऐसा कहकर वे उन राजाओंको सम्बोधित करके कहते हैं—'दुराचारी नरपालो! तुम सब लोग प्रजाका सर्वनाश करनेवाले रहे हो। तुमने थोड़े समयके लिये राज्य पाकर ऐसा पापकर्म क्यों किया? राज्यके लोभसे, मोहवश, अन्यायपूर्ण वृत्तियोंको अपनाकर तुमने जिन पापोंका संग्रह किया है, उनके यथार्थ फलका उपभोग करो। अरे! जिनके लिये तुमने अशुभ कर्म किये हैं, वह राज्य और वे स्त्रियाँ अब कहाँ हैं? वह सब कुछ छोड़कर तुम अकेले यहाँ आये हो। जिनके लिये तुमने प्रजाको सताया और नष्ट किया है, वे तुम्हारे भाई-बन्धु अब तुम्हारी यह यातना नहीं देख पा रहे हैं। इस समय यमदूत जब तुम्हें ऊँचेसे नीचे गिराते हैं, तब उन कर्मोंका कैसा मजा मिल रहा है।'

युधिष्ठिर! इस प्रकार चित्रगुप्तके अनेक तरहके कठोर वचनोंद्वारा उपालम्भ देनेपर वे राजालोग अपने-अपने कर्मोंको सोचते हैं और मौन रह जाते हैं। तदनन्तर धर्मराज यम उनके पापकी शुद्धिके लिये दूतोंको आज्ञा देते हैं—'चण्ड! महाचण्ड! तुम लोग इन राजाओंको पकड़कर

