संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1172, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११४३
कर्णोत्पलाने कहा—यदि ऐसी बात है तो आप मेरे पिताजीके पास जाकर स्वयं मेरे लिये प्रार्थना कीजिये, क्योंकि कन्याको कभी स्वच्छन्द नहीं होना चाहिये।
कामदेवने ‘तथास्तु’ कहकर उसकी बात मान ली। तब वह अपने पिताके पास जा उन्हें प्रणाम करके बोली—‘पिताजी! मैंने पार्वतीजीकी आराधना करके सुन्दर रूप और युवावस्था प्राप्त की है, अतः अब आप मेरा विवाह करके अन्तःसुख लाभ कीजिये। देवी पार्वती ने कामदेवको मेरा पति नियत करके भेजा है।’ कन्याको पूर्ववत् युवावस्थासे युक्त देख राजाने कहा—‘बेटी! आज मेरी तपस्या सफल हो गयी। मैंने जीवनका फल पा लिया।’ इतनेमें ही कामदेवने आकर प्रार्थना की—‘राजन्! आप अपनी कन्या मुझे प्रदान करें, इसके लिये पार्वतीदेवीने स्वयं मुझे भेजा है।’
तब राजाने ब्राह्मणोंके वचनसे अग्निको साक्षी बनाकर अपनी कन्याका विवाह कामदेवके साथ कर दिया। वह रतिके बाद कामदेवकी प्रीतिका पात्र हुई, इसलिये प्रीति नामसे विख्यात हुई। जिस जलाशयपर उसने तपस्या की, वह कर्णोत्पलातीर्थके रूपमें प्रसिद्ध हुआ। जो स्त्री और पुरुष माघभर उसमें स्नान करते हैं, उन्हें प्रयागस्नानका फल मिलता है और कभी बन्धुओंके वियोगका कष्ट नहीं भोगना पड़ता।
शाण्डिलीके उपदेशसे कात्यायनीके द्वारा पंचपिण्डा गौरीकी उपासना और पति-प्रेमकी प्राप्ति
सूतजी कहते हैं—याज्ञवल्क्यजीके दो स्त्रियाँ थीं, दोनों ही सब प्रकारके सद्गुणोंसे सम्पन्न थीं। उनमेंसे जो बड़ी स्त्री थी, उसका नाम मैत्रेयी था और छोटीका नाम कात्यायनी था। उन दोनोंके द्वारा निर्मित दो सुन्दर कुण्ड हाटकेश्वरक्षेत्रमें विद्यमान हैं। वहाँ स्नान करनेवाले मनुष्य महान् अभ्युदयकारी उत्तम लोकोंको जाते हैं। कात्यायनी और पतिव्रता शाण्डिलीके दो उत्तम तीर्थ और हैं, जहाँ परम वैराग्यको प्राप्त होकर आयी हुई कात्यायनीको शाण्डिली देवीने बोध कराया था। जो नारी मार्गशीर्ष शुक्ल पक्षकी तृतीयाको वहाँ एकाग्रचित्त हो स्नान करती है, वह अखण्ड सौभाग्यवती होती है। जो स्त्री दुर्भाग्ययुक्त, कानी, बूढ़ी और नाटी है, वह भी उस तीर्थमें स्नान करनेके प्रभावसे अपना अभीष्ट मनोरथ प्राप्त कर लेती है।
एक दिन कात्यायनी फल लेनेके लिये अपने आश्रमसे बाहर निकली, उस समय उसने शाण्डिलीको देखा। वह पतिके पास हाथ जोड़कर विनीत भावसे झुकी हुई-सी खड़ी थी और उसके पति भी अनुरागयुक्त हृदय तथा प्रसन्नतापूर्ण दृष्टिसे उसीका मुँह निहारते हुए गुण-दोषका विवेचन कर रहे थे। उन दोनों पति-पत्नीको एक-दूसरेसे अत्यन्त प्रसन्न देखकर कात्यायनी अपने चित्तमें यह विचार करने लगी कि ‘यह तपस्विनी धन्य है, जिसका पति इसके मुखकी ओर प्रेमसे देखते हुए गुण-दोषोंका विवेचन कर रहा है। पत्नीके प्रति इसके हृदयमें अत्यन्त अनुराग और स्नेह है।’ यही सब सोचती हुई पतिव्रता कात्यायनी अपने आश्रममें चली गयी।
तदनन्तर एक समय जब शाण्डिलीके पति किसी कार्यसे बाहर चले गये, तब एकान्तमें बैठी हुई शाण्डिलीके पास कात्यायनी गयी और आदरपूर्वक बोली—‘कल्याणी! मुझे कोई ऐसा उपदेश दो, जिससे पति स्त्रीके प्रति विशेष प्रेम रखनेवाला हो। कभी कटुवचनोंद्वारा पत्नीका अपमान न करे।’
शाण्डिली बोली—साध्वी! सुनो, मैं तुमसे एक रहस्यकी बात बताती हूँ। मेरे पिता मुनिवर शाण्डिल्य जब नयी अवस्थाके थे, तब कुरुक्षेत्रमें