भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कितनोंको प्राणोंसे हाथ धोना पड़ा और कितने ही युद्ध छोड़कर भाग खड़े हुए। इस प्रकार देवसेनाको तहस-नहस होती देख महातेजस्वी राजा मुचुकुन्द तारकासुरसे युद्ध करने लगे। इन्द्र बहुतेरे असुरोंसे घिरे हुए पृथ्वीपर पड़े थे। उन्हें छोड़कर तारकासुर मुचुकुन्दके साथ भिड़ गया। इस प्रकार मुचुकुन्द और तारकासुरमें बड़ा भारी युद्ध हुआ। मुचुकुन्द बड़े बलवान् थे। उन्होंने तलवारसे तारकासुरपर ज्यों ही प्रहार किया त्यों ही तारकासुरकी शक्तिसे आहत होकर वे रणभूमिमें गिर पड़े। गिरनेपर भी वे तत्काल उठकर खड़े हो गये और तारकासुरको मारनेके लिये ब्रह्मास्त्र उठाया। तब नारदजीने कहा—'राजन्! तारकासुर मनुष्यके हाथसे नहीं मारा जायगा। अतः उसके ऊपर इस महान् अस्त्रका प्रयोग न करो। भगवान् शिवके पुत्र कुमार कार्तिकेय ही तारकासुरको मारनेमें समर्थ हैं। अतः तुम सब लोगोंको शान्त रहना चाहिये।'

नारदजीकी बात सुनकर सब देवता मुचुकुन्दके साथ ही शान्त हो गये। तब वीरभद्रने त्रिशूलसे मारकर तारकासुरको भारी आघात पहुँचाया। तारकासुर सहसा पृथ्वीपर गिरा और क्षणभर मूर्छामें डूबा रहा। फिर चेत होनेपर एक ही मुहूर्तमें वह उठकर खड़ा हो गया और शक्तिसे उसने वीरभद्रपर प्रहार किया। भगवान् शिवके सेवक महाबली वीरभद्रने भी भयानक त्रिशूलसे तारकासुरको पुनः चोट पहुँचायी। इस तरह ये दोनों एक-दूसरेको मारने लगे। भगवान् शिवके गणोंमें जो अत्यन्त युद्धकुशल और वीरभद्रके समान ही पराक्रमी थे, वे बैलपर सवार हो मस्तकपर जटा-जूट धारण किये हाथोंमें त्रिशूल लिये तथा सर्पोंका आभूषण पहने वहाँ आये और वीरभद्रको आगे करके दैत्योंके साथ लोहा लेने लगे। उन्होंने दैत्योंके साथ बड़ा भयानक संग्राम किया। उस युद्धमें प्रमथगण विजयी हुए। उनसे परास्त होकर असुरलोग युद्धसे विमुख हो गये। अत्यन्त पीड़ित होकर उन्हें पराभव स्वीकार करना पड़ा।

अपनी सेनाको तितर-बितर होती देख तारकासुरने दस हजार भुजाएँ प्रकट कीं और सिंहपर सवार हो रणभूमिमें देवताओंका संहार आरम्भ किया। उसने शिवके बहुत-से गणोंको भी मार गिराया। जान पड़ता था वह तीनों लोकोंका संहार कर डालेगा। उसके सैनिकोंने समस्त शिवगणोंको क्षत-विक्षत कर दिया तथा दैत्यसेनाके सिंहोंने शिवगणोंकी सवारीके काम आनेवाले सब बैलोंको मार डाला। इस प्रकार उस रणक्षेत्रमें जब भगवान् शिवके पार्षद मारे जाने लगे तब भगवान् विष्णुने शंकरजीके प्रिय पुत्र कुमार कार्तिकेयसे हँसकर कहा—'कृत्तिकानन्दन! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा वीर नहीं है जो इस पापी तारकासुरका वध कर सके; अतः तुम्हें ही इसका संहार करना चाहिये।' कार्तिकेय बोले—'भगवन्! यहाँ कौन अपने हैं और कौन पराये, इसका मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं है।' यह सुनकर देवर्षि नारदने कहा—'महाबाहो! तुम भगवान् शंकरके अंशसे उत्पन्न कुमार हो, इस जगत्के रक्षक और स्वामी हो। देवताओंको सबसे बढ़कर सहारा देनेवाले भी इस समय तुम्हीं हो। वीरवर! तारकासुरने पहले बड़ी उग्र तपस्या की थी। उसीके प्रभावसे उसने देवताओंपर विजय पायी है, स्वर्गलोकको जीत लिया तथा अजेयता प्राप्त कर ली है। उस दुरात्माने इन्द्र और लोकपालोंको भी परास्त किया है तथा तीनों लोक अपने अधिकारमें कर लिये हैं। वह धर्मात्माओंको सतानेवाला है, अतः तुम्हें उसका वध अवश्य करना चाहिये। आज तुम्हीं रक्षक होकर सबका कल्याण करो।'

नारदजीकी बात सुनकर कुमार कार्तिकेय बड़े जोरसे हँसे और विमानसे उतरकर पैदल चलने लगे। अपने हाथमें बड़ी भारी उल्काके समान देदीप्यमान और अत्यन्त प्रभावशालिनी शक्ति लेकर जब वे रणभूमिमें पैदल ही दौड़ने