भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 109, कुल 1406 में से

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८०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कर रखा है। सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंने सबको अपनेमें लीन करनेके कारण आपके स्वरूपको लिंग कहा है। देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। विश्वमंगल! आपको नमस्कार है। नीलकण्ठरूपमें आपको नमस्कार है। मस्तकपर जटा-जूट धारण करनेवाले! आपको नमस्कार है। आप कारणोंके भी कारण हैं; आपको नमस्कार है। आप मंगलोंके भी मंगलरूप हैं; आपको नमस्कार है। बुद्धिहीनोंके पालक! आप ज्ञानियोंके लिये ज्ञानात्मा हैं और मनीषी पुरुषोंके लिये परम मनीषी हैं। विश्वके एकमात्र बन्धु महेश्वर! आप आदिदेव हैं, पुराण-पुरुष हैं तथा आप ही सब कुछ हैं। वेदान्तद्वारा आप ही जानने योग्य हैं। आपकी महिमा और प्रभाव महान् है। महानुभाव संत आपके ही नामों और गुणोंका सब ओर कीर्तन करते हैं। महेश! आप ही तीनों लोकोंकी सृष्टि करनेवाले हैं। आप ही इनका पालन और संहार भी करते हैं। आप ही सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी हैं।'

इस प्रकार कालने उस समय जगदीश्वर शिवका स्तवन किया। तदनन्तर राजा श्वेतसे कहा—'राजन्! सम्पूर्ण मनुष्यलोकमें तुमसे बढ़कर दूसरा कोई पुरुष नहीं हैं; क्योंकि तुमने तीनों लोकोंके लिये अजेय मुझ कालको भी जीत लिया। आजसे मैं तुम्हारा अनुगामी हुआ। महादेवजीकी ओरसे मुझे अभयदान करो।'

राजाने कहा—भगवन्! तुम तो साक्षात् शिवके ही एक श्रेष्ठ स्वरूप हो। सम्पूर्ण प्राणियोंका पालन तथा संहार तुम्हारा ही स्वरूप है। तुम्हीं सबके नियन्ता हो। इसलिये तुम मेरे परम पूजनीय हो। आत्मसाक्षात्कारके साधनमें लगे हुए समस्त पुण्यात्मा पुरुष तुमसे ही भय माननेके कारण विविध भावोंसे परमेश्वरकी शरण लेते हैं।

इस प्रकार परम धर्मात्मा राजा श्वेतसे रक्षित होकर कालने भगवान् शिवकी कृपा प्राप्त की और उसे पुनः नवीन चेतना प्राप्त हुई। तब वे कालदेव यमराज, मृत्यु तथा यमदूतोंके साथ भगवान् शिव और महाराज श्वेतको प्रणाम करके अपने निवासस्थानको गये। वहाँ उन्होंने सब दूतोंको बुलाकर कहा—'दूतगण! संसारमें जो लोग विभूतिके द्वारा त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं, मस्तकपर जटा और गलेमें रुद्राक्ष माला रखते हैं, ऐसे लोगोंको तुम कभी मेरे लोकमें न लाना। जो उत्तम भक्तिभावसे भगवान् सदाशिवका पूजन करते हैं, वे साक्षात् रुद्रके ही स्वरूप हैं। जो मस्तकपर एक रुद्राक्ष धारण करते, ललाटमें त्रिपुण्ड्र लगाते तथा जो साधु पुरुष पंचाक्षर मन्त्रका सदा जप करते हैं, वे सब तुम्हारे द्वारा पूजनीय हैं। जिस राष्ट्र, देश अथवा ग्राममें शिव-भक्त नहीं देखा जाता, वह श्मशानसे भी बढ़कर अशुभ है।'

यमराजने भी अपने सेवकोंको ऐसा ही आदेश दिया। भगवान् महेश्वरकी पराभक्तिसे युक्त महाराज श्वेत जब कालसे निर्भय हो गये तब उन्होंने भगवान् शिवका सायुज्य प्राप्त कर लिया। पवित्र बुद्धिवाले ज्ञानीपुरुषोंको भी अनेक जन्मोंके पश्चात् भगवान् शिवकी भक्ति प्राप्त होती है। मनुष्योंको चाहिये कि वे सदैव भगवान् सदाशिवका सेवन, वन्दन और पूजन करें।

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शिवरात्रिव्रतकी महिमा

लोमशजी कहते हैं—ब्रह्माजीने जब सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की, तब राशियोंसे कालचक्र उत्पन्न हुआ। उस कालचक्रमें सब कार्योंकी सिद्धिके लिये बारह राशियाँ और सत्ताईस नक्षत्र मुख्य हैं। इन बारह राशियों और सत्ताईस नक्षत्रोंके साथ क्रीड़ा करता हुआ कालचक्रसहित काल जगत्को उत्पन्न करता है। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सबको काल ही उत्पन्न करता, वही पालन करता और वही संहार करता है। एकमात्र कालसे ही यह सारा जगत् बँधा हुआ है। अकेला काल ही इस लोकमें

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