भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 108
  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * | ७९ ---|---

हैं। राजाको इस रूपमें देखकर यमराजके मनमें भी बड़ी हलचल हुई। वे अत्यन्त व्याकुल होकर सहसा चित्रलिखितकी भाँति हो गये। तदनन्तर प्रजाका विनाश करनेवाले काल भी तत्काल वहाँ आ गये। उन्होंने भी शिवपूजा-परायण राजाको तथा मन्दिरके द्वारपर खड़े हुए दूतोंसहित यमराजको देखा। देखकर यमराजसे पूछा—'धर्मराज ! क्या कारण है जो अभीतक तुम इस राजाको नहीं ले गये। तुम्हारे साथ यमदूत भी हैं, तो भी कुछ डरे हुए-से प्रतीत होते हो।'

तब धर्मराजने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया—यह राजा भगवान् शिवका भक्त है, अतः इसका उल्लंघन करना हमारे लिये अत्यन्त कठिन है। त्रिशूलधारी महादेवजीके भयसे हम यहाँ चित्रलिखित पुतलोंकी भाँति खड़े हैं।

यमराजकी यह बात सुनकर कालदेवता कुपित हो उठे तथा राजाको मारनेके लिये उन्होंने बड़े वेगसे ढाल और तलवार उठायी। उनकी ढाल सूर्यके समान आकृतिवाले आठ फूलोंसे सुशोभित थी। वे क्रोधमें भरकर शिवालयमें घुसे। वहाँ उन्होंने देखा, राजा श्वेत एकाग्रचित्तसे विशुद्ध ज्ञानस्वरूप, चिन्मय, स्वयंप्रकाश परमात्माका चिन्तन कर रहे हैं। ऐसी अवस्थामें उन्हें देखकर काल अहंकारवश ज्यों ही उनके पास जानेको उत्सुक हुए, त्यों ही भक्तवत्सल भगवान् शंकरने अपने भक्तकी रक्षा करते हुए तीसरा नेत्र खोलकर कालकी ओर देखा। उनके देखते ही कालदेव तत्काल जलकर भस्म हो गये। राजा श्वेत जब समाधिसे विरत हुए तब बाह्यज्ञान होनेपर उन्होंने धीरेसे आँखें खोलकर देखा। उस समय वहाँ उनके सामने ही कालदेव अद्भुत रूपसे जल रहे थे। राजाने बार-बार उनकी ओर देखा और भगवान् शंकरसे इस प्रकार प्रार्थना की—'सबके दुःखोंको दूर करनेवाले, शान्तस्वरूप, स्वयंप्रकाश एवं स्वयम्भूरूप आप भगवान् शंकरको नमस्कार है। व्यवधानशून्य, सूक्ष्मस्वरूप तथा ज्योतियोंके अधिपति महादेवजीको नमस्कार है। जगदीश्वर ! आप ही सबके रक्षक हैं, आप ही इस जगत्के पिता, माता, सुहृद्, सखा, बन्धु, स्वजन, स्वामी तथा ईश्वर हैं। शम्भो ! आपने यह क्या किया? किसको मेरे आगे जला दिया? मैं नहीं जानता यह क्या हुआ है और किसने यह बड़ा भारी अद्भुत कार्य कर डाला है?'

इस प्रकार प्रार्थना करते हुए राजा श्वेतका विलाप सुनकर लोक-कल्याणकारी भगवान् शंकरने कहा—'राजन् ! यह काल है; तुम्हारी रक्षाके लिये मैंने इसे जला दिया है।' राजा श्वेतने पूछा—'भगवन् ! इसने ऐसा कौन-सा कुकृत्य किया था, जिससे आपने इसे इस दशाको पहुँचा दिया?' भगवान् शिव बोले—'महाराज ! यह संसारके समस्त प्राणियोंका भक्षक है। इस समय यह क्रूर काल तुम्हें अपना ग्रास बनानेके लिये आया था। अतः बहुत-से जीवोंका कल्याण करनेकी इच्छासे मैंने इसे जला दिया है। क्योंकि जो पापी, अतिशय अधर्मपरायण, लोकविनाशकारी तथा पाखण्डी हैं, वे मेरे वध्य हैं।' भगवान् शिवकी यह बात सुनकर राजा श्वेतने कहा—'भगवन् ! काल आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके ही लोकमें सबको नियन्त्रणमें रखता है। आपहीके आदेशसे यह तीनों लोकोंमें विचरता है। इसके डरसे ही यह संसार सदा पुण्य-कर्मका अनुष्ठान करता है। इसलिये आप कृपा करके फिर शीघ्र ही इसे जीवित कर दें।' तब शिवजीने कालको पुनः जीवित कर दिया। तदनन्तर श्रेष्ठ राजा श्वेतने कालको अपने हृदयसे लगा लिया। इस प्रकार चेतना लौटनेपर कालने भगवान् शंकरकी स्तुति की—'कालका विनाश करनेवाले देवेश्वर ! आप त्रिपुरासुरका संहार करनेवाले हैं। प्रभो ! जगत्पते ! आपने कामदेवको जलाकर उसे अनंग (अंगहीन) बना दिया है; तथा आपहीने अत्यन्त अद्भुत ढंगसे दक्ष-यज्ञका विनाश कर डाला था। महान् लिंगरूपसे आपने तीनों लोकोंको व्याप्त

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