भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 100
  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ७१

देवताका छत्र धारण कराया जो बहुमूल्य मणियोंकी प्रभासे प्रकाशित हो रहा था। उसमें भाँति-भाँतिके रत्न लगे हुए थे, जिससे उसकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी। वह छत्र चन्द्रमाकी किरणोंके पड़नेसे अत्यन्त शोभायमान जान पड़ता था। उस समय युद्धकी इच्छा रखनेवाले इन्द्र आदि सम्पूर्ण महाबली देवता अपनी-अपनी सेनाके साथ युद्धमें सम्मिलित हो गये। अपने गणोंके साथ धर्मराज भी वहाँ उपस्थित थे। मरुद्गणोंके साथ वायु, जल-जन्तुओंके साथ वरुण, गुह्यकोंसे घिरे हुए कुबेर, प्रमथगणोंके साथ ईशान और व्याधियोंके साथ नैर्ऋत युद्धके लिये आये थे। इस प्रकार आठों लोकपाल युद्धकी इच्छासे मिलकर तारकासुरको मारनेका विचार करते थे। विश्ववन्द्य शिवपुत्र सेनापति कार्तिकेय आत्मज्ञोंमें श्रेष्ठ थे। उन्हें आगे करके सब देवता पृथ्वीपर उतरे और गंगा-यमुनाके बीच अन्तर्वेदीमें आकर खड़े हुए। तारकासुरके अनुचर भी पातालसे वहीं आ गये और देवताओंका वध करनेके लिये अपनी सेनाके साथ युद्धस्थलमें विचरने लगे। तारकासुर भी विमानपर बैठकर वहाँ आया। उस विमानसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। वह असुर बड़ा तेजस्वी था। उसके मस्तकपर छत्र तना हुआ था और सब ओरसे चँवर डुलाये जा रहे थे। इससे दैत्यराज तारक बड़ी शोभा पा रहा था। इस प्रकार देवता और दैत्य अन्तर्वेदीमें आकर बड़ी भारी सेनाके साथ खड़े थे। उन्होंने अपने सैनिकोंके पृथक्-पृथक् व्यूह बना रखे थे। हाथी, ऊँट, भेंड़े, भाँति-भाँतिके घोड़े तथा बहुमूल्य मणियोंसे युक्त विचित्र-विचित्र रथ भी व्यूहके आकारमें खड़े थे। बहुत-से पैदल योद्धा शक्ति, शूल, फरसा, तलवार, तोमर, तीर, पाश, मुद्गर और पट्टिश आदि शस्त्रोंसे सुसज्जित थे। देवता और दैत्योंकी वे दोनों सेनाएँ एक-दूसरेकी अपेक्षासे सजकर बड़ी शोभा पा रही थीं। उस समय देवताओंने दैत्योंको मार डालनेका विचार किया।

तदनन्तर दोनों सेनाएँ मेघके समान गम्भीर स्वरमें गर्जना करने लगीं। महाबली देवता और असुर एक-दूसरेसे भिड़ गये। उनमें घमासान युद्ध होने लगा। बाणोंकी बौछारोंसे वहाँका सारा मैदान रुण्ड-मुण्डोंसे भर गया। कितने ही धड़ बिना मस्तकके नाच रहे थे। रक्तकी नदियाँ बह चलीं। वह युद्ध बड़ा भयंकर हो रहा था। थोड़ी ही देरमें देवताओं और दानवोंका संहार करनेवाला वह युद्ध द्वन्द्व-युद्धके रूपमें परिणत हो गया। वायुदेवके साथ दनुकुमार युद्ध करने लगा। जम्भके साथ स्वयं यमराज भिड़ गये। बलके साथ वरुण और पद्मके साथ कुबेर युद्ध करने लगे। अग्निसे संह्लादका सामना हुआ। महाहनु नैर्ऋतिके साथ लोहा लेने लगा। मेघाभ ईशानके साथ और तारकासुर इन्द्रके साथ भिड़ गया। यक्ष, पिशाच, नाग, पक्षी, पितर, व्याधि, ज्वर, सन्निपात तथा भूत, प्रमथ और गुह्यक-गण भी अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे युद्धमें संलग्न हो गये। वे सब-के-सब दृढ़ निश्चय करके द्वन्द्वयुद्धमें तत्पर थे। कभी एक-दूसरेपर विजय पा जाते और कभी परस्पर विजय पाना उनके लिये अत्यन्त कठिन हो जाता था। विजयकी इच्छा रखनेवाले देवता और दानवोंमें जब इस प्रकार घमासान युद्ध चल रहा था उस समय देवतालोग दावानलसे दग्ध हुए बड़े-बड़े वृक्षोंकी भाँति उस युद्धस्थलमें गिरने लगे। गिरकर नष्ट हुए देवताओंकी लाशोंसे उस समय सारी पृथ्वी अत्यन्त भयानक प्रतीत होती थी। तारकासुरने अपनी बड़ी भारी शक्ति चलाकर देवराज इन्द्रको घायल कर दिया। वे तुरंत ही ऐरावत हाथीसे पृथ्वीपर गिर पड़े और मूर्छित हो गये। इसी प्रकार अन्य लोकपाल भी महाबली असुरोंसे पराजित हुए। उस रणभूमिमें युद्धविद्याविशारद कितने ही देवताओंको हार खानी पड़ी।