संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 102, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * | ७३ ---|---
लगे, उस समय बलवानोंमें श्रेष्ठ तथा अत्यन्त प्रचण्ड उस बालकको आते देख तारकासुर कहने लगा—'अहो! यह कुमार अपने शत्रुभूत बड़े-बड़े दैत्योंका संहार करनेवाला है। अतः इसके साथ मैं ही युद्ध करूँगा। अन्य सब वीरों, सम्पूर्ण गणों, गणाधीशों और लोकपालोंको भी मैं अभी मौतके घाट उतारता हूँ।'
यों कहकर महाबली तारकासुर कुमारसे युद्ध करनेके लिये आगे बढ़ा। उसने एक अद्भुत शक्ति हाथमें ले ली। वह इन्द्रका अपमान कर चुका था। उसे फिर वेगपूर्वक आते देख बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ इन्द्रने (सावधान होकर) वज्रसे आघात किया। वज्रकी मार खाकर तारकासुर व्याकुल हो पृथ्वीपर गिर पड़ा। गिरते ही वह पुनः उठकर खड़ा हो गया और बड़े रोषमें भरकर उसने इन्द्रपर शक्तिसे प्रहार किया। इन्द्र ऐरावत हाथीपर बैठे थे किंतु तारकासुरने उन्हें पृथ्वीपर गिरा दिया। उनके गिरनेपर देवताओंकी सेनामें बड़ा हाहाकार मचा। इन्द्रको पृथ्वीपर गिरा देख प्रतापी वीरभद्र अत्यन्त कुपित हो उठे। वे बड़े बलवान् वीर थे। उन्होंने हाथमें त्रिशूल लेकर इन्द्रकी रक्षा करते हुए महादैत्य तारकपर प्रहार किया। शूलके आघातसे आहत होकर तारकासुर पृथ्वीपर गिर पड़ा। परंतु वह बड़ा तेजस्वी था। गिरनेपर भी पुनः उठकर खड़ा हो गया। उसने बहुत बड़ी शक्ति लेकर वीरभद्रके वक्षस्थलपर प्रहार किया। उसकी शक्तिके आघातसे वीरभद्र भी धराशायी हो गये। उस समय समस्त शिवगण, सम्पूर्ण देवता, गन्धर्व, नाग तथा राक्षस बारंबार हाहाकार करने लगे। इतनेहीमें शत्रुओंका नाश करनेवाले महाबली वीरभद्र उठकर खड़े हो गये। उन्होंने एक चमकते हुए त्रिशूलसे जब तारकासुरको मार डालनेका विचार किया, उसी समय कुमार कार्तिकेयने उन्हें मना करते हुए कहा—'महामते! तुम इसका वध न करो।' उन्होंने उस रणभूमिमें जब सिंहनाद किया तब आकाशमें खड़े हुए देवता जय-जयकार करने लगे।
वीरवर कार्तिकेय एक बहुत बड़ी शक्ति लेकर उसके द्वारा तारकासुरको मार डालनेके लिये उद्यत हुए। तारकासुर और कुमार कार्तिकेयमें बड़ा विकट, सब प्राणियोंके लिये भयंकर तथा अत्यन्त दुस्सह संग्राम हुआ। दोनों वीर हाथोंमें शक्ति लिये एक-दूसरेसे जूझ रहे थे। वे शक्तिसे विपक्षीकी शक्तिपर चोट करते थे। दोनोंको उत्साहपूर्वक युद्ध करते देख देवता, गन्धर्व आदि आपसमें कहने लगे—'पता नहीं इस युद्धमें किसकी विजय होगी।' इसी समय आकाशवाणी हुई—'देवताओ! आज कुमार कार्तिकेय तारकासुरको अवश्य मार डालेंगे। तुम सब लोग चिन्ता न करो। सुखपूर्वक स्वर्गलोकमें स्थित रहो।'
आकाशमें प्रकट हुई इस दैवी वाणीको प्रमथगणोंसे घिरे हुए कुमार कार्तिकेयने भी सुना। सुनकर उस भयानक दैत्यको मार डालनेका निश्चय किया। अतिशय बलवान् महाबाहु कुमारने तारकासुरकी छातीमें शक्तिसे प्रहार किया। परंतु दैत्यराज तारकने उस प्रहारकी कोई परवा न करके स्वयं ही क्रोधमें भरकर अपनी शक्तिसे कुमारपर आघात किया। उस प्रहारसे शंकरनन्दन कार्तिकेय मूर्च्छित हो गये। जब पुनः वे सचेत हुए तो महर्षिगण उनकी स्तुति करने लगे। तब मतवाला सिंह जैसे हाथीपर झपटता है, उसी प्रकार प्रतापी कुमारने तारकासुरपर गहरा प्रहार किया। उस समय वायुकी गति कुण्ठित हो गयी थी, सूर्यका प्रकाश मन्द पड़ गया था, पर्वतों और वनोंसहित समूची पृथ्वी डगमगाने लगी। हिमालय, मेरु, श्वेतकूट, दर्दुर, मलयगिरि, महाशैल, मैनाक, विन्ध्याचल, महागिरि लोकालोक, मानसोत्तर पर्वत, कैलास, मन्दराचल, माल्यवान्, गन्धमादन, उदयाचल, महेन्द्रगिरि तथा अस्ताचल—ये तथा और भी बहुत-से महातेजस्वी पर्वत कुमारकी सर्वथा कुशल चाहते हुए स्नेहसे व्याकुल हो उठे। पार्वतीनन्दन कुमारने सब पर्वतोंको भयभीत देख उन्हें धीरज बँधाते हुए कहा—