संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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गौरीदेवीकी पूजा करेगी, वह भी तुम्हारी ही भाँति उत्तम फलकी भागिनी होगी।'
लक्ष्मीदेवी कहती हैं—तदनन्तर मैंने मुनीश्वर दुर्वासाजीसे पुनः कहा—'ब्रह्मन्! ऐसा कोई व्रत बताइये, जिसके सम्यक् पालनसे भविष्यमें मनुष्य-योनिमें जन्म न होकर देवभावकी प्राप्ति हो।' तब वे बहुत देरतक ध्यान करके बोले—'बेटी! गौरीजीको सन्तुष्ट करनेवाला एक उत्तम व्रत है, जिसका भलीभाँति अनुष्ठान करनेसे स्त्री देवीस्वरूपा हो जाती है। तुम उसी व्रतका अनुष्ठान करो, इससे देवभावको प्राप्त हो जाओगी।' मैंने पूछा—'मुने! किस-किस समय और किस-किस विधिसे उस व्रतका पालन करना चाहिये?'
दुर्वासा बोले—भाद्रपदमासके कृष्ण पक्षकी तृतीया तिथिको प्रातःकाल उठकर दाँतून करो। फिर स्नान आदिसे शुद्ध हो श्रद्धापूर्ण हृदयसे गौरीजीका नाम लेकर उन्हींकी प्रसन्नताके लिये उपवास व्रत करनेका नियम ग्रहण करे। तदनन्तर रात्रि प्रारम्भ होनेपर मिट्टीकी चार गौरीकी मूर्तियाँ बनावे और एक-एक पहरमें एक-एक मूर्तिकी पूजा करे। पहली गौरी पूर्वोक्त प्रकारसे पंचपिण्डीमयी ही बनानी चाहिये और प्रथम प्रहरमें उनकी इस प्रकार पूजा करनी चाहिये—
आवाहन और नमस्कार
हिमाचलगृहे जाता देवि त्वं शंकरप्रिये।
मेनागर्भसमुद्भूता पूजां गृह्ण नमोऽस्तु ते॥
'शिवप्रिया देवी गौरी! तुम गिरिराज हिमालयके घरमें मेनाके गर्भसे उत्पन्न हुई हो, यह पूजा स्वीकार करो, तुम्हें नमस्कार है।'
इस प्रकार प्रार्थना करके श्रद्धापूर्वक कर्पूरयुक्त धूप निवेदन करे। लाल सूतकी बत्ती बनाकर उसे घीमें डुबो दे और उसीका दीपक अर्पण करे। तत्पश्चात् चमेलीके फूलोंसे पूजा करके लड्डूका नैवेद्य निवेदन करे। नैवेद्यको लाल वस्त्रसे ढककर रखे। उसके बाद देवीको अर्घ्य दे। अर्घ्यमें उसी वृक्षका फूल डाले, जिसका दन्तधावन किया गया हो। फूल, जल, अक्षत और गन्ध आदिसे युक्त मातुलिंग (बिजौरा नीबू) लेकर निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करते हुए भक्तिपूर्वक अर्घ्य देना चाहिये—
शंकरस्य प्रिये देवि हिमाचलसुते शुभे।
अर्घ्यमेनं मया दत्तं प्रतिगृह्ण नमोऽस्तु ते॥
'भगवान् शंकरकी प्रियतमा तथा गिरिराज हिमवान्की पुत्री कल्याणमयी गौरीदेवी! मेरे द्वारा निवेदन किये हुए इस अर्घ्यको ग्रहण करो। तुम्हें सादर नमस्कार है।'
तदनन्तर शरीरशुद्धिके लिये मातुलिंग (बिजौरा नीबू)-का ही प्राशन (भोजन) करे। फिर दूसरे पहरके अन्तमें गौरीदेवीकी परम सुन्दर अर्धनारीश्वरकी मूर्तिकी निम्नांकित मन्त्रसे भक्तिपूर्वक पूजा करे—
वामाङ्कार्धे शरीरस्य या हरस्य व्यवस्थिता।
सा मे पूजां प्रगृह्णातु तस्यै देव्यै नमोऽस्तु ते॥
'जो भगवान् शंकरके श्रीअंगमें वामार्ध भागमें विराज रही हैं, वे गौरीदेवी मेरी पूजा ग्रहण करें, उनको नमस्कार है।'
इस प्रकार अभ्यर्थना करके अगुरुसहित धूप निवेदन करे। फिर भलीभाँति पूजा करके गुड़का नैवेद्य भोग लगावे। तत्पश्चात् नीचे लिखे मन्त्रको पढ़कर नारियलके फलसे अर्घ्य देना चाहिये तथा शरीरशुद्धिके लिये नारियल ही खाना चाहिये।
अर्घ्य-मन्त्र
अर्धनारीश्वरौ यौ च संस्थितौ परमेश्वरौ।
अर्घ्यो मे गृह्यतां देवौ स्यातां सर्वसुखप्रदौ॥
'अर्धनारीश्वररूपसे स्थित परमेश्वर शिव और पार्वती देवी! आप दोनों मेरे इस अर्घ्यको ग्रहण करें और सब प्रकारका सुख देनेवाले हों।'
तदनन्तर तीसरा पहर आनेपर शतपत्रीसे शिव-पार्वतीका पूजन करके प्रार्थना करे—
उमामहेश्वरौ देवौ यौ तौ सृष्टिलयान्वितौ।
तौ गृह्णीतामिमां पूजां मया दत्तां प्रभक्तितः॥
'सृष्टि और संहारकी शक्तिसे युक्त जो पार्वतीदेवी और महादेवजी हैं, वे भक्तिपूर्वक दी हुई मेरी इस पूजाको स्वीकार करें।'
इसके बाद गुग्गुलका धूप दे। नैवेद्य समर्पित