१०१८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नरकोंकी आगमें तपाओ और इन्हें पापोंसे शुद्ध करो।' तब वे दूत शीघ्र उठकर उन राजाओंके पाँव पकड़ लेते हैं और वेगपूर्वक घुमाते हुए उन्हें खूब तपी हुई भूमिपर फेंक देते हैं और लोहेके वृक्षोंपर भी पटक देते हैं। उन प्रहारोंसे जर्जर होकर वे राजा अचेत और निश्चेष्ट हो जाते हैं। फिर वायुका स्पर्श होनेपर वे धीरे-धीरे सचेत होते हैं। तब उन्हें पापसे शुद्ध करनेके लिये यमदूत नरकके समुद्रमें डाल देते हैं। नरकोंकी अट्ठाईस श्रेणियाँ हैं, जो सातवें पातालके अन्तमें घोर अन्धकारके भीतर स्थित हैं। (१) अतिघोरा, (२) रौद्रा, (३) घोरतमा, (४) अत्यन्त दुःखजननी, (५) घोररूपा, (६) तरणतारा, (७) भयानका, (८) कालरात्रि, (९) घटोत्कटा, (१०) चण्डा, (११) महाचण्डा, (१२) चण्डकोलाहला, (१३) प्रचण्डा, (१४) वराग्निका, (१५) जघन्या, (१६) अवरालोमा, (१७) भीषणी, (१८) नायिका, (१९) कराला, (२०) विकराला, (२१) वज्रविंशति, (२२) अस्ता, (२३) पंचकोणा, (२४) सुदीर्घा, (२५) परिवर्तुला, (२६) सप्तभौमा, (२७) अष्टभौमा और (२८) दीर्घमाया—ये ही नरकोंकी अट्ठाईस कोटियाँ हैं। इन सबके क्रमशः पाँच-पाँच नायक होते हैं। इनमें पहला रौरव है, क्योंकि उसमें पड़े हुए प्राणी रोते रहते हैं। दूसरा महारौरव है, जिसकी दुःसह पीड़ाओंसे महान् साहसी भी रो देते हैं। तीसरा तम, चौथा शीत और पाँचवाँ उष्ण है—इस प्रकार पहली कोटिके ये पाँच नायक माने गये हैं। दूसरी कोटिके १ अघोर, २ तीक्ष्ण, ३ पद्म, ४ संजीवन और ५ शठ—ये पाँच नायक हैं। तीसरी कोटिके नायक हैं—१ महामाय, २ विलोम, ३ कण्टक, ४ कटक और ५ तीव्र। चौथी कोटिके नायक १ वाम, २ कराल, ३ किंकरल, ४ प्रकम्पन और ५ महाचक्र हैं। पाँचवी कोटिके नायक १ सुपद्म, २ कालसूत्र, ३ प्रगर्जन, ४ सूचीमुख और ५ सुनेमि हैं। छठी कोटिके नायक १ खादक, २ सुप्रपीडित, ३ कुम्भीपाक, ४ सुपाक और ५ क्रकच हैं। सातवीं कोटिके नायक १ सुदारुण, २ अंगाररात्रि, ३ पचन, ४ असृक्पूयभव तथा ५ सुतीक्ष्ण हैं। आठवीं कोटिके १ शुण्ड, २ शकुनि, ३ महासंवर्तक, ४ ऋतु और ५ तप्तजन्तु—ये पाँच नायक हैं। नवीं कोटिके नायक १ पंकलेप, २ पूतिमान्, ३ हृद, ४ त्रपु और ५ उच्छ्वास हैं। दसवीं कोटिके नायक १ निरुच्छ्वास, २ सुदीर्घ, ३ क्रूर, ४ शाल्मलि और ५ उष्ट्रित हैं। ग्यारहवीं कोटिके नायक १ महानाद, २ प्रवाह, ३ सुप्रवाहन, ४ वृषाश्रय तथा ५ वृषश्व हैं। बारहवीं कोटिके १ सिंहानन, २ व्याघ्रानन, ३ गजानन, ४ श्वानन और ५ सूकरानन—ये पाँच नायक हैं। तेरहवीं कोटिके नायक १ अजानन, २ महिषानन, ३ मेषानन, ४ मूषकानन तथा ५ खरानन हैं। चौदहवीं कोटिके १ ग्राहानन, २ कुम्भीरानन, ३ नक्रानन, ४ महाघोर और ५ भयानक—ये पाँच नायक हैं। पंद्रहवीं कोटिके नायक १ सर्वभक्ष, २ स्वभक्ष, ३ सर्वकर्मा, ४ अश्व तथा ५ वायस हैं। सोलहवीं कोटिके नायक १ गृध्रोलूक, २ उलूक, ३ शार्दूल, ४ कपि और ५ कच्छुर हैं। सत्रहवीं कोटिके १ गण्डक, २ पूतिवक्त्र्य, ३ रक्तास्य, ४ पूतिमूत्रिक और ५ कणधूम्र—ये पाँच नायक हैं। अठारहवीं कोटिके नायक १ तुषाराग्नि, २ कृत्रिमान्, ३ निरय, ४ आतोद्य और ५ प्रतोद्य हैं। उन्नीसवीं कोटिके नायक १ रुधिरोध, २ भोजन, ३ कालात्मग, ४ अनुभक्ष और ५ सर्वभक्षक हैं। बीसवीं कोटिके १ सुदारुण, २ कर्कट, ३ विशाल, ४ विकट और ५ कटपूतन—ये पाँच नायक हैं। इक्कीसवीं कोटिके नायक १ अम्बरीष, २ कटाह, ३ कष्टदायिनी वैतरणी, ४ सुतप्त तथा ५ लोहशंकु हैं। बाईसवीं कोटिके नायक १ एकपाद, २ अश्रुपूरण, ३ घोर असिपत्रवन, ४ प्रतिष्ठित अस्थिलिंग और ५ तिलयन्त्र हैं। तेईसवीं कोटिके १ अतसीयन्त्र, २ इक्षुयन्त्र, ३ कूट, ४ पाप तथा ५ प्रमर्दन—ये पाँच नायक हैं। चौबीसवीं कोटिके नायक १ महाचुल्ली, २ विचुल्ली, ३ तप्त लोहमयी शिला, ४ क्षुरधार

