भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1198
  • नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११६९

करे। चमेली और जलका अर्घ्य देकर उसीका प्राशन करे। अथवा नागरमोथाके चूर्णसे धूप और मैनफलसे अर्घ्य देना चाहिये और शरीर-शुद्धिके लिये उसीका आहार करना चाहिये।

अर्घ्य-मन्त्र

उमामहेश्वरौ देवौ सर्वकामसुखप्रदौ।
गृहीतामर्घ्यदानं मे दयां कृत्वा महत्तमाम्॥

'सम्पूर्ण कामनाओं और सुखोंको देनेवाले भगवान् शिव और पार्वतीदेवी मुझपर बड़ी भारी दया करके अर्घ्यदानको ग्रहण करें।'

चौथा पहर आनेपर निम्नांकित मन्त्रद्वारा भृंगराज-पुष्प (भँगरैयाके फूल)-से पंचपिण्डिका गौरीकी भक्तिपूर्वक पूजा करके इस प्रकार अभ्यर्थना करे—

पृथिव्यादीनि भूतानि यानि प्रोक्तानि पञ्च च।
यस्या रूपाणि देवेशि पूजां गृह्ण नमोऽस्तु ते॥

'देवेश्वरि! पृथ्वी आदि जो पाँच भूत बताये गये हैं, वे सब तुम्हारे स्वरूप हैं, तुम्हें नमस्कार है। इस पूजाको ग्रहण करो।'

इसके बाद निम्नांकित मन्त्रसे अर्घ्य दे—

पञ्चभूतमयी देवी पञ्चधा च व्यवस्थिता।
अर्घ्यमेनं मया दत्तं सा गृह्णातु सुरेश्वरी॥

'पंचभूतस्वरूपा गौरीदेवी पाँच मूर्तियोंमें स्थित हैं, वे देवेश्वरी मेरे दिये हुए इस अर्घ्यको ग्रहण करें।'

इस प्रकार अर्घ्य देकर गीत-वाद्य और कीर्तन आदिकी ध्वनिके साथ सम्पूर्ण रात्रि व्यतीत करे। नींद न ले। फिर निर्मल प्रभातकालमें सूर्योदय होनेपर स्नान करके ब्राह्मणदम्पतिका भक्तिपूर्वक पूजन करे। राजकुमारी! इसके बाद हथिनी या घोड़ी मँगाकर उसीपर चारों गौरी-विग्रहोंकी सवारी निकाले। साथ-साथ गीत, वाद्य, मंगल-ध्वनि तथा वेदमन्त्रोंका उच्चारण होता रहे। किसी नदी या तालाबके समीप ले जाकर उसीमें उन विग्रहोंका विसर्जन करे।

विसर्जन-मन्त्र

आहूतासि मया देवि पूजितासि मया शुभे।
मम सौभाग्यदानाय यथेष्टं गम्यतामिति॥

'कल्याणमयी देवि! मैंने आपका आवाहन और पूजन किया है, अब आप मुझे सौभाग्य प्रदान करनेके लिये इच्छानुसार पधारें।'

लक्ष्मीदेवी कहती हैं—प्रभो! इस प्रकार पूर्वजन्ममें मैंने भाद्रपद मासकी उस तृतीयाको भक्तिपूर्वक गौरीदेवीका व्रत किया और द्वितीय तथा तृतीय प्रहरमें जब मैंने उनके श्रीविग्रहकी ओर देखा, तब वे रत्नमयी हो गयी थीं। उनका श्रीविग्रह सब ओरसे प्रकाशपुंजसे परिपूर्ण हो रहा था। जब विसर्जन करनेके उद्देश्यसे मैं नदी-तटपर गयी, तब मेरे मनमें संकल्प-विकल्प होने लगा, विसर्जन करूँ या न करूँ?' इतनेमें सुरेश्वरी गौरीने प्रकट होकर कहा—'बेटी! तुम इस जलमें मेरी भावनामात्र कर लो, फिर इस विग्रहको ले चलकर हाटकेश्वरक्षेत्रमें स्थापित करो। इस समय तुम्हारे मनमें जो-जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।' मैंने कहा—'देवि! मैं मनुष्ययोनिमें किसी प्रकार जन्म न लूँ, भगवान् विष्णु मेरे पति हों।' तब 'तथास्तु' कहकर पार्वती देवी अन्तर्धान हो गयीं। इसके बाद मैंने हाटकेश्वर क्षेत्रमें चारों गौरी-विग्रहोंका स्थापन किया। उसीके प्रभावसे मुझे आप साक्षात् भगवान् ही पतिरूपमें प्राप्त हुए हैं, जो कि सनातन, अविनाशी एवं सदा मेरे ऊपर स्नेहदृष्टि रखनेवाले हैं।

सूतजी कहते हैं—भगवती लक्ष्मीजीके मुखसे उनके पूर्वजन्मका यह वृत्तान्त सुनकर शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु बहुत प्रसन्न हुए। द्विजवरो! जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इस चरित्रको भक्ति-भावसे पढ़ता है, उसका कभी लक्ष्मीसे वियोग नहीं होता तथा कभी उसे दुर्भाग्यका दिन नहीं देखना पड़ता।

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