संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १९४५ |
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वास्तुपद नामक तीर्थ प्रसिद्ध हुआ। उसके दर्शन करनेपर मनुष्य पापसे तथा कर्मनाशके दोषसे छूट जाता है। घरमें जो शिला, कुत्सित पद और कुवास्तुजनित दोष होते हैं, वे उस तीर्थके दर्शनसे मिट जाते हैं। वैशाख शुक्ल तृतीयाको रोहिणी नक्षत्रमें महात्मा कात्यायनने उस वास्तुपदकी प्रतिष्ठा की थी; अतः वैसा समय आनेपर जो मनुष्य उसी विधिसे वास्तुपदकी पूजा करता है, वह राजा होता है। शिल्प आदिकी दृष्टिसे दोषयुक्त और उपद्रवपूर्ण घरको पाकर भी मनुष्य यदि उस तीर्थका संयोग प्राप्त कर ले, तो उसी दिनसे उसके घरमें अभ्युदय होने लगता है।
ब्रह्मर्षियो! जिस समय सर्वलोकहितकारी राजा अजापाल राज्य करते थे, उस समय सम्पूर्ण व्याधियाँ उनके यहाँ अजा (बकरी)-के रूपमें रहती थीं। उनको अपने अधीन सुरक्षित रखनेके कारण ही वे अजापाल कहलाते थे। वे उन सब बकरियोंको रातमें ले आकर एक स्थानपर रख देते थे। अतः उन अजाओंका आश्रयस्थान अजागृहके नामसे प्रसिद्ध हुआ। हाटकेश्वरक्षेत्रमें अजागृह नामक जो तीर्थ है, वह दर्शन करनेपर भूतलके समस्त मनुष्योंके पापोंका नाश करनेवाला है। विप्रवरो! उस क्षेत्रमें एक समय कोई तपस्वी-रूपधारी ब्राह्मण आया और तीर्थयात्राके प्रसंगसे रातमें वहाँ ठहरा। उसने उस अजावृन्दको निर्भय बैठा देख यह अनुमान किया 'यहाँ निश्चय ही कोई मनुष्य रहता होगा। अन्यथा रातको इस वनमें रक्षकसे रहित पशु कैसे टिक सकते हैं। वह रक्षक कहींसे आता ही होगा, अतः मैं निर्भय होकर यहीं रहूँगा।' इस प्रकार विचारते हुए तपस्वी ब्राह्मण वहीं सो गया। सोते हुए ही उसकी सारी रात बीत गयी। सोकर उठनेपर वह बहुत थका हुआ-सा हो गया। सबेरा होनेपर जब उसने अपने शरीरकी ओर दृष्टिपात किया तो अपनेको कोढ़ आदि रोगोंसे घिरा पाया। उस स्थानसे एक पग भी कहीं अन्यत्र जानेकी शक्ति उसमें नहीं रह गयी थी। उन भयंकर रोगोंसे युक्त होकर वह सोचने लगा—
'क्या कारण है कि मेरा शरीर अकस्मात् ऐसा हो गया?' इतनेमें ही वहाँ एक तेजस्वी पुरुष आये, उन्होंने उस अजायूथको भिन्न-भिन्न नामोंसे पुकारा और बायें हाथमें डंडा लेकर सबको चरानेके लिये ले चला। इसी समय उनकी दृष्टि भय और रोगोंसे घिरे हुए उस ब्राह्मणपर पड़ी, जो कहीं भी जानेमें असमर्थ था। तब राजाने आदरपूर्वक पूछा—'द्विजश्रेष्ठ! तुम कौन हो, जो इस दशामें इस स्थानपर आये हो। मेरे राज्यमें तो कहीं किसीके भी कोई रोग नहीं है? तुमने भी मेरा नाम सुना होगा। मैं ही राजा अज हूँ। लोगोंके हितके लिये मैं समस्त रोगोंको अजाके रूपमें एकत्र करके उनकी रखवाली करता हूँ। तुम्हारे शरीरमें जो रोग है, उसे बताओ। जिससे मैं उस रोगको भी बाँध लूँ।
ब्राह्मणने कहा— राजन्! मैं तीर्थयात्रामें तत्पर होकर समस्त भूमण्डलका भ्रमण करता हूँ। क्रमशः घूमता हुआ इस हाटकेश्वरक्षेत्रमें आया हूँ। इन पशुओंको देखकर यहाँ किसी मनुष्यके भी स्थित होनेकी सम्भावना करके रातमें यहीं इनके समीप सो गया था। सबेरा होनेपर जब अपने शरीरकी ओर देखता हूँ, तब यह कोढ़ आदि रोगोंसे घिरा हुआ है। नृपश्रेष्ठ! ऐसा होनेका क्या कारण है? इसे मैं ठीक-ठीक नहीं समझ सका। अब जिस प्रकार मेरा शरीर नीरोग हो, वह उपाय करो।
तब राजा अजापालने उन रोगोंसे कहा— किसने मेरी आज्ञा भंग की है?
रोग बोले— राजन्! इस कार्यमें आप हमलोगोंपर कोप न करें। इस ब्राह्मणके शरीरमें राजयक्ष्मा, कोढ़ और खुजली—इन तीन रोगोंका आवेश हुआ है। ये तीनों ही संसर्गज रोग हैं, इनमेंसे प्रथम दो रोग तो अमिट हैं। इन दोनोंके लिये ब्रह्माजीका शाप है, जिससे इनकी निवृत्ति नहीं होती। अतः इस विषयमें जो आपको उचित प्रतीत हो सो करो। इस ब्राह्मणने स्वयं ही इन तीनों अजाओं (रोगों)-का स्पर्श कर लिया था। अतः जबतक इसका शरीर रहेगा, वे दो रोग तो अवश्य बने रहेंगे।
यह सुनकर राजा अजापाल भी वहीं ठहर
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गये और उस ब्राह्मणसे बोले—विप्रवर! तुम्हें भय नहीं करना चाहिये। इस भयंकर रोगसे तुम्हारी रक्षा मैं करूँगा। ऐसा कहकर राजाने बड़ी भारी तपस्या की। वे भक्तिपूर्वक दिन-रात उस क्षेत्रकी देवीकी आराधना करने लगे। मुण्ड, अथर्वशीर्ष, क्षेत्रपाल-सूक्त तथा वास्तुसूक्तके मन्त्रोंद्वारा देवीकी स्तुति करते हुए सरसों, लाल फूल, गुग्गुल और धूपकी आहुति देते थे। तत्पश्चात् नीलरुद्रका विशेषरूपसे जप करते थे। एक समय जब रात्रि व्यतीत हो रही थी, उनके होमकुण्डसे मन्त्रोंद्वारा आकृष्ट हुई उस क्षेत्रकी देवी धरती फोड़कर प्रकट हुई और बोली—'राजन्! मैं इस क्षेत्रकी अधिष्ठात्री देवी हूँ। इस होमके प्रभावसे तुमपर प्रसन्न हो पृथ्वीसे निकली हूँ। महाभाग! तुम्हारा जो कार्य हो उसे बताओ, मैं पूर्ण करूँगी।'
राजाने कहा—देवि! तुम सदा इसी स्थानपर निवास करो, जिससे रोगोंके संसर्गजनित दोष इस भूमिसे विदा हो जायँ तथा ये ब्राह्मणदेवता जैसे भी रोगमुक्त हों, वैसा उपाय करो।
क्षेत्रदेवी बोली—राजन्! इस स्थानको मैंने सब व्याधियोंके दोषोंसे रहित कर दिया। आजसे मैं सदा यहीं निवास करूँगी। इस समयसे जो भी व्याधिग्रस्त पुरुष इस स्थानपर आवेगा और भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, वह पूर्णतः नीरोग हो जायगा। अतः आज ये द्विजश्रेष्ठ आदर और भक्तिके साथ पवित्र एवं एकाग्रचित्त होकर मेरी पूजा करें। इस क्षेत्रमें एक दूसरा प्रसिद्ध तीर्थ है—चन्द्रकूपिका। उसमें ये ब्राह्मणदेवता प्रतिदिन स्नान करें। पूर्वकालमें दक्षके शापसे क्षयरोगसे ग्रस्त हुए महात्मा चन्द्रदेवने अपने स्नानके लिये उस कूपका निर्माण किया था। इसके सिवा यहाँ 'खण्डशिला' नामसे प्रसिद्ध एक देवी रहती हैं, वहीं सौभाग्यकूपिका नामक तीर्थ है। उस कूपमें स्नान करके ये खण्डशिला देवीका दर्शन करें। पूर्वकालमें कुष्ठरोगसे पीड़ित कामदेवने अपने स्नान तथा कुष्ठरोगके निवारणके लिये उस सौभाग्यकूपिकाका निर्माण किया था। इसी प्रकार यहाँ आप्सरसकुण्ड है, जिसमें रविवारके दिन स्नान करनेसे खुजली मिट जाती है।
तदनन्तर ब्राह्मणदेवताने परम पवित्र चन्द्रकूपिकामें स्नान करके भक्तिभावसे देवीका पूजन किया। एक मासतक पूजा करनेके बाद वे राजयक्ष्मासे मुक्त हो गये। तत्पश्चात् कामदेवनिर्मित सौभाग्यकूपिकाका दर्शन और उसमें स्नान करके वे खण्डशिला देवीका दर्शन प्रतिदिन करने लगे। एक मासतक ऐसा करनेसे उन्हें कुष्ठरोगसे भी छुटकारा मिल गया। उसके बाद रविवारको अप्सराओंके कुण्डमें स्नान करनेसे उनकी खुजली भी जाती रही। रोगमुक्त होकर ब्राह्मण अत्यन्त तेजस्वी दिखायी देने लगे। उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर राजाको आशीर्वाद दिया और उनसे विदा लेकर वे अभीष्ट स्थानको चले गये। इसके बाद राजा अज पुनः अपनी स्त्रीके साथ पाताललोकमें हाटकेश्वरजीके समीप चले गये। अजागृहमें स्थित होनेके कारण उस क्षेत्रकी देवी सब ओर अजागृहाके नामसे विख्यात हुई। आज भी राजयक्ष्मासे ग्रस्त हुआ जो मनुष्य उसी विधिसे देवीका पूजन करता है, वह शीघ्र ही नीरोग हो जाता है।
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पतिव्रताकी शक्तिसे उसके मरे हुए पतिको पुनः नवजीवनकी प्राप्ति
सूतजी कहते हैं—पूर्वकालमें श्रेष्ठ नगर वर्धमानपुरमें वीरशान्त नामसे विख्यात एक ब्राह्मण रहते थे, वे वेद-विद्यामें प्रवीण थे। उनके एक कन्या उत्पन्न हुई, जो प्रमाणसे बहुत बड़ी थी। वह कुमारी धीरे-धीरे युवावस्थाको प्राप्त हुई; परंतु किसी भी पुरुषने उसका वरण नहीं किया, क्योंकि जो काममोहित पुरुष अत्यन्त थोड़े केशवाली, अत्यन्त बड़ी तथा अधिक नाटी कन्याओंसे विवाह करता है, वह छः महीनेके भीतर मृत्युको प्राप्त होता है। इसी कारण सब लोग उस कुमारीको बहुत बड़ी बताकर त्याग देते थे। इससे वैराग्यको प्राप्त होकर उस
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कुमारीने घोर तपस्या की। इस प्रकार तपमें लगी हुई उस कन्याके समीप राजसम्पदा उपस्थित हुई। उस समय इन्द्रने उसे प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'शुभे! तुम कन्यावस्थामें ऋतुकालको प्राप्त हुई हो, इस कारण सदोष हो गयी हो। अतः किसी पतिका वरण करो, जिससे पवित्रताको प्राप्त होओगी।' यह सुनकर उस कन्याको बड़ी लज्जा हुई। उसने वर्धमानपुरमें जाकर हाथ उठाकर कहा—'यदि कोई कुलीन ब्राह्मण मेरा पाणिग्रहण करे, तो मेरी आधी तपस्या उसकी हो जायगी और मैं उसका कल्याण करूँगी।'
यह सुनकर किसी कोढ़ी ब्राह्मणने उसे बुलाकर कहा—यदि तू सदा मेरे कहे अनुसार चले, तो मैं तेरा पाणिग्रहण करके तेरे साथ विवाह करूँगा।
कुमारी बोली—द्विजश्रेष्ठ ! तुम शास्त्रोक्त विधिसे मेरा पाणिग्रहण करो, मैं तुम्हारी प्रत्येक आज्ञाका पालन करूँगी। तदनन्तर ब्राह्मणने गृह्यसूत्रोक्त विधानसे देवता, अग्नि तथा गुरुके समीप उस कुमारीका पाणिग्रहण किया। विवाहके पश्चात् दीर्घिका ब्राह्मणी पतिसे बोली—'नाथ! आज्ञा दीजिये मैं इस समय आपकी क्या सेवा करूँ?'