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०१९

पर्वत तथा ५ मय हैं। पचीसवीं कोटिके नायक १ यमल पर्वत, २ सूचीकूप, ३ विष्ठाकूप, ४ अन्धकूप और ५ पतन हैं। छब्बीसवीं कोटिके १ पातन, २ मुसली, ३ वृषली, ४ अशिवा तथा ५ संकटला—ये पाँच नायक हैं। सत्ताईसवीं कोटिके नायक १ तालपत्र वन, २ असिगहन, ३ महामोहक, ४ सम्मोहन तथा ५ अस्थिभंग हैं। अट्ठाईसवीं कोटिके नायक १ तप्ताचलमय, २ अगुण, ३ बहुदुःख, ४ महादुःख तथा ५ कश्मल हैं। इनके सीवा यमल, हालाहल, विरूप, श्वरूप, च्युतमानस, एकपाद, त्रिपाद और तीव्र आदि नरक हैं। इस प्रकार यहाँ नरकोंके अट्ठाईस पंचक बताये गये हैं।


पापियोंकी नरक-यातनाका वर्णन

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! मनुष्य अपने कर्मोंके अनुसार क्रमशः एक-एक नरकका उपभोग करते हैं। अपनी कुत्सित कामनाओंके कारण जो कुकर्मोंका संग्रह किया गया है, उसीके फलस्वरूप तपायी हुई लोहेकी साँकलसे बाँधकर अँधेरेमें बड़े-बड़े वृक्षोंकी शाखाओंमें पापी मनुष्य लटका दिये जाते हैं। फिर यमदूत उन सबको बड़े जोर-जोरसे झुलाते हैं। वेगपूर्वक झुलाये हुए वे सभी पापी अचेत हो जाते हैं। फिर आकाशमें लटकते हुए उनके पैरोंमें सौ भार लोहा बाँध देते हैं। उस महान् भारसे वे सब लोग अत्यन्त सन्तप्त होते हैं और अपने-अपने कर्मोंका स्मरण करते हुए निश्चल भावसे मौन रह जाते हैं। तत्पश्चात् क्रमशः आगमें तपाकर खूब लाल किये हुए लोहेके कँटीले दण्डोंसे यमदूत उनके मस्तकपर मारते हैं। इसके बाद उन्हें विष्ठा और कीटोंसे भरे हुए कुएँमें डाल देते हैं। घोर यमदूत सब ओरसे घेरकर पापियोंको आगमें पकाते हैं। उसके बाद उनके शरीरपर नमकीन पानी डाल देते हैं। कितने ही पापियोंको लोहेके कड़ाहमें बैंगनकी तरह भूनते हैं, फिर गंदे कुएँमें डाल देते हैं। मेदा, रक्त और पीबसे भरी हुई बावलीमें भी पापियोंको फेंक दिया जाता है और वहाँ उन्हें कीड़े तथा कौए लोहेके समान तीखी चोंचोंसे नोच-नोचकर खाते हैं। कितने ही पापी मनुष्योंको तीखे त्रिशूलोंमें गुम्फित करके उन्हें धधकते हुए अंगारोंपर मांसकी भाँति पकाया जाता है। इसी प्रकार यमदूत पापियोंको खूब तपे हुए तेलसे भरे कड़ाहोंमें अनेक बार पकाते हैं। जो असत्य और अप्रिय बोलनेवाले हैं, उनकी छातीपर चढ़कर और पाँवसे दबाकर तपाये हुए मजबूत सँड़सेसे उनकी जीभ उखाड़ ली जाती है। दम्भपूर्ण झूठे शास्त्रसे प्रेरित होकर जो ब्राह्मण यज्ञके नामपर अधिक धनका संग्रह करता है, उसकी जिह्वा भी तीखे भालेसे छेदी जाती है। जो मूढ़ मानव माता-पिता और गुरुको फटकारते हैं, उनके मुँहमें बार-बार बालू भरकर पानीसे सींचा जाता है। तदनन्तर खारा और गरम जल भरा जाता है। फिर खौलते हुए तेलको उड़ेल दिया जाता है। यमदूत उन पापियोंके पैर पकड़कर कीड़ोंसे भरी हुई विष्ठापर घसीटते हैं। फिर सींगसे दबाकर उन्हें लोहेके शाल्मलि वृक्षमें बाँध दिया जाता है। उसके बाद वे महाबली भयानक दूत उन्हें पीछेकी ओरसे मारते हैं। अत्यन्त प्रबल दाँतीदार आरेसे मस्तककी ओरसे चीरते हैं। अपने भयानक कर्मोंके परिणामसे वे पापी जीव भूख लगनेपर अपना ही मांस खाते और प्यास लगनेपर अपना ही रक्त पीते हैं। जिन मूढ़ पुरुषोंने कभी अन्न और जलका दान नहीं किया है और न किसीके दानका अनुमोदन ही किया है, वे मुद्गरोंसे जर्जर करके ईखकी तरह पेरे जाते हैं। घोर असिताल वनमें खण्ड-खण्ड करके काटे जाते हैं। उनके सब अंगोंमें सूई चुभोयी जाती है। तत्पश्चात् उन्हें शूलीपर चढ़ा दिया जाता है। शूलीपर चढ़ाकर उन्हें बार-बार हिलाया और खींचा जाता है। फिर भी उनकी मृत्यु नहीं होती।

