भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

है। उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। शब्द वाक्-इन्द्रियका कार्य होनेके कारण अनित्य है—जैसे घट। अतः वह उस परमार्थ वस्तुको प्रकाशित नहीं कर सकता। शब्द वह है, जिससे प्रवृत्तिप्रधान धर्मके लिये प्रेरणा मिलती है। प्रवृत्ति और निवृत्ति तथा सम्पूर्ण द्वन्द्व जिसमें विलीन हो जाते हैं, वही शाश्वत पद माना गया है। वह व्यवधानशून्य, निर्गुण, बोधस्वरूप, निरंजन (निर्लेप), निर्विकल्प, निरीह, सत्तामात्र, ज्ञानगम्य, स्वतःसिद्ध, स्वयंप्रकाश, वेदवेद्य तथा अगम्य है। प्रेतराज! जिसकी जड़ अनादि कालसे चली आ रही है, मायाके कारण जिसको विचारमें लाना भी कठिन है, उस मायामय संसारसे ऊपर उठकर तथा मायाका सर्वथा परित्याग करके जो ममता और आसक्तिसे रहित हो गये हैं, वे विकल्पशून्य नित्य पदको प्राप्त होते हैं। संसार कल्पनामूलक है। यह कल्पना ही नित्यकी भाँति प्रतीत होती है। जिन्होंने इस कल्पनाको त्याग दिया है वे परमपदको प्राप्त होते हैं। जैसे सीपीमें चाँदीकी प्रतीति, सर्पमें रस्सीकी प्रतीति तथा सूर्यकी किरणोंमें जलकी प्रतीति मिथ्या है, उसी प्रकार नित्य परमात्मामें अनित्य संसारकी प्रतीति भी मिथ्या ही है। आत्मा एक है। उसे जान लेनेपर मनुष्य ममता और अहंकारसे रहित हो जाता है। ऐसे आत्मज्ञानी पुरुषोंको बन्धन कहाँसे प्राप्त हो सकता है? क्या कभी आकाशमें फूल होना सम्भव है? ज्ञानीका संसार-बन्धन वैसा ही असत्य है जैसे खरगोशके सींगका होना। इसलिये अब इस विषयमें बहुत-सी व्यर्थ बातें कहनेसे कोई लाभ नहीं है। विद्वान्, जितेन्द्रिय तथा वीतराग ज्ञानी पुरुष ममताका परित्याग करके परमपदको प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखते हैं। जिन्होंने ममत्वको त्याग दिया है और लोभ तथा मोहको दूर कर दिया है, वे काम-क्रोधसे हीन मानव परमपदको प्राप्त होते हैं। जबतक मनमें काम, लोभ, राग और द्वेष डेरा डाले रहते हैं, तबतक केवल शब्दमात्रका बोध रखनेवाले विद्वान् परमसिद्धि (मुक्ति)-को नहीं प्राप्त होते हैं।* यमराज! जिनके सब पाप दूर हो गये हैं वे समस्त ऋषि-मुनि ज्ञानका प्रवचन करनेवाले तथा ज्ञानाभ्यासके अनुकूल बर्ताव करनेवाले हैं, तथापि ज्ञानवेत्ता नहीं हैं। ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञानगम्य वस्तुको जानकर ही मनुष्य ज्ञानी कहलाता है। कैसे जानना चाहिये, किसके द्वारा जानने योग्य है और किसको जानना अभीष्ट है, वह वस्तु क्या है—ये सब बातें मैं तुम्हारी जानकारीके लिये संक्षेपसे बतलाता हूँ। आत्मा एक ही है तथापि भेदबुद्धि होनेसे वह अनेक-सा दिखायी देता है। जैसे भँवरी देनेवालेकी दृष्टिमें यह पृथ्वी घूमती हुई-सी प्रतीत होती है, उसी प्रकार भेदबुद्धिसे एक आत्मा भी अनेक-सा प्रतीत होता है। अतः विचारके द्वारा ही आत्माका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। गुरुके मुखसे श्रवणके द्वारा तथा भलीभाँति प्रयोगमें लाये हुए विशेष मननके द्वारा भी आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करना उचित है। इस प्रकार आत्माको जानकर मनुष्य अनायास ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् मायाका जाल है। ममतासे उपलक्षित होनेवाला यह महान् संसार मायामय है। ममताको दूर कर देनेपर बन्धनसे अनायास छुटकारा मिल जाता है। मैं कौन हूँ, तुम कौन हो तथा महामायाके आश्रित रहनेवाले अन्य लोग भी कहाँसे आये हैं? यह सारा प्रपंच बकरीके गलेमें लटकते हुए स्तनकी भाँति निरर्थक है, निष्फल है, प्रकाशहीन है तथा धूमसमूहकी भाँति निस्सार है। इसलिये यमराज! तुम सर्वथा


* यैस्त्यक्तो ममताभावो लोभमोहौ निराकृतौ । ते यान्ति परमं स्थानं कामक्रोधविवर्जिताः ॥
यावत् कामश्च लोभश्च रागद्वेषव्यवस्थितिः । नाप्नुवन्ति परां सिद्धिं शब्दमात्रैकबोधकाः ॥
(स्क० पु०, मा० के० ३१। ६३-६४)

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ७७

प्रयत्न करके आत्म-तत्त्वका चिन्तन करो।

लोमशजी कहते हैं—भगवान् शंकरके इस प्रकार उपदेश देनेपर यमराज ज्ञानवान् होकर उस समय साक्षात् आत्मस्वरूपसे स्थित हुए। वे कर्मसे सबके शासक हैं। सब प्राणियोंको उनके कर्मानुसार दण्ड या पुरस्कार देते हैं। वे अपने चित्तको एकाग्र रखकर सदा सब भूतों तथा मनुष्योंका कल्याण करते हैं।


कार्तिकेयजीकी स्तुति और उनके द्वारा पर्वतोंको वरदान तथा महाराज श्वेतका चरित्र

ऋषियोंने पूछा—सूतजी! महात्मा कुमारने युद्धमें तारकासुरको मारकर फिर कौन-सा महान् अद्भुत कर्म किया? यह बतलाइये।

सूतजी बोले—तारकासुरको मारा गया देख इन्द्रादि सब देवता बहुत प्रसन्न हुए और सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाले कुमार कार्तिकेयकी स्तुति करने लगे।

देवता बोले—कल्याणस्वरूप भगवान् कार्तिकेयको नमस्कार है। शिवनन्दन! आपको नमस्कार है। विश्वबन्धो! आपको नमस्कार है। विश्वभावन! आपको नमस्कार है। जिन्होंने आपका दर्शन कर लिया, वे चाण्डाल भी सर्वश्रेष्ठ हैं। जगद्वन्धो! हम आपको नमस्कार करते हैं। देव! इस समय हम आपकी शरणमें आये हैं।१

देवताओंद्वारा की हुई यह स्तुति सुनकर प्रसन्नतासे भरे हुए पर्वतोंने भी सर्वतोभावेन उन गिरिजाकुमारका स्तवन किया।

पर्वत बोले—भगवन्! आप अनाथोंके नाथ हो। शंकरनन्दन! तुम्हें नमस्कार है। श्रेष्ठ देवताओंद्वारा पूजनीय! तुम्हें नमस्कार है। ज्ञानवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! तुम्हें नमस्कार है। महादानव तारकासुरका विनाश करनेवाले कुमार! तुम्हें नमस्कार है। देववर! तुम्हें नमस्कार है। तुम हमपर प्रसन्न होओ।२

पर्वतोंद्वारा इस प्रकार स्तुति की जानेपर शंकर और पार्वतीके पुत्र एवं वरदाताओंमें श्रेष्ठ स्वामी कार्तिकेय बहुत सन्तुष्ट हुए और उन्हें वर देते हुए बोले—'मेरु आदि समस्त पर्वतगण! आप सब लोग मेरे वन्दनीय और प्रयत्नपूर्वक पूजनीय हैं। तपस्वी, ज्ञानी और कर्मयोगी भी निरन्तर आप लोगोंका सेवन करेंगे। आपलोग मेरे वचनसे सम्पूर्ण जगत्‌को पवित्र कर सकते हैं। पर्वतसम्बन्धी सभी स्थान तीर्थस्वरूप होंगे। आपके ऊपर दिव्य शिवालय, दिव्य मन्दिर, बड़े-बड़े विचित्र गृह तथा दिव्य तपोवन सुशोभित होंगे। इतना ही नहीं, भगवान् शंकरके विशिष्ट स्वरूप तथा विशिष्ट लिंग भी आपके शिखरोंपर विराजमान होंगे। ये जो मेरे नाना पर्वतश्रेष्ठ हिमवान् हैं, आजसे ये महाभाग तपस्वियोंके फलदाता होंगे। ये गिरिराज मेरु पुण्यात्माओंके आश्रय होंगे। गिरिश्रेष्ठ लोकालोक तथा महायशस्वी उदयगिरि—ये दोनों शिवलिंगस्वरूप समझे जायँगे। श्रीशैल, महेन्द्रगिरि, सह्याचल, माल्यवान्, मलयगिरि,


१- नमः कल्याणरूपाय नमस्ते शिवनन्दन। विश्वबन्धो नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वभावन॥
वरिष्ठाः श्वपचा यैस्तु कृतं वै दर्शनं तव। त्वां नमामो जगद्बन्धो त्वां वयं शरणं गताः॥
(स्क० पु०, मा० के० ३१।८१-८२)

२-त्वं नाथोऽसि ह्यनाथानां शङ्करात्मज ते नमः। नमो देववरैः पूज्य नमो ज्ञानविदां वर॥
नमोऽस्तु ते दानववर्यहन्तर्नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद॥
(स्क० पु०, मा० के० ३१।८४-८५)

७८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

विन्ध्याचल, गन्धमादन, श्वेतकूट, त्रिकूट तथा दर्दुर पर्वत—ये और दूसरे भी बहुत-से पर्वत लिंगस्वरूप माने जायँगे और मेरे वचनसे ये सभी पापोंका विनाश करनेवाले होंगे।'

शंकरपुत्र भगवान् कार्तिकेयने इस प्रकार उन सब पर्वतोंको वरदान दिया। जिसके मुखमें सदा ('नमः शिवाय' इस) पंचाक्षर मन्त्रका जप होता रहता है, जिसका चित्त सदा भगवान् शिवके चिन्तनमें संलग्न रहता है, जो सब प्राणियोंके प्रति समभाव रखता है, दूसरोंकी निन्दामें जिसकी वाणी मूक रहती है तथा जो परायी स्त्रियोंके प्रति अपनेमें नपुंसक भाव ही रखता है—ऐसे उपासकपर भगवान् शिवकी विशेष कृपा होती है।

शौनकजी बोले— महाभाव! हमने कुमार कार्तिकेयके विशिष्ट चरित्रका श्रवण किया, जो परम मंगलमय है। अब हम राजाधिराज श्वेतके परम अद्भुत चरित्रके विषयमें जानना चाहते हैं जिन्होंने अपनी भारी शिवभक्तिके प्रभावसे भगवान् शिवको भलीभाँति सन्तुष्ट किया था। जो लोग भक्तिपूर्वक महादेवजीकी आराधना करते हैं, वे ही भक्त हैं, वे ही महात्मा हैं तथा वे ही कर्मयोगी और ज्ञानी हैं।

