भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1195
१९६६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

थी। अमा जैसे-जैसे गौरीकी पूजा करती, वैसे-ही-वैसे उसके सौभाग्यकी वृद्धि होती जाती थी। प्रतिदिन उसीके सौभाग्यकी वृद्धि होती देख उसकी सौतोंको बड़ा दुःख होता था। वे कहती थीं—'इसने पूर्वजन्ममें पुण्य किये हैं। उन्हींका यह फल है।' इस प्रकार दुःखमें पड़ी हुई उसकी सौतोंका बहुत समय व्यतीत हो गया।

एक दिन सब सौतें आपसमें सलाह करके गंगातटपर उसके समीप गयीं, जहाँ वह पंचपिण्डिका गौरीकी पूजा करती थी। उन सबको वहाँ आयी देख अमा गौरीजीकी पूजा छोड़कर उनके सम्मुख गयी और हाथ जोड़कर बोली—'महाभाग्यवती देवियो ! आपका बारंबार स्वागत है। आज्ञा दीजिये, मै आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ?'

सौतें बोलीं—हम सब लोग तुम्हारे सौभाग्यकी आगसे जली हुई हैं, इसलिये कौतूहलवश यहाँ आयी हैं। महाभागे ! तुम प्रतिदिन जो पाँच पिण्डोंकी पूजा करती हो, उसीसे तुम्हारे सौभाग्यकी वृद्धि हो रही है या इसका कोई दूसरा कारण है?

अमाने कहा—आप सब लोग मेरी बड़ी बहिनें हैं, आपके प्रति मेरे मनमें तनिक भी ईर्ष्या नहीं है। अतः गोपनीय बात भी आपके सामने प्रकट करती हूँ। पूर्वजन्ममें मैं कुसुमपुरके वैश्य-पुत्र वीरसेनकी पुत्री थी। उन्होंने विवाहके समय धर्मपूर्वक मेरा दान किया। साथ ही प्रेमपूर्वक कहा कि 'पुत्री ! जबतक तुम गौरीजीकी पूजा न कर लेना तबतक जल भी न पीना। इससे तुम्हें अभीष्ट मनोरथकी प्राप्ति होगी।' तब मैंने बहुत अच्छा कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की। ससुराल आनेपर मैं गौरीजीकी पूजामें तत्पर हुई। प्रतिदिन पंचपिण्ड बनाकर उनकी पूजा करती और उन पिण्डोंका जलमें विसर्जन कर देती थी। कुछ कालके अनन्तर मेरे पति वाणिज्यके लिये देशान्तरमें जाने लगे। उस समय स्नेहवश उन्होंने मुझे भी साथ ले लिया। जेठके सूर्य तप रहे थे। भयंकर गरमी पड़ रही थी। ऐसे समयमें वैश्योंका वह समूह निर्जल मरुप्रदेशमें जा पहुँचा। वहाँ एक वृक्षके नीचे सबने विश्राम किया। मैंने देखा सब ओर जल लहरा रहा है। सोचा, पास ही इतना अधिक जल है, स्नान करके गौरीजीकी पूजा कर लूँ, फिर स्वादिष्ट जल पीऊँगी। यह विचार कर मैं क्रमशः एक-एक पग आगे बढ़ती गयी। वहाँ जल कहाँ, मृगतृष्णा थी। जितना ही दूर जाती, उतना ही दूर वह मृगतृष्णा दिखायी देती थी। अन्तमें प्याससे पीड़ित होकर मैं उस बालूमें गिर पड़ी और मेरे सब अंगोंमें फफोले पड़ गये। इसी समय महाभारतका एक प्रसंग मुझे याद आ गया। मुनिवर त्रितने जैसे पूजा की थी, उसी प्रकार मैं भी क्यों न गौरीकी पूजा कर लूँ। ऐसा सोचकर बालूकी पाँच मूठी लेकर मैंने पाँच मन्त्रोंसे देवीका पूजन किया; उसके बाद मेरी मृत्यु हो गयी। उसी पुण्यके प्रभावसे मैं दशार्ण देशके राजाके घर उत्पन्न हुई। इस जन्ममें भी मुझे पूर्वजन्मकी स्मृति बनी हुई है। गौरीदेवीके प्रसादसे ही मैं आपलोगोंसे छोटी होकर भी सौभाग्यमें बड़ी हूँ। इसीलिये पंककी पंचपिण्डा गौरी बनाकर प्रतिदिन पूजा करती हूँ। यह गुप्त रहस्य है, जो मैंने आपलोगोंपर प्रकट किया है। इस सत्यके प्रभावसे गौरीदेवी मेरा अभीष्ट सिद्ध करें।

यह सुनकर सब सौतोंने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक प्रणाम करके कहा—बहिन ! हमपर भी कृपा करो और उन पाँचों मन्त्रोंको हमें भी बताओ, जिससे परमेश्वरी गौरी प्रसन्न होती हैं।

अमा बोली—मैं सब बताती हूँ, सुनिये और सुनकर उसीके अनुसार आपलोग भी कीजिये।

उसके ऐसा कहनेपर सब सौतें मन, वाणी और क्रियाद्वारा उसकी शिष्या हो गयीं। तब उसने उन पाँच मन्त्रोंका उपदेश किया—

(१) नमः पृथिव्यै क्षान्तीशि। (२) नमः आपोमये शुभे। (३) तेजस्विनि नमस्तुभ्यम्। (४) नमस्ते वायुरूपिणि। (५) आकाशरूप-सम्पन्ने पञ्चरूपे नमो नमः।