१०२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


उनके शरीरसे मांस नोच लिया जाता है। लोहेके मुद्गरोंसे मारकर उनकी हड्डियाँ चूर-चूर कर दी जाती हैं। बलोन्मत्त यमदूत उस दशामें भी उन्हें अनेक बार जल्दी-जल्दी घसीटते हैं और वे पापी जीव दीर्घकालतक नरकमें रहकर दारुण यातनाएँ भोगते हैं। उनका मुँह बालूसे भरा होता है, इसलिये वे स्वाँसतक नहीं ले पाते। इन सब यातनाओंके बाद अनेक प्रकारके यमदूत रौरव आदि नरकोंमें उन्हें पीड़ा देते हैं। महारौरवकी पीड़ाओंसे महान् धीर पुरुष भी रो देते हैं। मुख, लिंग, गुदा पार्श्व, पैर, छाती और मस्तकमें तपाये हुए लोहेके तीखे मुद्गरोंसे यमदूत मारते हैं। जो स्त्रियाँ पराये पतियोंका आलिंगन करती हैं और अपने पतिकी सेवामें नहीं रहतीं, ऐसी स्त्रियोंसे यमदूत कहते हैं—'अरी! अब तू क्यों जल्दीसे भागी जा रही है? स्मरण है या नहीं, तूने अपने पतिको धोखा दिया था और एक पापान्ध परपुरुषको सुखपूर्वक गलेसे लगाया था?' ऐसा कहकर वे उन्हें लोहकुम्भ नामक नरकमें फेंक देते हैं और धीरे-धीरे पकाते हैं। कभी उन्हें प्रज्वलित अग्निमें राँधते हैं, तप्तशिलाओंपर बिठाते हैं, अँधेरे कुएँमें डालते हैं और अजगर सर्पोंद्वारा डँसाते हैं। जो धर्मका उपदेश देनेवाले महात्मा आचार्यकी निन्दा करते हैं, शिवभक्त, ब्राह्मण तथा सनातन शिवधर्मपर दोषारोपण करते हैं, उनकी छाती, कण्ठ, जिह्वा, शरीरकी सन्धियों तथा दोनों ओठोंमें काँटी ठोंककर यमदूत उन्हें कील देते हैं।

इस प्रकार पापाचारी पुरुषोंको यमलोकमें बड़ी भयानक यातनाएँ दी जाती हैं। एक-एक नरकमें सैकड़ों और सहस्रों प्रकारकी ऐसी यातनाएँ जाननी चाहिये, जो समस्त पापकर्मियोंको प्राप्त होती हैं। सम्पूर्ण नरकोंमें ऐसी-ऐसी अनन्त पीड़ाएँ भोगनी पड़ती हैं। अपने-अपने कर्मोंसे नरकोंमें गिराये हुए पापी जीव क्रमशः सभी नरकोंमें पकाये जाते हैं। महापातकी मनुष्य सब नरकोंमें चन्द्रमा और नक्षत्रोंकी स्थितिकालतक अनेकानेक यमदूतोंद्वारा पीड़ा भोगते रहते हैं। यही दशा पातकियोंकी भी होती है। उपपातकियोंको इनसे आधी यातना प्राप्त होती है। तात युधिष्ठिर! कब किसकी मृत्यु हो जायगी, यह ज्ञात नहीं होता और अकस्मात् यदि मृत्यु आ गयी तो कौन मनुष्य यहाँ वर्ष या दिन पा सकता है। फिर तो सब कुछ छोड़कर अकेले ही परलोककी यात्रा करनी पड़ेगी। इसलिये पूर्ण प्रयत्न करके सत्यधर्मपरायण होओ। यह सब नरकोंका लक्षण तुमसे बताया गया।