पति बोले—सुन्दरि ! मैं तुम्हारी सहायतासे अड़सठ तीर्थोंमें स्नान करना चाहता हूँ। यदि यह कार्य कर सको तो करो।
तब उस पतिव्रताने 'बहुत अच्छा' कहकर पतिकी आज्ञा शिरोधार्य की और पतिके बराबर बाँसकी एक मजबूत खाट बनाकर उसपर कोमल रूई भरा हुआ बिछावन डाल दिया और हाथ जोड़कर कहा—'प्राणनाथ ! इसपर बैठिये; जिससे आपको मस्तकपर लेकर समस्त शुभ तीर्थोंकी यात्रा करा सकूँ।' तब कोढ़ी ब्राह्मण प्रसन्न हो पृथ्वीसे शनैः-शनैः उठकर बाँसके उस खटोलेपर बैठा और वह उसे माथेपर लेकर सब तीर्थोंमें घूम-घूमकर अपने पतिको तीर्थस्नान कराने लगी। क्रमशः समूची पृथ्वीपर घूमती हुई एक दिन सन्ध्या होते-होते वह हाटकेश्वरक्षेत्रमें पहुँची। उस समय वह थक गयी थी, पैर लड़खड़ा रहे थे। उसी प्रदेशमें उस दिन मुनिवर माण्डव्यको शूलीपर चढ़ाया गया था। वे अत्यन्त दुःख सहन करते हुए शूलीपर बैठे हुए थे। पतिव्रता दीर्घिका माथेपर भार लेकर उसी मार्गसे निकली। उसके धक्केसे वह शूल हिल गया और मुनिवर माण्डव्यका शरीर भी विचलित हो गया। इससे उन्हें बड़ी भारी पीड़ा हुई और वे दुःखी होकर बोले—'किस पापीने मेरे इस शूलको हिला दिया, जिससे मुझ दुःखीका दुःख और भी बढ़ गया।'
दीर्घिका बोली—महाभाग! मैंने आपको देखा नहीं, भूलसे आपका स्पर्श हो गया।
माण्डव्य बोले—निष्ठुरे! तुमने मुझे प्राणान्तकारिणी पीड़ा दी है, इसलिये तुम्हारा अभीष्ट पति सूर्यकी किरणोंका स्पर्श होते ही मेरे शापसे निश्चय ही अपने प्राणोंको त्याग देगा।
दीर्घिका बोली—यदि प्रातःकाल मेरे पतिकी मृत्यु होगी तो अब प्रातःकाल या सूर्योदय होगा ही नहीं।
ऐसा कहकर दीर्घिका धरतीपर बैठ गयी और बाँसके खटोलेमें बैठे पतिको उसने माथेपरसे उतार दिया। उस समय कोढ़ीने कहा—'प्रिये ! मुझे प्यास लग रही है; अतः पीनेके योग्य शीतल जल ले आओ।' इतना सुनते ही वह पतिकी आज्ञाका पालन करनेके लिये उत्सुक हो पानी लानेके लिये इधर-उधर घूमने लगी, किंतु अन्धकारमें उसे कहीं भी जल नहीं दिखायी दिया। तब उसने पृथ्वीपर आघात किया और माण्डव्य मुनिके देखते-देखते निर्मल एवं स्वादिष्ट जल निकल आया। फिर परिश्रमसे कष्ट पाते हुए अपने पतिको उस जलसे स्नान कराया और उन्हें जल पिलाकर स्वयं भी पीया। उस समय पतिव्रताके भयसे सूर्यदेव उदित नहीं हुए। इससे प्रातःकाल आनेमें बहुत विलम्ब हुआ। रात्रिको बहुत बड़ी होती देख यज्ञकर्म करनेवाले शान्तचित्त ब्राह्मण बहुत दुःखी हो गये। देवता यज्ञभागसे वंचित होकर बड़े कष्टमें पड़ गये और सूर्यनारायणके
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निकट जाकर बोले—'दिवाकर! आपका उदय क्यों नहीं होता? देखिये आपके बिना सम्पूर्ण जगत् व्याकुल हो रहा है।'
सूर्यदेवने कहा—देवताओ! मैंने पतिव्रताके आदेशसे अपना उदय रोक रखा है। अतः आप सब लोग उसके पास जाकर मेरे उदयके लिये अनुरोध करें। उसकी आज्ञा होनेपर मैं सुख-पूर्वक उदय हो जाऊँगा। एक लक्ष अश्वमेध यज्ञोंके अनुष्ठानसे जो फल प्राप्त होता है, उसीको स्त्री केवल पातिव्रत्यधर्मके पालनसे प्राप्त कर लेती है।
यह सुनकर सब देवता उस उत्तम क्षेत्रको गये और दीर्घिकाके सम्मुख खड़े हो कोमल वचनोंमें बोले—पतिव्रते! तुमने जो सूर्यका उदय रोक दिया, सो अच्छा नहीं किया। क्योंकि इससे पृथ्वीपर शुभ कर्मोंका अनुष्ठान रुक गया है। अतः शुभे! तुम आज्ञा दे दो, जिससे सूर्यदेव उदित हों।
दीर्घिका बोली—माण्डव्य मुनिने अकारण मेरे पतिको शाप दिया है। जब मेरे पति ही नहीं रहेंगे, तब मुझे सूर्योदयसे, यज्ञसे, श्राद्धसे और दान आदिसे क्या प्रयोजन है।
तब सब देवता एक-दूसरेकी ओर देखकर दीर्घिकासे बोले—'भद्रे! सूर्यका उदय होने दो, तुम्हारे प्रिय पतिकी भी मृत्यु हो जाय और ये मुनीश्वर माण्डव्य भी सत्यवादी हो जायें। इसके बाद हम शीघ्र ही मृत्युके मार्गमें गये हुए तुम्हारे पतिको पुनः जीवित कर देंगे। उस समय तुम्हारे पतिकी अवस्था पच्चीस वर्षकी-सी हो जायगी और तुम बड़े सुन्दररूपमें अपने पतिका दर्शन करोगी तथा तुम भी पंद्रह वर्षकी-सी अवस्थासे युक्त एवं कमलके समान नेत्रोंवाली होकर स्वेच्छानुसार मर्त्यलोकमें सुखका उपभोग करोगी और ये पापरहित मुनिवर माण्डव्य भी शूलभेदकी पीड़ासे मुक्त होकर सुखके भागी होंगे।'
तब दीर्घिकाने 'बहुत अच्छा' कहकर देवताओंकी बात मान ली। उसके 'हाँ' कहते ही भगवान् सूर्य बड़े वेगसे उदित हुए। सूर्यकी किरणोंका स्पर्श होते ही कोढ़ी ब्राह्मणकी मृत्यु हो गयी; किंतु देवताओंके हाथोंका स्पर्श पाकर पुनः वह उठ खड़ा हुआ। उसकी अवस्था पच्चीस वर्षकी-सी दिखायी दे रही थी। जान पड़ता था, दूसरे कामदेव ही आ गये हैं। उसे अपने पूर्वजन्मकी सब बातोंका स्मरण था, अतः इस नूतन जन्मसे उसे बड़ा हर्ष हो रहा था। दीर्घिका भी भगवान् शंकरका स्पर्श पाकर दिव्य लक्षणोंसे लक्षित युवती हो गयी। उसके नेत्र कमलदलके समान शोभा पा रहे थे और मुख चन्द्रमाके समान मनोहर प्रतीत होता था। तदनन्तर देवताओंने माण्डव्य मुनिको शूलीसे उतारकर कहा—'मुने! आपने जो शाप दिया था, वह आपका वचन सत्य किया गया। सूर्यकी किरणोंके स्पर्शसे वह कोढ़ी ब्राह्मण मर गया। तत्पश्चात् पुनः हमने इस स्त्रीके साथ उसे तरुण जीवन प्रदान किया है; अतः अब आप अपने आश्रमको पधारें और हमसे वर माँगें।'
## शूलीतीर्थ और दीर्घिकातीर्थका प्राकट्य, माण्डव्य मुनिका धर्मराजको शाप देना और उनके शूलीपर चढ़नेका कारण
माण्डव्यजीने कहा—सुरश्रेष्ठगण! मैं आपलोगोंसे वर ग्रहण करूँगा; परंतु ये धर्मराज मेरे एक प्रश्नका निर्णय करें। संसारमें समस्त प्राणियोंके लिये सुख और दुःखके रूपमें उनके पूर्वजन्मका शुभाशुभ कर्म ही उपस्थित होता है। यह सर्वथा सत्य सिद्धान्त है। मैंने इस लोक या परलोकमें कौन-सा पातक किया है, जिससे मुझे ऐसी वेदना प्राप्त हुई और किसी प्रकार भी मृत्यु नहीं हुई।
धर्मराजने कहा—विप्रवर! तुमने दूसरे शरीरमें
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बचपनके समय तीखे शूलके अग्रभागसे पृथ्वीके एक जीवको बींधा था। यही एक पाप तुमसे हुआ है, इसके सिवा दूसरा कोई थोड़ा-सा भी पाप नहीं दिखायी देता। इसीलिये तुम्हें इस दशामें डाला गया है।
सूतजी कहते हैं—धर्मराजकी यह बात सुनकर माण्डव्य मुनिको बड़ा रोष हुआ। तब माण्डव्यने अपने सामने खड़े हुए धर्मराजसे कहा—'धर्म! तुमने मेरे थोड़ेसे अपराधके लिये महान् दण्ड दिया है। अतः मेरा शाप ग्रहण करो। तुम मानव-शरीर पाकर शूद्रयोनिमें स्थित हो जाति-संहारजनित महान् दुःखका उपभोग करोगे तथा आजसे मैंने समस्त देहधारियोंके लिये व्यवस्था कर दी कि आठ वर्षसे ऊपरका मनुष्य ही अपने निन्दित कर्मके कारण दण्डका भागी होगा।' ऐसा कहकर माण्डव्य मुनि शूलीकी पीड़ासे मुक्त हो अभीष्ट दिशाकी ओर चल दिये। उन्हें जाते देख सब देवताओंने कहा—'भगवन्! धर्मराज तो केवल न्याय करते हैं, अतः आप उन्हें शापके द्वारा शूद्र न बनावें। आप इनके ऊपर कृपा-प्रसाद करें।'
माण्डव्यने कहा—मैंने जो बात कह दी, वह मिथ्या नहीं हो सकती। निश्चय ही ये धर्मराज शूद्रयोनिमें पड़ेंगे तथापि शूद्रयोनिमें रहते हुए भी इन्हें उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति होगी और ये पुनः परम उत्तम धर्मराज-पदको प्राप्त कर लेंगे। इन्हें इसी क्षेत्रमें रहकर शान्तभावसे भगवान् शंकरकी आराधना करनी चाहिये। महादेवजीके प्रसादसे इन्हें शीघ्र मोक्ष प्राप्त होगा और यदि आपलोग मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो यह शूली आज मेरे स्पर्शसे धर्मदायक तीर्थ बन जाय।
देवता बोले—जो प्रातःकाल उठकर इस शूलीका स्पर्श करेगा, वह इस लोकमें पातकसे मुक्त हो जायगा।
माण्डव्य मुनिसे ऐसा कहकर इन्द्र आदि देवता पतिसहित उस पतिव्रतासे आदरपूर्वक बोले—पतिव्रते! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।
पतिव्रता बोली—देवेश्वरो! इस स्थानमें मेरे द्वारा जो गड्डा बनाया गया है, वह तीनों लोकोंमें दीर्घिकातीर्थके नामसे विख्यात हो।
देवताओंने कहा—आजसे लेकर तुम्हारे कथनानुसार यह गड्डा तीनों लोकोंमें दीर्घिकातीर्थके नामसे विख्यात होगा। जो मनुष्य इसमें श्रद्धापूर्वक स्नान करेंगे, वे यदि अपुत्र होंगे तो पुत्रवान् हो जायेंगे और अपने वंशकी वृद्धि करेंगे।
पतिव्रतासे ऐसा कहकर सब देवता स्वर्गलोकको चले गये। सुन्दरी पतिव्रता भी अपने उसी प्रियतम पतिके साथ रहकर सुख भोगने लगी। अन्तिम अवस्था आनेपर उसने हाटकेश्वरक्षेत्रमें अपने दीर्घिकातीर्थका सेवन किया। तदनन्तर कालवश अपने पतिकी मृत्यु हुई देख उसने भी शरीर त्याग दिया और पतिके साथ वह भी ब्रह्मलोकको चली गयी। इस प्रकार मैंने यह दीर्घिकातीर्थका वर्णन किया है।
ऋषियोंने पूछा—सूतजी! परमतपस्वी मुनिश्रेष्ठ माण्डव्यको किसने और किस कारणसे शूलीपर चढ़ाया था?