लोमशजीने कहा— महाभाग महर्षियो! राजा श्वेतका परम अद्भुत चरित्र सुनो। महात्मा श्वेत अपने राज्यमें सब प्रकारके भोग भोगते रहे तो भी उनकी बुद्धि सदा धर्ममें ही संलग्न रहती थी। उन्होंने धर्मके अनुसार प्रजाको प्रसन्न रखते हुए समस्त पृथ्वीका पालन किया। वे ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, शूरवीर तथा निरन्तर शिवजीके भजनमें तत्पर रहनेवाले थे। राजा श्वेत अपनी बढ़ी-चढ़ी शक्तिसे राज्यका शासन और भक्तिभावसे भगवान् शिवकी आराधना करते थे। इस प्रकार परमेश्वरकी आराधना करते-करते महाराज श्वेतकी सारी आयु बीत चली। उनके मनमें न कभी व्यथा हुई और न शरीरमें ही कोई रोग हुआ। ये संसारी उपद्रव महाराज श्वेतको कभी कष्ट नहीं पहुँचाते थे। इनके राज्यमें सब लोग निर्भय रहते थे। किसीको कोई उपद्रव नहीं था। महाराजके राज्यमें बिना जोते-बोये ही अनाज पैदा होता था। ब्राह्मण तपस्यामें संलग्न रहते और दूसरे लोग भी अपने-अपने वर्ण तथा आश्रम-सम्बन्धी धर्मका पालन करते थे। सारी पृथ्वीमें प्रायः सर्वत्र मंगलमय उत्सव ही होता रहता था। भगवान् शिवकी कृपासे महात्मा राजा श्वेतके राज्यमें सब प्रजा सदा मानसिक कष्टसे रहित, आनन्दमग्न तथा सुखी रहती थी। कभी किसीको भी पुत्रकी मृत्यु नहीं देखनी पड़ी, दुःख नहीं उठाना पड़ा, अपमान, महामारी तथा दरिद्रताका कष्ट भी नहीं सहन करना पड़ा। इस प्रकार भगवान् शिवकी पूजामें लगे हुए महात्मा राजा श्वेतके जीवनका बहुत बड़ा समय सफलतापूर्वक बीत गया।

एक दिनकी बात है, राजा श्वेत परमार्थदाता शंकरजीकी आराधनामें लगे थे। उसी समय यमराजने उनके पास अपने दूत भेजे। उन दूतोंको आज्ञा दी कि चित्रगुप्तके कथनानुसार राजा श्वेतकी आयु पूरी हो गयी है, अतः उन्हें शीघ्र ले आओ। 'जो आज्ञा' कहकर दूतोंने उनकी आज्ञा स्वीकार की और राजाको ले जानेकी इच्छासे वे भगवान् शिवके मन्दिरमें आये। उनके हाथोंमें काल-पाश था तथा वे आकृतिसे भी बड़े भयानक थे। यमदूतोंने शीघ्रतापूर्वक वहाँ आकर देखा, महाराज गहरी समाधि लगाये भगवान् शिवके समीप बैठे थे। उन्हें देखकर उनके मनमें ज्यों ही हलचल हुई त्यों ही वे सब दूत चित्रलिखितकी भाँति निश्चेष्ट हो गये। अतः यमदूत धर्मराजकी आज्ञाका पालन न कर सके। यह सब जानकर यमराज स्वयं ही वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने राजाको सहसा ले जानेके लिये अपना दण्ड ऊपरको उठा रखा था। धर्मराजने देखा, महाबाहु श्वेत शिव-भक्तिसे युक्त होकर भगवान् शिवके ही चिन्तनमें तत्पर हैं। केवल ज्ञानका आश्रय ले, शान्तभावसे विराजमान

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * | ७९ ---|---

हैं। राजाको इस रूपमें देखकर यमराजके मनमें भी बड़ी हलचल हुई। वे अत्यन्त व्याकुल होकर सहसा चित्रलिखितकी भाँति हो गये। तदनन्तर प्रजाका विनाश करनेवाले काल भी तत्काल वहाँ आ गये। उन्होंने भी शिवपूजा-परायण राजाको तथा मन्दिरके द्वारपर खड़े हुए दूतोंसहित यमराजको देखा। देखकर यमराजसे पूछा—'धर्मराज ! क्या कारण है जो अभीतक तुम इस राजाको नहीं ले गये। तुम्हारे साथ यमदूत भी हैं, तो भी कुछ डरे हुए-से प्रतीत होते हो।'

तब धर्मराजने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया—यह राजा भगवान् शिवका भक्त है, अतः इसका उल्लंघन करना हमारे लिये अत्यन्त कठिन है। त्रिशूलधारी महादेवजीके भयसे हम यहाँ चित्रलिखित पुतलोंकी भाँति खड़े हैं।

यमराजकी यह बात सुनकर कालदेवता कुपित हो उठे तथा राजाको मारनेके लिये उन्होंने बड़े वेगसे ढाल और तलवार उठायी। उनकी ढाल सूर्यके समान आकृतिवाले आठ फूलोंसे सुशोभित थी। वे क्रोधमें भरकर शिवालयमें घुसे। वहाँ उन्होंने देखा, राजा श्वेत एकाग्रचित्तसे विशुद्ध ज्ञानस्वरूप, चिन्मय, स्वयंप्रकाश परमात्माका चिन्तन कर रहे हैं। ऐसी अवस्थामें उन्हें देखकर काल अहंकारवश ज्यों ही उनके पास जानेको उत्सुक हुए, त्यों ही भक्तवत्सल भगवान् शंकरने अपने भक्तकी रक्षा करते हुए तीसरा नेत्र खोलकर कालकी ओर देखा। उनके देखते ही कालदेव तत्काल जलकर भस्म हो गये। राजा श्वेत जब समाधिसे विरत हुए तब बाह्यज्ञान होनेपर उन्होंने धीरेसे आँखें खोलकर देखा। उस समय वहाँ उनके सामने ही कालदेव अद्भुत रूपसे जल रहे थे। राजाने बार-बार उनकी ओर देखा और भगवान् शंकरसे इस प्रकार प्रार्थना की—'सबके दुःखोंको दूर करनेवाले, शान्तस्वरूप, स्वयंप्रकाश एवं स्वयम्भूरूप आप भगवान् शंकरको नमस्कार है। व्यवधानशून्य, सूक्ष्मस्वरूप तथा ज्योतियोंके अधिपति महादेवजीको नमस्कार है। जगदीश्वर ! आप ही सबके रक्षक हैं, आप ही इस जगत्के पिता, माता, सुहृद्, सखा, बन्धु, स्वजन, स्वामी तथा ईश्वर हैं। शम्भो ! आपने यह क्या किया? किसको मेरे आगे जला दिया? मैं नहीं जानता यह क्या हुआ है और किसने यह बड़ा भारी अद्भुत कार्य कर डाला है?'

इस प्रकार प्रार्थना करते हुए राजा श्वेतका विलाप सुनकर लोक-कल्याणकारी भगवान् शंकरने कहा—'राजन् ! यह काल है; तुम्हारी रक्षाके लिये मैंने इसे जला दिया है।' राजा श्वेतने पूछा—'भगवन् ! इसने ऐसा कौन-सा कुकृत्य किया था, जिससे आपने इसे इस दशाको पहुँचा दिया?' भगवान् शिव बोले—'महाराज ! यह संसारके समस्त प्राणियोंका भक्षक है। इस समय यह क्रूर काल तुम्हें अपना ग्रास बनानेके लिये आया था। अतः बहुत-से जीवोंका कल्याण करनेकी इच्छासे मैंने इसे जला दिया है। क्योंकि जो पापी, अतिशय अधर्मपरायण, लोकविनाशकारी तथा पाखण्डी हैं, वे मेरे वध्य हैं।' भगवान् शिवकी यह बात सुनकर राजा श्वेतने कहा—'भगवन् ! काल आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके ही लोकमें सबको नियन्त्रणमें रखता है। आपहीके आदेशसे यह तीनों लोकोंमें विचरता है। इसके डरसे ही यह संसार सदा पुण्य-कर्मका अनुष्ठान करता है। इसलिये आप कृपा करके फिर शीघ्र ही इसे जीवित कर दें।' तब शिवजीने कालको पुनः जीवित कर दिया। तदनन्तर श्रेष्ठ राजा श्वेतने कालको अपने हृदयसे लगा लिया। इस प्रकार चेतना लौटनेपर कालने भगवान् शंकरकी स्तुति की—'कालका विनाश करनेवाले देवेश्वर ! आप त्रिपुरासुरका संहार करनेवाले हैं। प्रभो ! जगत्पते ! आपने कामदेवको जलाकर उसे अनंग (अंगहीन) बना दिया है; तथा आपहीने अत्यन्त अद्भुत ढंगसे दक्ष-यज्ञका विनाश कर डाला था। महान् लिंगरूपसे आपने तीनों लोकोंको व्याप्त

८०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कर रखा है। सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंने सबको अपनेमें लीन करनेके कारण आपके स्वरूपको लिंग कहा है। देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। विश्वमंगल! आपको नमस्कार है। नीलकण्ठरूपमें आपको नमस्कार है। मस्तकपर जटा-जूट धारण करनेवाले! आपको नमस्कार है। आप कारणोंके भी कारण हैं; आपको नमस्कार है। आप मंगलोंके भी मंगलरूप हैं; आपको नमस्कार है। बुद्धिहीनोंके पालक! आप ज्ञानियोंके लिये ज्ञानात्मा हैं और मनीषी पुरुषोंके लिये परम मनीषी हैं। विश्वके एकमात्र बन्धु महेश्वर! आप आदिदेव हैं, पुराण-पुरुष हैं तथा आप ही सब कुछ हैं। वेदान्तद्वारा आप ही जानने योग्य हैं। आपकी महिमा और प्रभाव महान् है। महानुभाव संत आपके ही नामों और गुणोंका सब ओर कीर्तन करते हैं। महेश! आप ही तीनों लोकोंकी सृष्टि करनेवाले हैं। आप ही इनका पालन और संहार भी करते हैं। आप ही सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी हैं।'

इस प्रकार कालने उस समय जगदीश्वर शिवका स्तवन किया। तदनन्तर राजा श्वेतसे कहा—'राजन्! सम्पूर्ण मनुष्यलोकमें तुमसे बढ़कर दूसरा कोई पुरुष नहीं हैं; क्योंकि तुमने तीनों लोकोंके लिये अजेय मुझ कालको भी जीत लिया। आजसे मैं तुम्हारा अनुगामी हुआ। महादेवजीकी ओरसे मुझे अभयदान करो।'

राजाने कहा—भगवन्! तुम तो साक्षात् शिवके ही एक श्रेष्ठ स्वरूप हो। सम्पूर्ण प्राणियोंका पालन तथा संहार तुम्हारा ही स्वरूप है। तुम्हीं सबके नियन्ता हो। इसलिये तुम मेरे परम पूजनीय हो। आत्मसाक्षात्कारके साधनमें लगे हुए समस्त पुण्यात्मा पुरुष तुमसे ही भय माननेके कारण विविध भावोंसे परमेश्वरकी शरण लेते हैं।

इस प्रकार परम धर्मात्मा राजा श्वेतसे रक्षित होकर कालने भगवान् शिवकी कृपा प्राप्त की और उसे पुनः नवीन चेतना प्राप्त हुई। तब वे कालदेव यमराज, मृत्यु तथा यमदूतोंके साथ भगवान् शिव और महाराज श्वेतको प्रणाम करके अपने निवासस्थानको गये। वहाँ उन्होंने सब दूतोंको बुलाकर कहा—'दूतगण! संसारमें जो लोग विभूतिके द्वारा त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं, मस्तकपर जटा और गलेमें रुद्राक्ष माला रखते हैं, ऐसे लोगोंको तुम कभी मेरे लोकमें न लाना। जो उत्तम भक्तिभावसे भगवान् सदाशिवका पूजन करते हैं, वे साक्षात् रुद्रके ही स्वरूप हैं। जो मस्तकपर एक रुद्राक्ष धारण करते, ललाटमें त्रिपुण्ड्र लगाते तथा जो साधु पुरुष पंचाक्षर मन्त्रका सदा जप करते हैं, वे सब तुम्हारे द्वारा पूजनीय हैं। जिस राष्ट्र, देश अथवा ग्राममें शिव-भक्त नहीं देखा जाता, वह श्मशानसे भी बढ़कर अशुभ है।'