o

दान, पुण्य, शिवध्यान और नर्मदासेवनसे नरकसे उद्धार होनेका तथा संसारसे वैराग्यका उपदेश

युधिष्ठिरने पूछा— मुने! किस धर्मके द्वारा इस परम दुस्तर संसार-सागरको पार किया जा सकता है?

मार्कण्डेयजी बोले— मनुष्य अनेक प्रकारके राग और लोभके वशीभूत होकर संसारमें नाना प्रकारके क्लेश उठाता है। गर्भमें पड़ जानेसे मनुष्य कहे हुए शास्त्रको नहीं समझता और स्वर्ग तथा मोक्षसाधक कर्मोंकी चर्चा नहीं सुनता। सम्पूर्ण कामनाओं और प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाले भगवान् शंकरके ध्यानमें वह अज्ञानवश कष्ट मानने लगता है। वास्तवमें भगवान् शिवका चिन्तन ही नरकसे छुड़ाकर अपना परम अद्भुत कल्याण करनेवाला है। जो जम्बूद्वीपमें आकर मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है, तथापि नर्मदादेवीकी शरणमें नहीं जाता, वह भाग्यहीन है। इस संसारमें पापसे दूषित चित्तवाले मनुष्योंको उत्तम गति देनेवाली नर्मदासे बढ़कर दूसरी कौन नदी है? जो पापहारिणी महादेवी नर्मदाका ध्यान करते हैं, उनकी पापराशि नष्ट हो जाती है। जो नर्मदाका मनसे स्मरण और वाणीद्वारा कीर्तन करता है, वह परलोकमें जानेपर

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२१

यमदूतोंद्वारा पीड़ित नहीं होता। नरकमें स्थित होनेपर भी जो नर्मदा नदी एवं भगवान् शिव और विष्णुका स्मरण करता है, उसे यमराजके दूत तत्काल त्याग देते हैं। यदि वैदूर्य पर्वत एवं अमरकण्टकपर भोग और मोक्ष फल देनेवाले परमेश्वर 'ॐकारजी' विद्यमान हैं, तो पापी मनुष्य यहाँ क्यों शोक करते हैं? वहीं सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले सिद्धलिंग सिद्धेश्वर, यज्ञेश्वर और शशिभूषण हैं। नर्मदाके दक्षिण भागमें महेश्वर एवं कपिलेश्वरलिंग हैं। उस स्थानको विद्वान् पुरुष शिवक्षेत्र कहते हैं। जो मनुष्य सदा पुष्प, धूप, आरती और तर्पण आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक इन लिंगोंकी अर्चना करते हैं, वे नरकसे छूटकर शिवलोकको जाते हैं। अनघ! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बताया। पापी पुरुषोंको यमराजने यह बताया है कि 'जो लोग गोदान, स्वर्णदान, तिलदान, अन्नदान, जलदान, सब सामग्रियोंका दान तथा महल और बगीचेका दान करते हैं, वे घोर नरकस्वरूप यमलोकमें नहीं जाते। भगवान् शिवके वचनानुसार वे सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं।'

