भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 1406 में से

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७८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

विन्ध्याचल, गन्धमादन, श्वेतकूट, त्रिकूट तथा दर्दुर पर्वत—ये और दूसरे भी बहुत-से पर्वत लिंगस्वरूप माने जायँगे और मेरे वचनसे ये सभी पापोंका विनाश करनेवाले होंगे।'

शंकरपुत्र भगवान् कार्तिकेयने इस प्रकार उन सब पर्वतोंको वरदान दिया। जिसके मुखमें सदा ('नमः शिवाय' इस) पंचाक्षर मन्त्रका जप होता रहता है, जिसका चित्त सदा भगवान् शिवके चिन्तनमें संलग्न रहता है, जो सब प्राणियोंके प्रति समभाव रखता है, दूसरोंकी निन्दामें जिसकी वाणी मूक रहती है तथा जो परायी स्त्रियोंके प्रति अपनेमें नपुंसक भाव ही रखता है—ऐसे उपासकपर भगवान् शिवकी विशेष कृपा होती है।

शौनकजी बोले— महाभाव! हमने कुमार कार्तिकेयके विशिष्ट चरित्रका श्रवण किया, जो परम मंगलमय है। अब हम राजाधिराज श्वेतके परम अद्भुत चरित्रके विषयमें जानना चाहते हैं जिन्होंने अपनी भारी शिवभक्तिके प्रभावसे भगवान् शिवको भलीभाँति सन्तुष्ट किया था। जो लोग भक्तिपूर्वक महादेवजीकी आराधना करते हैं, वे ही भक्त हैं, वे ही महात्मा हैं तथा वे ही कर्मयोगी और ज्ञानी हैं।

लोमशजीने कहा— महाभाग महर्षियो! राजा श्वेतका परम अद्भुत चरित्र सुनो। महात्मा श्वेत अपने राज्यमें सब प्रकारके भोग भोगते रहे तो भी उनकी बुद्धि सदा धर्ममें ही संलग्न रहती थी। उन्होंने धर्मके अनुसार प्रजाको प्रसन्न रखते हुए समस्त पृथ्वीका पालन किया। वे ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, शूरवीर तथा निरन्तर शिवजीके भजनमें तत्पर रहनेवाले थे। राजा श्वेत अपनी बढ़ी-चढ़ी शक्तिसे राज्यका शासन और भक्तिभावसे भगवान् शिवकी आराधना करते थे। इस प्रकार परमेश्वरकी आराधना करते-करते महाराज श्वेतकी सारी आयु बीत चली। उनके मनमें न कभी व्यथा हुई और न शरीरमें ही कोई रोग हुआ। ये संसारी उपद्रव महाराज श्वेतको कभी कष्ट नहीं पहुँचाते थे। इनके राज्यमें सब लोग निर्भय रहते थे। किसीको कोई उपद्रव नहीं था। महाराजके राज्यमें बिना जोते-बोये ही अनाज पैदा होता था। ब्राह्मण तपस्यामें संलग्न रहते और दूसरे लोग भी अपने-अपने वर्ण तथा आश्रम-सम्बन्धी धर्मका पालन करते थे। सारी पृथ्वीमें प्रायः सर्वत्र मंगलमय उत्सव ही होता रहता था। भगवान् शिवकी कृपासे महात्मा राजा श्वेतके राज्यमें सब प्रजा सदा मानसिक कष्टसे रहित, आनन्दमग्न तथा सुखी रहती थी। कभी किसीको भी पुत्रकी मृत्यु नहीं देखनी पड़ी, दुःख नहीं उठाना पड़ा, अपमान, महामारी तथा दरिद्रताका कष्ट भी नहीं सहन करना पड़ा। इस प्रकार भगवान् शिवकी पूजामें लगे हुए महात्मा राजा श्वेतके जीवनका बहुत बड़ा समय सफलतापूर्वक बीत गया।

एक दिनकी बात है, राजा श्वेत परमार्थदाता शंकरजीकी आराधनामें लगे थे। उसी समय यमराजने उनके पास अपने दूत भेजे। उन दूतोंको आज्ञा दी कि चित्रगुप्तके कथनानुसार राजा श्वेतकी आयु पूरी हो गयी है, अतः उन्हें शीघ्र ले आओ। 'जो आज्ञा' कहकर दूतोंने उनकी आज्ञा स्वीकार की और राजाको ले जानेकी इच्छासे वे भगवान् शिवके मन्दिरमें आये। उनके हाथोंमें काल-पाश था तथा वे आकृतिसे भी बड़े भयानक थे। यमदूतोंने शीघ्रतापूर्वक वहाँ आकर देखा, महाराज गहरी समाधि लगाये भगवान् शिवके समीप बैठे थे। उन्हें देखकर उनके मनमें ज्यों ही हलचल हुई त्यों ही वे सब दूत चित्रलिखितकी भाँति निश्चेष्ट हो गये। अतः यमदूत धर्मराजकी आज्ञाका पालन न कर सके। यह सब जानकर यमराज स्वयं ही वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने राजाको सहसा ले जानेके लिये अपना दण्ड ऊपरको उठा रखा था। धर्मराजने देखा, महाबाहु श्वेत शिव-भक्तिसे युक्त होकर भगवान् शिवके ही चिन्तनमें तत्पर हैं। केवल ज्ञानका आश्रय ले, शान्तभावसे विराजमान

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