सूतजीने कहा—महर्षियो! पूर्वकालमें माण्डव्य मुनि बड़ी श्रद्धाके साथ तीर्थयात्रा करते हुए इस क्षेत्रमें आये थे। यहाँ विश्वामित्रसम्बन्धी पावन तीर्थमें जाकर उन्होंने पितरोंका तर्पण किया और सूर्योपस्थान करते हुए विभ्रादित्यादि सूर्यदेवतासम्बन्धी सूक्तका पाठ करने लगे। इसी समय कोई चोर किसीका धन चुराकर भागा और उसी ओर आ निकला। उस चोरका पीछा करते हुए कोई दूसरा मनुष्य भी उसके पीछे ही लगा हुआ वहाँ आया। तब चोरने मुनीश्वरको मौन देखकर वह धन उनके आगे रख दिया और स्वयं किसी गुफाके भीतर जा छिपा। इतनेमें ही उस धनको वापस लेनेके लिये बहुत-से मनुष्य वहाँ एकत्र हो गये। उन्होंने मुनिके आगे धनका वह गट्ठर देखकर पूछा—'महाभाग! इस मार्गसे कोई चोर यह धन लेकर आया है, बताइये वह किस मार्गसे निकला है?' माण्डव्यजी यह जानते हुए भी कि चोर
१९५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
गुफामें छिपा है, कुछ भी नहीं बोले। मौनव्रतमें ही तत्पर रहे। बार-बार पूछे जानेपर भी जब मुनि कुछ नहीं बोले, तब सबने आपसमें सलाह करके यह निश्चय किया कि अवश्य यही चोर है। हमलोगोंको अपने पीछे लगा देखकर अब साधु बनकर बैठ गया है। वे सब-के-सब दुरात्मा आभीर थे, उन्होंने पूर्वोक्त निश्चय करनेके बाद फिर कुछ विचार नहीं किया। मुनिको तत्काल ले जाकर वनके भीतर शूलीपर चढ़ा दिया। इस प्रकार माण्डव्य मुनिको निर्दोष होते हुए भी अपने पूर्वकर्मके परिणामसे शूली प्राप्त हुई।
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अन्न और जलके दानकी महत्ता, अन्नदानके बिना वसुषेणको स्वर्गमें भी कष्ट होना तथा सत्यसेनद्वारा स्थापित मिष्टान्नद देवकी महिमा
सूतजी कहते हैं—महर्षियो! प्राचीन कालमें आनर्तदेशमें वसुषेण नामवाले एक राजा राज्य करते थे। वे दीर्घकालतक राज्य कर पुत्र-पौत्रका सुख देख करके समय आनेपर मृत्युको प्राप्त हुए। तदनन्तर मन्त्रियोंने उनके पुत्र सत्यसेनको राजपदर अभिषिक्त किया। सत्यसेन शौर्य तथा उदारतासे सम्पन्न थे। राजा वसुषेणने जीवनकालमें बहुत-से दान किये थे। उस दानके ही प्रभावसे वे दिव्य वस्त्रधारी एवं दिव्यरत्नोंसे विभूषित हो श्रेष्ठ विमानपर बैठकर स्वर्गलोकमें गये। पर वहाँ जानेपर भी वे भूखकी पीड़ासे घिरे रहे। उनका चित्त प्यासके दुःखसे व्याकुल रहता था, मुँह सूखा जाता था। उन्होंने इन्द्रके निकट जाकर कहा—'सुरश्रेष्ठ! मुझे भूख-प्यास कष्ट दे रही है, इसका क्या कारण है? बताइये। शचीपते! भूखसे अत्यन्त पीड़ित रहनेवाले पुरुषको इन दिव्य आभूषणों, वस्त्रों और विमान आदिसे क्या सुख मिलता है।'
इन्द्र बोले—राजन्! तुमने असंख्य दान दिये हैं, परंतु कभी किसीको अन्न अथवा जल नहीं दिया है। इस कारण तुम स्वर्गमें भूखे-प्यासे रहते हो। जो इस लोक और परलोकमें सनातन तृप्तिकी इच्छा रखता हो, उसे सदा दक्षिणासहित अन्न और जलका दान करना चाहिये। अन्न और जलका दान न करनेके कारण ही तुम स्वर्गमें दिव्य आभूषणोंसे विभूषित और श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ होकर भी भूखसे पीड़ित हो।
राजाने कहा—देवराज! क्या ऐसा कोई उपाय है, जिससे ये मेरी तीव्रतम क्षुधा-पिपासा शान्त हो?
इन्द्र बोले—उपाय तो है, यदि तुम्हारा कोई पुत्र सदा ब्राह्मणोंके लिये अन्न और जल दे, तो तुम्हें तृप्ति प्राप्त हो सकती है; परंतु तुम्हारा पुत्र भी तुम्हारे लिये संकल्प करके ब्राह्मणोंको अन्न और जल नहीं देता है।
इन्द्र और वसुषेणमें यह बात हो ही रही थी कि वहाँ ब्रह्मलोकसे नारद मुनि आ पहुँचे। तब इन्द्रने नारदजीको विधिपूर्वक अर्घ्य प्रदान करके आदरके साथ पूछा—'विप्रवर! आप कहाँसे आये हैं और कहाँ जानेके लिये प्रस्थित हुए हैं।'
नारदजीने कहा—मैं ब्रह्मलोकसे आया हूँ और तीर्थयात्राके लिये भूतलपर जा रहा हूँ।
तब राजा बोले—मुनिश्रेष्ठ! मुझ दीनपर कृपा कीजिये। पृथ्वीपर मेरा पुत्र सत्यसेन आनर्त देशका स्वामी है। उससे कहियेगा, 'मैंने तुम्हारे पिताको इन्द्रके लोकमें देखा है, उनका शरीर भूख-प्याससे पीड़ित है और देवताओंमें रहकर भी उनका चित्त अत्यन्त दीन एवं दुःखी है। इसलिये यदि तुम मेरे पुत्र हो और सत्यकी रक्षा करते हो, तो प्रतिदिन ब्राह्मणोंको मिष्टान्न, धान और जलदान करते रहो।'
'तथास्तु' कहकर मुनिश्रेष्ठ नारदजीने राजाका सन्देश सुनानेकी प्रतिज्ञा की और इन्द्रसे विदा लेकर वे भूलोककी ओर चल पड़े। वहाँ क्रमशः अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए आनर्तदेशमें गये
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और सत्यसेनसे मिले। राजा सत्यसेनने नारदजीका पूजन किया। तत्पश्चात् मुनिने एकान्तमें आदरपूर्वक उनको पिताका सन्देश सुनाया। यह बात सुनकर सत्यसेनने विधिपूर्वक नारदजीकी पूजा करके उन्हें विदा किया और पिताके उद्देश्यसे प्रतिदिन सहस्रों ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक मिष्टान्न भोजन कराया। धर्मसम्बन्धी अन्य समस्त कार्योंको छोड़कर ग्रीष्मकालमें विशेषरूपसे पौंसला (प्याऊ) चलानेकी व्यवस्था की। इस प्रकार अन्न और जलके दानमें लगे हुए राजा सत्यसेनके राज्यमें भयंकर अनावृष्टि हुई, जो समस्त अन्न एवं खेती आदिको नष्ट कर देनेवाली थी। इन्द्रने बारह वर्षोंतक पृथ्वीपर जल नहीं बरसाया। इससे सब लोग क्षुधाके कष्टसे व्याकुल हो गये। उस समय राजा सत्यसेन पहलेकी भाँति ब्राह्मणोंको अन्नदान न कर सके। तब उनके पिता स्वप्नमें दर्शन देकर बोले—‘तुम पुत्रके रहते हुए मैं स्वर्गमें स्थित होकर भी भूख-प्याससे व्याकुल हूँ, अतः तुम अन्न दो, मिष्टान्न और जलका दान करो।’
यह स्वप्न देखनेसे राजाको बड़ा शोक हुआ। अन्नके अभावके सम्बन्धमें उन्होंने मन्त्रियोंके साथ बैठकर सलाह की और कहा—‘मैं अनाजके लिये भगवान् शंकरकी आराधना करूँगा। आपलोग सदा राज्यकी रक्षा करते रहें।' तब उन्होंने हाटकेश्वरक्षेत्रमें आकर भगवान् शंकरकी स्थापना की और यम-नियमसे रहते हुए वे उनकी भलीभाँति आराधना करने लगे। एक वर्ष पूर्ण होनेपर भगवान् शिव सन्तुष्ट हुए और राजासे इस प्रकार बोले—‘तुम इच्छानुसार वर माँगो।’
राजाने कहा—देवदेवेश्वर! मैंने अन्नकी प्राप्तिके लिये आपकी आराधना की है, अतः आप मुझे शीघ्र ही असंख्य अन्न प्रदान करें। पृथ्वीपर वर्षा हो, जिससे अनाज उत्पन्न हो और जल भी प्रचुर मात्रामें मिल सके। स्वर्गमें रहनेवाले मेरे महात्मा पिताको भी आपके प्रसादसे तृप्ति प्राप्त हो।
श्रीभगवान् बोले—राजेन्द्र! समस्त पृथ्वीपर शीघ्र ही वृष्टि होगी और पृथ्वीपर सब प्रकारके अन्न होंगे। इस समय तुम अपने घर जाओ। राजन्! तुमने यहाँ जो मेरे लिंगकी प्रतिष्ठा की है, इसका जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर दर्शन करेगा, उसे मनोवांछित वस्तुकी प्राप्ति होगी।
ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् राजा सत्यसेन बड़े हर्षसे अपने निवासस्थानपर आये और पृथ्वीका अकण्टक राज्य करने लगे।
सूतजी कहते हैं—आज भी भयंकर कलिकाल प्राप्त होनेपर जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर भक्तिपूर्वक मिष्टान्नद शिवका दर्शन करता है, वह यदि चाहे तो उसे मिष्टान्नकी प्राप्ति होती है और जो निष्कामभावसे उनका दर्शन करता है, वह देवाधिदेव शूलपाणि महादेवजीके लोकको प्राप्त होता है।
## अदितिदेवीद्वारा आराधित अमरेश्वर लिंगकी महिमा
ऋषियोंने पूछा—सूतजी! अमरत्व प्रदान करनेवाले जो अमरेश्वर महादेव बताये गये हैं, उनकी स्थापना किसने की है और उनका प्रभाव क्या है?