यमराजने भी अपने सेवकोंको ऐसा ही आदेश दिया। भगवान् महेश्वरकी पराभक्तिसे युक्त महाराज श्वेत जब कालसे निर्भय हो गये तब उन्होंने भगवान् शिवका सायुज्य प्राप्त कर लिया। पवित्र बुद्धिवाले ज्ञानीपुरुषोंको भी अनेक जन्मोंके पश्चात् भगवान् शिवकी भक्ति प्राप्त होती है। मनुष्योंको चाहिये कि वे सदैव भगवान् सदाशिवका सेवन, वन्दन और पूजन करें।

~~ o ~~

शिवरात्रिव्रतकी महिमा

लोमशजी कहते हैं—ब्रह्माजीने जब सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की, तब राशियोंसे कालचक्र उत्पन्न हुआ। उस कालचक्रमें सब कार्योंकी सिद्धिके लिये बारह राशियाँ और सत्ताईस नक्षत्र मुख्य हैं। इन बारह राशियों और सत्ताईस नक्षत्रोंके साथ क्रीड़ा करता हुआ कालचक्रसहित काल जगत्को उत्पन्न करता है। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सबको काल ही उत्पन्न करता, वही पालन करता और वही संहार करता है। एकमात्र कालसे ही यह सारा जगत् बँधा हुआ है। अकेला काल ही इस लोकमें

  • माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ८१

बलवान् है, दूसरा नहीं। अतः यह सब प्रपंच कालात्मक है। सबसे पहले काल हुआ। कालसे ही स्वर्गलोकके अधिनायक उत्पन्न हुए। तदनन्तर लोकोंकी उत्पत्ति हुई। उसके बाद त्रुटि हुई। त्रुटिसे लव हुआ। लवसे क्षण हुआ। क्षणसे निमिष हुआ जो प्राणियोंमें निरन्तर देखा जाता है। साठ निमिषका एक पल कहा जाता है। साठ पलोंकी एक घड़ी होती है। साठ घड़ीका एक दिन-रात होता है। पंद्रह दिन-रातका एक पक्ष माना जाता है। दो पक्षका एक मास और बारह महीनोंका एक वर्ष होता है। कालको जाननेकी इच्छा रखनेवाले बुद्धिमान् पुरुषोंको इन सब बातोंका ज्ञान रखना चाहिये। प्रतिपदासे लेकर पूर्णमासीतक पक्ष पूरा होता है। उस दिन पक्ष पूर्ण होनेके कारण ही उसे पूर्णिमा कहते हैं। जिस तिथिको पूर्ण चन्द्रमाका उदय होता है, वह पूर्णमासी देवताओंको प्रिय है तथा जिस तिथिको चन्द्रमा लुप्त हो जाते हैं, उसे विद्वानोंने अमावस्या कहा है। अग्निष्वात्त आदि पितरोंको वह अधिक प्रिय है। ये तीस दिन पुण्यकालसे संयुक्त होते हैं। इनमें जो विशेषता है उसे आपलोग सुनें। योगोंमें व्यतीपात, नक्षत्रोंमें श्रवण, तिथियोंमें अमावस्या और पूर्णिमा तथा संक्रान्ति-काल—ये सब दान-कर्ममें पवित्र माने गये हैं। भगवान् शंकरको अष्टमी प्रिय है। गणेशजीको चतुर्थी, नागराजको पंचमी, कुमार कार्तिकेयको षष्ठी, सूर्यदेवको सप्तमी, दुर्गाजीको नवमी, ब्रह्माजीको दशमी, रुद्रदेवको एकादशी, भगवान् विष्णुको द्वादशी, कामदेवको त्रयोदशी तथा भगवान् शंकरको चतुर्दशी विशेष प्रिय है। कृष्णपक्षमें जो चतुर्दशी अर्धरात्रिव्यापिनी हो, उसमें सबको उपवास करना चाहिये। वह भगवान् शिवका सायुज्य प्रदान करनेवाली है १। वही शिवरात्रिके नामसे विख्यात है। वह सब पापोंका नाश करनेवाली है। इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। पूर्वकालमें कोई विधवा ब्राह्मणी थी, जिसकी प्रकृति बड़ी चंचल थी। वह कामभोगमें आसक्त रहती थी। अतः किसी कामी चाण्डालके साथ उसका सम्बन्ध हो गया। उसके गर्भसे दुरात्मा चाण्डालके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम दुस्सह था। दुस्सह बड़ा ही दुष्टात्मा था। वह सब धर्मोंके विपरीत ही आचरण करता था। महान् पापपूर्ण प्रयोगोंके द्वारा वह सदा नये-नये पाप प्रारम्भ करता था। वह जुआरी, शराबी, चोर, गुरुस्त्रीगामी, वधिक, दुष्टात्मा तथा चाण्डालोचित कर्म करनेवाला था।

एक दिन वह अधर्मी मनमें कोई बुरी वृत्ति लेकर ही किसी शिवालयमें गया। उस दिन शिवरात्रि थी। वह रातमें भगवान् शिवके पास उपवासपूर्वक रहा और वहाँ पास ही दैवात् होती हुई शैवशास्त्रकी कथा सुनता रहा। वहाँ उसे लिंगस्वरूप भगवान् शिवका दर्शन हुआ। दुष्ट होते हुए भी उसने एक रात व्रत किया और शिवरात्रिमें जागता रहा। उसी शुभ कर्मके परिणामसे उसने पुण्ययोनि प्राप्त करके बहुत वर्षोंतक पुण्यात्माओंके लोकमें सुख-भोग किया। तदनन्तर वह राजा चित्रांगदका पुत्र हुआ। उसमें राजराजेश्वरोंके लक्षण थे। वहाँ वह विचित्रवीर्य २ के नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसका रूप सुन्दर था। उसे सुन्दरी स्त्रियाँ प्यार करती थीं। उसने बहुत बड़ा राज्य प्राप्त करके भी अपने मनमें अहंकार नहीं आने दिया। भगवान् शिवकी भक्ति करते हुए वह सदा शिवधर्मके पालनमें ही तत्पर रहा। शिवसम्बन्धी शास्त्रोंको मान्यता देकर वह उन्हींके अनुसार शिवकी पूजा किया करता था। भगवान् शिवके समीप यत्नपूर्वक रात्रिमें जागरण


१- निशीथसंयुता या तु कृष्णपक्षे चतुर्दशी। उपोष्या सा तिथिः सर्वैः शिवसायुज्यकारिका॥
(स्क० पु०, मा० के० ३३।९२)
२- यह विचित्रवीर्य शान्तनुपुत्र नहीं है; क्योंकि यह तो शिवसायुज्य होकर वीरभद्र नामसे भगवान् शिवका गण हुआ और इसने दक्ष-यज्ञका विध्वंस किया जो कि शान्तनुसे बहुत पहलेकी बात है।

२. माहेश्वरखण्ड (कौमारिकाखण्ड)

८२

  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करके भगवान् शिवकी गाथाका गान करता और रोमांचित होकर नेत्रोंसे आनन्दके अश्रुकण बहाया करता था। भगवान् शिवकी कथा सुननेसे उसमें प्रेमके सभी लक्षण प्रकट हो जाते थे। उसे देवाधिदेव शिवकी प्रेमलक्षणा-भक्ति प्राप्त हुई। भगवान् शिवके ध्यानमें निरन्तर संलग्न रहनेके कारण उसकी सारी आयु व्रतमें ही बीती।

भगवान् शिव इस संसारमें पशुओं (अज्ञानियों) तथा ज्ञानीजनोंको समान रूपसे सुलभ हैं। अतः सुखकी प्राप्तिके लिये एकमात्र सदाशिवका ही सेवन करना चाहिये। शिवरात्रिके उपवाससे राजाको उत्तम ज्ञान प्राप्त हुआ। उस ज्ञानसे सब प्राणियोंमें निरन्तर समभावका अनुभव हुआ। फिर, एकमात्र भगवान् सदाशिव ही सब भूतोंके आत्मारूप हैं, इस ज्ञानका साक्षात्कार हुआ। तत्पश्चात् यह अनुभव हुआ कि इस संसारमें कहीं कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जो भगवान् शिवसे रहित हो। इस प्रकार उन्होंने अत्यन्त दुर्लभ एवं पूर्ण प्रपंचातीत ज्ञान प्राप्त कर लिया। वह ज्ञान विज्ञ पुरुषोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है, फिर औरोंकी तो बात ही क्या है। राजा विचित्रवीर्य वह ज्ञान प्राप्त करके भगवान् शिवके अत्यन्त प्रिय भक्त हो गये। शिवरात्रिके उपवाससे उन्होंने सायुज्य मुक्ति प्राप्त कर ली। उसी पुण्यके प्रभावसे उन्होंने शिवजीकी लीलामें योग देनेके लिये शिवजीसे ही दिव्य जन्म प्राप्त किया। दक्ष-कन्या सतीसे जब शिवजीका वियोग हुआ तब उनके जटा फटकारनेके शब्दसे उन्हींके मस्तकसे जो वीरभद्र नामक वीर उत्पन्न हुआ, वह राजा विचित्रवीर्य ही है। वही दक्ष-यज्ञका विनाश करनेवाला हुआ।

इसी प्रकार अन्य बहुत-से मनुष्य भी शिवरात्रि-व्रतके प्रभावसे पूर्वकालमें सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं। राजा भरत आदि तथा मान्धाता, धुन्धुमार और हरिश्चन्द्र आदि नरेश भी इस (विचित्रवीर्यद्वारा किये हुए ) उत्तम शिवरात्रि-व्रतका अनुष्ठान करके ही सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। इन सबके अतिरिक्त भी बहुत-से कुल इस श्रेष्ठ व्रतके द्वारा तारे गये हैं, जिनकी गणना या वर्णन करना असम्भव है।

देवाधिदेव जगदीश्वर शिवने अपने वीरभद्र आदि असंख्य गणोंके साथ कैलासमें राज्य किया है। वहाँ भगवान् रुद्रके साथ ऋषि और इन्द्रादि देवता भी सेवामें उपस्थित रहते हैं। ब्रह्माजी उनकी स्तुति करते रहते हैं। भगवान् विष्णु आज्ञापालक सेवककी भाँति खड़े होते हैं। इन्द्र सब देवताओंके साथ सेवा-धर्मका पालन करते हैं। चन्द्रमा भगवान्‌के मस्तकपर छत्र धारण करते हैं और वायुदेव चँवर डुलाते हैं। साक्षात् अग्निदेव ही सदा उनके रसोइया बने रहते हैं। स्वर्गवासी गन्धर्व उनके दरबारमें गीत गाते और स्तुति-पाठ करते हैं। इस प्रकार भगवान् महेश्वर कैलास पर्वतपर अपने प्रतापी पुत्र गणेश और कार्तिकेय आदिके साथ तथा महारानी गिरिराजनन्दिनी उमाके साथ महान् पराक्रमका परिचय देते हुए राज्य करते हैं।

~~ ० ~~

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ८३

कुमारिकाखण्ड

पञ्चाप्सरस तीर्थमें अर्जुनद्वारा अप्सराओंका उद्धार

मुनियोंने पूछा—विशाल नेत्रोंवाले सूतजी! दक्षिण समुद्रके तटोंपर जो पाँच तीर्थ हैं, उनका वर्णन कीजिये; क्योंकि मुनिलोग उन तीर्थोंकी अधिक चर्चा करते हैं।

उग्रश्रवा बोले—मुनिवरो ! इस विषयमें पहले नारदजीने जो अर्जुनकी आश्चर्यमयी कथा कही है, उसे मैं आपलोगोंसे विस्तारपूर्वक कहूँगा। पूर्वकालकी बात है, कुछ कारणवश अर्जुन (बारह वर्षोंतक तीर्थयात्राके लिये निकले थे, वे) मणिपुर होते हुए दक्षिण समुद्रके तटपर वहाँके पाँच तीर्थोंमें स्नान करनेके लिये आये। ये तीर्थ वे ही हैं जिन्हें उस समय भयके मारे तपस्वीलोग स्वयं भी छोड़ चुके थे और दूसरोंको भी वहाँ जानेसे मना करते थे। उनमें पहला 'कुमारेश' तीर्थ है, जो मुनियोंको प्रिय है। दूसरा 'स्तम्भेश' तीर्थ है, जो सौभद्र मुनिको प्रिय है। तीसरा 'वक्त्रेश्वर' तीर्थ है, जो इन्द्रपत्नी शचीको प्रिय लगता है और बहुत उत्तम है। चौथा 'महाकालेश्वर' तीर्थ है, जो राजा करन्धमको अधिक प्रिय है। इसी प्रकार पाँचवाँ 'सिद्धेश' नामक तीर्थ है, जो महर्षि भारद्वाजको विशेष प्रिय है। कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने इन पाँचों तीर्थोंका दर्शन किया, जिन्हें तपस्वियोंने त्याग दिया था। वास्तवमें वे पाँचों तीर्थ महान् पुण्यके जनक थे। अर्जुनने नारद आदि महामुनियोंका दर्शन करके उनसे पूछा—'महात्माओ ! ये तीर्थ तो बड़े ही सुन्दर और अद्भुत प्रभावसे युक्त हैं, तो भी ब्रह्मवादी मुनियोंने सदाके लिये इनका परित्याग क्यों कर दिया है?'

