भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1194
  • नागरखण्ड-उत्तरार्ध * | १९६५ ---|---

चैत्रमासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको तुम्हारा पूजन करेंगे, वे वर्षभर नीरोग रहेंगे। अतः तुम्हें मेरे वचनसे सदा यहीं निवास करना चाहिये।' उनके इस प्रकार आदेश देनेपर वह शक्ति देवीके रूपमें वहीं स्थित हो नागर ब्राह्मणोंद्वारा पूजित होने लगी। उसका नाम धारा है, वह भक्तजनोंको सुख देनेवाली है।

जिस समय वसिष्ठजीने विश्वामित्रकी भेजी हुई शक्तिको स्तम्भित कर दिया, उस समय उसके अंगोंसे पसीना छूटने लगा। वह पसीना उसके पैरोंके मार्गसे प्रवाहित होकर शीतल जलके रूपमें परिणत हो गया और वहाँ उस जलसे भरा हुआ एक कुण्ड बन गया। वह जल परम पावन, स्वच्छ और निर्मल था। उसमें सब तीर्थोंसे सम्पन्न गंगाजी प्रत्यक्ष प्रकट हुईं। उनके जलसे भरे हुए शीतल कुण्डमें विधिपूर्वक स्नान करके जो पुरुष धारादेवीका दर्शन करता है, उसे धन, धान्य, पुत्र तथा राज्यका समस्त सुख प्राप्त होता है। धारादेवी नागर ब्राह्मणोंके साढ़े साठ गोत्रोंकी कुलदेवी हैं। इसीलिये नागरोंको साथ रखनेसे ही वहाँकी यात्रा सफल होती है। नागरोंके बिना की हुई जो यात्रा है, उससे परमेश्वरी धारा सन्तुष्ट नहीं होतीं।

सरस्वती नदी वसिष्ठजीकी प्राण-रक्षामें सहायक हुई थी, इसलिये विश्वामित्रजीने कुपित होकर शाप दे दिया कि 'तुम्हारा जल रक्तमय हो जायगा।' तबसे उसका जल रक्तमय हो गया। चण्डशर्मा आदि जितने भी तपस्वी वहाँ ठहरे थे, वे सब-के-सब बहुत दूर चले गये। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ भी अर्बुदाचलपर चले गये। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र चमत्कारपुरमें गये और हाटकेश्वरक्षेत्रमें आश्रम बनाकर उन्होंने भयंकर तपस्या की। उस तपस्यासे उनमें सृष्टिरचनाकी शक्ति आ गयी, जिससे वे ब्रह्माजीके साथ होड़ करने लगे।

तदनन्तर किसी समय सरस्वती नदी अर्बुदाचलपर जाकर अत्यन्त दीन-दुःखी हो मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठसे बोली—'मुने! आपके ही लिये विश्वामित्रने क्रोधपूर्वक मुझे शाप दिया है, जिसके कारण मैं रक्त बहानेवाली नदी हो गयी और तपस्वीजनोंने मेरे तटपर रहना छोड़ दिया। अब मुझपर ऐसी कृपा कीजिये, जिससे मेरे प्रवाहमें फिर जल हो और रक्तराशिका नाश हो जाय।'

वसिष्ठजी बोले—भद्रे! मैं ऐसा यत्न करूँगा, जिससे तुम्हारे प्रवाहमें पुनः जल हो जाय तथा रक्तका निवारण हो।

ऐसा कहकर वसिष्ठजी उस पाकरके वृक्षकी जड़के समीप गये, जहाँसे सरस्वती नदी निकली थीं। वहाँ समाधि लगाकर धरतीपर बैठ गये और ब्राह्ममन्त्रका उच्चारण करते हुए वहाँकी भूमिको देखने लगे। तब धरतीको छेदकर दो छिद्रोंसे जलकी धाराएँ बह निकलीं। जलका एक स्रोत तो वहींसे प्रकट हुआ, जहाँ सरस्वतीका उद्गम हुआ था। वृक्षकी जड़से निकले हुए उस जलप्रवाहने सम्पूर्ण रक्तको बहा दिया, जिससे महानदी सरस्वती परम निर्मल हो गयीं। दूसरा प्रवाह जो संभ्रमवश उत्पन्न हुआ था, उससे भ्रमती नामसे विख्यात नदी हुई। इस प्रकार सरस्वती नदी पुनः अपने पूर्वस्वरूपको प्राप्त हुई थी।

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पंचपिण्डका गौरी-पूजासे अमाकी सौभाग्यवृद्धि, अमाके पूर्वजन्मका चरित्र

सूतजी कहते हैं—पूर्वकालमें जयसेन नामसे विख्यात एक राजा हो गये हैं, जो काशी प्रदेशके शासक थे। उनके एक सहस्र स्त्रियाँ थीं। इनके अतिरिक्त उन्हें मद्रराज विश्वक्सेनकी सुन्दरी कन्या अमा भी पत्नीरूपमें प्राप्त हुई। अमा उन्हें बहुत प्रिय थी। वह प्रातःकाल उठकर गंगाजीके शुभ तटपर जाती और वहाँकी भीगी मिट्टी लेकर उसीकी पंचपिण्डात्मिका गौरी-मूर्ति बनाकर पाँच मन्त्रोंसे पूजा करती थी। प्रतिदिन इसी प्रकार विधिवत् पूजा सम्पन्न करके वह राजमहलमें लौट आती