संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड * ८५
है अथवा उससे क्या लाभ है। अपने मनमें विचार करके इसका उत्तर दो। हम स्त्रियोंकी निन्दा नहीं करते, जिनसे सबका जन्म होता है। केवल उन पुरुषोंकी निन्दा करते हैं, जो स्त्रियोंके प्रति उच्छृंखल हैं, मर्यादाका उल्लंघन करके उनके प्रति आसक्त हैं। ब्रह्माजीने संसारकी सृष्टि बढ़ानेके लिये स्त्री-पुरुषके जोड़ेका निर्माण किया है। अतः इसी भावसे स्त्री-पुरुषोंको मिथुन-धर्मका पालन करना चाहिये। इसमें कोई दोष नहीं है। परंतु इतना ध्यान रखना चाहिये कि जो नारी अपने बन्धु-बान्धवोंद्वारा ब्राह्मण और अग्निके समीप शास्त्रीय विधिसे अपनेको दी गयी हो, उसीके साथ सदा गृहस्थ-धर्मका पालन करना श्रेष्ठ माना गया है। इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक शास्त्र-मर्यादाके अनुकूल चलाया जानेवाला अपना गार्हस्थ्य उत्तम तथा महान् गुणकारक हो सकता है। जो गृहस्थी शास्त्र-मर्यादाके अनुसार नहीं चलायी जाती, वह दोषका कारण भी हो सकती है। पाँच मुखोंवाले नगरमें, जिसके द्वारोंपर ग्यारह योद्धा पहरा देते हैं, जो पुरुष अपनी स्त्री और अनेक सन्तानोंके साथ मौजूद है, वह अचेतन कैसे हो जाता है। स्त्रीके साथ संयोग इसलिये किया जाता है कि उससे पुत्र उत्पन्न होकर पंचयज्ञ आदि कर्मोंद्वारा सम्पूर्ण विश्वका उपकार कर सके, किंतु हाय! मूढ़ मनुष्य उस पवित्र संयोगको किसी और ही भावसे ग्रहण करते हैं। छः धातुओंका सारभूत जो वीर्य है उसे अपने समान वर्णवाली स्त्रीको छोड़कर अन्य किसी निन्दित योनिमें यदि कोई छोड़ता है, तो उसके लिये यमराजने ऐसा कहा है—पहले तो वह अन्नका द्रोही है, फिर आत्माका द्रोही है, फिर पितरोंका द्रोही है तथा अन्ततोगत्वा सम्पूर्ण विश्वका द्रोही है। ऐसा पुरुष अनन्तकालतक अन्धकारपूर्ण नरकमें पड़ा रहता है। देवता, पितर, ऋषि, मनुष्य (अतिथि) तथा सम्पूर्ण भूत (प्राणी) मनुष्यके सहारे जीविका चलाते हैं। अतः प्रत्येक मनुष्यको उचित है कि वह इन पाँचोंका उपकार करनेके लिये सदा उद्यत रहे। जो मन, वाणी, जिह्वा, हाथ और कानको अपने वशमें करके जितेन्द्रिय हो गया है, उसे हंसतीर्थ कहते हैं। उससे भिन्न जो अजितेन्द्रिय पुरुष हैं, वे सब काकतीर्थ हैं। जो तमोगुणी मनुष्य काकवत् आचरण करनेवाले मनुष्यमें (काकतीर्थमें) हंसबुद्धिसे रमण करते हैं, उनसे देवताओंका क्या प्रयोजन है? यह ध्यान देकर सोचनेकी बात है। इस प्रकार संसारका जो निर्माण हुआ है, उसे हृदयके भीतर स्मरण रखनेवाले पुरुषका मन त्रिलोकीका राज्य पानेके लिये भी कैसे पापमें प्रवृत्त हो सकता है। अप्सराओ! अन्यान्य मनुष्योंके कर्मोंका जो यह शास्त्रद्वारा ज्ञात होनेवाला परिणाम है, उसे मैंने यमलोकमें प्रत्यक्ष देखा है। फिर मुझे कैसे मोह हो? तुमलोग वनमें जलके भीतर ग्राह होकर रहोगी और उसमें स्नानके लिये आनेवाले पुरुषोंको पकड़ोगी। कुछ वर्षोंतक इस जीवनमें रह लेनेके पश्चात् जब कोई श्रेष्ठ पुरुष तुम्हें जलसे बाहर स्थलपर खींच ले जायगा, तब तुम पुनः अपना यह स्वरूप प्राप्त कर लोगी। मैंने पहले कभी हँसीमें भी झूठ बात नहीं कही है। जैसे निन्दित पेय पदार्थको पीने अथवा अशुद्ध वस्तुके छूनेकी शुद्धि प्रायश्चित्तसे होती है, उसी प्रकार इस शापको भोग लेनेसे ही तुम्हारी उत्तम शुद्धि हो सकती है।'
**स्त्री बोली—**तदनन्तर उन ब्राह्मण देवताको प्रणाम करके हमने उनकी परिक्रमा की और उस स्थानसे दूर हटकर अत्यन्त दुःखित हो, हम बड़ी चिन्तामें पड़ गयीं। सोचने लगीं, 'किस उपायसे थोड़े ही समयमें हम सब उस मनुष्यके समीप जा सकती हैं, जो पुनः हमें अपने स्वरूपकी प्राप्ति करा देगा।' दो घड़ीतक इस प्रकार चिन्ता करनेके पश्चात् हम बड़भागिनी स्त्रियोंने वहाँ स्वतः आये हुए देवर्षि नारदजीको देखा। तब उन्हें प्रणाम करके उदास