तपस्वी बोले—कुरुनन्दन ! इन तीर्थोंमें पाँच ग्राह निवास करते हैं, जो तपस्वी मुनियोंको जलमें खींच ले जाते हैं। इसीलिये ये तीर्थ त्याग दिये गये हैं।

यह सुनकर महाबाहु अर्जुनने समुद्रके तटपर उन तीर्थोंमें जानेका विचार किया। तब उनसे तपस्वी महात्माओंने कहा—'अर्जुन ! वहाँ तुम्हें नहीं जाना चाहिये। ग्राहोंने बहुतेरे राजाओं और मुनियोंको मार डाला है। तुम तो बारह वर्षतक अनेक तीर्थोंमें स्नान कर चुके होगे। फिर इन पाँच तीर्थोंसे तुम्हें क्या लेना है? दीपशिखापर जल मरनेवाले पतंगोंकी भाँति इन तीर्थोंमें प्राण देनेके लिये न जाओ।'

अर्जुनने कहा—मुनिवरो ! आपलोगोंका दयालु स्वभाव है, आपने जो सार बात बतायी है, वह ठीक है; तथापि अपनी ओरसे मैं सेवामें कुछ निवेदन करता हूँ। जो मनुष्य धर्माचरणकी इच्छासे कहीं जाता हो, उसे मना करना महात्माओंके लिये भी उचित नहीं है। जीवन बिजलीकी चमकके समान क्षणभंगुर है। वह यदि धर्म-पालनके लिये चला जाता (नष्ट हो जाता) है, तो जाय, इसमें क्या दोष है? जिनके जीवन, धन, स्त्री, पुत्र, खेत और घर धर्मके काममें चले जाते हैं, वे ही इस पृथ्वीपर मनुष्य कहलानेके अधिकारी हैं।*


* यज्जीवितं चाचिरांशुसमानं क्षणभङ्गुरम्। तच्चेद्धर्मकृते याति यातु दोषोऽस्ति को ननु ॥
जीवितं च धनं दारा पुत्राः क्षेत्रं गृहाणि च। याति येषां धर्मकृते त एव भुवि मानवाः ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० १ । २१-२२)

८४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तपस्वी बोले— पार्थ! इस प्रकार धर्माचरण करते हुए तुम्हारी आयु बड़ी हो और धर्ममें तुम्हारा अनुराग निरन्तर बना रहे। जाओ, अपना मनोरथ सिद्ध करो।

मुनियोंके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उन सबको प्रणाम किया और आशीर्वाद ले सौभद्र महर्षिके उत्तम तीर्थमें जाकर स्नान किया। इसी समय जलके भीतर रहनेवाले महान् ग्राहने नरश्रेष्ठ अर्जुनको पकड़ लिया। महाबाहु अर्जुन बलवानोंमें श्रेष्ठ थे। वे जोर-जोरसे फड़कते हुए उस जलचर जीवको बलपूर्वक लिये-दिये जलसे बाहर निकल आये। ज्यों ही उसे खींचकर वे बाहर लाये, वह ग्राह समस्त आभूषणोंसे विभूषित कल्याणमयी नारीके रूपमें परिणत हो गया। उसका रूप दिव्य था। वह मनको मोह लेनेवाली थी। उस समय अर्जुनने उससे पूछा—'कल्याणी! तुम कौन हो? जलमें विचरनेवाली मकरीका रूप तुम्हें कैसे मिला? ऐसा महान् पाप तुमने क्यों किया?'

नारी बोली— कुन्तीनन्दन! मैं देवताओंके नन्दनवनमें निवास करनेवाली अप्सरा हूँ। मेरा नाम वर्चा है। यहाँ मेरी चार सखियाँ और हैं। वे सभी सुन्दरी तथा इच्छानुसार गमन करनेवाली हैं। एक दिन उन सबको साथ लेकर मैं देवराज इन्द्रके भवनसे चली और एक वनमें पहुँचकर मैंने देखा, कोई ब्राह्मण देवता अकेले एकान्तमें बैठकर स्वाध्याय कर रहे हैं। उनका रूप बड़ा सुन्दर है। वीरवर! उनकी तपस्याके तेजसे वह सारा वन प्रकाशित हो रहा था। वे सूर्यकी भाँति उस समस्त प्रदेशको आलोकित कर रहे थे। उन्हें देखकर उनकी तपस्यामें विघ्न डालनेकी इच्छासे मैं वहाँ उतर गयी। मैं, सौरभेयी, सामेयी, बुद्बुदा और लता सब एक ही साथ उन ब्राह्मण देवताके समीप पहुँचीं तथा गाती और खेलती हुई उन्हें लुभानेकी चेष्टा करने लगीं। वीर! यह सब करनेपर भी उन्होंने अपना मन हमारी ओर नहीं आने दिया। वे महातेजस्वी ब्राह्मण निर्मल तपस्यामें स्थित थे। हमारी अनुचित चेष्टाओंसे कुपित होकर उन्होंने हम सबको शाप दे दिया—'अरी! तुम सब लोग सौ वर्षोंतक जलके भीतर ग्राह बनकर रहो।'

यह शाप सुनकर हमलोग अत्यन्त व्यथित हो उठीं और उन्हीं तपस्वी ब्राह्मणकी शरणमें गयीं। हमने प्रार्थनापूर्वक कहा—'विप्रवर! हम सबने बड़ा अनुचित किया है; फिर भी आप हमारे अपराधको क्षमा कर देने योग्य हैं। मुने! आप धर्मज्ञ हैं, ब्राह्मण सब प्राणियोंके प्रति मित्र-भाव रखनेवाला बताया गया है। मनीषी महात्माओंका यह वचन सत्य हो। साधुपुरुष शरणागतोंकी रक्षा करते हैं। हम सब आपकी शरणमें आयी हैं; अतः कृपापूर्वक हमें क्षमा कर दें।'

सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी वे धर्मात्मा ब्राह्मण सदा कल्याणमय कर्म करनेवाले थे। अप्सराओंके प्रार्थना करनेपर उन्होंने उनपर कृपा की और इस प्रकार कहा—'देवियो! यदि लोग अपने सिरपर खड़ी हुई मृत्युको देख लें तो उन्हें भोजन भी न रुचे, फिर पापमें प्रवृत्ति तो हो ही कैसे सकती है? अहो! सब रत्नोंसे बढ़कर अत्यन्त दुर्लभ इस मनुष्य-जन्मको पाकर स्त्रियोंके मोहमें फँसे हुए कुछ नीच मनुष्य इसे तिनकेके समान गँवा देते हैं। यह कितने आश्चर्यकी बात है।* हम पूछते हैं, तुमलोगोंका जन्म किसलिये हुआ


* मस्तकस्थापिनं मृत्युं यदि पश्येदयं जनः। आहारोऽपि न रोचेत किमुताकार्यकारिता॥
अहो मानुष्यकं जन्म सर्वरत्नसुदुर्लभम्। तृणवत् क्रियते कैश्चिद् योषिन्मूढैर्नराधमैः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० १।४९-५०)

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ८५

है अथवा उससे क्या लाभ है। अपने मनमें विचार करके इसका उत्तर दो। हम स्त्रियोंकी निन्दा नहीं करते, जिनसे सबका जन्म होता है। केवल उन पुरुषोंकी निन्दा करते हैं, जो स्त्रियोंके प्रति उच्छृंखल हैं, मर्यादाका उल्लंघन करके उनके प्रति आसक्त हैं। ब्रह्माजीने संसारकी सृष्टि बढ़ानेके लिये स्त्री-पुरुषके जोड़ेका निर्माण किया है। अतः इसी भावसे स्त्री-पुरुषोंको मिथुन-धर्मका पालन करना चाहिये। इसमें कोई दोष नहीं है। परंतु इतना ध्यान रखना चाहिये कि जो नारी अपने बन्धु-बान्धवोंद्वारा ब्राह्मण और अग्निके समीप शास्त्रीय विधिसे अपनेको दी गयी हो, उसीके साथ सदा गृहस्थ-धर्मका पालन करना श्रेष्ठ माना गया है। इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक शास्त्र-मर्यादाके अनुकूल चलाया जानेवाला अपना गार्हस्थ्य उत्तम तथा महान् गुणकारक हो सकता है। जो गृहस्थी शास्त्र-मर्यादाके अनुसार नहीं चलायी जाती, वह दोषका कारण भी हो सकती है। पाँच मुखोंवाले नगरमें, जिसके द्वारोंपर ग्यारह योद्धा पहरा देते हैं, जो पुरुष अपनी स्त्री और अनेक सन्तानोंके साथ मौजूद है, वह अचेतन कैसे हो जाता है। स्त्रीके साथ संयोग इसलिये किया जाता है कि उससे पुत्र उत्पन्न होकर पंचयज्ञ आदि कर्मोंद्वारा सम्पूर्ण विश्वका उपकार कर सके, किंतु हाय! मूढ़ मनुष्य उस पवित्र संयोगको किसी और ही भावसे ग्रहण करते हैं। छः धातुओंका सारभूत जो वीर्य है उसे अपने समान वर्णवाली स्त्रीको छोड़कर अन्य किसी निन्दित योनिमें यदि कोई छोड़ता है, तो उसके लिये यमराजने ऐसा कहा है—पहले तो वह अन्नका द्रोही है, फिर आत्माका द्रोही है, फिर पितरोंका द्रोही है तथा अन्ततोगत्वा सम्पूर्ण विश्वका द्रोही है। ऐसा पुरुष अनन्तकालतक अन्धकारपूर्ण नरकमें पड़ा रहता है। देवता, पितर, ऋषि, मनुष्य (अतिथि) तथा सम्पूर्ण भूत (प्राणी) मनुष्यके सहारे जीविका चलाते हैं। अतः प्रत्येक मनुष्यको उचित है कि वह इन पाँचोंका उपकार करनेके लिये सदा उद्यत रहे। जो मन, वाणी, जिह्वा, हाथ और कानको अपने वशमें करके जितेन्द्रिय हो गया है, उसे हंसतीर्थ कहते हैं। उससे भिन्न जो अजितेन्द्रिय पुरुष हैं, वे सब काकतीर्थ हैं। जो तमोगुणी मनुष्य काकवत् आचरण करनेवाले मनुष्यमें (काकतीर्थमें) हंसबुद्धिसे रमण करते हैं, उनसे देवताओंका क्या प्रयोजन है? यह ध्यान देकर सोचनेकी बात है। इस प्रकार संसारका जो निर्माण हुआ है, उसे हृदयके भीतर स्मरण रखनेवाले पुरुषका मन त्रिलोकीका राज्य पानेके लिये भी कैसे पापमें प्रवृत्त हो सकता है। अप्सराओ! अन्यान्य मनुष्योंके कर्मोंका जो यह शास्त्रद्वारा ज्ञात होनेवाला परिणाम है, उसे मैंने यमलोकमें प्रत्यक्ष देखा है। फिर मुझे कैसे मोह हो? तुमलोग वनमें जलके भीतर ग्राह होकर रहोगी और उसमें स्नानके लिये आनेवाले पुरुषोंको पकड़ोगी। कुछ वर्षोंतक इस जीवनमें रह लेनेके पश्चात् जब कोई श्रेष्ठ पुरुष तुम्हें जलसे बाहर स्थलपर खींच ले जायगा, तब तुम पुनः अपना यह स्वरूप प्राप्त कर लोगी। मैंने पहले कभी हँसीमें भी झूठ बात नहीं कही है। जैसे निन्दित पेय पदार्थको पीने अथवा अशुद्ध वस्तुके छूनेकी शुद्धि प्रायश्चित्तसे होती है, उसी प्रकार इस शापको भोग लेनेसे ही तुम्हारी उत्तम शुद्धि हो सकती है।'

