भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1174, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1174
* नागरखण्ड-पूर्वार्ध *१९४५

वास्तुपद नामक तीर्थ प्रसिद्ध हुआ। उसके दर्शन करनेपर मनुष्य पापसे तथा कर्मनाशके दोषसे छूट जाता है। घरमें जो शिला, कुत्सित पद और कुवास्तुजनित दोष होते हैं, वे उस तीर्थके दर्शनसे मिट जाते हैं। वैशाख शुक्ल तृतीयाको रोहिणी नक्षत्रमें महात्मा कात्यायनने उस वास्तुपदकी प्रतिष्ठा की थी; अतः वैसा समय आनेपर जो मनुष्य उसी विधिसे वास्तुपदकी पूजा करता है, वह राजा होता है। शिल्प आदिकी दृष्टिसे दोषयुक्त और उपद्रवपूर्ण घरको पाकर भी मनुष्य यदि उस तीर्थका संयोग प्राप्त कर ले, तो उसी दिनसे उसके घरमें अभ्युदय होने लगता है।

ब्रह्मर्षियो! जिस समय सर्वलोकहितकारी राजा अजापाल राज्य करते थे, उस समय सम्पूर्ण व्याधियाँ उनके यहाँ अजा (बकरी)-के रूपमें रहती थीं। उनको अपने अधीन सुरक्षित रखनेके कारण ही वे अजापाल कहलाते थे। वे उन सब बकरियोंको रातमें ले आकर एक स्थानपर रख देते थे। अतः उन अजाओंका आश्रयस्थान अजागृहके नामसे प्रसिद्ध हुआ। हाटकेश्वरक्षेत्रमें अजागृह नामक जो तीर्थ है, वह दर्शन करनेपर भूतलके समस्त मनुष्योंके पापोंका नाश करनेवाला है। विप्रवरो! उस क्षेत्रमें एक समय कोई तपस्वी-रूपधारी ब्राह्मण आया और तीर्थयात्राके प्रसंगसे रातमें वहाँ ठहरा। उसने उस अजावृन्दको निर्भय बैठा देख यह अनुमान किया 'यहाँ निश्चय ही कोई मनुष्य रहता होगा। अन्यथा रातको इस वनमें रक्षकसे रहित पशु कैसे टिक सकते हैं। वह रक्षक कहींसे आता ही होगा, अतः मैं निर्भय होकर यहीं रहूँगा।' इस प्रकार विचारते हुए तपस्वी ब्राह्मण वहीं सो गया। सोते हुए ही उसकी सारी रात बीत गयी। सोकर उठनेपर वह बहुत थका हुआ-सा हो गया। सबेरा होनेपर जब उसने अपने शरीरकी ओर दृष्टिपात किया तो अपनेको कोढ़ आदि रोगोंसे घिरा पाया। उस स्थानसे एक पग भी कहीं अन्यत्र जानेकी शक्ति उसमें नहीं रह गयी थी। उन भयंकर रोगोंसे युक्त होकर वह सोचने लगा—

'क्या कारण है कि मेरा शरीर अकस्मात् ऐसा हो गया?' इतनेमें ही वहाँ एक तेजस्वी पुरुष आये, उन्होंने उस अजायूथको भिन्न-भिन्न नामोंसे पुकारा और बायें हाथमें डंडा लेकर सबको चरानेके लिये ले चला। इसी समय उनकी दृष्टि भय और रोगोंसे घिरे हुए उस ब्राह्मणपर पड़ी, जो कहीं भी जानेमें असमर्थ था। तब राजाने आदरपूर्वक पूछा—'द्विजश्रेष्ठ! तुम कौन हो, जो इस दशामें इस स्थानपर आये हो। मेरे राज्यमें तो कहीं किसीके भी कोई रोग नहीं है? तुमने भी मेरा नाम सुना होगा। मैं ही राजा अज हूँ। लोगोंके हितके लिये मैं समस्त रोगोंको अजाके रूपमें एकत्र करके उनकी रखवाली करता हूँ। तुम्हारे शरीरमें जो रोग है, उसे बताओ। जिससे मैं उस रोगको भी बाँध लूँ।

ब्राह्मणने कहा— राजन्! मैं तीर्थयात्रामें तत्पर होकर समस्त भूमण्डलका भ्रमण करता हूँ। क्रमशः घूमता हुआ इस हाटकेश्वरक्षेत्रमें आया हूँ। इन पशुओंको देखकर यहाँ किसी मनुष्यके भी स्थित होनेकी सम्भावना करके रातमें यहीं इनके समीप सो गया था। सबेरा होनेपर जब अपने शरीरकी ओर देखता हूँ, तब यह कोढ़ आदि रोगोंसे घिरा हुआ है। नृपश्रेष्ठ! ऐसा होनेका क्या कारण है? इसे मैं ठीक-ठीक नहीं समझ सका। अब जिस प्रकार मेरा शरीर नीरोग हो, वह उपाय करो।

तब राजा अजापालने उन रोगोंसे कहा— किसने मेरी आज्ञा भंग की है?

रोग बोले— राजन्! इस कार्यमें आप हमलोगोंपर कोप न करें। इस ब्राह्मणके शरीरमें राजयक्ष्मा, कोढ़ और खुजली—इन तीन रोगोंका आवेश हुआ है। ये तीनों ही संसर्गज रोग हैं, इनमेंसे प्रथम दो रोग तो अमिट हैं। इन दोनोंके लिये ब्रह्माजीका शाप है, जिससे इनकी निवृत्ति नहीं होती। अतः इस विषयमें जो आपको उचित प्रतीत हो सो करो। इस ब्राह्मणने स्वयं ही इन तीनों अजाओं (रोगों)-का स्पर्श कर लिया था। अतः जबतक इसका शरीर रहेगा, वे दो रोग तो अवश्य बने रहेंगे।

यह सुनकर राजा अजापाल भी वहीं ठहर

संक्षिप्त स्कन्द पुराण · पृष्ठ 1174, कुल 1406 में से · BharatKosha