सूतजी बोले—पूर्वकालमें प्रजापति दक्षकी दो कन्याएँ दिति और अदिति महात्मा कश्यपजीके साथ ब्याही गयी थीं। अदितिसे देवताओंकी उत्पत्ति हुई और दितिसे दैत्योंकी। उनमें बड़ा भारी वैर उपस्थित हुआ। दैत्योंने देवताओंको पदभ्रष्ट कर दिया और वे सब सम्पूर्ण दिशाओंमें इधर-उधर भाग गये। तब देवमाता अदिति भगवान् शंकरके ध्यानमें तत्पर हो दिन-रात तपस्या करने लगीं। इस प्रकार व्रतमें स्थित हुई अदिति देवीके आगे धरती फोड़कर एक शिवलिंग प्रकट हुआ। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उसकी स्तुति करके
| १९५२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया। इसी समय आकाशवाणी हुई—'कल्याणी! तुम मनोवांछित वर माँगो।'
अदिति बोलीं—सुरश्रेष्ठ! मेरे पुत्र देवता युद्धमें दैत्योंद्वारा मारे जाते हैं। अतः आप उन्हें अमर बना दें। युद्धमें दानवोंके द्वारा उन्हें अवध्य कर दें।
श्रीभगवान् बोले—शुभे! जो मेरे इस लिंगमय विग्रहका स्पर्श करके युद्धमें जायँगे, वे एक वर्षतक शत्रुओंके द्वारा अवध्य रहेंगे। दूसरे भी जो मनुष्य माघकृष्णा चतुर्दशी (फाल्गुनकी शिवरात्रि)-को एकाग्रचित्त हो यहाँ जागरण करेंगे, वे भी एक वर्षतक नीरोग रहेंगे। जो इस शुभ देवस्थानमें आयगा, उसे मृत्यु दूरसे ही छोड़ देगी।
यह सुनकर अदितिने मरनेसे बचे हुए अपने पुत्रोंको लाकर इस शिवलिंगका दर्शन कराया और उसके माहात्म्यका भी वर्णन किया। तब देवता उस शिवलिंगको प्रणाम करके प्रसन्न हो अस्त्र-शस्त्र ले-लेकर दैत्योंपर चढ़ आये। देवताओंको सहसा युद्धके लिये आया देख दैत्य भी गर्जना करते हुए उनके सामने गये। उस समय देवताओंका दानवोंके साथ भयंकर युद्ध हुआ। उस संग्राममें अनेक प्रकारके तीक्ष्ण अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा देवताओंने असंख्य दैत्योंको यमलोक पहुँचाया। जो मारनेसे बच गये, वे स्वर्ग छोड़कर समुद्रमें जा छिपे। तदनन्तर इन्द्रने अपना राज्य प्राप्त किया। शेष दानवोंने उस शिवलिंगकी महिमाका पता पाकर शुक्रजीसे पूछा। तब शुक्राचार्यने उन्हें सब माहात्म्य बताया—'फाल्गुनकी शिवरात्रिको पवित्र होकर जो पुरुष उस शिवलिंगकी पूजा करता है, वह काल आ जानेपर भी प्राण-त्याग नहीं करता। दानवो! तुमलोग उस दिन रातमें जाकर उस शिवलिंगकी पूजा करो, जिससे तुम एक वर्षतक मृत्युके भयसे रहित हो जाओगे।'
इन्द्रको नारदजीसे दैत्योंकी यह मन्त्रणा ज्ञात हो गयी। तब उन्होंने सब देवताओंके साथ विचार किया कि 'जैसे भी हो सके, हमें महादेवजीकी रक्षाके लिये उत्तम-से-उत्तम उद्योग करना चाहिये।' ऐसा निश्चय करके तैंतीस कोटि देवता अस्त्र-शस्त्रोंके साथ उस शिवलिंगकी रक्षाके लिये हाटकेश्वरक्षेत्रमें आकर स्थित हुए। उन्हें देखकर दानव भयभीत होकर सब दिशाओंमें भाग गये। शिवरात्रिके दूसरे दिन पुनः सब देवताओंने आपसमें विचार किया कि 'यदि हमलोग इस क्षेत्रको छोड़कर जायँगे, तो दैत्य यहाँ आकर इस शिवलिंगकी पूजा करेंगे और वे भी हमारी ही भाँति अवध्य हो जायँगे। इसलिये हम तैंतीस देवता इस शिवलिंगकी रक्षाके लिये यहीं टिके रहें और शेष देवता इन्द्रके साथ स्वर्गमें जायँ।' ऐसा निश्चय करके आठ वसु, बारह सूर्य, ग्यारह रुद्र तथा दो अश्विनीकुमार—ये तैंतीस देवता उस शिव-लिंगकी रक्षाके लिये हाटकेश्वरक्षेत्रमें निवास करने लगे। शेष सब लोग इन्द्रसहित स्वर्गमें चले गये।
सूतजी कहते हैं—इस प्रकार प्रभावशाली अमरेश्वरलिंग पूर्वकालमें अदितिदेवीके द्वारा स्थापित हुआ था। जिसके दर्शनमात्रसे देहधारियोंकी (एक वर्षतक) मृत्यु नहीं होती है। मृत्युका निवारण करनेके कारण ही वह अमरलिंगके नामसे तीनों लोकोंमें विख्यात है। उस शिवलिंगके आगे स्वच्छ जलसे भरा हुआ एक उत्तम कुण्ड है, जिसे अदितिदेवीने अपने स्नानके लिये निर्माण कराया था। जो मनुष्य उसमें स्नान करके उस शिवलिंगका दर्शन करता है तथा उसी दिन रातमें वहाँ जागरण करता है, वह एक वर्षतक अपमृत्युको नहीं प्राप्त होता।
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- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११५३ ---|---
शुकदेवजीका जन्म, वैराग्य, व्यासजीके साथ उनका संवाद और वनगमन
सूतजी कहते हैं—वहाँपर चटकेश्वर नामक महादेवजी हैं, जो मनुष्योंको पुत्र प्रदान करनेवाले हैं। पूर्वकालमें चेटिकाने वहाँ तप किया था, उसने व्याससे कपिंजल नामक पुत्र पाया था। एक समयकी बात है, शान्तचित्त महात्मा व्यासजीके मनमें पत्नीके लिये अभिलाषा हुई। तब उन्होंने जाबालि मुनिसे उनकी सुन्दरी कन्या माँगी। जाबालिने चेटिका नामकी कन्या व्यासजीके साथ ब्याह दी। तब व्यासजी उसके साथ वनमें रहते हुए मैथुनमें प्रवृत्त हुए। ऋतुकालमें सत्यवतीनन्दन व्याससे मैथुन प्राप्त करके चेटिका गर्भवती हुई। उसका दूसरा नाम पिंगला भी था। उसके उदरमें वह गर्भ दिन-दिन पुष्ट होने लगा। बारह वर्ष बीत गये, किंतु वह गर्भ उत्पन्न नहीं हुआ। वह भीतर ही रहकर जो कुछ सुनता उसे याद कर लेता था, उसकी बुद्धि बड़ी प्रखर थी। उसने गर्भमें रहते हुए ही अंगोंसहित सम्पूर्ण वेद पढ़ लिये। स्मृति, पुराण तथा मोक्षशास्त्रका वह दिन-रात पूर्णरूपेण पाठ करता था। वह गर्भमें ज्यों-ज्यों वृद्धिको प्राप्त होता त्यों-ही-त्यों उसकी माता अत्यन्त पीड़ाको प्राप्त होकर व्याकुल होती जाती थी। तब विस्मयमें पड़े हुए व्यासजीने उस गर्भस्थ बालकसे पूछा—‘तुम कौन हो, गर्भका रूप धारण करके मेरी धर्मपत्नीकी कुक्षिमें आ बैठे हो? बाहर क्यों नहीं निकलते?’
गर्भ बोला—जो चौरासी लाख योनियाँ बतायी गयी हैं, उन सबमें मैंने भ्रमण किया है। अतः मैं क्या बताऊँ कि कौन हूँ। भयंकर संसारमें भ्रमण करते-करते मुझे बड़ा निर्वेद (वैराग्य) हुआ है। इस समय मनुष्य होकर इस उदरमें आया हूँ। अब मेरा विचार किसी प्रकार मनुष्यलोकमें निकलनेका नहीं है। यहीं रहकर योगाभ्यासमें तत्पर हो मोक्षमार्गको प्राप्त होऊँगा।
व्यासजीने कहा—वत्स! यदि तुम्हारी ऐसी अभिलाषा है, तो तुम्हें पाप नहीं लगेगा। इस गर्भवासरूपी घृणित एवं घोर नरकसे निकल आओ और योगका आश्रय लेकर कल्याणको प्राप्त होओ।
गर्भ बोला—विप्रवर! जबतक जीव गर्भमें रहता है, तभीतक उसे ज्ञान, वैराग्य तथा पूर्वजन्मका स्मरण बना रहता है। जब वह गर्भसे निकलता है और भगवान् विष्णुकी माया उसे स्पर्श करती है, तब सारा ज्ञान भूल जाता है। इसलिये मैं इस गर्भसे किसी तरह बाहर नहीं निकलूँगा।
व्यासजीने कहा—वैष्णवी माया तुमपर किसी प्रकार भी प्रभाव नहीं डालेगी। अतः तुम मुझे अपना मुख दिखाओ।
तदनन्तर बारह वर्षके कुमार शुक जो यौवनके समीप पहुँच चुके थे, गर्भसे बाहर निकले और व्यास तथा माताको प्रणाम करके उसी क्षण वनवासके लिये प्रस्थित हुए। तब मुनिवर व्यासने कहा—‘बेटा! मेरे घरमें ठहरो; जिससे तुम्हारे जातकर्म आदि संस्कार तो कर दूँ।’
शुकदेव बोले—मेरे जन्म-जन्ममें सैकड़ों संस्कार हो चुके हैं। उन्हीं बन्धनात्मक संस्कारोंने मुझे भवसागरमें डाल रखा है।
व्यासजीने कहा—द्विजके बालकको पहले ब्रह्मचारी, फिर गृहस्थ, तत्पश्चात् वानप्रस्थी और अन्तमें संन्यासी होना चाहिये। इसके बाद वह मोक्षको प्राप्त होता है।
शुकदेवजी बोले—यदि ब्रह्मचर्यसे ही मोक्ष होता है, तब तो नपुंसकोंको वह सदा ही प्राप्त होना चाहिये। यदि गृहस्थाश्रमियोंकी मुक्ति होती है, तब तो सम्पूर्ण जगत्को ही मुक्त हो जाना चाहिये। यदि कहें, वनवासमें अनुरक्त रहनेवालोंकी मुक्ति होती है तब तो मृगोंकी मुक्ति अवश्य हो जानी चाहिये। यदि आपका यह विचार हो कि संन्यास-धर्मका पालन करनेवाले मनुष्योंका मोक्ष होता है तब तो जितने दरिद्र मनुष्य हैं, उन सबकी मुक्ति पहले हो जानी चाहिये।
व्यासजीने कहा—मनुजीका कथन है कि गृहस्थधर्ममें अनुरक्त हो सन्मार्गपर चलनेवाले
| १९५४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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मानवोंके लिये यह लोक और परलोक दोनों सुखद होते हैं। गृहस्थाश्रमी पुरुषोंके द्वारा गृहस्थ-धर्मका पालन करनेके लिये जो संग्रह किया जाता है, वह इहलोक और परलोकमें भी सनातन सुख प्रदान करता है।
शुकदेवजी बोले—दैवयोगसे कभी अग्निसे भी शीतलता प्राप्त हो सकती है, चन्द्रमासे भी ताप हो सकता है; परंतु इस मर्त्यलोकमें परिग्रहसे भी सुखकी उत्पत्ति हो, ऐसा न तो कभी हुआ है, न होता है और न आगे कभी होगा ही।
व्यासजीने कहा—बहुत पुण्य होनेसे किसी प्रकार इस पृथ्वीपर अत्यन्त दुर्लभ मानवजन्मकी प्राप्ति होती है। उसे पाकर यदि मनुष्य गृहस्थधर्मका तत्त्व जाननेवाला हो तो उसे क्या नहीं मिल जाता ?
शुकदेवजी बोले—यदि मनुष्य जन्मकालमें अपनी अवस्थाको देखकर ज्ञानयुक्त होता है तो जन्म लेनेके पश्चात् वह सारा ज्ञान भूल जाता है।
व्यासजीने कहा—मनुष्यका पुत्र हो अथवा गदहेका बच्चा, जब वह शरीरमें धूल लपेटे, चंचल गतिसे चलता और तोतली वाणी बोलता है, तब उसका वह शब्द भी लोगोंके लिये बड़ा आनन्ददायक होता है।
शुकदेवजी बोले—मुने! धूलमें रेंगते और लोटते हुए अपवित्र शिशुसे जो यहाँ सन्तुष्ट होते या सुखका अनुभव करते हैं, वे अज्ञानी हैं।
व्यासजीने कहा—यमलोकमें पुं नामक महाभयंकर नरक है, पुत्रहीन मनुष्य ही उसमें जाता है। इसलिये पुत्रकी प्रशंसा की जाती है।
शुकदेवजी बोले—महामुने ! यदि पुत्रसे ही सब लोगोंको स्वर्गकी प्राप्ति होती, तब तो सूअरों, कुत्तों और टिड्डियोंको विशेषरूपसे उसकी प्राप्ति होनी चाहिये ?
व्यासजीने कहा—पुत्रके दर्शनसे मनुष्य पितृ-ऋणसे मुक्त होता है, पौत्रके दर्शनसे वह देव-ऋणसे मुक्त होता है और प्रपौत्रको भी देख ले, तब तो वह स्वर्गका निवासी होता है।
शुकदेवजी बोले—गीध दीर्घजीवी होता है, वह सदा अपनी कई पीढ़ीकी सन्तानोंको क्रमशः देखता है; किंतु क्या वह मोक्षको प्राप्त हो जाता है?
