भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 106
  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ७७

प्रयत्न करके आत्म-तत्त्वका चिन्तन करो।

लोमशजी कहते हैं—भगवान् शंकरके इस प्रकार उपदेश देनेपर यमराज ज्ञानवान् होकर उस समय साक्षात् आत्मस्वरूपसे स्थित हुए। वे कर्मसे सबके शासक हैं। सब प्राणियोंको उनके कर्मानुसार दण्ड या पुरस्कार देते हैं। वे अपने चित्तको एकाग्र रखकर सदा सब भूतों तथा मनुष्योंका कल्याण करते हैं।


कार्तिकेयजीकी स्तुति और उनके द्वारा पर्वतोंको वरदान तथा महाराज श्वेतका चरित्र

ऋषियोंने पूछा—सूतजी! महात्मा कुमारने युद्धमें तारकासुरको मारकर फिर कौन-सा महान् अद्भुत कर्म किया? यह बतलाइये।

सूतजी बोले—तारकासुरको मारा गया देख इन्द्रादि सब देवता बहुत प्रसन्न हुए और सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाले कुमार कार्तिकेयकी स्तुति करने लगे।

देवता बोले—कल्याणस्वरूप भगवान् कार्तिकेयको नमस्कार है। शिवनन्दन! आपको नमस्कार है। विश्वबन्धो! आपको नमस्कार है। विश्वभावन! आपको नमस्कार है। जिन्होंने आपका दर्शन कर लिया, वे चाण्डाल भी सर्वश्रेष्ठ हैं। जगद्वन्धो! हम आपको नमस्कार करते हैं। देव! इस समय हम आपकी शरणमें आये हैं।१

देवताओंद्वारा की हुई यह स्तुति सुनकर प्रसन्नतासे भरे हुए पर्वतोंने भी सर्वतोभावेन उन गिरिजाकुमारका स्तवन किया।

पर्वत बोले—भगवन्! आप अनाथोंके नाथ हो। शंकरनन्दन! तुम्हें नमस्कार है। श्रेष्ठ देवताओंद्वारा पूजनीय! तुम्हें नमस्कार है। ज्ञानवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! तुम्हें नमस्कार है। महादानव तारकासुरका विनाश करनेवाले कुमार! तुम्हें नमस्कार है। देववर! तुम्हें नमस्कार है। तुम हमपर प्रसन्न होओ।२

पर्वतोंद्वारा इस प्रकार स्तुति की जानेपर शंकर और पार्वतीके पुत्र एवं वरदाताओंमें श्रेष्ठ स्वामी कार्तिकेय बहुत सन्तुष्ट हुए और उन्हें वर देते हुए बोले—'मेरु आदि समस्त पर्वतगण! आप सब लोग मेरे वन्दनीय और प्रयत्नपूर्वक पूजनीय हैं। तपस्वी, ज्ञानी और कर्मयोगी भी निरन्तर आप लोगोंका सेवन करेंगे। आपलोग मेरे वचनसे सम्पूर्ण जगत्‌को पवित्र कर सकते हैं। पर्वतसम्बन्धी सभी स्थान तीर्थस्वरूप होंगे। आपके ऊपर दिव्य शिवालय, दिव्य मन्दिर, बड़े-बड़े विचित्र गृह तथा दिव्य तपोवन सुशोभित होंगे। इतना ही नहीं, भगवान् शंकरके विशिष्ट स्वरूप तथा विशिष्ट लिंग भी आपके शिखरोंपर विराजमान होंगे। ये जो मेरे नाना पर्वतश्रेष्ठ हिमवान् हैं, आजसे ये महाभाग तपस्वियोंके फलदाता होंगे। ये गिरिराज मेरु पुण्यात्माओंके आश्रय होंगे। गिरिश्रेष्ठ लोकालोक तथा महायशस्वी उदयगिरि—ये दोनों शिवलिंगस्वरूप समझे जायँगे। श्रीशैल, महेन्द्रगिरि, सह्याचल, माल्यवान्, मलयगिरि,


१- नमः कल्याणरूपाय नमस्ते शिवनन्दन। विश्वबन्धो नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वभावन॥
वरिष्ठाः श्वपचा यैस्तु कृतं वै दर्शनं तव। त्वां नमामो जगद्बन्धो त्वां वयं शरणं गताः॥
(स्क० पु०, मा० के० ३१।८१-८२)

२-त्वं नाथोऽसि ह्यनाथानां शङ्करात्मज ते नमः। नमो देववरैः पूज्य नमो ज्ञानविदां वर॥
नमोऽस्तु ते दानववर्यहन्तर्नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद॥
(स्क० पु०, मा० के० ३१।८४-८५)