भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 104

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड *

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हैं। कोई बड़ी भारी तपस्या करे तभी आप उसपर प्रसन्न होते हैं। लोकपितामह ब्रह्माजी भी पुण्यात्मा मनुष्योंपर उनके उत्तम कर्मोंसे ही सन्तुष्ट होते हैं। इसी प्रकार वेदोंद्वारा जानने योग्य सनातन देव भगवान् विष्णु भी अनेक प्रकारके यज्ञों तथा उपवास-व्रतोंसे प्रसन्न होकर मनुष्योंको केवल भक्तिभाव प्रदान करते हैं, जिससे वे मोक्षको प्राप्त हो सकें। दुर्गाजी भी आराधनासे संतुष्ट होनेपर लौकिक भोग और स्वर्गादि सम्पत्तियाँ देती हैं। भगवान् सूर्य अपने उपासकको आयु और आरोग्य प्रदान करते हैं। इसी प्रकार गणेशजी भी अर्घ्य, पाद्य और चन्दन आदिके द्वारा पूजन करने तथा उनके मन्त्रोंका जप करनेपर विघ्नोंका निवारण करते हैं। परंतु आपके पुत्र कार्तिकेयजीने तो इस जगत्‌के सभी प्राणियोंके लिये स्वर्गका द्वार खोल दिया है। इनके दर्शनमात्रसे सब लोग, वे पापी ही क्यों न हों, एकमात्र स्वर्गके अधिकारी हो जाते हैं। यह महान् आश्चर्यकी बात है। जिन्होंने अपनी इन्द्रियोंको जीत लिया है, लोभ जिन्हें छू भी नहीं सका है, जो काम और रागसे रहित हैं, यज्ञ करनेवाले और धर्मनिष्ठ हैं तथा वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् हैं, वे सब पुण्यात्मा पुरुष जिस उत्तम गतिको प्राप्त करते हैं, उसीको अधम-से-अधम, पापपरायण चाण्डाल आदि भी कुमार कार्तिकेयके दर्शनमात्रसे पा लेते हैं। उनका यह कर्म महान् आश्चर्यजनक है। कृत्तिका नक्षत्रसे युक्त कार्तिककी पूर्णिमामें स्नान करनेसे जो फल होता है, वही फल आपके पुत्रका दर्शनमात्र करनेसे लोग अपनी कई पीढ़ियोंसहित प्राप्त कर लेते हैं।

यमराजका यह वचन सुनकर भगवान् शंकरने कहा—धर्मराज ! जिन पुण्यात्मा मनुष्योंका आन्तरिक पाप नष्ट हो गया है, उनके मनमें श्रद्धाका उदय होता है।* फिर पूर्वपुण्यके प्रभावसे उनके हृदयमें उत्तम तीर्थोंमें जाने और संत-महात्माओंका दर्शन करनेकी प्रबल इच्छा जाग्रत् होती है। धर्मराज ! कुमारके दर्शनसे जो पुण्यफल प्रकट होता है उसके लिये तुम्हें रंचमात्र भी आश्चर्य नहीं करना चाहिये। कर्मसंयुक्त वचन—कर्तव्यका आदेश देनेवाला वेदवाक्य सबके लिये फलद होता है। सब तीर्थोंका सेवन, यज्ञोंका अनुष्ठान और नाना प्रकारके दान आदि कार्य अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये करने योग्य हैं। फिर शुद्ध अन्तःकरणके द्वारा मनुष्य स्वयं ही अपने आत्माका चिन्तन करे। मैं ही आत्मारूपसे सब प्राणियोंके भीतर स्थित हूँ। मैं नित्य, सत्तायुक्त, अपने-आपमें स्थित रहनेवाला और व्यवधानशून्य हूँ। शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे परे हूँ। मुझमें किसी प्रकारका विकल्प नहीं है। मैं आत्मनिष्ठ, नित्य, नित्ययुक्त और निरीह हूँ। कूटस्थ (निश्चल), कल्पित भेदों और विवादोंसे दूर रहनेवाला, ज्ञानगम्य, अनन्त, स्वतन्त्र तथा स्वयंप्रकाश प्रभु हूँ। वेदवेत्ता विद्वान् इसे ही ज्ञान कहते हैं। वे सर्वत्र आत्मदृष्टि रखते हैं। सर्वातीत भावगम्य तत्त्वको जानकर ज्ञानी पुरुष समतायुक्त बुद्धिसे व्यवहार करते हैं और केवल बोधस्वरूप अपने आत्माको भूल जानेके कारण सब जीवसमूह संसार बन्धनमें बँधे हुए देखे जाते हैं। तत्त्वज्ञानसे रहित बहिर्मुख जीव काम, क्रोध, भय, द्वेष, मोह और मात्सर्यसे युक्त हो एक-दूसरेको दूषित करते रहते हैं। इसलिये गुणभेदसे निर्मित इस प्रपंचको इस प्रकार असत्य जानकर अपने-आपमें स्थित गुणातीत परमात्माका साक्षात्कार ही यथार्थ दर्शन है। जहाँ भेद भी अभेदको, राग भी वैराग्यको और क्रोध भी क्रोधाभावको प्राप्त होता है, वही मेरा परमधाम


* येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् । निरस्तमस्ति भो धर्म श्रद्धा मनसि वर्तते ॥
(स्क० पु०, मा० के० ३१। २९)