भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 113

८४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तपस्वी बोले— पार्थ! इस प्रकार धर्माचरण करते हुए तुम्हारी आयु बड़ी हो और धर्ममें तुम्हारा अनुराग निरन्तर बना रहे। जाओ, अपना मनोरथ सिद्ध करो।

मुनियोंके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उन सबको प्रणाम किया और आशीर्वाद ले सौभद्र महर्षिके उत्तम तीर्थमें जाकर स्नान किया। इसी समय जलके भीतर रहनेवाले महान् ग्राहने नरश्रेष्ठ अर्जुनको पकड़ लिया। महाबाहु अर्जुन बलवानोंमें श्रेष्ठ थे। वे जोर-जोरसे फड़कते हुए उस जलचर जीवको बलपूर्वक लिये-दिये जलसे बाहर निकल आये। ज्यों ही उसे खींचकर वे बाहर लाये, वह ग्राह समस्त आभूषणोंसे विभूषित कल्याणमयी नारीके रूपमें परिणत हो गया। उसका रूप दिव्य था। वह मनको मोह लेनेवाली थी। उस समय अर्जुनने उससे पूछा—'कल्याणी! तुम कौन हो? जलमें विचरनेवाली मकरीका रूप तुम्हें कैसे मिला? ऐसा महान् पाप तुमने क्यों किया?'

नारी बोली— कुन्तीनन्दन! मैं देवताओंके नन्दनवनमें निवास करनेवाली अप्सरा हूँ। मेरा नाम वर्चा है। यहाँ मेरी चार सखियाँ और हैं। वे सभी सुन्दरी तथा इच्छानुसार गमन करनेवाली हैं। एक दिन उन सबको साथ लेकर मैं देवराज इन्द्रके भवनसे चली और एक वनमें पहुँचकर मैंने देखा, कोई ब्राह्मण देवता अकेले एकान्तमें बैठकर स्वाध्याय कर रहे हैं। उनका रूप बड़ा सुन्दर है। वीरवर! उनकी तपस्याके तेजसे वह सारा वन प्रकाशित हो रहा था। वे सूर्यकी भाँति उस समस्त प्रदेशको आलोकित कर रहे थे। उन्हें देखकर उनकी तपस्यामें विघ्न डालनेकी इच्छासे मैं वहाँ उतर गयी। मैं, सौरभेयी, सामेयी, बुद्बुदा और लता सब एक ही साथ उन ब्राह्मण देवताके समीप पहुँचीं तथा गाती और खेलती हुई उन्हें लुभानेकी चेष्टा करने लगीं। वीर! यह सब करनेपर भी उन्होंने अपना मन हमारी ओर नहीं आने दिया। वे महातेजस्वी ब्राह्मण निर्मल तपस्यामें स्थित थे। हमारी अनुचित चेष्टाओंसे कुपित होकर उन्होंने हम सबको शाप दे दिया—'अरी! तुम सब लोग सौ वर्षोंतक जलके भीतर ग्राह बनकर रहो।'

यह शाप सुनकर हमलोग अत्यन्त व्यथित हो उठीं और उन्हीं तपस्वी ब्राह्मणकी शरणमें गयीं। हमने प्रार्थनापूर्वक कहा—'विप्रवर! हम सबने बड़ा अनुचित किया है; फिर भी आप हमारे अपराधको क्षमा कर देने योग्य हैं। मुने! आप धर्मज्ञ हैं, ब्राह्मण सब प्राणियोंके प्रति मित्र-भाव रखनेवाला बताया गया है। मनीषी महात्माओंका यह वचन सत्य हो। साधुपुरुष शरणागतोंकी रक्षा करते हैं। हम सब आपकी शरणमें आयी हैं; अतः कृपापूर्वक हमें क्षमा कर दें।'

सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी वे धर्मात्मा ब्राह्मण सदा कल्याणमय कर्म करनेवाले थे। अप्सराओंके प्रार्थना करनेपर उन्होंने उनपर कृपा की और इस प्रकार कहा—'देवियो! यदि लोग अपने सिरपर खड़ी हुई मृत्युको देख लें तो उन्हें भोजन भी न रुचे, फिर पापमें प्रवृत्ति तो हो ही कैसे सकती है? अहो! सब रत्नोंसे बढ़कर अत्यन्त दुर्लभ इस मनुष्य-जन्मको पाकर स्त्रियोंके मोहमें फँसे हुए कुछ नीच मनुष्य इसे तिनकेके समान गँवा देते हैं। यह कितने आश्चर्यकी बात है।* हम पूछते हैं, तुमलोगोंका जन्म किसलिये हुआ


* मस्तकस्थापिनं मृत्युं यदि पश्येदयं जनः। आहारोऽपि न रोचेत किमुताकार्यकारिता॥
अहो मानुष्यकं जन्म सर्वरत्नसुदुर्लभम्। तृणवत् क्रियते कैश्चिद् योषिन्मूढैर्नराधमैः॥
(स्क० पु०, मा० कुमा० १।४९-५०)