संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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‘महाभाग पर्वतगण! आपलोग खेद और चिन्ता न करें। आज मैं यहाँ सबके सामने ही इस महापापी दैत्यका वध करता हूँ।’
इस प्रकार पर्वतोंको और देवताओंको भी आश्वासन देकर शंकरजीके प्रिय पुत्र कुमार कार्तिकेयने मन-ही-मन अपने पिता और माताको प्रणाम किया। फिर हाथमें शक्ति ले उन्होंने दैत्यराज तारकपर बड़े वेगसे प्रहार किया। शक्तिका आघात होते ही असुरोंका स्वामी तारक सहसा धराशायी हो गया। वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति उसका अंग-अंग चूर हो गया। कुमार कार्तिकेयके द्वारा तारकासुर बलपूर्वक मार दिया गया—यह देवताओं, ऋषियों, गुह्यकों, पक्षियों, किन्नरों, चारणों, सिद्धों तथा अप्सराओंने अपनी आँखोंसे देखा। देखकर उन्हें बड़ा हर्ष हुआ और वे सब मिलकर कुमार कार्तिकेयकी स्तुति करने लगे। यह घटना देख-सुनकर तीनों लोकोंके निवासी सहसा आश्चर्यचकित हो उठे। सब-के-सब आनन्दमग्न हो गये। भगवान् शंकर और सती पार्वती भी बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ आये और अपने पुत्रको गोदमें बिठाकर पूर्ण सन्तोष प्राप्त किया। उस समय देवताओंने भगवान् शिव और पार्वतीकी आरती उतारी। तत्पश्चात् अपने पुत्रों तथा मेरु आदि पर्वतोंसे घिरे हुए गिरिराज हिमालय भी वहाँ आये और कुमारका स्तवन करने लगे। इसके बाद इन्द्र आदि सब देवताओंने ऋषियोंके साथ गीत और वाद्यकी ध्वनि करते हुए वेद-मन्त्रोच्चारणपूर्वक भाँति-भाँतिके सूक्तोंद्वारा कुमारका स्तवन किया। यह कुमार-विजय नामक चरित्र अत्यन्त अद्भुत है। इसमें कुमारके पराक्रम और माहात्म्यका वर्णन है। उनका यह उदार चरित्र अत्यन्त प्राचीन, परमानन्ददायक तथा मनुष्योंको मनोवांछित वस्तु प्रदान करनेवाला है। जो महात्मा कुमारके इस तारक-वध नामक चरित्रका पाठ या श्रवण करता है, उसके सब पातकोंका नाश हो जाता है।
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यमराजके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति तथा शिवके द्वारा यमराजको आत्मज्ञानका उपदेश
लोमशजी कहते हैं— ब्राह्मणो! एक समय पितरोंके स्वामी यमराज यह सुनकर कि सनातन देव भगवान् शंकर इस जगत्के रक्षक हैं उनके पास गये, और एकाग्रचित्तसे उन्होंने उनका स्तवन किया।
यमराज बोले— पापोंको जलानेवाले भगवान् भर्गको नमस्कार है। देवताओंके पालक प्रकाशस्वरूप महादेवको नमस्कार है। मृत्युपर विजय पानेवाले जटाजूटधारी रुद्रदेवको नमस्कार है। जिनके कण्ठमें नील चिह्न सुशोभित होता है, जो पाप-तापोंका नाश करनेवाले हैं, सर्वव्यापी आकाश जिनका एक अवयवमात्र है, जो सबको अपना ग्रास बनानेवाले काल हैं, कालके भी स्वामी हैं तथा काल ही जिनका स्वरूप है, उन भगवान् शिवको नमस्कार है।
देवदेवेश्वर! आप सबका कल्याण करनेवाले