संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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आश्रम बनाकर रहते थे। वहीं मैं उनकी इकलौती कन्या उत्पन्न हुई। उस तपोवनमें ही मैं क्रमशः बड़ी हुई और होमके समय पिताजीकी यथायोग्य सेवा करती रही। प्रतिदिन उनके लिये नीवार आदि धान्य लाया करती थी। एक समय मेरे पिताके आश्रममें मुनिश्रेष्ठ नारदजी आये। मैंने पिताजीकी आज्ञासे उनके पैर धोकर स्नान आदि कराया और उनकी थकावट दूर की। भोजनके अन्तमें जब मुनि सुखसे विराजमान हुए, तब मेरी माताने उनसे विनयपूर्वक पूछा—'मुनिश्रेष्ठ! यह हमें एक कन्या पैदा हुई है, जो प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है। अतः इसके लिये कोई सुखदायक पति प्राप्त हो, ऐसा उपाय बताइये। कोई व्रत, नियम, होम, मन्त्र आदि ऐसा बताइये, जिसके करनेसे इसको कोमल स्वभाववाला सद्गुणी पति प्राप्त हो, जो प्रिय बोलनेवाला तथा परस्त्रीसे विमुख रहनेवाला हो।'
मेरी माताका यह वचन सुनकर नारदजीने कहा—हाटकेश्वरक्षेत्रमें पंचपिण्डा गौरी हैं, जिनकी स्थापना स्वयं पार्वतीदेवीने की है। उन्हीं पंचपिण्डा गौरीकी यह एक वर्षतक प्रत्येक तृतीयाको अत्यन्त श्रद्धाके साथ पूजा-आराधना करे। इस प्रकार वर्ष समाप्त होनेपर यह यथायोग्य पति प्राप्त करेगी। ऐसा कहकर मातासे विदा ले मुनिश्रेष्ठ नारदजी प्रसन्नतापूर्वक तीर्थयात्राको चले गये। कात्यायनी! कुमारी होते हुए भी मैंने नारदजीकी आज्ञासे उत्तम पतिकी इच्छा रखकर मार्गशीर्षमाससे आरम्भ करके एक वर्षतक प्रत्येक तृतीयाको भक्तिपूर्वक पंचपिण्डा गौरीकी आराधना की और गन्ध, माल्य, अनुलेपन, भाँति-भाँतिके दान और नैवेद्य आदिके द्वारा उनका पूजन किया। उसीके प्रभावसे मुझे ये जैमिनि नामवाले श्रेष्ठ द्विज पतिरूपमें प्राप्त हुए हैं। अतः कल्याणी! तुम भी इन पंचपिण्डा गौरीकी पूजा करो। इससे तुम्हें उत्तम सौभाग्यकी प्राप्ति होगी।
शाण्डिलीका कथन सुनकर कात्यायनीने उसे प्रणाम किया और प्रसन्नतापूर्वक अपने घर लौट आयी। मार्गशीर्षमास आनेपर तृतीया तिथिको शुभ दिनमें कात्यायनीने गौरीदेवीका पूजन किया और एक वर्षतक वह इस नियमका पालन करती रही। उसने मिष्टान्न आदि सरस भोजनोंसे गौरी देवीको तृप्त किया। तदनन्तर वर्ष पूरा होनेपर उसके पति याज्ञवल्क्य स्वयं उसके पास आये और प्रेमपूर्वक बोले—'शुभे! चलो, चलो, अपने घर चलें।' ऐसा कहकर वे कात्यायनीका दाहिना हाथ पकड़कर उसे अपने घर लिवा ले गये और मैत्रेयीके साथ जैसा उनका बर्ताव था, वैसा ही बर्ताव वे कात्यायनीके साथ भी करने लगे। तत्पश्चात् कात्यायनीसे उन्होंने एक गुणवान् पुत्र उत्पन्न किया, जिसका नाम कात्यायन था। वह यज्ञविद्यामें परम निपुण था। उस कात्यायनके पुत्र वररुचि हुए, जो समस्त गुणोंके समुद्र, सर्वज्ञ एवं वेदोंके पारंगत विद्वान् हुए। उन्होंने हाटकेश्वरक्षेत्रमें विद्यार्थियोंके लाभके लिये गणेशजीकी स्थापना की है। चतुर्थी और शुक्रवारके योगमें उन गणेशजीकी विशेषरूपसे आराधना करके द्विज वेद-वेदांगोंका पारंगत विद्वान् होता है।
वास्तुपदतीर्थ तथा अजागृहा देवीकी महिमा और एक ब्राह्मणका रोगोंसे उद्धार
सूतजी कहते हैं—कात्यायनने हाटकेश्वरक्षेत्रमें वास्तुपद नामक उत्तम तीर्थका निर्माण किया, जो मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको देनेवाला है। वहाँपर अड़तालीस देवताओंकी पूजा होती है, जो पूजित होनेपर तत्क्षण सिद्धि प्रदान करते हैं। याज्ञवल्क्यके पुत्र कात्यायन तथा विश्वकर्माने वहाँ संसारके हितके लिये शालाकर्म आदि करके वास्तुपूजा की थी; इसीलिये उस क्षेत्रमें