सूतजी कहते हैं—इस प्रकार कहकर शुकदेवजी वनमें चले गये।
अपने पुत्र शुकको गृहस्थीकी ओरसे निःस्पृह देख चेटिकाने दुःखी होकर व्यासजीसे कहा—द्विजश्रेष्ठ ! मुझे आज्ञा दीजिये, जिससे मैं पुत्रके लिये तपस्या करूँ और उसके द्वारा महादेवजीको सन्तुष्ट करूँ, जिससे मुझे वंशकी वृद्धि करनेवाला श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हो। ऐसा निश्चय करके व्यासजीकी आज्ञा पाकर पतिव्रता चेटिकाने हाटकेश्वरक्षेत्रमें जा तपस्या प्रारम्भ की। उसने भगवान् शंकरकी स्थापना करके उनके आगे निर्मल जलसे भरी हुई एक विशाल वापी निर्माण करायी, जो स्नान करनेमात्रसे समस्त पातकोंका नाश करनेवाली है। तदनन्तर उसकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर त्रिपुरारि महादेवजीने प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'सुव्रते ! वरदान माँगो।'
चेटिका बोली—सुरश्रेष्ठ ! मुझे ऐसा पुत्र दीजिये, जो मेरे वंशकी वृद्धि करनेवाला, सदा ही मित्रोंको आनन्द देनेवाला, सुशील तथा विनयी हो।
श्रीमहादेवजीने कहा—शोभने ! तुमने जैसे पुत्रके लिये प्रार्थना की है, वैसा ही पुत्र तुम्हें प्राप्त होगा, इसमें सन्देह नहीं है। दूसरी कोई भी जो स्त्री यहाँ वापीमें स्नान करके एकाग्रचित्त हो एक वर्षतक प्रत्येक शुक्ला पंचमीको तुम्हारे द्वारा स्थापित मेरे इस लिंगका पूजन करेगी, वह वर्षके अन्तमें सौभाग्यसे सम्पन्न होगी। इसी प्रकार जो पुरुष यहाँ स्नान करके सकाम भावसे मेरी पूजा करेगा, वह मनोवांछित कामना प्राप्त कर लेगा और जो निष्काम भावसे मेरा पूजन करेगा, वह मोक्षको प्राप्त होगा।
ऐसा कहकर महादेवजी अन्तर्धान हो गये और चेटिकाने व्यासजीसे कपिंजल नामक पुत्र प्राप्त किया। (चेटिकाद्वारा स्थापित होनेसे वह शिवलिंग 'चटकेश्वर' नामसे विख्यात हुआ।)
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- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १९५५
राजा सुरथके द्वारा भैरवजीकी स्थापना और आराधना तथा शंखतीर्थ, शिव, गणेश, गौरी और चक्रपाणि वासुदेव आदि देवविग्रहोंके दर्शनका माहात्म्य
सूतजी कहते हैं—किसी समय सूर्यवंशमें उत्पन्न सुप्रसिद्ध राजा सुरथ अपने राज्यसे भ्रष्ट होकर पुरोहित वसिष्ठजीके आश्रमपर गये और प्रणाम करके बोले—'ब्रह्मन्! इस समय शत्रुओंने मुझ मन्दभागीके राज्यका बलपूर्वक अपहरण कर लिया है। अतः मुझपर कृपाप्रसाद कीजिये। मेरी दूसरी कोई गति नहीं है।'
वसिष्ठजीने कहा—महाराज! यदि ऐसी बात है, तो तुम शीघ्र ही समस्त सिद्धियोंको देनेवाले हाटकेश्वरक्षेत्रमें जाओ। वहाँ भैरवरूपसे महादेवजीकी स्थापना करो, जिनके हाथमें उठे हुए त्रिशूलके अग्रभागपर अन्धकासुरका शरीर गुँथा हुआ स्थित हो। इस प्रकार भैरवरूपी शिवकी स्थापना करके नारसिंहमन्त्रसे लाल फूल, लाल चन्दन तथा धूप आदिके द्वारा उनकी पूजा करो। इससे भैरवजीकी शक्ति प्राप्त करके तुम तेज और वीर्यसे सम्पन्न हो जाओगे और उन्हींकी कृपासे सम्पूर्ण शत्रुओंका संहार कर डालोगे; परंतु बड़ी पवित्रताके साथ तुम्हें भगवान् भैरवकी पूजा करनी चाहिये, अन्यथा विघ्नकी प्राप्ति होगी।
महर्षि वसिष्ठका यह वचन सुनकर राजा सुरथ तत्काल हाटकेश्वरक्षेत्रमें गये। वहाँ उन्होंने भैरवरूपधारी महादेवजीकी स्थापना की और भक्तिपूर्वक नारसिंह-मन्त्रद्वारा उनका पूजन किया। उपासनाके समय राजा बड़े ही पवित्र, संयमशील एवं ब्रह्मचर्यपरायण रहते थे। नारसिंह-मन्त्रका दस सहस्र जप करनेके पश्चात् राजाके ऊपर भगवान् भैरव सन्तुष्ट हुए और इस प्रकार बोले—'राजन्! इस मन्त्रसे पूजित होकर मैं तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हूँ। इसलिये तुम मनोऽभिलषित वर माँगो।'
सुरथ बोले—सुरेश्वर! शत्रुओंने मेरा राज्य छीन लिया है, वह आपके प्रसादसे पुनः शत्रुरहित होकर मुझे प्राप्त हो। दूसरा कोई भी जो पुरुष यहाँ आकर इसी प्रकार पूजन करे, उसे भी सहस्र मन्त्रोंका जप पूरा होनेपर आप मेरी ही भाँति सिद्धि प्रदान करें।
'तथास्तु' कहकर भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये। राजा सुरथने भी संग्राममें शत्रुओंका वध करके अपना राज्य प्राप्त कर लिया।
सूतजी कहते हैं—महर्षियो! जो मनुष्य शंख-तीर्थमें विशेषतः एकादशी तिथिको स्नान करता है, वह सब तीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त कर लेता है। जो वहाँ सिद्धेश्वरसहित ग्यारह रुद्रोंका भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, उसके द्वारा माहेश्वरतीर्थोंके समस्त शिवविग्रहोंका दर्शन सम्पन्न हो जाता है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक ग्रहोत्थादेवीका दर्शन करता है, उसके द्वारा सम्पूर्ण दुर्गा-मूर्तियोंका दर्शन हो जाता है। जो मनुष्योंको स्वर्गद्वार प्रदान करनेवाले गणेशजीको देखता है, उसके द्वारा सम्पूर्ण गणेश-विग्रहोंका दर्शनकार्य सम्पन्न हो जाता है। जो वहाँ बरगदके नीचे शर्मिष्ठाद्वारा स्थापित गौरीजीका दर्शन करता है, उसके द्वारा सम्पूर्ण गौरीविग्रहोंका दर्शन हो जाता है। जो मानव प्रातःकाल उठकर चक्रपाणि वासुदेवका दर्शन करता है, उसने समस्त वासुदेव-विग्रहोंका दर्शन कर लिया। जो मनुष्य सोते और जागते समय तथा प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर स्नान करनेके पश्चात् भक्तिपूर्वक भगवान् चक्रपाणिका दर्शन करता है, उसके ब्रह्महत्या आदि पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं।
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११५६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
गौरी, जया और विजयाकुण्डका माहात्म्य, सिद्धिके उपाय तथा नागर-खण्डके पूर्वार्ध भागके श्रवणका फल
सूतजी कहते हैं—ब्रह्मर्षियो! वहीं पार्वतीजीकी सेविका जया निवास करती है और उसने वहाँ गौरीकुण्डके समीप जयाकुण्डका निर्माण किया है। जो नारी तृतीयाके दिन जयाकुण्डमें स्नान करती है वह पुत्र और सौभाग्यसे सम्पन्न तथा पतिकी प्यारी होती है। जयाकुण्डके पास ही परम उत्तम विजयाकुण्ड है। वहाँ स्नान करके वन्ध्या स्त्री भी पुत्रवती हो जाती है। इतना ही नहीं, वह कभी स्वप्नमें भी पुत्रोंके नाश या वियोगका दुःख नहीं देखती। जो काक-वन्ध्या स्त्री भी वहाँ स्नान करती है वह अनेक पुत्र प्राप्त करके स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होती है।
हाटकेश्वरक्षेत्रमें जो सत्ताईस लिंग हैं, उनमें सत्त्वगुण और वीर्यसे युक्त एक शिवलिंगकी भी आश्विन कृष्ण चतुर्दशीको आधी रातके समय जो पूजा करता है तथा जो श्रेष्ठ साधक पूर्वोक्त रूपसे अंगन्यास करके यजन-पूजन एवं छुरिका सूक्तका पाठ करता है और उन शिवलिंगोंके सामने स्थित होकर समस्त चराचरकी मानसिक पूजा करके दिक्पालोंमेंसे प्रत्येककी भक्तिपूर्वक अर्चना करता है, वह उसी शरीरसे उस दिव्य धामको पहुँच जाता है, जहाँ कभी भी जरा-मृत्यु तथा रोग-शोक आदि नहीं होते। इसी प्रकार चित्रेश्वरी पीठमें भी एक सिद्धि बतायी गयी है। जो माघ कृष्णा चतुर्दशीको वहाँ श्रद्धापूर्वक आगमोक्त विधिसे पीठकी पूजा करता है तथा चित्रशर्माद्वारा स्थापित हाटकेश्वर लिंगका शिवरात्रिको निशीथ कालमें एक लाख फूलोंसे भक्तिपूर्वक पूजन करता है वह उसी शरीरसे तत्काल सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
ऋषि बोले—महामते! शुद्ध चित्तवाले ब्राह्मणोंको जिस प्रकार मोक्ष प्राप्त होता है, ऐसे उपायोंको आप बतावें।
सूतजीने कहा—दस रुद्रोंके साथ जो आनन्देश्वर लिंग है, उसके अग्रभागमें स्थित जो कुण्ड है उसमें शास्त्रीय विधिसे स्नान करके मनुष्य देवदुर्लभ सिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य माघमासमें प्रातःकाल विश्वामित्रकुण्डमें स्नान करता है और ब्राह्मणको तिलसे भरा हुआ पात्र देता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। द्विजोत्तमो! इस प्रकार ब्राह्मणोंके लिये हितकारक और देवताओंद्वारा प्रशंसित सिद्धिका उपाय बताया गया। उस तीर्थमें अन्य जो तीर्थ और मन्दिर हैं, उन्हें भी मुनियोंने स्वर्गदायक कहा है। हाटकेश्वर महादेवजीके क्षेत्रका यह उत्तम माहात्म्य मैंने आपलोगोंसे भलीभाँति कहा है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। जो मनुष्य यहाँके सब तीर्थोंमें स्नान करके भक्तिपूर्वक सब देवस्थानोंका दर्शन करता है, वह पापी भी हो तो मुक्त हो जाता है। यह स्वामिकार्तिकेयजीके द्वारा कहे हुए स्कन्दपुराणके प्रथम खण्डका वर्णन किया गया, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्तसे इसका पाठ या श्रवण करता है, वह इस लोकमें प्रचुर भोगोंका उपभोग करके स्वर्गलोकमें जाता है। सब तीर्थोंमें और सब प्रकारके दानोंसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, उसीको श्रद्धापूर्वक इस माहात्म्यका श्रवण करनेसे भी मनुष्य पा लेता है। ब्राह्मणो! पृथ्वीपर इस पुराणको सुनकर मनुष्य कोटि जन्मोंके पापसे मुक्त होता और अपने कुलका उद्धार कर देता है।
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नागरखण्ड (पूर्वार्ध) सम्पूर्ण।
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* नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११५७
नागरखण्ड ( उत्तरार्ध )
सब पापोंकी शुद्धिके लिये पुरश्चरणसप्तमी व्रतकी विधि एवं महिमा
ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन! किस समय और किस विधिसे पुरश्चरण करना चाहिये?
सूतजीने कहा—पूर्वकालमें महामुनि मार्कण्डेयजीने हरिश्चन्द्र-पुत्र राजा रोहिताश्वके पूछनेपर जो कुछ कहा है, वही प्रसंग मैं सुनाता हूँ।
रोहिताश्व बोले—मुने! मनुष्य ज्ञानसे अथवा अज्ञानसे जो पाप करता है, उसके नाशका कोई उपाय मुझे बताइये।
मार्कण्डेयजी बोले—संसारमें मनुष्योंको मानसिक, वाचिक और शारीरिक तीन प्रकारका पाप लगता है। इनमेंसे मनुष्योंको जो मानस पाप लगता है, वह पश्चात्ताप करनेसे तत्क्षण नष्ट हो जाता है; परंतु जो वाचिक और कायिक पाप हैं, वे बिना भोगे नष्ट नहीं होते अथवा पुरश्चरणद्वारा उन्हें दूर किया जा सकता है। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे अपना पाप निवेदन करके उनके बताये अनुसार शास्त्रोक्त प्रायश्चित्त करे। इससे मनुष्य शुद्ध होता है अथवा राजा जब उस पापको जानकर तदनुकूल दण्ड देता है, तब वह मनुष्य उस पापसे शुद्ध हो जाता है। जो लज्जावश श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे अपना पाप नहीं कहता तथा राजा भी जिसके पापको नहीं जान पाता, जो शरीरमें ही उस पापको लिये जाता है, उसको दण्ड देनेवाले साक्षात् वैवस्वत यम हैं। इसलिये विज्ञपुरुषको पूर्ण प्रयत्न करके ब्राह्मणोंके बताये अनुसार प्रायश्चित्त करना चाहिये।
रोहिताश्व बोले—मुनीश्वर! मनुष्य नित्य ही सब ओर सूक्ष्म पाप करता है, उन सबके लिये प्रायश्चित्त करनेकी शक्ति कैसे हो सकती है?
