संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1200, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११७१
अतिथि-सत्कारका माहात्म्य
ऋषि बोले—महाभाग सूतजी! आप हमें अतिथिसत्कारका उत्तम माहात्म्य विस्तारपूर्वक बताइये।
सूतजीने कहा—मुनीश्वरो! आप सब लोग इस उत्तम माहात्म्यको श्रवण करें। गृहस्थोंके लिये अतिथि-सत्कारसे बढ़कर दूसरा कोई महान् धर्म नहीं है। अतिथिसे महान् कोई देवता नहीं है; अतिथिके उल्लंघनसे बड़ा भारी पाप होता है। जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौट जाता है, उसे वह अपना पाप देकर और उसका पुण्य लेकर चल देता है। जो अतिथिका आदर नहीं करता, उसके सौ वर्षोंके सत्य, तप, स्वाध्याय, दान और यज्ञ आदि सभी सत्कर्म नष्ट हो जाते हैं। जिसके घरपर दूरसे प्रसन्नतापूर्वक अतिथि आते हैं, वही गृहस्थ कहा गया है; शेष सब लोग तो गृहके रक्षकमात्र हैं*। जिन्होंने पूर्वजन्ममें पुण्य किये हैं, उन्हीं मनुष्योंके यहाँ इस पृथ्वीपर श्राद्ध, दान और अतिथिके लिये मधुर वचन—ये तीन प्रकारके सत्कर्म होते हैं। अतिथिको सन्तुष्ट करनेसे गृहस्थके ऊपर सब देवता सन्तुष्ट रहते हैं और अतिथिके विमुख होनेपर सम्पूर्ण देवता भी विमुख हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है। इसलिये गृहस्थको चाहिये कि वह सदा अतिथिको सन्तुष्ट करे। यदि वह अपने लिये पुण्य चाहता है तो आत्मदान करके भी अतिथिको प्रसन्न रखे। द्विजवरो! गृहस्थके लिये तीन प्रकारके अतिथि बताये गये हैं—श्राद्धीय, वैश्वदेवीय तथा सूर्योढ। पितरोंके लिये श्राद्ध और ब्राह्मण-भोजनका संकल्प हो जानेपर जो श्राद्धकालमें स्वतः आ जाता है, उसे श्राद्धीय अतिथि कहते हैं। जो दूरका रास्ता तै करके थका-माँदा बलिवैश्वदेवकर्मके समय (मध्याह्नकालमें) आता है, उस अभ्यागतको वैश्वदेवीय अतिथि जानना चाहिये। पहलेका आया हुआ 'वैश्वदेवीय' अतिथि नहीं कहलाता। प्रिय हो या द्वेषपात्र, मूर्ख हो या पण्डित, यदि वैश्वदेवकालमें आया है, तो वह स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला अतिथि है। उसके गोत्र, चरण (शाखा), स्थान और वेद आदिके विषयमें न पूछे। केवल यज्ञोपवीत देखकर भक्तिपूर्वक भोजन करावे। तीसरा अतिथि सूर्योढ वह है, जो दिनमें या रातमें भोजनके बाद घरपर आता है। उसके लिये भी गृहस्थको यथाशक्ति अन्नदान करना चाहिये। जिसके घरपर आया हुआ सूर्योढ अतिथि सत्कार प्राप्त किये बिना निराश लौट जाता है, वह उसे अपना पातक देकर चला जाता है। तृण, भूमि, जल और चौथा मीठा वचन—ये सब वस्तुएँ सत्पुरुषोंके घरमें कभी समाप्त नहीं होतीं। अतिथिका स्वागत करनेसे गृहस्थको सदा तृप्ति बनी रहती है। उसे आसन देनेसे स्वयम्भू ब्रह्माजी प्रसन्न होते हैं। अर्घ्य प्रदान करनेसे शिवजी सन्तुष्ट होते हैं। पाद्य देनेसे इन्द्र आदि देवता प्रसन्न रहते हैं तथा उसे भोजन देनेसे भगवान् विष्णु सन्तुष्ट होते हैं। अतिथि सम्पूर्ण देवताओंका स्वरूप होता है; अतः सदा उसका पूजन करना और विशेषतः उसे भोजन देना चाहिये। अतिथि न मिले तो अतिथिके नामसे किसी दूसरे ब्राह्मणको ही गृहस्थ पुरुष भोजन करावे।
* अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते। स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति॥
सत्यं तथा तपोऽधीतं दत्तमिष्टं शतं समाः। तस्य सर्वमिदं नष्टमतिथिं यो न पूजयेत्॥
दूरादतिथयो यस्य गृहमायान्ति निर्वृताः। स गृहस्थ इति प्रोक्तः शेषाश्च गृहरक्षिणः॥
(स्क० पु०, ना० उ० १७६। ४—७)