**स्त्री बोली—**तदनन्तर उन ब्राह्मण देवताको प्रणाम करके हमने उनकी परिक्रमा की और उस स्थानसे दूर हटकर अत्यन्त दुःखित हो, हम बड़ी चिन्तामें पड़ गयीं। सोचने लगीं, 'किस उपायसे थोड़े ही समयमें हम सब उस मनुष्यके समीप जा सकती हैं, जो पुनः हमें अपने स्वरूपकी प्राप्ति करा देगा।' दो घड़ीतक इस प्रकार चिन्ता करनेके पश्चात् हम बड़भागिनी स्त्रियोंने वहाँ स्वतः आये हुए देवर्षि नारदजीको देखा। तब उन्हें प्रणाम करके उदास

८६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


मुखसे हमलोग खड़ी हो गयीं। नारदजीने हमारे दुःखका कारण पूछा। उनके पूछनेपर हमने सब वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों कह सुनाया। सुनकर वे इस प्रकार बोले—'दक्षिणमें समुद्रके किनारे जो परम पवित्र और सुन्दर पाँच तीर्थ हैं, वहीं तुम सब लोग शीघ्र चली जाओ। वहाँ शुद्ध चित्तवाले नरश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन अर्जुन तुम सबको इस दुःखसे छुटकारा दिलायेंगे।' वीरवर! देवर्षि नारदजीकी वह बात सुनकर हम सब सखियाँ यहीं आ गयी थीं। अब तुम उनकी बात सत्य करनेयोग्य हो। तुम्हारे-जैसे साधुपुरुषोंका जन्म दीन-दुःखियोंकी भलाई करनेके लिये ही होता है।

वर्चाकी यह बात सुनकर पाण्डुकुमार अर्जुनने बारी-बारीसे सब तीर्थोंमें स्नान किया और ग्राह बनी हुई सब अप्सराओंका कृपापूर्वक उद्धार कर दिया। तदनन्तर वे सब अप्सराएँ वीर अर्जुनको प्रणाम कर तथा उन्हें अनेकानेक आशीर्वाद देकर आकाशमें उड़ गयीं।


## सारस्वत-कात्यायन-संवाद—दान और त्यागकी महिमा

**उग्रश्रवा मुनि बोले—** तदनन्तर अर्जुनने ब्राह्मणों-से घिरे हुए देवपूजित नारदजीके समीप जाकर सबको पृथक्-पृथक् प्रणाम किया। तब नारदजीने उनसे कहा—'धनंजय! तुम्हें शत्रुओंपर विजय प्राप्त हो। तुम्हारी बुद्धि धर्म, देवता और ब्राह्मणोंकी सेवामें लगे। वीर! बारह वर्षकी यह लंबी यात्रा करते समय तुम्हें कोई कष्ट तो नहीं हुआ? जिसके हाथ, पैर और मन भलीभाँति संयममें हों तथा जिसकी सभी क्रियाएँ निर्विकार भावसे सम्पन्न होती हों, वही तीर्थका पूरा फल प्राप्त करता है।\* यह बात तुम्हें अपने हृदयमें धारण करनी चाहिये। तात! हम तुमसे क्या कहें? धर्मराज युधिष्ठिर जिसके भाई और भगवान् श्रीकृष्ण जिसके मित्र हैं, उसे कोई क्या शिक्षा दे सकता है? तथापि यह उचित है कि ब्राह्मणोंद्वारा मनुष्योंको शिक्षा मिले। भगवान् विष्णुने हमें धर्मगुरुके पदपर स्थापित किया है। ब्राह्मणोंके प्रति श्रीहरिने जो उद्गार प्रकट किया है, उसे सुनो—'जिसके सुधाके समान निर्मल यशको सुनना—उसमें गोते लगाना, चाण्डालपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्‌को तत्काल पवित्र कर देता है, वह मैं विष्णु जो विकुण्ठ नामसे प्रसिद्ध हूँ; मुझे यह परम पवित्र कीर्ति आप-जैसे उत्तम ब्राह्मणोंसे ही प्राप्त हुई है। अतः यदि मेरी यह बाँह भी आपलोगोंके प्रतिकूल चले तो मैं इसे काट डालूँगा; फिर औरोंकी तो बात ही क्या है?' कुन्तीनन्दन! मैं तुम्हें कुछ प्रिय समाचार सुनाता हूँ। तुम जिनकी कुशल चाहते हो, वे यदुवंशी और पाण्डव सब कुशलसे हैं। इस समय राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे भीमसेनने राजा वीरवर्माको मार डाला है, जो कौरवोंको सदा सन्ताप पहुँचाता

---

\* यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम्। निर्विकाराः क्रियाः सर्वाः स तीर्थफलमश्नुते॥  
(स्क० पु०, मा० कुमा० २।६)

ब्राह्मणोंसे घिरे हुए देवर्षि नारदजीके साथ अर्जुनका संवाद

८८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

था। जैसे पहले राजा बलि अत्यन्त बलवान् और अजेय थे, उसी प्रकार राजा वीरवर्मा भी समस्त राजाओंके लिये अजेय हो गया था।'

नारदजीकी कही हुई ये सब बातें सुनकर अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोले—'मुने! जो ब्राह्मणोंकी इच्छाके अनुसार चलते और ब्राह्मणोंका सदा समादर करते हैं, वे अकुशली कैसे हो सकते हैं? मैं सदा संयम-नियमसे रहकर तीर्थोंमें विचरता हुआ इस तीर्थमें आया हूँ। इससे मेरे हृदयमें बड़ा आनन्द है। तीर्थोंका दर्शन धन्य है! उनमें स्नान करनेका महत्त्व दर्शनसे भी अधिक है, तथा उनके माहात्म्यको सुनना दर्शन और स्नानसे भी बढ़कर है। ऐसा और्व मुनिका कथन है।^१ अतः मैं इस तीर्थके गुणोंका वर्णन सुनना चाहता हूँ।'

नारदजीने कहा—कुन्तीनन्दन! तुम स्वयं गुणी हो, इसलिये गुणोंको पूछते हो। यह तुम्हारे लिये सर्वथा उचित ही है। गुणी पुरुषोंमें ही धर्मसे उत्पन्न होनेवाले गुणोंको सुननेकी इच्छा होनी सम्भव है। साधुपुरुषोंकी आयु प्रतिदिन धर्मकी बातें सुनने तथा धर्म और ईश्वरके कीर्तन करनेमें ही बीतती है। परंतु पापात्मा पुरुषोंकी आयु सदा बुरी चर्चाएँ करनेमें ही व्यर्थ नष्ट होती है^२। इसलिये मैं इस तीर्थके जो बहुत-से गुण हैं, उनका वर्णन करूँगा। अर्जुन! पहलेकी बात है, मैं कपिलजीके पीछे-पीछे तीनों लोकोंमें विचरता हुआ एक दिन ब्रह्मलोकमें गया। वहाँ मैंने लोकपितामह ब्रह्माजीका दर्शन किया और उन्हें प्रणाम करके कपिलदेवजीके साथ प्रसन्नतापूर्वक बैठा। ब्रह्माजीने स्नेहपूर्ण दृष्टिसे मेरी ओर देखकर ही मानो मेरा स्वागत किया था। इसी समय वहाँ कुछ ब्राह्मण पधारे, जो सदा जगत् स्थिति देखनेके लिये लोकहितके उद्देश्यसे भ्रमण करते रहते हैं। वे भी जब प्रणाम करके बैठ गये, तब पितामहने अपनी अमृतमयी दृष्टिसे देखकर उन्हें आनन्दमग्न करते हुए पूछा—'ब्राह्मणो! तुमने कहाँ-कहाँ भ्रमण किया है? क्या-क्या देखा अथवा सुना है? यदि कहीं कोई अद्भुत बात हो तो बताओ।' उनके इस प्रकार पूछनेपर वे सुश्रवा नामवाले ब्राह्मण ब्रह्माजीको मस्तक झुकाकर इस प्रकार बोले—'भगवन्! सर्वज्ञ प्रभुके सामने किसी बातका विज्ञापन करना वैसा ही है, जैसा सूर्यके आगे दीपक दिखाना। फिर भी पुण्यके लिये आपने हमें कुछ कहनेकी आज्ञा दी है, इसलिये अवश्य कुछ निवेदन करना उचित है। कात्यायन नामके एक मुनि थे, जिन्होंने बहुत-से धर्मोंका श्रवण करके उनका सारतत्त्व जाननेकी इच्छासे एक अँगूठेके बलपर खड़े हो सौ वर्षोंतक तपस्या की। तदनन्तर दिव्य आकाशवाणी हुई—'कात्यायन! तुम परम पवित्र सरस्वती नदीके तटपर जाकर सारस्वत मुनिसे पूछो। सारस्वत मुनि धर्मके तत्त्वको जाननेवाले हैं। वे तुम्हें सारभूत धर्मका उपदेश करेंगे।'

'यह सुनकर मुनिवर कात्यायन मुनिश्रेष्ठ सारस्वतके पास गये और भूमिपर मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम करके अपने मनकी शंका इस प्रकार पूछने लगे—'महर्षे! कोई सत्यकी प्रशंसा करते हैं, कुछ लोग तप और शौचाचारकी महिमा गाते हैं, कोई सांख्य (ज्ञान)-की सराहना करते हैं, कुछ अन्य लोग योगको महत्त्व देते हैं, कोई क्षमाको श्रेष्ठ बतलाते हैं, कोई इन्द्रिय-संयम और सरलताको तो कोई मौनको सर्वश्रेष्ठ कहते हैं, कोई शास्त्रोंके स्वाध्यायकी तो कोई सम्यक्


१-तीर्थानां दर्शनं धन्यमवगाहस्ततोऽधिकः। माहात्म्यश्रवणं तस्मादित्योर्वो मुनिरब्रवीत्॥
(स्क०पु०, मा० कुमा० २। १७)
२-साधूनां धर्मश्रवणैः कीर्तनैर्याति चान्वहम्। पापानामसदालापैरायुर्याति वृथात्ययम्॥
(स्क०पु०, मा० कुमा० २। २१)

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ८९

ज्ञानकी प्रशंसा करते हैं, कोई वैराग्यको उत्तम बताते हैं तो कुछ लोग अग्निष्टोम आदि यज्ञ-कर्मको श्रेष्ठ मानते हैं और दूसरे लोग मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णमें समभाव रखते हुए आत्मज्ञानको ही सबसे उत्तम समझते हैं। कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें प्रायः लोककी यही स्थिति है। अतः सबसे श्रेष्ठ क्या है? यह विचार करनेवाले मनुष्य बहुधा मोहको ही प्राप्त होते हैं। मुने! आप सर्वज्ञ हैं, ऊपर बताये हुए कार्योंमें जो सर्वोत्तम, महात्मा पुरुषोंके द्वारा भी अनुष्ठान करने योग्य तथा सब पुरुषार्थोंका साधक हो, वह मुझे बतानेकी कृपा करें।'