मार्कण्डेयजीने कहा—राजन्! एक पुरश्चरण-सप्तमी नामक पुण्यदायक व्रत है, जिसका अनुष्ठान करनेसे यमराजके पिता भगवान् सूर्य जन्मभरके संचित पापोंका नाश कर देते हैं। महाराज! तुम भी उसी व्रतको करो, जिससे समस्त शारीरिक पापोंसे मुक्त हो जाओगे।
रोहिताश्व बोले—मुनिश्रेष्ठ! पुरश्चरण-सप्तमी व्रतका अनुष्ठान किस समय किस विधिसे करना चाहिये?
मार्कण्डेयजी बोले—माघ मासके शुक्ल पक्षमें जब सूर्य मकर राशिपर स्थित हों, तब रविवार-युक्त सप्तमीको इस व्रतका आचरण करना चाहिये। उस दिन पाखण्डी और पतित मनुष्योंसे बात नहीं करनी चाहिये। प्रातःकाल दातुन करके निम्नांकित मन्त्रसे व्रतका नियम ग्रहण करना चाहिये—
पुरश्चरणकृत्यायां सप्तम्यां दिवसाधिप।
उपवासं करिष्यामि अद्य त्वं शरणं मम॥
'दिनेश! आज पुरश्चरणसप्तमीको मैं उपवास करूँगा, आप मुझे शरण दें, सहायक हों।'
तदनन्तर अपराह्नकालमें स्नान करके धुला हुआ वस्त्र पहनकर पवित्र हो भगवान् सूर्यकी प्रतिमाका लाल रंगके फूलोंसे भक्तिपूर्वक पूजन करे। उसके बाद पाद्यार्घ्यपूजन करे, फिर 'पतङ्गाय नमः' इस मन्त्रसे पैरोंकी, 'मार्तण्डाय नमः' से दोनों घुटनोंकी, 'दिवसनाथाय नमः' से गुह्यभागकी, 'द्वादशमूर्तये नमः' से नाभिकी, 'पद्महस्ताय नमः' से दोनों बाहुओंकी, 'तीक्ष्णदीधितये नमः' से हृदयकी, 'पद्मदलाभाय नमः' से कण्ठकी तथा 'तेजोमयाय नमः' से मस्तककी विधिवत् पूजा सम्पन्न करके कपूरका धूप निवेदन करे। तत्पश्चात् गुड़-भातका नैवेद्य अर्पण करे। उस नैवेद्यको लाल वस्त्रसे ढका हुआ रखे। इसी प्रकार लालरंगके सूत्रसे आवेष्टित दीप और आरती निवेदन करे। तदनन्तर शंखमें रक्तचन्दन-मिश्रित जल और फल लेकर अर्घ्य दे—
११५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
यत्कृतं तु मया किञ्चिज्ज्ञानादज्ञानतोऽपि वा।
प्रायश्चित्तकृते देव ममार्घ्यश्च प्रगृह्यताम्॥
'देव! मैंने जानकर या अनजानमें जो कुछ भी पापकर्म किया है, उसके प्रायश्चित्तके लिये मेरा अर्घ्य ग्रहण करें।'
इसके बाद गन्ध, पुष्प और अनुलेपन आदिके द्वारा ब्राह्मणका भलीभाँति पूजन करे। उसे भोजन देकर शक्तिके अनुसार दक्षिणा दे। फिर शरीरशुद्धिके लिये पंचगव्य पान करे और हाथ जोड़कर सूर्यदेवका दर्शन करे। दर्शनके पश्चात् नमस्कार करके निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करे—
इदं व्रतं मया देव गृहीतं पुरतस्तव।
अविघ्नं सिद्धिमायातु प्रसादात्तव भास्कर॥
'देव! भास्कर! मैंने यह व्रत आपके सामने ग्रहण किया है, आपके प्रसादसे इसकी निर्विघ्नतापूर्वक सिद्धि प्राप्त हो।'
तत्पश्चात् फाल्गुन मास आनेपर उक्त विधिसे ही कुन्द पुष्पके द्वारा सूर्यदेवकी पूजा करे। गुग्गुलका धूप दे और भातका नैवेद्य निवेदन करे। उस दिन सब पापोंकी शुद्धिके लिये गोमयका भोजन बताया गया है। चैत्रमास आनेपर सुरभि (सुगन्धित पुष्प अथवा चम्पा, मौलसिरी या चमेली)-से सूर्यदेवकी पूजा करे। उस समय नैवेद्यके लिये गुड़ बताया गया है। सरजरस (राल)-का धूप निवेदन करे तथा कुशोदकका पान करे; इससे मनुष्य शारीरिक शुद्धिको प्राप्त होता है। वैशाखमासमें घृताहारी होकर पलाशके फूलोंसे सूर्यदेवकी पूजा करे और आमका नैवेद्य तथा जटामासीका धूप देवे। इस महीनेमें शरीरकी शुद्धिके लिये दहीका भोजन करना चाहिये। ज्येष्ठमें पाड़रके फूलसे सूर्यकी पूजा करनी चाहिये। नैवेद्यके लिये सत्तू बताया गया है और समस्त पापोंकी शुद्धिके लिये कपिला गायके घीका भोजन करना चाहिये। आषाढ़में अगस्तके फूलोंसे सूर्यकी पूजा करे। नैवेद्यके लिये खीरका विधान है और शरीरशुद्धिके लिये घीके साथ मधु पीना चाहिये। उस समय श्रद्धापूर्वक अगरुका धूप निवेदन करे। श्रावणमें कदम्बके फूलसे सूर्यदेवका पूजन करे, लड्डूका नैवेद्य भोग लगावे और तगरका धूप दे। तत्पश्चात् गोशृंगका जल ग्रहण करके मनुष्य सब पापोंसे तत्काल मुक्त हो जाता है। भाद्रपदमासमें जातिपुष्प (चमेली)-से भगवान् सूर्यकी पूजा करे, दूधका नैवेद्य भोग लगावे, रालका धूप दे और शरीरशुद्धिके लिये दूध पीये। आश्विनमासमें कमलके फूलोंसे पूजा करे, घीकी पूड़ीका नैवेद्य निवेदन करे, कुंकुमका धूप दे और शरीरशुद्धिके लिये कपूर खाय। कार्तिकमासमें तुलसीसे सूर्यदेवकी पूजा बतायी गयी है, खाँड़का नैवेद्य और कुसुमका धूप देना चाहिये। उस समय लवंगका भोजन सब पापोंका शोधक बताया गया है। अगहनमें भृंगराजपत्र (भँगरेया)-से पूजा करे, पूवाका नैवेद्य और गुड़का धूप निवेदन करे, उस समय सूर्यकी प्रसन्नताके लिये कंकोल (शीतलचीनी)-का भोजन करना चाहिये। पौषमें शतपत्री (गुलाब)-से सूर्यकी पूजा बतायी गयी है, नैवेद्यके लिये पूड़ी और धूपके लिये घीका विधान है। उस समय शरीर-शुद्धिके लिये पूर्वोक्त सभी वस्तुओंका भोजन करे। व्रतकी समाप्ति होनेपर सब पापोंकी शुद्धिके लिये घरकी वस्तुओंका छठा भाग ब्राह्मणको दान कर दे। तदनन्तर अपनी शक्तिके अनुसार प्रिय पदार्थोंका ब्राह्मणवर्गको भोजन करावे। इस प्रकार जो सूर्यसप्तमीका व्रत करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो निर्मल हो जाता है।
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- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११५९
चण्डशर्माके द्वारा सत्ताईस शिवलिंगोंका पूजन, शिवकृपाप्राप्ति, ऋचीक मुनिका गाधिपुत्रीके साथ विवाह और जमदग्निका जन्म
सूतजी कहते हैं—चण्डशर्मा नामक एक ब्राह्मण था, जिसे नागर ब्राह्मणोंने किसी कारणसे जातिच्युत घोषित करके चमत्कारपुरसे बाहर कर दिया था। चण्डशर्मा नगरसे बाहर सरस्वती नदीके तटपर कुटिया बनाकर रहने लगा। वह सरस्वतीमें स्नान करके पवित्र और एकाग्रचित्त हो षडक्षरमन्त्रका जप करता और सत्ताईस लिंगोंके पृथक्-पृथक् नामका नमस्कारान्त उच्चारण करके जपता था। पंककी मिट्टी लेकर पाँच अँगुलके सत्ताईस शिवलिंग बनाकर उनकी स्थापना करता और पुष्प-धूप एवं चन्दन आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक उन सबकी पूजा करता था। फिर परम श्रद्धापूर्वक प्राणरुद्रसम्बन्धी मन्त्रोंको जपता था। 'शिवलिंग अच्छी स्थितिमें हो या बुरी स्थितिमें, किसी भी दशामें उसको अपने स्थानसे विचलित न करे।' ऐसा मानकर द्विजश्रेष्ठ चण्डशर्मा उन शिवलिंगोंका कभी विसर्जन नहीं करता था। उनके ऊपर-ऊपर वह प्रतिदिन पंकमय सत्ताईस शिवलिंगोंको स्थापित करता जाता था। इस प्रकार दीर्घकालमें वहाँ पंकका पर्वत-सा खड़ा हो गया। तब उसकी भक्तिकी अधिकता देखकर महादेवजी बहुत सन्तुष्ट हुए और धरतीको भेदकर उसे अपने दिव्यलिंगका दर्शन कराया। तत्पश्चात् इस प्रकार कहा—'चण्डशर्मन्! मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारे सिवा और दूसरा भी जो कोई इन सत्ताईस लिंगोंका इस प्रकार पूजन करेगा, वह भी कल्याणका भागी होगा।'
ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। चण्डशर्माने भी उनके प्रत्यक्ष प्रकट हुए दिव्य लिंगमय स्वरूपका यथावत् पूजन किया और उसके लिये उत्तम मन्दिरका निर्माण कराया। उसीसे वह शिवलिंग नगरेश्वरके नामसे विख्यात हुआ। इस प्रकार शिवलिंगकी स्थापना करके विप्रवर चण्डशर्माने पुष्प, धूप और चन्दन आदिके द्वारा भगवान् शिवकी पूजा की। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् नगरेश्वरके प्रसादसे वह साक्षात् शिवधाममें चला गया। चण्डशर्माकी पत्नी शाकम्भरीने सरस्वती नदीके तटपर श्रीदुर्गादेवीको स्थापित किया तथा उत्तम भक्ति से दिन-रात उनकी आराधना की। तब उसपर प्रसन्न होकर दुर्गादेवीने कहा—'बेटी शाकम्भरी! मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।'
शाकम्भरी बोली—देवि! चमत्कारपुरमें जो प्रसिद्ध चौंसठ मातृकागण हैं, वे सब सन्तुष्ट हों।
देवीने कहा—जो आश्विन शुक्ला महानवमीके दिन मेरे आगे आकर भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करेगा, उसे पूर्ण फलकी प्राप्ति होगी। विशेषतः नागर ब्राह्मणकी की हुई पूजा अवश्य सफल होगी। यह सब मैंने सत्य कहा है।
ऐसा कहकर देवी दुर्गा अदृश्य हो गयीं। शाकम्भरीद्वारा स्थापित देवी दुर्गा उसीके नामसे प्रसिद्ध हुईं।
तबसे लेकर सरस्वतीके पुण्यतटपर बाह्य नागर ब्राह्मणोंका एक महान् स्थान बन गया। पुत्र-पौत्र तथा दौहित्र आदिसे युक्त होकर उन सबकी संख्या बहुत बढ़ गयी और विद्या तथा महान् वैभवकी दृष्टिसे वह स्थान चमत्कारपुरसे भी अधिक विख्यात हुआ। तदनन्तर किसी समय विश्वामित्रजीने क्रोध करके सरस्वतीको शाप दे रक्त बहानेवाली कर दिया। तब वे बाह्य नागर सरस्वती नदीको छोड़कर वहाँसे दूर चले गये और नर्मदाके पावन तटपर मार्कण्डेय मुनिके आश्रमके समीप निवास करने लगे।
ऋषियोंने पूछा—बुद्धिमान् विश्वामित्रजीने सरस्वतीको किस कारण शाप दिया?
१९६० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
सूतजीने कहा—महर्षियो! प्राचीन कालमें भृगुके पुत्र महामुनि ऋचीक प्रसिद्ध महात्मा थे। वे व्रत-स्वाध्यायमें तत्पर, तपस्वी और महायशस्वी थे। एक समय मुनीश्वर ऋचीकजी तीर्थयात्राके प्रसंगसे घूमते हुए भोजकट नामक स्थानमें गये। वहाँ राजा गाधि राज्य करते थे। त्रिभुवनविख्यात कौशिकी नदी वहीं बहती है। ऋचीकजी वहाँ कौशिकी नदीमें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण कर तटपर बैठे तथा ध्यानस्थ होकर जप करने लगे। इतनेमें ही वहाँ सर्वगुणसम्पन्ना राजकन्या आयी। उसे देखकर मुनिने निकटवर्ती मनुष्योंसे पूछा—'यह साध्वी कन्या किसकी पुत्री है और किसलिये यहाँ आयी है?'
