संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
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- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११६७
| (१) क्षमाकी अधीश्वरी देवि ! पृथिवीरूपमें आपको नमस्कार है। (२) शुभे ! आप ही जलरूपा हैं, आपको नमस्कार है। (३) तेजस्-तत्त्वकी स्वामिनि ! आपको नमस्कार है। (४) वायुस्वरूपा देवि ! आपको नमस्कार है। (५) आकाशरूपसे सम्पन्न पंचरूपा देवि ! आपको बार-बार नमस्कार है। | इस प्रकार इन मन्त्रोंका उपदेश देकर अमाने पूजा पूरी की। तत्पश्चात् उसने गौरीदेवीकी रत्नमयी प्रतिमा निर्माण की और उसे हाटकेश्वरक्षेत्रमें स्थापित किया। जो नारी उस गौरी-प्रतिमाका पूजन करती है, वह सब पापोंसे मुक्त हो शीघ्र ही अपने पतिकी प्रिया होती है—उसे पूर्णतः पतिप्रेम उपलब्ध होता है। |
## पूर्वजन्ममें अमारूपा लक्ष्मीदेवीके द्वारा पंचपिण्डका गौरीकी उत्पत्ति एवं स्थापनाका वर्णन
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| **लक्ष्मीजी (भगवान् विष्णुसे) कहती हैं—** प्रभो! इस प्रकार पूर्वजन्ममें 'अमा' होकर मैंने गौरी-पूजाके प्रभावसे राज्य तथा उस परम सौभाग्यको प्राप्त किया, जो सम्पूर्ण युवतियोंके लिये दुर्लभ वस्तु है। तथापि मुझे कोई सन्तान नहीं प्राप्त हुई। एक समय मुनिवर दुर्वासाजी चातुर्मास्य व्रत करनेके लिये आनर्त-नरेशके भवनमें आये। राजाने उनका पूजन किया और कहा—'मुनिश्रेष्ठ! संसारमें मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है, क्योंकि आपके युगल चरणारविन्दोंको मस्तकद्वारा स्पर्श करनेका सौभाग्य आज मुझे प्राप्त हुआ है। बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? | नहीं है, जिस व्रत-नियम, दान अथवा होमसे मुझे सन्तान प्राप्त हो, वह बतानेकी कृपा करें।' मेरी बात सुनकर मुनिने बहुत देरतक ध्यान किया, इसके बाद मुसकराते हुए कहा—बेटी ! पूर्वजन्ममें तपी हुई बालूसे तुमने पार्वतीजीका पूजन किया है। अतः भक्ति-भावसे राज्य पाकर भी तुम्हारे मनमें कुछ सन्ताप रह गया है। देवता न तो काठमें रहते हैं, न पत्थरमें और न मिट्टीमें ही रहते हैं, भावमें ही देवताका वास है। भावयुक्त मन्त्रके संयोगसे सर्वत्र देवताका सान्निध्य हो जाता है।\* तुमने भक्तिपूर्वक मन्त्र-प्रयोग किया इससे गौरीदेवी वहाँ आ गयीं। फिर तपी हुई बालूसे तुमने उनका पूजन किया, इससे वे तापयुक्त हुईं; |
| **दुर्वासा बोले—**राजन् ! मैं तुम्हारे यहाँ रहकर विधिपूर्वक चातुर्मास्य व्रत सम्पन्न करूँगा। आप मेरी सेवा-शुश्रूषाकी व्यवस्था कर दें। | यही कारण है कि तुम्हें सर्वदा सन्ताप रहता है। अतः अब हाटकेश्वरमें जाकर ब्रह्म-रुद्रमयी गौरीदेवीकी पंचपिण्डी मूर्ति स्थापित करो। तत्पश्चात् |
| 'बहुत अच्छा' कहकर महाराजने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। सेवाका सारा भार मुझपर ही था। जैसे पुत्री पिताकी सेवा करती है, उसी प्रकार मुनिकी सेवाके योग्य जो कार्य था, वह सब मैंने स्वयं ही किया। चौमासा बीतनेपर जब मुनि जाने लगे, तब उन्होंने सन्तुष्ट होकर कहा—'बेटी ! बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा अभीष्ट कार्य सिद्ध करूँ?' तब मैंने उनके चरणोंमें बारम्बार प्रणाम करके कहा—'ब्रह्मन् ! मुझे कोई सन्तान | जब सूर्यदेव वृषराशिपर स्थित हों, उस समय ग्रीष्मकालमें गौरीजीके ऊपर दिन-रात जलधारा गिरनेकी व्यवस्था करो। इससे ज्यों-ज्यों गौरीजीको ठण्डक लगेगी और ताप कम होगा, त्यों-ही-त्यों तुम्हारा मानसिक सन्ताप भी कम होता जायगा। इसके बाद तुम्हें गर्भ रहेगा और तुम पुत्र प्राप्त करोगी। तुम्हारा वह पुत्र राज्यका भार वहन करनेमें समर्थ, शूरवीर तथा तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध होगा। दूसरी कोई भी जो स्त्री इस प्रकार ज्येष्ठमासमें |
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\* न देवो विद्यते काष्ठे पाषाणे मृत्तिकासु च। भावेषु विद्यते देवो मन्त्रसंयोगसंयुतः ॥ (स्क० पु०, ना० खं १६८। १६-१७)