भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1199, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1199

११७० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

हाटकेश्वरक्षेत्रमें तीनों पुष्करतीर्थोंके आगमनका वृत्तान्त

ऋषियोंने पूछा— सूतजी ! सुना जाता है, त्रिभुवनविख्यात पुष्कर नामक तीर्थ साक्षात् ब्रह्माजीके द्वारा निर्मित हुआ है। उसका प्रमाण एक योजन है। हम जानना चाहते हैं, हाटकेश्वरक्षेत्रमें उस तीर्थका प्रादुर्भाव कैसे हुआ ?

सूतजीने कहा— महर्षियो ! स्वयम्भू ब्रह्माजीको नमस्कार करके मैं पुष्करके प्रादुर्भावका वृत्तान्त सुनाता हूँ। एक समयकी बात है, देवर्षि नारदजी तीनों लोकोंमें भ्रमण करके ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके समीप गये और उन्हें प्रणाम करके उनके आगे विनीतभावसे बैठे।

तब ब्रह्माजीने पूछा— वत्स ! इस समय तुम कहाँसे आये हो ?

नारदजीने कहा— प्रभो ! इस समय मर्त्यलोकसे आया हूँ।

ब्रह्माजीने पूछा— मर्त्यलोकका क्या समाचार है? वहाँके लोग क्या बातें करते हैं?

नारदजीने कहा— सुरश्रेष्ठ ! इस समय मर्त्यलोकमें कलिका राज्य है। वहाँके राजा सन्मार्ग त्यागकर लोभके वशीभूत हो गये हैं और धनके लिये अत्यन्त निर्दयतापूर्वक प्रजाको पीड़ा देते हैं। उनमें शूरता-वीरताका तो नाम नहीं है। सब परायी स्त्रियोंका सतीत्व नष्ट करते हैं। वे ब्राह्मण, गुरु, देवता तथा पितरोंका भी पूजन नहीं करते। ब्राह्मण भी शौचाचारसे रहित हो वेद बेचते, दूसरोंसे दान लेनेमें आसक्त रहते, सन्ध्या नहीं करते, दयाहीन बर्ताव करते तथा वैश्योंकी भाँति सदा कृषिकर्म और पशुपालनमें संलग्न रहते हैं। भूतलपर सब वैश्योंका उच्छेद हो गया है। शूद्र सदा धर्मानुष्ठानकी कामना रखते और तपस्यामें तत्पर रहते हैं। जिसके घरमें धन है, युवती स्त्रियाँ हैं, उसीके साथ सब लोग मित्रता करते हैं। समस्त तीर्थ और आश्रम कलियुगके भयसे दसों दिशाओंमें भागते हैं। स्त्रियाँ अपने पतिके साथ विवाद करती हैं, पतिकी सेवा आदि छोड़कर मनमाने व्रत करती हैं। इस समय मर्त्यलोकमें मैंने सास-पतोहू, पिता-पुत्र, भाई-भाई, स्वामी-सेवक, चोर-राजा तथा पति-पत्नीमें कलह होते देखे हैं। मेघ थोड़ा जल बरसाते हैं। पृथ्वीपर खेतीकी उपज बहुत कम हो गयी है। गौएँ बहुत थोड़ा दूध देने लगी हैं और उनके दूधमें घीका सर्वथा अभाव हो गया है। इस प्रकार वहाँका कलह देखते-देखते मेरा चित्त उद्भ्रान्त-सा हो उठा था, इसलिये मैं यहाँ आया; अब फिर वहीं जानेका विचार हो रहा है।

नारदजीकी यह बात सुनकर ब्रह्माजी यह विचार करने लगे कि—'मर्त्यलोकमें मेरा पुष्कर नामक तीर्थ भी है, जो कलिकालसे व्याप्त होकर नष्ट हो जायगा, अतः मैं उसे किसी दूसरे तीर्थमें ले जाऊँगा, जहाँ कलियुगका प्रवेश नहीं होता।' ऐसा निश्चय करके पितामहने कमल हाथमें लेकर कहा—'हे पद्म ! तुम पृथ्वीपर उस स्थानमें गिरो जहाँ कलियुग न हो।' ब्रह्माजीसे प्रेरित हुआ कमल समूची पृथ्वीपर घूमकर हाटकेश्वरक्षेत्रमें गिरा। जहाँ पहले गिरा, वहाँसे उछलकर वह दूसरे स्थानपर गिरा और फिर वहाँसे भी उछलकर तीसरे स्थानपर जा गिरा। अतः उन तीनों स्थानोंपर तीन कुण्ड हो गये। उन तीनों कुण्डोंमें स्फटिक-मणिके समान स्वच्छ जल भर गया। इसी समय साक्षात् पितामह ब्रह्माजी भी वहाँ आ पहुँचे। हाटकेश्वरक्षेत्रका दर्शन करके वे भूतलपर बैठे और बहुत समयतक ध्यान करके ज्येष्ठ, मध्य तथा कनिष्ठ तीनों पुष्करोंको वहाँ ले आये। तत्पश्चात् वे प्रसन्नचित्त होकर बोले—'मैं कलिकालके भयसे इन तीनों पुष्करोंको यहाँ लाया हूँ। जो मनुष्य परम श्रद्धापूर्वक यहाँ स्नान करेंगे, वे अविनाशिनी उत्तम सिद्धिको प्राप्त होंगे। जो लोग एकाग्रचित्त हो यहाँ कार्तिककी पूर्णिमाको स्नान और गयाशीर्षमें श्राद्ध करेंगे, उनको बड़ा भारी पुण्य प्राप्त होगा।'