लोगोंने कहा—यह महाराज गाधिकी त्रिभुवनसुन्दरी कन्या है, जो सर्वगुणसम्पन्न उत्तम पतिकी इच्छा रखती हुई यहाँ गौरीजीकी पूजाके लिये अन्तःपुरसे आयी है। इस नदीके तटपर यह जो बहुत बड़ा मन्दिर सुशोभित है, इसमें सम्पूर्ण देवताओंसे पूजित उमादेवी निवास करती हैं। यह राजकन्या मन्त्रोच्चारणपूर्वक क्रमशः पूजन करके भाँति-भाँतिके नैवेद्य भोग लगावेगी और वीणा बजाकर कानोंको सुख देनेवाला मधुर संगीत सुनावेगी। तत्पश्चात् जब सूर्यका ताप कुछ कम होगा, तब यह अपने महलमें पधारेगी।
उन मनुष्योंका यह वचन सुनकर ऋचीक मुनि राजा गाधिके घर गये। उन्हें सहसा अपने घरपर आया देख नृपश्रेष्ठ गाधि शीघ्र उनके सम्मुख गये और शास्त्रोक्त विधिसे उनका पूजन करके बोले—'विप्रवर! यद्यपि आप स्वभावसे ही निःस्पृह हैं, तथापि अपने आगमनका कारण बताइये।'
ऋचीकजीने कहा—राजेन्द्र! आपके एक सुन्दरी कन्या है, जो अब वरके योग्य हो गयी है। आप ब्राह्म-विवाहकी विधिसे वह कन्या मुझे दीजिये। पार्वतीजीके पूजनके निमित्त गयी हुई उस कन्याको मैंने देखा है।
यह सुनकर नृपश्रेष्ठ गाधि भयभीत हो गये। 'एक तो मुनि अपने समान वर्णके नहीं थे, दूसरे दरिद्र और बूढ़े थे, फिर भी कन्या न देनेपर उनसे शाप मिलनेका डर था।' यह सब सोचकर राजाने कहा—'विप्रवर! हमने कन्यादानके लिये शुल्क नियत कर रखा है। यदि वह आप दे सकेंगे तब निश्चय ही आपको अपनी कन्या दूँगा।'
ऋचीकजीने पूछा—नृपश्रेष्ठ! कन्याका शुल्क क्या है, यह आप मुझे बताइये।
गाधि बोले—द्विजेन्द्र! वायुके समान वेगवाले श्वेत रंगके सात सौ घोड़े, जिनका एक-एक कान श्याम रंगका हो, मेरी कन्याके शुल्करूपमें प्राप्त होने चाहिये।
'बहुत अच्छा' कहकर मुनिश्रेष्ठ ऋचीक कान्यकुब्ज देशमें गये और गंगाके किनारे बैठकर राजा गाधिके बताये अनुसार श्यामकर्ण घोड़ोंकी प्राप्तिके लिये विनियोगपूर्वक ऋषि, छन्द और देवताका स्मरण करके 'अश्वो वोलहा' इत्यादि चौंसठ ऋचाओंवाले सूक्तका जप करने लगे। तब वे अश्व गंगाजीके जलसे प्रकट हो गये। उन सबका रंग श्वेत और एक-एक कान श्याम था। वे सभी बड़े वेगशाली अश्व थे, उनके साथ उतने ही सवार भी थे। तबसे गंगाके शुभ पुण्यतटपर वह स्थान भूतलमें अश्वतीर्थके नामसे विख्यात हुआ।
उन विश्वासपात्र पुरुषोंके साथ सात सौ घोड़ोंको पाकर ऋचीक मुनि उस स्थानपर गये, जहाँ राजा गाधि रहते थे। वहाँ पहुँचकर मुनिने कन्याके लिये वे उत्तम अश्व राजाको समर्पित किये। तब राजा गाधिने उन घोड़ोंको ग्रहण करके गृह्यसूत्रोक्त विधिसे ब्राह्मण और अग्निकी साक्षितामें वह त्रिभुवनसुन्दरी कन्या ऋचीक मुनिको ब्याह दी। विवाह हो जानेपर ऋचीक मुनि अपनी स्त्रीकी ओरसे निष्काम हो गये और बोले—'सुन्दरी! मैं तपस्याके लिये वनमें जाऊँगा, तुम कोई वर माँगो!'
उनका वह वचन सुनकर राजकुमारी दुःखी होकर अपनी माताके पास गयी और मुनिने जो कुछ कहा था, वह सब कह सुनाया। उसे सुनकर माताने कहा—'बेटी! यदि तुम्हारे पति तुम्हें
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११६१
मनोवांछित वर देते हैं तो उनसे अपने लिये ब्राह्मणोचित गुणोंसे सम्पन्न एक पुत्र माँगो और मेरे लिये क्षत्रियोचित गुणोंसे युक्त एक पुत्रके लिये प्रार्थना करो।' माताकी बात सुनकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली राजकुमारी ऋचीक मुनिके पास गयी और माताने जैसा कहा था, वह सब उनसे कहा। पत्नीका वह वचन सुनकर ऋचीक मुनिने विधिपूर्वक पुत्रेष्टि यज्ञ करके दो चरु तैयार किये। एकमें तो उन्होंने ब्राह्मणोचित तेज एवं सम्पूर्ण यशका आधान किया और दूसरेमें सम्पूर्ण क्षात्रतेज स्थापित कर दिया। तदनन्तर उन्होंने पहले अपनी पत्नीको उत्तम ब्राह्मतेजसे युक्त चरु प्रदान किया और कहा—'तुम इसे खा लो और खानेके बाद पीपलके वृक्षका आलिंगन करो। इससे तुम्हें ब्रह्मतेजसे सम्पन्न उत्तम पुत्र प्राप्त होगा तथा यह जो दूसरा चरु है, इसे अपनी माताको दे दो। साथ ही उन्हें समझा दो कि वे इस चरुको खाकर बरगदके वृक्षका आलिंगन करें। ऐसा करनेसे उन्हें क्षत्रियतेजसे युक्त श्रेष्ठ पुत्रकी प्राप्ति होगी।' घरमें जाकर दोनों माँ-बेटी प्रसन्नचित्त होकर आपसमें बात करने लगीं कि मुनिका वचन अवश्य सत्य होगा।
तदनन्तर माताने पुत्रीसे कहा—संसारमें सब लोग अपने लिये उत्तम वस्तु चाहते हैं, अतः तुम्हारे लिये जो चरु है, उसमें अवश्य कोई-न-कोई विशेषता होगी, अतः अपना चरु मुझे दे दो और मेरा तुम ले लो।' माताके ऐसा कहनेपर पुत्रीने चरु और वृक्षमें अदला-बदली कर ली। तत्पश्चात् ऋतुस्नाता होनेपर दोनों स्त्रियोंने गर्भ धारण किया। त्रिभुवनसुन्दरी राजकन्या उस गर्भको प्राप्त होकर क्षत्रियतेजसे युक्त हो गयी। वह मन-ही-मन हाथी, घोड़ेपर चढ़ने तथा राज्य करनेकी बात सोचने लगी। देवताओं और असुरोंकी युद्धकथा बड़े रुचिके साथ सुनने लगी।
उसके क्षत्रियोचित कर्म देखकर मुनिने कुपित होकर पूछा—पापिनि! तुमने यह क्या किया? अवश्य ही चरु और वृक्षमें तुमने परिवर्तन कर लिया है। अतः इसमें सन्देह नहीं कि तुम्हारा पुत्र क्षत्रिय होगा और भाई ब्राह्मण। गर्भके चिह्नोंसे ऐसा ही प्रतीत होता है। शास्त्रचिन्तकोंने यह बात कही है कि गर्भिणी स्त्रीके मनमें जैसी अभिलाषा उत्पन्न होती है, वैसे ही गुणोंसे युक्त पुत्र उसके गर्भसे उत्पन्न होता है।
तब राजकुमारीने हाथ जोड़कर कहा—प्रभो! आपने जो कहा है, वह सत्य है। हमारे द्वारा चरु-परिवर्तनका अपराध हो गया है तथापि मुझपर ऐसी कृपा कीजिये, जिससे मेरा पुत्र ब्राह्मणोचित गुणोंसे सम्पन्न हो।
ऋचीक बोले—जो कुछ भी ब्राह्मणोचित तेज और गुण है, वह सब मैंने तुम्हारे चरुमें स्थापित कर दिया था और तुम्हारी माताके चरुमें क्षत्रियोचित क्षत्रियतेजका आधान किया था। अतः मैं शास्त्रके विरुद्ध उसमें उलट-फेर कैसे कर सकता हूँ। तुम्हारी प्रार्थनासे इतना ही कर सकता हूँ कि तुम्हारा पुत्र क्षत्रियोचित गुणसे युक्त न होकर पौत्र वैसे गुणोंसे विभूषित होगा। वह अपने क्षात्र-तेजके कारण युद्धमें शत्रुओंके लिये दुर्धर्ष होगा।
तत्पश्चात् मुनिके इस सत्य वरदानको पाकर सती साध्वी राजकुमारीका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और उसने अपनी मातासे पतिकी कही हुई सब बातें बतायीं। इसके बाद दसवें महीनेमें पुष्य नक्षत्र आनेपर राजकुमारीने बालसूर्यके समान तेजस्वी ब्रह्मतेजसे सुशोभित तपस्याके निधान और परम पवित्र पुत्रको जन्म दिया, जो तीनों लोकोंमें जमदग्निके नामसे विख्यात हुए। जमदग्निके ही पुत्र महायशस्वी परशुराम हुए, जिन्होंने पितामह ऋचीक मुनिके दिये हुए क्षात्रतेजके प्रभावसे इक्कीस बार इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य किया था।
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११६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
विश्वामित्रकी उत्पत्ति, राज्य-प्राप्ति, वसिष्ठ मुनिके आश्रमपर नन्दिनीद्वारा सेनासहित विश्वामित्रका सत्कार, नन्दिनीके कोपसे उनका पराभव तथा राज्य त्यागकर तप करनेका निश्चय
**सूतजी कहते हैं—**गाधिकी महारानीने भी मन्त्रसे सिद्ध किये हुए चरुका भक्षण करके उसी वर्षमें गर्भ धारण किया। गर्भवती होनेपर साध्वी रानी तीर्थयात्रामें तत्पर हुई और अनेक प्रकारके व्रतोंका पालन करने लगी। जहाँ वेदमन्त्रोंकी ध्वनि हो, वहाँ वे बड़े हर्षसे जातीं और सुनतीं। दसवाँ मास पूर्ण होनेपर उन्होंने भी उत्तम कान्तिसे युक्त पुत्र उत्पन्न किया, जो चराचर जगत्में विश्वामित्रके नामसे प्रसिद्ध हुआ। जैसे शुक्ल पक्षका चन्द्रमा आकाशमें प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होता है, उसी प्रकार महाभाग विश्वामित्र भी नित्यप्रति बढ़ने लगे। जब वे युवावस्थासे सम्पन्न एवं राज्य करनेमें समर्थ हुए, तब उनके पिता गाधिने उन्हें राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। इसके बाद राजा गाधि अपनी पत्नीके साथ वनमें चले गये।
राज्य-संचालनमें नियुक्त होकर भी विश्वामित्रजी प्रायः ब्राह्मणोंके स्वागत-सत्कार एवं सत्संगमें ही संलग्न रहते थे। एक समय उन्होंने वनमें प्रवेश किया और बहुत-से हिंसक पशुओंको मारा। फिर जेठकी तपती हुई दुपहरीमें भूख-प्याससे पीड़ित हो वे महात्मा वसिष्ठके आश्रमपर गये। वसिष्ठजीने भी नृपश्रेष्ठ विश्वामित्रको आया देख प्रसन्नतापूर्वक उनकी अगवानी की तथा उनके लिये अर्घ्य और मधुपर्क निवेदन करके कहा—'महीपाल! आपका स्वागत है! कहिये, मेरे आश्रमपर पधारे हुए आपका मैं कौन-सा अभीष्ट कार्य पूर्ण करूँ?'