सारस्वत बोले-ब्रह्मन्! माता सरस्वती ने मुझे जो कुछ बतलाया है, उसके अनुसार मैं सारतत्त्वका वर्णन करूँगा, सुनो। यह सम्पूर्ण जगत् छायाकी भाँति उत्पत्ति और विनाशरूप धर्मसे युक्त है। धन, यौवन और भोग जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाकी भाँति चंचल हैं। यह जानकर और इसपर भलीभाँति विचार करके भगवान् शंकरकी शरणमें जाना चाहिये और दान भी करना चाहिये। किसी भी मनुष्यको कदापि पाप नहीं करना चाहिये, यह वेदकी आज्ञा है। श्रुति यह भी कहती है कि महादेवजीका भक्त जन्म और मृत्युके बन्धनमें नहीं पड़ता। पूर्वकालमें सावर्णि मुनिने जो दो गाथाएँ गान की हैं, उन्हें सुनो—'भगवान् धर्मका नाम वृष है। वे ही जिनके वाहन हैं, उन महादेवजीकी यदि पूजा की जाती है, तो वही सबसे महान् धर्म कहा गया है। जिसमें दुःखरूपी भँवर उठता है, अज्ञानमय प्रवाह बहता रहता है, धर्म और अधर्म ही जिसके जल हैं, जो क्रोधरूपी कीचड़से युक्त है, जिसमें मदरूपी ग्राह निवास करता है, जहाँ लोभरूपी बुलबुले उठते रहते हैं, अभिमान ही जिसकी पातालतक पहुँचनेवाली गहराई है, सत्त्वगुणरूपी जहाज जिसकी शोभा बढ़ाता है, ऐसे संसारसमुद्रमें डूबनेवाले जीवोंको केवल भगवान् शंकर ही पार लगाते हैं। दान, सदाचार, व्रत, सत्य और प्रिय वचन, उत्तम कीर्ति, धर्मपालन तथा आयुपर्यन्त दूसरोंका उपकार—इन सार वस्तुओंका इस असार शरीरसे उपार्जन करना चाहिये। राग हो तो धर्ममें, चिन्ता हो तो शास्त्रकी, व्यसन हो तो दानका—ये सभी बातें उत्तम हैं। इन सबके साथ यदि विषयोंके प्रति वैराग्य हो जाय तो समझना चाहिये, मैंने जन्मका फल पा लिया।* इस भारतवर्षमें मनुष्यका शरीर, जो सदा टिकनेवाला नहीं है, पाकर जो अपना कल्याण नहीं कर लेता, उसने दीर्घकालतकके लिये अपने आत्माको धोखेमें डाल दिया। देवता और असुर सबके लिये मनुष्य-योनिमें जन्म लेनेका सौभाग्य अत्यन्त दुर्लभ है। उसे पाकर ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे नरकमें न जाना पड़े। यह मानव-शरीर सर्वस्वसाधनका मूल है तथा सब पुरुषार्थोंको सिद्ध करनेवाला है। यदि तुम सदा लाभ उठानेके ही प्रयासमें रहते हो, तो इस मूलकी यत्नपूर्वक रक्षा करो। महान् पुण्यरूपी मूल्य देकर तुम्हारे द्वारा यह मानव-शरीररूपी नौका इसलिये खरीदी जाती है कि इसके द्वारा दुःखरूपी समुद्रके पार पहुँचा जा सके। जबतक यह नौका छिन्न-भिन्न नहीं हो जाती, तबतक ही तुम इसके द्वारा संसार-समुद्रको पार कर लो। जो नीरोग मानवशरीररूपी दुर्लभ वस्तुको पाकर भी उसके द्वारा संसारसागरके पार नहीं हो जाता, वह नीच मनुष्य आत्महत्यारा है। इसी शरीरमें रहकर यतिजन परलोकके लिये तप करते हैं, यज्ञकर्ता होम करते हैं और दाता पुरुष आदरपूर्वक दान देते हैं।'

कात्यायनने पूछा—सारस्वतजी! दान और


* दानं वृत्तं व्रतं वाचः कीर्तिर्धर्मस्तथायुषः। परोपकरणं कायादसारात् सारमुद्धरेत् ॥
धर्मे रागः श्रुतौ चिन्ता दाने व्यसनमुत्तमम्। इन्द्रियार्थेषु वैराग्यं सम्प्राप्तं जन्मनः फलम् ॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० २। ४७-४८)

९०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तपस्यामें कौन दुष्कर है तथा कौन परलोकमें महान् फल देनेवाला है; यह बतलाइये।

सारस्वतने कहा—मुने! इस पृथ्वीपर दानसे बढ़कर अत्यन्त दुष्कर कोई कार्य नहीं है। यह प्रत्यक्ष देखा जाता है। सभी लोग इसके साक्षी हैं। मनुष्य धनके लिये महान् लोभ होनेके कारण अपने प्यारे प्राणोंका भी मोह छोड़कर महाभयंकर समुद्र, जंगल और पहाड़ोंमें प्रवेश कर जाते हैं। दूसरे लोग धनके ही लोभसे सेवा-जैसी निन्दित वृत्तिका आश्रय लेते हैं, जिसे कुत्तेकी वृत्तिके समान त्याज्य माना गया है। कुछ लोग खेतीकी वृत्ति अपनाते हैं, जिसमें प्रायः जीवोंकी हिंसा होती है और स्वयं भी बहुत क्लेश उठाने पड़ते हैं। इस प्रकार जो बड़े दुःखसे उपार्जन किया गया, सैकड़ों आयास-प्रयाससे प्राप्त किया गया, प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है, उस धनका त्याग अत्यन्त दुष्कर है। मनुष्य अपने हाथसे उठाकर जो धन दूसरेको देता है, अथवा जिसे वह खा-पीकर भोग लेता है, वही धन वास्तवमें उस धनीका है। मरे हुए मनुष्यके धनसे तो दूसरे लोग मौज करते हैं। जो प्रतिदिन अपने पास आकर याचना करता है, मैं उसे गुरु मानता हूँ; क्योंकि वह नित्यप्रति दर्पणकी भाँति मेरे चित्तका मार्जन करके इसे स्वच्छ बनाता है। दिया जानेवाला धन घटता नहीं, अपितु सदा बढ़ता ही रहता है। ठीक उसी प्रकार, जैसे कुएँसे पानी उलीचनेपर वह शुद्ध और अधिक जलवाला होता है। एक जन्मके सुखके लिये सहस्रों जन्मोंके सुखोंपर पानी नहीं फेरना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष एक ही जन्ममें इतना पुण्य संचय कर लेता है, जो सहस्रों जन्मोंके लिये पर्याप्त होता है। मूर्ख मनुष्य इस लोकमें दरिद्र हो जानेकी आशंकासे अपने धनका दान नहीं करता, परंतु विद्वान् पुरुष परलोकमें दरिद्र न होना पड़े, इस शंकासे यहाँ खुले हाथों धन बाँटता है। जिनका आश्रय ही नाशवान् है, वे मनुष्य धन रखकर क्या करेंगे? जिसके लिये वे धन चाहते हैं, वह शरीर सदा रहनेवाला नहीं है। लोगोंने पहलेसे जो 'नास्ति-नास्ति' (नहीं है, नहीं है) इन दो अक्षरोंका अभ्यास कर रखा है, उसकी जगह यह 'देहि-देहि' (दो-दो) इन दो अक्षरोंका प्रस्ताव विपरीत जान पड़ता है। याचक जन 'देहि' (दीजिये) कहकर याचना नहीं करते, अपितु कृपण मनुष्यको यह समझाते हैं कि 'दान न करनेवालेकी यही (मेरी-जैसी) अवस्था होती है। अतः आप भी ऐसे ही न बनें।' याचक दाताका उपकार करनेके लिये ही उसके सामने 'देहि' (दीजिये) कहकर याचना करता है; क्योंकि दाता तो ऊपरके लोकोंमें जाता है और दान लेनेवाला नीचे ही रह जाता है। जो दान नहीं करते, वे दरिद्र, रोगी, मूर्ख तथा सदा दूसरोंके सेवक होकर दुःखके ही भागी होते हैं। जो धनवान् होकर दान नहीं करता और दरिद्र होकर कष्ट-सहनरूप तपसे दूर भागता है, इन दोनोंको गलेमें बड़ा भारी पत्थर बाँधकर जलमें छोड़ देना चाहिये। सैकड़ों मनुष्योंमें कोई शूरवीर हो सकता है, सहस्रोंमें कोई पण्डित भी मिल सकता है तथा लाखोंमें कोई वक्ता भी निकल सकता है, परंतु इनमें एक भी दाता हो सकता है या नहीं, इसमें सन्देह है। गौ, ब्राह्मण, वेद, सती स्त्री, सत्यवादी पुरुष, लोभहीन तथा दानशील मनुष्य—इन सातोंके द्वारा ही यह पृथ्वी धारण की जाती है।* उशीनर देशके राजा शिवि ब्राह्मणके लिये


* अहन्यहनि याचन्तमहं मन्ये गुरुं तथा। मार्जनं दर्पणस्येव यः करोति दिने दिने॥
दीयमानं हि नायैति भूय एवाभिवर्धते। कूप उत्सिच्यमानो हि भवेच्छुद्धो बहुदकः॥
एकजन्मसुखस्यार्थे सहस्राणि न लोपयेत्। प्राज्ञो जन्मसहस्रेषु संचिनोत्येकजन्मनि॥
मूर्खो हि न ददात्यर्थानिह दारिद्र्यशङ्कया। प्राज्ञस्तु विसृजत्यर्थानमुत्र तस्य शङ्कया॥

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ९१

अपने शरीरको देकर स्वर्गलोकमें चले गये। विदेहनरेश निमिने अपना सम्पूर्ण राज्य, परशुरामजीने सारी पृथ्वी तथा राजा गयने नगरोंसहित समूची पृथ्वी ब्राह्मणोंको दान कर दी। एक समय जब बहुत दिनोंतक मेघोंने वर्षा नहीं की, तब वसिष्ठजीने सब प्राणियोंको उसी प्रकार जीवित रखा, जैसे प्रजापति समस्त प्रजाके जीवनकी रक्षा करते हैं। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ पांचाल-नरेश ब्रह्मदत्तने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको शंख निधि प्रदान करके स्वर्गलोक प्राप्त किया। ये तथा और भी बहुत-से राजर्षि, जो शान्तचित्त और जितेन्द्रिय थे, दान तथा शिवभक्तिके प्रभावसे रुद्रलोकमें गये। जबतक यह पृथ्वी टिकी रहेगी तबतक इन सबकी कीर्ति स्थिर है। ऐसा विचार करके तुम सारभूत धर्मके अभिलाषी होकर भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके लिये सदा दान करते रहो।

यह उपदेश सुनकर कात्यायन भी मोह त्यागकर वैसे ही हो गये।

o

नारदजीके द्वारा धर्मवर्माके दानसम्बन्धी जटिल प्रश्नोंका समाधान

नारदजी बोले—वीरश्रेष्ठ अर्जुन! इस प्रकार पृथ्वीपर जो-जो पवित्र तीर्थस्थान हैं, उन सबका दर्शन करते हुए मैं समूची पृथ्वीपर घूमता-घामता भृगुके आश्रमपर पहुँचा, जहाँ श्रेष्ठ एवं पवित्र नर्मदा नदी बहती है, जिसका स्मरण सात कल्पोंतक पुण्य फल देनेवाला होता है। नर्मदा महान् पुण्य प्रदान करनेवाली, पवित्र, सर्वतीर्थमयी तथा कल्याणकारिणी है। वह अपने नामोंका कीर्तनमात्र करनेसे पवित्र कर देती है। दर्शन करनेपर तो वह विशेष पुण्यदायिनी होती है। कुन्तीनन्दन! नर्मदामें स्नान करनेपर जीव सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जैसे पिंगला नामवाली नाड़ी शरीरके मध्य भागमें स्थित है। इसी प्रकार यह नर्मदा ब्रह्माण्डरूपी शरीरके उसी स्थान (मध्यभाग)-में स्थित बतायी गयी है। वहाँ नर्मदामें सब पापोंका नाश करनेवाला शुक्लतीर्थ है जहाँ स्नान करनेमात्रसे ब्रह्महत्या नष्ट हो जाती है। अर्जुन! उस शुक्ल तीर्थके समीप नर्मदाके उत्तर तटपर भृगु मुनिका आश्रममण्डल है, जिसमें तीनों वेदोंके विद्वान् ब्राह्मण रहकर सब ओरसे उसकी शोभा बढ़ाते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके मन्त्रोंके उच्चघोषसे वहाँकी सम्पूर्ण दिशाएँ गूँजती रहती हैं। मुनिश्रेष्ठ भृगु जहाँ विराजमान थे, उस स्थानपर मैं भी गया; मुझे आते देख भृगु आदि सब ब्राह्मणोंने उठकर मेरा स्वागत किया। भलीभाँति स्वागत करके मुझे अर्घ्य, पाद्य आदि निवेदन कर वे सब मुनीश्वर मेरे और भृगुजीके साथ आसनोंपर बैठे। फिर यह जानकर कि मैंने पूर्ण विश्राम कर लिया, मुझसे भृगुजीने इस प्रकार पूछा—'मुनिश्रेष्ठ!

