भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 105

७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

है। उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। शब्द वाक्-इन्द्रियका कार्य होनेके कारण अनित्य है—जैसे घट। अतः वह उस परमार्थ वस्तुको प्रकाशित नहीं कर सकता। शब्द वह है, जिससे प्रवृत्तिप्रधान धर्मके लिये प्रेरणा मिलती है। प्रवृत्ति और निवृत्ति तथा सम्पूर्ण द्वन्द्व जिसमें विलीन हो जाते हैं, वही शाश्वत पद माना गया है। वह व्यवधानशून्य, निर्गुण, बोधस्वरूप, निरंजन (निर्लेप), निर्विकल्प, निरीह, सत्तामात्र, ज्ञानगम्य, स्वतःसिद्ध, स्वयंप्रकाश, वेदवेद्य तथा अगम्य है। प्रेतराज! जिसकी जड़ अनादि कालसे चली आ रही है, मायाके कारण जिसको विचारमें लाना भी कठिन है, उस मायामय संसारसे ऊपर उठकर तथा मायाका सर्वथा परित्याग करके जो ममता और आसक्तिसे रहित हो गये हैं, वे विकल्पशून्य नित्य पदको प्राप्त होते हैं। संसार कल्पनामूलक है। यह कल्पना ही नित्यकी भाँति प्रतीत होती है। जिन्होंने इस कल्पनाको त्याग दिया है वे परमपदको प्राप्त होते हैं। जैसे सीपीमें चाँदीकी प्रतीति, सर्पमें रस्सीकी प्रतीति तथा सूर्यकी किरणोंमें जलकी प्रतीति मिथ्या है, उसी प्रकार नित्य परमात्मामें अनित्य संसारकी प्रतीति भी मिथ्या ही है। आत्मा एक है। उसे जान लेनेपर मनुष्य ममता और अहंकारसे रहित हो जाता है। ऐसे आत्मज्ञानी पुरुषोंको बन्धन कहाँसे प्राप्त हो सकता है? क्या कभी आकाशमें फूल होना सम्भव है? ज्ञानीका संसार-बन्धन वैसा ही असत्य है जैसे खरगोशके सींगका होना। इसलिये अब इस विषयमें बहुत-सी व्यर्थ बातें कहनेसे कोई लाभ नहीं है। विद्वान्, जितेन्द्रिय तथा वीतराग ज्ञानी पुरुष ममताका परित्याग करके परमपदको प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखते हैं। जिन्होंने ममत्वको त्याग दिया है और लोभ तथा मोहको दूर कर दिया है, वे काम-क्रोधसे हीन मानव परमपदको प्राप्त होते हैं। जबतक मनमें काम, लोभ, राग और द्वेष डेरा डाले रहते हैं, तबतक केवल शब्दमात्रका बोध रखनेवाले विद्वान् परमसिद्धि (मुक्ति)-को नहीं प्राप्त होते हैं।* यमराज! जिनके सब पाप दूर हो गये हैं वे समस्त ऋषि-मुनि ज्ञानका प्रवचन करनेवाले तथा ज्ञानाभ्यासके अनुकूल बर्ताव करनेवाले हैं, तथापि ज्ञानवेत्ता नहीं हैं। ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञानगम्य वस्तुको जानकर ही मनुष्य ज्ञानी कहलाता है। कैसे जानना चाहिये, किसके द्वारा जानने योग्य है और किसको जानना अभीष्ट है, वह वस्तु क्या है—ये सब बातें मैं तुम्हारी जानकारीके लिये संक्षेपसे बतलाता हूँ। आत्मा एक ही है तथापि भेदबुद्धि होनेसे वह अनेक-सा दिखायी देता है। जैसे भँवरी देनेवालेकी दृष्टिमें यह पृथ्वी घूमती हुई-सी प्रतीत होती है, उसी प्रकार भेदबुद्धिसे एक आत्मा भी अनेक-सा प्रतीत होता है। अतः विचारके द्वारा ही आत्माका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। गुरुके मुखसे श्रवणके द्वारा तथा भलीभाँति प्रयोगमें लाये हुए विशेष मननके द्वारा भी आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करना उचित है। इस प्रकार आत्माको जानकर मनुष्य अनायास ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् मायाका जाल है। ममतासे उपलक्षित होनेवाला यह महान् संसार मायामय है। ममताको दूर कर देनेपर बन्धनसे अनायास छुटकारा मिल जाता है। मैं कौन हूँ, तुम कौन हो तथा महामायाके आश्रित रहनेवाले अन्य लोग भी कहाँसे आये हैं? यह सारा प्रपंच बकरीके गलेमें लटकते हुए स्तनकी भाँति निरर्थक है, निष्फल है, प्रकाशहीन है तथा धूमसमूहकी भाँति निस्सार है। इसलिये यमराज! तुम सर्वथा


* यैस्त्यक्तो ममताभावो लोभमोहौ निराकृतौ । ते यान्ति परमं स्थानं कामक्रोधविवर्जिताः ॥
यावत् कामश्च लोभश्च रागद्वेषव्यवस्थितिः । नाप्नुवन्ति परां सिद्धिं शब्दमात्रैकबोधकाः ॥
(स्क० पु०, मा० के० ३१। ६३-६४)