**विश्वामित्रजी बोले—**मुनीश्वर! मेरी इन्द्रियाँ प्याससे व्याकुल हो रही थीं। मैं जल पीनेके लिये आपके आश्रमपर आया था सो यहाँ शीतल जल पी लिया। मेरी प्यास बुझ गयी है। अब आज्ञा दीजिये, जिससे अपने घरको जाऊँ।
**वसिष्ठजीने कहा—**राजन्! मध्याह्नकालमें सूर्य अत्यन्त तापदायक है। अतः इस समय मेरे आश्रममें ही भोजन करके अपराह्नकालमें जाइयेगा।
**विश्वामित्रजी बोले—**मुने! मैं चतुरंगिणी सेनाके साथ यहाँ आया था। आपके आश्रमके द्वारपर मेरी सेना भी स्थित है। जो स्वामी अपने सेवकोंके भूखे रहनेपर भी भोजन कर लेता है, वह भयंकर नरकमें जाता है। इसलिये मुझे घर लौटनेकी आज्ञा दीजिये।
**वसिष्ठजीने कहा—**यदि आपके सेवक मेरे द्वारपर भूखे हैं, तो उन सबको बुलाइये; मैं सभीको भोजनसे तृप्त करूँगा।
यह सुनकर राजा विश्वामित्रने सम्पूर्ण सेनाको वहीं बुला लिया और स्नान, सन्ध्या, तर्पण तथा जप करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर वे सिंहासनपर विराजमान हुए। इसी समय वसिष्ठजीने नन्दिनी नामक धेनुका आवाहन किया और वह विश्वामित्रके आगे जाकर खड़ी हो गयी। तब वसिष्ठजीने कहा—'तुम अनेक प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य तथा पेय आदि विविध खाद्य पदार्थोंके द्वारा सेनासहित महाराज विश्वामित्रको तृप्त करो। साथ ही इनके घोड़े और हाथी आदिके लिये भी चारे-दाने आदिकी व्यवस्था करो।'
'बहुत अच्छा' कहकर नन्दिनीने क्षणभरमें दस हजार सेवकोंको उत्पन्न किया। उन सबने सब प्रकारके भोज्य पदार्थोंको लेकर विश्वामित्रकी सेनाके प्रत्येक व्यक्तिको पृथक्-पृथक् भोजन परोसा। सेना, परिवार, हाथी, ऊँट, घोड़े और बैल आदिसहित महाराज विश्वामित्र पूर्णतः तृप्त हो गये। यह कौतुक देखकर मन्त्रियोंसहित विश्वामित्रने विचार किया कि 'इस उत्तम धेनुको अपने घर ले चलना चाहिये। ये ब्राह्मणदेवता इसे
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११६३
रखकर क्या करेंगे।' ऐसा विचार करके विश्वामित्रने कहा—'मुनिश्रेष्ठ! यह गौ मुझे दे दीजिये। इसके मूल्यके रूपमें मैं आपको उत्तम रथ, हाथी, घोड़े तथा अन्य मनोवांछित पदार्थ दूँगा।'
वसिष्ठजीने कहा—राजन्! यह समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली हमारी होमधेनु है। ब्राह्मणोंके लिये साधारण गौका विक्रय भी अनुचित है, फिर समस्त कामनाओंको देनेवाली नन्दिनीकी तो बात ही क्या है। महाराज! जो श्रेष्ठ ब्राह्मण गाय बेचकर उसका धन लेता है, उसे माताको बेचनेवाला चाण्डाल समझना चाहिये। इसलिये महामते! यह नन्दिनी मैं आपको नहीं दूँगा।
विश्वामित्र बोले—मुने! इस पृथ्वीपर जो कुछ भी रत्नभूत पदार्थ है; वह सब राजाका धन है, ऐसा नीतिज्ञ विद्वान् कहते हैं। अतः यह रत्नभूता नन्दिनी गाय मेरे द्वारा बलपूर्वक ले ली जा सकती है।
इतना कहकर उन्होंने नन्दिनीको बलपूर्वक ले जानेकी आज्ञा अपने सेवकोंको दे दी। उनके अनुचर नन्दिनीको डंडोंसे पीटते हुए ले जाने लगे। तब नन्दिनीने वसिष्ठजीसे पूछा—'मुने! क्या आपने मुझे इनको दे दिया है, जो ये मालिककी भाँति मुझे बलपूर्वक ले जाते हैं?' वसिष्ठजीने उत्तर दिया—'नहीं, मैं अपने प्राणोंपर संकट आ जाय तो भी तुम्हें त्याग नहीं सकता। ये लोग अन्यायपूर्वक तुम्हें ले जाते हैं। तुम स्वयं ही इनसे आत्मरक्षा करो।' इतना सुनकर नन्दिनीने क्रोधपूर्वक हुंकार किया; हुंकार करते ही उसके शरीरसे असंख्य म्लेच्छ-सेना प्रकट हुई। इस सेनाने विश्वामित्रके समस्त सैनिकोंको यमलोक पहुँचा दिया। तब विश्वामित्रने स्वयं ही धनुष लेकर उस सेनाका सामना किया। नन्दिनीके इन सैनिकोंने विश्वामित्रके हाथी, घोड़े आदि सबका सफाया कर डाला और उन्हें भी मारनेके लिये सब ओरसे घेर लिया। उनके प्राणोंपर संकट देख वसिष्ठजीने कहा—नन्दिनी! राजा अवध्य होता है; इन्हें बचाओ। राजाके होनेसे ही सब लोक सुरक्षित रहकर सन्मार्गमें प्रवृत्त होते हैं और कुमार्गसे दूर रहते हैं।' यह सुनकर नन्दिनी ज्यों-ही अपने म्लेच्छ-सैनिकोंको मना करनेके लिये आयी त्यों-ही विश्वामित्रने तलवार उठाकर उसपर घातक प्रहार करनेका विचार किया। यह देख वसिष्ठजीने तलवारसहित उनकी बाँहको स्तम्भित कर दिया—उनकी वह बाँह हिल-डुल नहीं सकी।
राजा विश्वामित्र बड़ी बुरी दशामें पड़ गये। उन्होंने लज्जित होकर वसिष्ठजीसे कहा—'मुनिश्रेष्ठ! इन भयंकर म्लेच्छोंके हाथसे मारे जाते हुए मुझ असहायकी अब आप ही रक्षा करें तथा मेरी इस बाँहको स्तम्भरहित (हिलने-डुलने लायक) कर दें। अब मैं घरको लौट जाऊँगा। युद्धसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। उद्दण्ड पुरुष विद्या, ऐश्वर्य तथा लक्ष्मीको पाकर मदोन्मत्त हो वैसे ही चिरकालतक उस स्थितिमें नहीं रह पाता, जैसे मैं राजमदसे उन्मत्त हो युद्धमें नहीं टिक सका।' उनके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजीने उनकी उस भुजाको स्तम्भदोषसे मुक्त कर दिया और हँसते हुए कहा—"राजन्! जाओ, मैंने तुम्हारी बाँह ठीक कर दी। अब कभी ब्राह्मणोंके साथ वैर न करना।'
वसिष्ठजीकी यह आज्ञा पाकर विश्वामित्रजी पैदल ही अपने महलको गये। सन्ध्याके समय नगरद्वारपर पहुँचकर वे अपने-आप ही कहने लगे—'क्षत्रियोंके बल, पराक्रम और जीवनको धिक्कार है! केवल ब्राह्मण-बल और ब्राह्मण-तेज ही प्रशंसाके योग्य है। अब मुझे ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे ब्राह्मण-बल प्राप्त हो। आजसे मैं अपना राज्य त्यागकर बड़ी भारी तपस्या करूँगा।' ऐसा निश्चय करके उन्होंने अपने पुत्र विश्वसहको राजपदपर स्थापित कर दिया और स्वयं तपस्याके लिये तपोवनको प्रस्थान किया।
१९६४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
विश्वामित्रकी तपस्या, ब्राह्मणपदकी प्राप्ति, विश्वामित्रकी भेजी हुई शक्तिका वसिष्ठजीके द्वारा स्तम्भन और सरस्वतीके जलकी शुद्धि
सूतजी कहते हैं—द्विजवरो ! इस प्रकार अपना राज्य छोड़कर विश्वामित्रजीने हिमालयपर्वतपर जा अत्यन्त भयंकर तपस्या प्रारम्भ की। फल-मूलका भोजन करते हुए वे तीन सौ वर्षोंतक केवल परब्रह्म परमात्माके चिन्तनमें संलग्न रहे। फिर उतने ही समयतक केवल वृक्षके सूखे पत्ते चबाकर रहे। उसके बाद एक हजार वर्षोंतक पानीमात्र पीकर रह गये। फिर सौ वर्षोंतक केवल वायु पीकर सन्तोष किया। विश्वामित्रजीकी उस तपःशक्तिको देखकर देवर्षियोंसहित साक्षात् ब्रह्माजी वहाँ आये और इस प्रकार बोले—'विश्वामित्र ! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे सन्तुष्ट हूँ, वर माँगो !'
विश्वामित्रजीने कहा—देव ! मुझे ब्राह्मणत्व प्रदान कीजिये।
ब्रह्माजी बोले—तुम तो क्षत्रियकी सन्तान हो, फिर तुममें ब्राह्मणत्व कैसे आ सकता है!
विश्वामित्रजीने कहा—देवदेवेश्वर ! आप परम उत्तम ब्रह्मलोकमें पधारिये। मैं या तो शरीर त्याग दूँगा अथवा ब्राह्मणकी ब्राह्मणता प्राप्त करूँगा।
तदनन्तर देवर्षियोंके मध्यमें खड़े हुए ऋचीक मुनि बोले—देव ! मैंने विश्वामित्रजीके जन्मके लिये जो चरु तैयार किया था, उसमें ब्राह्म-मन्त्रोंद्वारा अपरिमित ब्रह्मतेजकी स्थापना की थी। इस कारण ये क्षत्रिय-पुत्र होनेपर भी वास्तवमें ब्राह्मण हैं; इसलिये आप इन्हें 'ब्रह्मर्षि' कहिये, जिससे हमलोग भी इन्हें श्रेष्ठ द्विज कहें।
तब ब्रह्माजीने दीर्घकालतक विचार करके कहा—'विश्वामित्र ! तुम निःसन्देह ब्रह्मर्षि हो।' तत्पश्चात् ऋचीक आदि सब देवर्षियोंने भी उन्हें 'ब्रह्मर्षि' स्वीकार किया। इसके बाद उन सबके मध्यमें खड़े हुए मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने कहा—'पितामह ! विश्वामित्र क्षत्रियसे उत्पन्न हुए हैं, यह जानते हुए भी मैं इन्हें कदापि ब्राह्मण नहीं कहूँगा।' ऐसा कहकर वसिष्ठजी हाटकेश्वरक्षेत्रमें शंखतीर्थके समीप चले आये, जहाँ श्वेतद्वीपयुक्त पुण्यमयी ब्रह्मशिला विराजमान है। वहींपर सब पापोंको हरनेवाली शुभ सरस्वती नदी स्थित हैं। उसी सरस्वतीके तटपर आश्रम बनाकर वसिष्ठजी बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न हो गये। विश्वामित्र भी उनका वध करनेके लिये वहीं आ पहुँचे और उनके आश्रमसे दूर दक्षिण दिशामें आश्रम बनाकर रहने लगे। वे प्रतिदिन उनके छिद्र ढूँढ़ा करते थे। बहुत दिनोंतक टिके रहनेपर भी उन्हें उनका कोई दोष नहीं दिखायी दिया। तब उन्होंने वसिष्ठजीके ऊपर आभिचारिक प्रयोग (मारण आदि) प्रारम्भ किया। इससे एक भयंकर शक्ति प्रकट हुई और बोली—'विप्रवर ! आज्ञा दीजिये, मैं आपका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ।'
विश्वामित्र बोले—मेरे महान् शत्रु वसिष्ठका वध करो।
विश्वामित्रजीके इस प्रकार आदेश देनेपर वह वसिष्ठजीके आश्रमपर जानेके लिये उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थित हुई। इसी समय वहाँ होनेवाले बड़े भारी उत्पातोंको देख महर्षि वसिष्ठने दिव्य दृष्टिसे सब कुछ जान लिया और अथर्ववेदके मन्त्रोंद्वारा उस कृत्याकी गतिको रोक दिया। तब वह शक्ति वसिष्ठजीसे इस प्रकार बोली—'मुने ! सामवेद सब वेदोंमें प्रधान है। विश्वामित्रने सामवेदके मन्त्रोंद्वारा मेरी सृष्टि की है; अतः इसे अप्रामाणिक न होने दीजिये; मेरे प्रहारको सह लीजिये।'
वसिष्ठजीने कहा—शोभने ! यदि ऐसी बात है तो तुम केवल मेरा स्पर्शमात्र कर लो; परंतु मर्मस्थानको न छूना।
तब विश्वामित्रजीकी छोड़ी हुई वह भयंकर शक्ति वसिष्ठजीके अंगोंका स्पर्शमात्र करके गिर पड़ी। इससे सन्तुष्ट होकर वसिष्ठजीने कहा—'महाभागे ! जो मनुष्य परम श्रद्धासे युक्त होकर