किं धनेन करिष्यन्ति देहिनो भङ्गुराश्रयाः। यदर्थं धनमिच्छन्ति तच्छरीरमशाश्वतम्॥
अक्षरद्वयमभ्यस्तं नास्ति नास्तीति यत्पुरा। तदिदं देहि देहीति विपरीतमुपस्थितम्॥
बोधयन्ति न याचन्ते देहीति कृपणं जनाः। अवस्थेयमदानस्य माभूदेवं भवानपि॥
दातुरेवोपकाराय वदन्त्यर्थीति देहि मे। यस्माद्दाता प्रयात्यूर्ध्वमधस्तिष्ठेत् प्रतिग्रही॥
दरिद्रा व्याधिता मूर्खाः परप्रेष्यकराः सदा। अदत्तदाना जायन्ते दुःखस्यैव हि भाजनाः॥
धनवन्तमदातारं दरिद्रं चातपस्विनम्। उभावम्भासि मोक्तव्यौ गले बद्ध्वा महाशिलाम्॥
शतेषु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः। वक्ता शतसहस्रेषु दाता जायेत वा न वा॥
गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च सतीभिः सत्यवादिभिः। अलुब्धैर्दानशीलैश्च सप्तभिर्धार्यते मही॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० २। ६०-७१)

९२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


आपको कहाँ जाना है और कहाँसे आप यहाँ पधारे हैं?'

तब मैंने भृगुजीसे कहा—महर्षे ! मैंने समुद्र-पर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीपर भ्रमण किया है। मेरी यात्राका उद्देश्य था ब्राह्मणोंको भूमिदान करनेके लिये उत्तम भूमिकी खोज करना। मैं पग-पगपर ऐसी भूमिका अनुसन्धान करता था, जो सर्वथा निर्दोष, पवित्र तीर्थोंसे युक्त, रमणीय और मनोरम हो। किंतु किसी प्रकार ऐसी भूमि मुझे नहीं दिखायी देती।

भृगुजी बोले—देवर्षे ! मैंने भी ब्राह्मणोंको बसानेके लिये पूर्वकालमें समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीपर भ्रमण किया था। उस समय मैंने शुभ पुण्यभूमिका दर्शन किया है। 'मही' नामसे प्रसिद्ध एक परम पवित्र नदी है, जो सर्वतीर्थमयी होनेके साथ ही परम कल्याणकारिणी है। वह देखनेमें मनोरम, सौम्य तथा महापापोंका विनाश करनेवाली है। नारद! पृथ्वीपर जो देखे हुए और बिना देखे हुए तीर्थ हैं, वे सब मही नदीके जलमें निवास करते हैं। पुण्यसलिला मही नदी समुद्रमें मिली हुई है। जहाँ मही और समुद्रका संगम हुआ है, वहाँ स्तम्भ नामक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है। वहाँ जो मनुष्य स्नान करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो जानेके कारण यमराजके समीप नहीं जाते।

मैंने कहा—भृगुजी! आप और हम दोनों मही नदीके शोभायमान तटपर चलेंगे और साथ ही उस परम उत्तम स्थानका पूर्णरूपसे दर्शन करेंगे।

मेरी बात सुनकर भृगुजी मेरे साथ परम पुण्यमय महीतटका दर्शन करनेके लिये आये। उसे देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ। मेरे सम्पूर्ण शरीरमें रोमांच हो आया और मैंने हर्ष-गद्गद वाणीमें मुनिश्रेष्ठ भृगुजीसे कहा—'ब्रह्मन् ! आपके प्रसादसे मैं इस स्थानको बहुत उत्तम बनाऊँगा। अब आप अपने आश्रमपर पधारें। मैं आगेके कार्यपर विचार करूँगा।' इस प्रकार भृगुजीको विदा करके मैं महीके तटपर विचार करने लगा कि यह स्थान मेरे अधीन कैसे होगा क्योंकि यह भूमि सदा राजाओंके अधीन रही है। यदि मैं राजा धर्मवर्माके पास जाकर इस भूमिके लिये याचना करता हूँ तो वे मेरे माँगनेपर मुझे अवश्य दे देंगे; परंतु मुनियोंने तीन प्रकारके द्रव्य बतलाये हैं—शुक्ल, शबल और कृष्ण। इनमें शुक्ल सबसे उत्तम है। शबल मध्यम श्रेणीका है और कृष्ण अधम कहलाता है। वेदोंको पढ़ाकर शिष्यसे दक्षिणारूपमें जो धन प्राप्त होता है वह शुक्ल कहा गया है। कन्यासे तथा सूद, व्यापार, खेती और याचनासे मिला हुआ धन शबल कहलाता है। जुआ, चोरी, दुःसाहसपूर्ण कार्य तथा छलसे कमाया हुआ धन कृष्ण कहा गया है। (ये शुक्ल, शबल और कृष्ण द्रव्य क्रमशः सात्त्विक, राजस और तामस माने गये हैं।) जो मनुष्य किसी उत्तम तीर्थ और पात्रको पाकर शुक्ल धनके द्वारा श्रद्धापूर्वक धर्मका अनुष्ठान करता है, वह देवयोनिमें उसके फलका उपभोग करता है। जो राजस भावसे शबल धनके द्वारा याचकोंको दान देता है, वह उसका उपभोग मनुष्य-योनिमें करता है। जो तमोगुणसे आवृत्त हो कृष्ण धनके द्वारा दान करता है, वह नराधम मृत्युके पश्चात् तिर्यग् योनिमें जाकर उसके फलका उपभोग करता है। इस दृष्टिसे मेरे याचना करनेपर मिला हुआ धन राजस होगा, यह बात स्वतः स्पष्ट है। यदि ब्राह्मणभावसे उपस्थिति हो राजासे प्रतिग्रहकी याचना करता हूँ तो वह भी प्रतिग्रह होनेके ही कारण मुझे अत्यन्त कष्टदायक प्रतीत होता है। यह राजप्रतिग्रह बड़ा भयंकर है। स्वादमें तो मधुके समान है, किंतु परिणाममें विषके तुल्य है। प्रतिग्रहयुक्त ब्राह्मण नरकमें जाता है, इसीलिये मैं इस प्रतिग्रहरूपी पापसे अलग हूँ। तब दान और याचना इन दोमेंसे किसी एक उपायके द्वारा यह स्थान अपने अधिकारमें करूँ। इसी बातपर मैं बार-बार विचार करने लगा।

  • माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ९३

अर्जुन! इसी समय मही और समुद्रके पवित्र संगममें स्नान करनेके लिये वहाँ बहुत-से ऋषि-मुनि आ पहुँचे।

मैंने उन सबसे पूछा—'महात्माओ! आपलोग कहाँसे आये हैं?' तब वे मुझे प्रणाम करके बोले—'मुने! हमलोग सौराष्ट्र देशमें रहते हैं, जहाँके राजा धर्मवर्मा हैं। राजा धर्मवर्माने दानका तत्त्व जाननेकी इच्छासे बहुत वर्षोंतक तपस्या की, तब आकाशवाणीने उनसे एक श्लोक कहा—वह इस प्रकार है, सुनो—

द्विहेतु षडधिष्ठानं षडङ्गं च द्विपाकयुक्।
चतुष्प्रकारं त्रिविधं त्रिनाशं दानमुच्यते॥

'दानके दो हेतु, छः अधिष्ठान, छः अंग, दो प्रकारके परिणाम (फल), चार प्रकार, तीन भेद और तीन विनाशसाधन हैं; ऐसा कहा जाता है।'

"यह एक श्लोकमात्र कहकर आकाशवाणी मौन हो गयी। नारदजी! राजाके पूछनेपर भी आकाशवाणीने इस श्लोकका अर्थ नहीं बतलाया। तब महाराज धर्मवर्माने ढिंढोरा पिटवाकर यह घोषणा करायी कि 'जो मेरी तपस्याद्वारा प्राप्त हुए इस श्लोककी ठीक-ठीक व्याख्या कर देगा उसे मैं सात लाख गौएँ, इतनी ही स्वर्णमुद्राएँ तथा सात गाँव दूँगा।' डंकेकी चोटपर राजाकी यह महती घोषणा सुनकर अनेक देशोंके बहुत ब्राह्मण वहाँ गये। नारदजी! हम भी धनके लोभसे वहाँ गये थे, किंतु श्लोक दुर्बोध होनेके कारण उसकी व्याख्या न करके यहाँ लौट आये हैं और अब तीर्थयात्राके लिये जाते हैं।"

अर्जुन! उन महात्माओंकी यह बात सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ और उन्हें विदा करके सोचने लगा—'अहो! इस स्थानकी प्राप्तिके लिये मुझे अच्छा उपाय मिल गया, इसमें संशय नहीं है। श्लोककी व्याख्या करके विद्याके मूल्यपर मैं राजासे स्थान और धन दोनों प्राप्त करूँगा। ऐसा करनेपर मुझे प्रतिग्रह नहीं माँगना पड़ेगा। अब मेरा दुर्लभ मनोरथ सिद्ध हो गया। यद्यपि यह श्लोक अत्यन्त दुर्बोध है, तथापि मैं इसे अच्छी तरह जानता हूँ।' कुन्तीनन्दन! इस प्रकार विचार करके मुझे बड़ा हर्ष हुआ। फिर उस महीसागर-संगम तीर्थको बार-बार प्रणाम करके मैं वहाँसे चला और वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण करके राजा धर्मवर्माके पास जा पहुँचा। वहाँ जाकर मैंने राजासे इस प्रकार कहा—'नरेन्द्र! मुझसे श्लोककी व्याख्या सुनिये और इसके बदलेमें जो कुछ देनेके लिये आपने ढिंढोरा पिटवाया है, उसकी यथार्थता प्रकट कीजिये।'

मेरे ऐसा कहनेपर राजा बोले—'ब्रह्मन्! ऐसी बात तो बहुत अधिक श्रेष्ठ ब्राह्मण कह चुके हैं; परंतु कोई भी इसका वास्तविक अर्थ नहीं बता सका। दानके वे दोनों हेतु कौन हैं? छः अधिष्ठान कौन-से बताये गये हैं? छः अंग कौन हैं? दो फल कौन माने गये हैं? वे चार प्रकार और तीन भेद कौन-कौन-से हैं? तथा दानके तीन विनाश-साधन कौन-कौन-से बताये गये हैं? यह सब स्पष्टरूपसे वर्णन कीजिये। विप्रवर! यदि इन सात प्रश्नोंको आप भलीभाँति स्पष्ट करके बतला सकेंगे तो मैं आपको सात लाख गौ, इतनी ही स्वर्णमुद्रा तथा सात गाँव दे दूँगा। यदि नहीं बता सकें तो खाली हाथ अपने घर लौट जाइयेगा।'

