संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
लगे—'बूढ़े बाबा! तुम इस वृद्धाके साथ क्यों दुःखसे पीड़ित होकर रोते हो? क्या तुम्हारी कोई प्रिय वस्तु नष्ट हो गयी है?'
सत्यसन्धने कहा—मैं ही पहले इस आनर्त देशका राजा था। मेरा नाम सत्यसन्ध है। यह मेरी पुत्री कर्णोत्पला है। मैं इसके विवाहके निमित्त वरका निश्चय करनेके लिये ब्रह्माजीसे पूछनेके उद्देश्यसे यहाँसे ब्रह्मलोकको गया था। वहाँ दो घड़ी मुझे ठहर जाना पड़ा था; उसके बाद लौटकर आया हूँ तो इस पृथ्वीपर सब कुछ बदला हुआ देखता हूँ।
यह सुनकर वहाँके लोगोंने राजा बृहद्बलके पास जाकर सब वृत्तान्त कहा। सुनकर राजा बृहद्बल वहाँ पैदल ही आये और उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़े हुए बोले—'महाराज! आपका स्वागत है। मुझ सेवकके साथ अपना यह राज्य पुनः सादर ग्रहण कीजिये।'
तब राजा सत्यसन्धने भूपाल बृहद्बलको हृदयसे लगाया और उनका मस्तक सूँघकर कहा—वत्स! मैंने बहुत समयतक राज्य किया, नाना प्रकारके दान दिये तथा पूर्ण दक्षिणावाले अश्वमेध आदि यज्ञोंसे यज्ञपुरुषकी आराधना भी की है। अब इस पुत्रीके साथ तपस्या करूँगा, जिससे इसको पुनः पूर्ववत् तरुणावस्था प्राप्त हो जाय।
बृहद्बल बोले—प्रभो! मैंने परम्परासे ये सारी बातें इस प्रकार सुनी हैं—राजा सत्यसन्ध अपनी कन्याको साथ लेकर कहीं चले गये और फिर लौटकर नहीं आये। उनके मन्त्रियोंने बहुत दिनोंतक उस राज्यका पालन किया, उसके बाद उन्हींके पुत्र सुह्यका उन्होंने राज्याभिषेक कर दिया। उसी महाराज सुह्यकी वंशपरम्परामें मेरा जन्म हुआ है। मैं उनसे सतहत्तरवीं पीढ़ीमें हूँ। आप इसी गर्ता तीर्थमें रहकर तपस्या करें, जिससे मैं तीनों समय आपकी चरण-वन्दना करके कल्याणका भागी हो सकूँ।
सत्यसन्धने कहा—वत्स! पहले हाटकेश्वर-क्षेत्रमें मैंने वृषभेश्वर भगवान् शिवकी प्रतिष्ठा की थी। वह स्थान आज भी है ही। वहीं चलकर दिन-रात भगवान् शंकरकी आराधना करूँगा। तुम इस कन्याके साथ मुझे वहीं भेज दो।
तदनन्तर पुत्रीके साथ हाटकेश्वरक्षेत्रमें जाकर राजा सत्यसन्ध बहुत प्रसन्न हुए और वहाँ अद्भुत तपस्यामें संलग्न हो गये। कर्णोत्पला भी किसी पवित्र जलाशयके तटपर श्रद्धापूर्वक पार्वतीजीकी स्थापना करके वहीं तपस्या करने लगी। उसकी तपस्यासे सन्तुष्ट हो पार्वतीदेवीने प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'बेटी! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। मनोवांछित वर माँगो।'
कर्णोत्पला बोली—देवि! मेरे पिताजी मेरा विवाह करनेके लिये बहुत दुःखी हैं। वे इसीके लिये राज्य, सुख और कुटुम्ब सबसे वंचित हुए और अब वैराग्यको प्राप्त हो तप करते हैं। मैं कुमारीसे सहसा वृद्ध हो गयी। अतः अब यही प्रार्थना है कि मेरा वह तारुण्य और सौन्दर्य पुनः लौट आवे तथा मुझे कोई श्रेष्ठ पति प्राप्त हो।
देवीने कहा—शुभे! माघमासकी तृतीयाको जब शनैश्चर दिन और धनिष्ठा नक्षत्रका योग हो, तब तुम यौवन तथा रूपका चिन्तन करती हुई इस पुण्य जलाशयमें स्नान कर लेना। इससे तुम्हारा शरीर युवावस्थासे सम्पन्न और दिव्य रूपसे सुशोभित हो जायगा। दूसरी कोई स्त्री भी, जो उस दिन इसी उद्देश्यसे यहाँ स्नान करेगी, ऐसे ही दिव्य रूपसे सुशोभित होगी।
ऐसा कहकर पार्वती देवी अन्तर्धान हो गयीं। वह योग आनेपर कर्णोत्पलाने रूप, सौभाग्य, यौवन तथा अन्य मनोरथोंका चिन्तन करके आधी रातको जलमें प्रवेश किया। स्नान करके वह दिव्य रूप और यौवनसे सम्पन्न हो जलाशयसे बाहर निकली। इसी समय उसके समीप साक्षात् कामदेव आये और बोले—'महाभागे! मैं पार्वतीजीकी आज्ञासे तुम्हारे पास आया हुआ कामदेव हूँ। तुम मेरी पत्नी बनो।'