सम्मानको अपमानने, प्रियजनोंके संयोगको वियोगने और जवानीको बुढ़ापेने ग्रस लिया है। सारा सुख दुःखके उपद्रवसे युक्त है। जब बाल पक जाते हैं, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, तब वृद्धावस्थामें जर्जरशरीर होकर विद्वान् मनुष्य क्या कर सकता है? स्त्री और पुरुषोंका यौवन तथा रूप, जो एक-दूसरेको बहुत ही प्रिय लगता है, जराग्रस्त हो जानेपर दोनोंके लिये अप्रिय हो जाता है। जो अपने-आपको अपूर्व शिथिलतासे युक्त देखकर भी संसारसे विरक्त नहीं होता, उससे बढ़कर मूर्ख दूसरा कौन हो सकता है? जराग्रस्त मनुष्य अशक्त होनेके कारण पत्नी-पुत्र आदि बान्धवों तथा दुराचारी सेवकोंद्वारा भी अपमानित होता है। वृद्ध मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष किसी भी पुरुषार्थका साधन करनेमें समर्थ नहीं होता। इसलिये बुढ़ापा आनेसे पहले ही धर्माचरण करे। युधिष्ठिर! शरीरमें वात, पित्त और कफ आदिकी विषमता होती रहती है तथा वात, पित्त, कफका समूह शरीरसे ही उत्पन्न बताया गया है। इसलिये अपना यह शरीर सदा रोगोंका ही आश्रय है, ऐसा जानना चाहिये। जब वातका प्रकोप होता है और मनुष्य ज्वरसे पीड़ित होता है, तब अनेक प्रकारसे होनेवाले रोगोंके कारण उसे बहुत दुःख सहन करने पड़ते हैं। इस शरीरमें मृत्युके साधन सौसे भी अधिक हैं। इनमेंसे एक मृत्यु तो कालरूप है और शेष मृत्युएँ आगन्तुक मानी गयी हैं। जो आगन्तुक होती हैं वे ओषधिसेवन तथा जप, होम और दान आदिसे शान्त हो जाती हैं; परंतु कालरूप मृत्यु किसी उपायसे भी शान्त नहीं होती। विष और मद्य आदिसे मनुष्यकी अपमृत्यु होती है। अतः इन सब वस्तुओंका सेवन कदापि न करे। अनेक प्रकारके रोग, कष्ट, सर्प आदि जीव, विष और मारण आदिके प्रयोग—ये सब देहधारियोंके लिये मृत्युके द्वार हैं। यदि मनुष्यका मृत्युकाल आ पहुँचा है, उस समय रोग, सर्प आदिसे पीड़ित हो तो साक्षात् धन्वन्तरि भी उसे नहीं बचा सकते। कालपीड़ित मनुष्यकी रक्षा करनेमें ओषधि, तप, दान, मित्र और बान्धव—कोई भी समर्थ नहीं हैं। मृत्युके समान कोई दुःख नहीं है, मृत्युके समान कोई शत्रु नहीं है तथा समस्त देहधारियोंके लिये मृत्युके समान दूसरा कोई काल नहीं है। युधिष्ठिर! श्रेष्ठ और सुन्दर स्त्री, पुत्र, मित्र, राज्य तथा ऐश्वर्य आदि नाना प्रकारके सम्पूर्ण सुखोंको मृत्यु सहसा छीन लेती है। राजन्! भाई-बन्धु आदिके रूपमें जो यह दुस्तर संसार है, इसका तुम्हें यत्किंचित् परिचय दिया गया है। यह सब परिणामी—नाशवान् है, कालका भोजन है। ऐसा जानकर प्रयत्नपूर्वक नर्मदाका सेवन करना चाहिये। नर्मदा सब दुःखोंका निवारण और सम्पूर्ण शोकोंका नाश करनेवाली है। जो जिन कामनाओंको पाना चाहता है, नर्मदादेवी उसे वे सभी वस्तुएँ देती हैं।