अर्जुन! उनके ऐसा कहनेपर सौराष्ट्रपति राजा धर्मवर्मासे मैंने कहा—'राजन्! दानके जो दो हेतु हैं, उन्हें सुनिये,—दानका थोड़ा होना या बहुत होना अभ्युदयका कारण नहीं होता, अपितु श्रद्धा और शक्ति ही दानोंकी वृद्धि और क्षयमें कारण होती है। इनमेंसे श्रद्धाके विषयमें ये श्लोक हैं—शरीरको बहुत क्लेश देनेसे तथा धनकी राशियोंसे सूक्ष्म धर्मकी प्राप्ति नहीं होती। श्रद्धा ही धर्म और अद्भुत तप है, श्रद्धा ही स्वर्ग और मोक्ष है तथा श्रद्धा ही यह सम्पूर्ण जगत् है। यदि कोई बिना श्रद्धाके अपना सर्वस्व दे दे अथवा अपना जीवन ही निछावर कर दे तो भी वह उसका कोई फल नहीं पाता; इसलिये सबको

९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

श्रद्धालु होना चाहिये। श्रद्धासे ही धर्मका साधन किया जाता है; धनकी बहुत बड़ी राशिसे नहीं। क्योंकि अकिंचन ऋषि-मुनि श्रद्धालु होनेके कारण ही स्वर्गलोकमें गये हैं। देहधारियोंमें उनके स्वभावके अनुसार होनेवाली श्रद्धा तीन प्रकारकी होती है—सात्त्विकी, राजसी और तामसी। उसे सुनिये। सात्त्विकी श्रद्धावाले पुरुष देवताओंकी पूजा करते हैं, राजसी श्रद्धावाले लोग यक्षों और राक्षसोंको पूजते हैं तथा तामसी श्रद्धावाले मनुष्य प्रेतों, भूतों और पिशाचोंकी पूजा किया करते हैं। इसलिये श्रद्धावान् पुरुष अपने न्यायोपार्जित धनका सत्पात्रके लिये जो दान करते हैं, वह थोड़ा भी हो तो उसीसे भगवान् शिव प्रसन्न हो जाते हैं।^१

'शक्तिके विषयमें श्लोक इस प्रकार हैं—कुटुम्बके भरण-पोषणसे जो अधिक हो, वही धन दान करने योग्य है, वही मधुके समान मीठा है—उसीसे वास्तविक धर्मका लाभ होता है। इसके विपरीत करनेपर वह आगे चलकर विषके समान हानिकारक होता है, दाताका धर्म अधर्मरूपमें परिणत हो जाता है। यदि आत्मीयजन दुःखसे जीवननिर्वाह कर रहे हों, तो उस अवस्थामें किसी सुखी और समर्थ पुरुषको दान देनेवाला मनुष्य मधुपानके धोखेमें मानो विष-भक्षण करनेवाला है। वह धर्मके अनुकूल नहीं, प्रतिकूल चलता है। जो भरण-पोषण करनेयोग्य व्यक्तियोंको कष्ट देकर किसी मृत व्यक्तिके लिये (बहु-व्ययसाध्य) श्राद्ध करता है, उसका किया हुआ वह श्राद्ध उसके जीते-जी अथवा मरनेपर भी भविष्यमें दुःखका ही कारण होता है। जो अत्यन्त तुच्छ हो अथवा जिसपर सर्वसाधारणका अधिकार हो, वह वस्तु 'सामान्य' कहलाती है, कहींसे माँगकर लायी हुई वस्तुको 'याचित' कहते हैं, धरोहरका ही दूसरा नाम 'न्यास' है, बन्धक रखी हुई वस्तुको 'आधि' कहते हैं, दी हुई वस्तु 'दान'के नामसे पुकारी जाती है, दानमें मिली हुई वस्तुको 'दान-धन' कहते हैं, जो धन एकके यहाँ धरोहर रखा गया हो और रखनेवालेने उसे पुनः दूसरेके यहाँ रख दिया हो उसे 'अन्वाहित' कहते हैं, जिसे किसीके विश्वासपर उसके यहाँ छोड़ दिया जाय, वह धन 'निक्षिप्त' कहलाता है, वंशजोंके होते हुए भी सब कुछ दूसरोंको दे देना 'सान्वय सर्वस्व दान' कहा गया है। विद्वान् पुरुषोंको चाहिये कि वे आपत्तिकालमें भी उपर्युक्त नव प्रकारकी वस्तुओंका दान न करें। जो पूर्वोक्त नव वस्तुओंका दान करता है, वह मूढ़चित्त मानव प्रायश्चित्तका भागी होता है।^२


१- कायक्लेशैश्च बहुभिर्न चैवार्थस्य राशिभिः। धर्मः सम्प्राप्यते सूक्ष्मः श्रद्धा धर्मोऽद्भुतं तपः॥
श्रद्धा स्वर्गश्च मोक्षश्च श्रद्धा सर्वमिदं जगत्। सर्वस्वं जीवितं चापि दद्यादश्रद्धया यदि॥
नाप्नुयात्स फलं किञ्चिच्छ्रद्दधानस्ततो भवेत्। श्रद्धया साध्यते धर्मो महद्भिर्नार्थराशिभिः॥
निष्किञ्चना हि मुनयः श्रद्धावन्तो दिवंगताः। त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा॥
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चैव तां शृणु। यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः॥
प्रेतान् भूतान् पिशाचांश्च यजन्ते तामसा जनाः। तस्माच्छ्रद्धावता पात्रे दत्तं न्यायार्जितं हि यत्॥
तेनैव भगवान् रुद्रः स्वल्पकेनापि तुष्यति।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। २९–३५)

२- कुटुम्बभुक्तभरणाद्देयं यदतिरिच्यते। मध्वास्वादो विषं पश्चाद्दातुर्धर्मोऽन्यथा भवेत्॥
शक्ते परजने दाता स्वजने दुःखजीविनि। मध्वापानविषादः स धर्माणां प्रतिरूपकः॥
भृत्यानामुपरोधेन यः करोत्यौर्ध्वदैहिकम्। तद्भवत्यसुखोदर्कं जीवितोऽस्य मृतस्य च॥
सामान्यं याचितं न्यासमाधिर्दानं च तद्धनम्। अन्वाहितं च निक्षिप्तं सर्वस्वं चान्वये सति॥
आपत्स्वपि न देयानि नववस्तूनि पण्डितैः। यो ददाति स मूढात्मा प्रायश्चित्ती भवेन्नरः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ३६–४०)

* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ९५


'राजन्! ये दानके दो हेतु बताये गये हैं। अब अधिष्ठानोंका वर्णन सुनो। दानके अधिष्ठान छः हैं। उन्हें बताता हूँ— धर्म, अर्थ, काम, लज्जा, हर्ष और भय—ये दानके छः अधिष्ठान कहे जाते हैं। सदा ही किसी प्रयोजनकी इच्छा न रखकर केवल धर्मबुद्धिसे सुपात्र व्यक्तियोंको जो दान दिया जाता है, उसे 'धर्म-दान' कहते हैं। मनमें कोई प्रयोजन रखकर ही प्रसंगवश जो कुछ दिया जाता है, उसे 'अर्थ-दान' कहते हैं। वह इस लोकमें ही फल देनेवाला होता है। स्त्रीसमागम, सुरापान, शिकार और जुएके प्रसंगमें अनधिकारी मनुष्योंको प्रयत्नपूर्वक जो कुछ दिया जाता है, वह 'काम-दान' कहलाता है। भरी सभामें याचकोंके माँगनेपर लज्जावश देनेकी प्रतिज्ञा करके उन्हें जो कुछ दिया जाता है, वह 'लज्जा-दान' माना गया है। कोई प्रिय कार्य देखकर अथवा प्रिय समाचार सुनकर हर्षोल्लाससे जो कुछ दिया जाता है, उसे धर्मविचारक महात्मा पुरुष 'हर्ष-दान' कहते हैं। निन्दा, अनर्थ और हिंसाका निवारण करनेके लिये अनुपकारी व्यक्तियोंको विवश होकर जो कुछ दिया जाता है, उसे 'भय-दान' कहते हैं।*

'इस प्रकार दानके छः अधिष्ठान बताये गये। अब उसके छः अंगोंका वर्णन सुनिये—दाता, प्रतिग्रहीता, शुद्धि, धर्मयुक्त देय वस्तु, देश और काल—ये दानके छः अंग माने गये हैं। दाता नीरोग, धर्मात्मा, देनेकी इच्छा रखनेवाला, व्यसनरहित, पवित्र तथा सदा अनिन्दनीय कर्मसे आजीविका चलानेवाला होना चाहिये। इन छः गुणोंसे दाताकी प्रशंसा होती है। सरलतासे रहित, श्रद्धाहीन, दुष्टात्मा, दुर्व्यसनी, झूठी प्रतिज्ञा करनेवाला तथा बहुत सोनेवाला दाता तमोगुणी और अधम माना गया है। जिसके कुल, विद्या और आचार तीनों उज्ज्वल हों, जीवननिर्वाहकी वृत्ति भी शुद्ध और सात्त्विक हो, जो दयालु, जितेन्द्रिय तथा योनि-दोषसे मुक्त हो, वह ब्राह्मण दानका उत्तम पात्र (प्रतिग्रहका सर्वोत्तम अधिकारी) कहा जाता है। याचकोंको देखनेपर सदा प्रसन्नमुख हो उनके प्रति हार्दिक प्रेम होना, उनका सत्कार करना तथा उनमें दोषद्रष्टि न रखना ये सब सद्गुण दानमें शुद्धिकारक माने गये हैं। जो धन किसी दूसरेको सताकर न लाया गया हो, अति क्लेश उठाये बिना अपने प्रयत्नसे उपार्जित किया गया हो, वह थोड़ा हो या अधिक, वही देने योग्य बताया गया है। किसीके साथ कोई धार्मिक उद्देश्य लेकर जो वस्तु दी जाती है, उसे धर्मयुक्त देय कहते हैं। यदि देय वस्तु उक्त विशेषताओंसे शून्य हो तो उसके दानसे कोई फल नहीं होता। जिस देश अथवा कालमें जो-जो पदार्थ दुर्लभ हो, उस-उस पदार्थका दान करनेयोग्य वही-वही देश और काल श्रेष्ठ है;


* अधिष्ठानानि वक्ष्यामि षडेव शृणु तानि च। धर्ममर्थं च कामं च व्रीडाहर्षभयानि च॥
अधिष्ठानानि दानानां षडेतानि प्रचक्षते। पात्रेभ्यो दीयते नित्यमनपेक्ष्य प्रयोजनम्॥
केवलं धर्मबुद्ध्या यद्धर्मदानं तदुच्यते। प्रयोजनमपेक्ष्यैव प्रसंगाद्यत्प्रदीयते॥
तदर्थदानमित्याहुर्हैहिकं फलहेतुकम्। स्त्रीपानमृगयाक्षाणां प्रसंगाद्यत्प्रदीयते॥
अनर्हेषु सुयत्नेन कामदानं तदुच्यते। संसदि व्रीडयाऽऽश्रुत्य अर्थोऽर्थिभ्यः प्रयाचितः॥
प्रदीयते तु तद्दानं व्रीडादानमिति श्रुतम्। दृष्ट्वा प्रियाणि श्रुत्वा वा हर्षेण यत्प्रदीयते॥
हर्षदानमिति प्राहुर्दानं तद्धर्मचिन्तकाः। आक्रोशामर्थहिंसानां प्रतीकाराय यद्भवेत्॥
दीयतेऽनुपकर्तृभ्यो भयदानं तदुच्यते।
(स्क० पु०, मा० कुमा० ३। ४२—४९)