संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९६४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
विश्वामित्रकी तपस्या, ब्राह्मणपदकी प्राप्ति, विश्वामित्रकी भेजी हुई शक्तिका वसिष्ठजीके द्वारा स्तम्भन और सरस्वतीके जलकी शुद्धि
सूतजी कहते हैं—द्विजवरो ! इस प्रकार अपना राज्य छोड़कर विश्वामित्रजीने हिमालयपर्वतपर जा अत्यन्त भयंकर तपस्या प्रारम्भ की। फल-मूलका भोजन करते हुए वे तीन सौ वर्षोंतक केवल परब्रह्म परमात्माके चिन्तनमें संलग्न रहे। फिर उतने ही समयतक केवल वृक्षके सूखे पत्ते चबाकर रहे। उसके बाद एक हजार वर्षोंतक पानीमात्र पीकर रह गये। फिर सौ वर्षोंतक केवल वायु पीकर सन्तोष किया। विश्वामित्रजीकी उस तपःशक्तिको देखकर देवर्षियोंसहित साक्षात् ब्रह्माजी वहाँ आये और इस प्रकार बोले—'विश्वामित्र ! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे सन्तुष्ट हूँ, वर माँगो !'
विश्वामित्रजीने कहा—देव ! मुझे ब्राह्मणत्व प्रदान कीजिये।
ब्रह्माजी बोले—तुम तो क्षत्रियकी सन्तान हो, फिर तुममें ब्राह्मणत्व कैसे आ सकता है!
विश्वामित्रजीने कहा—देवदेवेश्वर ! आप परम उत्तम ब्रह्मलोकमें पधारिये। मैं या तो शरीर त्याग दूँगा अथवा ब्राह्मणकी ब्राह्मणता प्राप्त करूँगा।
तदनन्तर देवर्षियोंके मध्यमें खड़े हुए ऋचीक मुनि बोले—देव ! मैंने विश्वामित्रजीके जन्मके लिये जो चरु तैयार किया था, उसमें ब्राह्म-मन्त्रोंद्वारा अपरिमित ब्रह्मतेजकी स्थापना की थी। इस कारण ये क्षत्रिय-पुत्र होनेपर भी वास्तवमें ब्राह्मण हैं; इसलिये आप इन्हें 'ब्रह्मर्षि' कहिये, जिससे हमलोग भी इन्हें श्रेष्ठ द्विज कहें।
तब ब्रह्माजीने दीर्घकालतक विचार करके कहा—'विश्वामित्र ! तुम निःसन्देह ब्रह्मर्षि हो।' तत्पश्चात् ऋचीक आदि सब देवर्षियोंने भी उन्हें 'ब्रह्मर्षि' स्वीकार किया। इसके बाद उन सबके मध्यमें खड़े हुए मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने कहा—'पितामह ! विश्वामित्र क्षत्रियसे उत्पन्न हुए हैं, यह जानते हुए भी मैं इन्हें कदापि ब्राह्मण नहीं कहूँगा।' ऐसा कहकर वसिष्ठजी हाटकेश्वरक्षेत्रमें शंखतीर्थके समीप चले आये, जहाँ श्वेतद्वीपयुक्त पुण्यमयी ब्रह्मशिला विराजमान है। वहींपर सब पापोंको हरनेवाली शुभ सरस्वती नदी स्थित हैं। उसी सरस्वतीके तटपर आश्रम बनाकर वसिष्ठजी बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न हो गये। विश्वामित्र भी उनका वध करनेके लिये वहीं आ पहुँचे और उनके आश्रमसे दूर दक्षिण दिशामें आश्रम बनाकर रहने लगे। वे प्रतिदिन उनके छिद्र ढूँढ़ा करते थे। बहुत दिनोंतक टिके रहनेपर भी उन्हें उनका कोई दोष नहीं दिखायी दिया। तब उन्होंने वसिष्ठजीके ऊपर आभिचारिक प्रयोग (मारण आदि) प्रारम्भ किया। इससे एक भयंकर शक्ति प्रकट हुई और बोली—'विप्रवर ! आज्ञा दीजिये, मैं आपका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ।'
विश्वामित्र बोले—मेरे महान् शत्रु वसिष्ठका वध करो।
विश्वामित्रजीके इस प्रकार आदेश देनेपर वह वसिष्ठजीके आश्रमपर जानेके लिये उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थित हुई। इसी समय वहाँ होनेवाले बड़े भारी उत्पातोंको देख महर्षि वसिष्ठने दिव्य दृष्टिसे सब कुछ जान लिया और अथर्ववेदके मन्त्रोंद्वारा उस कृत्याकी गतिको रोक दिया। तब वह शक्ति वसिष्ठजीसे इस प्रकार बोली—'मुने ! सामवेद सब वेदोंमें प्रधान है। विश्वामित्रने सामवेदके मन्त्रोंद्वारा मेरी सृष्टि की है; अतः इसे अप्रामाणिक न होने दीजिये; मेरे प्रहारको सह लीजिये।'
वसिष्ठजीने कहा—शोभने ! यदि ऐसी बात है तो तुम केवल मेरा स्पर्शमात्र कर लो; परंतु मर्मस्थानको न छूना।
तब विश्वामित्रजीकी छोड़ी हुई वह भयंकर शक्ति वसिष्ठजीके अंगोंका स्पर्शमात्र करके गिर पड़ी। इससे सन्तुष्ट होकर वसिष्ठजीने कहा—'महाभागे ! जो मनुष्य परम श्रद्धासे युक्त होकर