~o~~

१०२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


मातंग, मृगवन और वाराहतीर्थकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—माहिष्मतीपुरीके पश्चिम अशोकवनिका नामक एक पापहारी तीर्थ है, जो सब प्रकारके शोकोंका विनाश करनेवाला है। वहाँ स्नान करके अपने वैभवके अनुसार गौरीदेवीका पूजन करे। वहीं मातंगमुनिका आश्रम है। जो स्त्री शुक्ल और कृष्ण पक्षकी तृतीयाको गन्ध, धूप, चन्दन, नाना प्रकारके उपहार तथा दीपावली जलाने आदिके द्वारा वहाँ भक्तिपूर्वक गौरीदेवीका पूजन करती है, वह रूप और सौभाग्यसे सम्पन्न पति प्राप्त करती है।

युधिष्ठिर ! पूर्व कल्पकी बात है—मातंग नामसे प्रसिद्ध देवर्षिने नर्मदा नदीके तटपर रहकर बड़ी दुष्कर तपस्या की थी। महर्षियोंके सत्संग और नर्मदाके दर्शनसे उन्होंने पाप-बुद्धिका परित्याग करके धर्म-बुद्धिका आश्रय लिया था। 'मैं विरक्त और भिक्षु हूँ' ऐसा विचारकर वे अशोकवनिकामें गये और जटा, वल्कल धारण करके कन्द, मूल, फलका आहार करते हुए एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक भगवान् शिवकी आराधनामें तत्पर रहे। सब मन्त्रोंमें उत्तम 'ॐ नमः शिवाय' इस षडक्षर मन्त्रका वे दिन-रात अपने हृदयमें चिन्तन करते थे। उनकी उस पराभक्तिको जानकर देवाधिदेव महादेवजीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'सुव्रत ! इस ध्यानसे तुम्हारा कल्याण हो, तुम वर माँगो।'

मातंग बोले—देवेश्वर ! यह तीर्थ मातंगके नामसे विख्यात हो। इसमें चाण्डाल, श्वपच आदि पापयोनिके जीव तथा जप आदिसे रहित पुरुष भी पापमुक्त होते रहें। जो यहाँ स्नान करके नर्मदातटवर्ती मातंगेश्वरलिंगका पूजन करे, उसका संसार-बन्धन छूट जाय।

मातंग मुनिका यह वचन सुनकर महादेवजी बोले—मुने ! मेरे प्रसादसे यह सब कुछ तुम्हारे इच्छानुसार होगा। ऐसा कहकर भगवान् शिव पर्वतश्रेष्ठ कैलासको चले गये और मातंग मुनि वरदान पाकर दिव्य विमानपर आरूढ़ हो उमा-महेश्वर-धामको चले गये। चैत्रके कृष्ण पक्षमें जो चतुर्दशी और अमावास्या तिथि आती है, उसमें वहाँ जो कुछ दान, होम आदि किया जाता है, वह अक्षय फल देनेवाला होता है। उस तीर्थमें तिल और जलद्वारा तर्पण करनेसे और गुड़-सत्तूका पिण्डदान देनेसे चौदह इन्द्रोंके स्थित कालतक पितर तृप्त रहते हैं। अशोकवनिका नामसे प्रसिद्ध स्थान मातंग-तीर्थ कहलाता है, वह नर्मदाके उत्तर तटपर विद्यमान है।

युधिष्ठिर ! अब मैं नर्मदाके दक्षिण तटपर विद्यमान मृगवन नामक तीर्थका वर्णन करूँगा। महाराज ! वहाँ एकादशीको स्नान करके शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णुका अर्चन करे और निराहार रहकर रात बितावे। प्रातःकाल होनेपर फिर गन्ध और पुष्पोंद्वारा मृगवनमें श्रीहरिकी पूजा करे। वहाँ एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर लाख ब्राह्मणोंको भोजन करानेका पुण्य होता है। तिल और जलकी अंजलि देनेसे पितरोंको वैष्णव पदकी प्राप्ति होती है। वहीं उत्तम वाराहतीर्थ है, जहाँ वाराहरूप धारण करके भगवान्ने इस पृथ्वीका उद्धार किया था और वहीं अमित तेजस्वी श्रीहरिने विश्वरूपको भी धारण किया था। जो पतिव्रता नारी मासोपवास व्रत करके वहाँ विधिपूर्वक स्नान करती है, वह विष्णुधामको जाती है।

$\sim\sim\circ\sim\sim$