संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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हाटकेश्वरक्षेत्रमें पुष्करके प्राकट्यका वार्षिक समय, उसकी महिमा तथा ब्रह्मज्ञानसाधक दो तीर्थोंका माहात्म्य
ब्रह्माजी बोले— ब्राह्मणो! पृथ्वीपर नैमिषारण्य, अन्तरिक्षमें पुष्कर और तीनों लोकोंमें कुरुक्षेत्रकी विशेष स्थिति मानी गयी है। मेरे आदेशसे पाँच रातके लिये पुष्कर क्षेत्र इस पृथ्वीपर अवश्य आवेगा। कार्तिक शुक्ल पक्षमें एकादशीसे लेकर पूर्णिमातक पाँच राततक यहाँ पुष्करतीर्थका वास होगा। इन पाँच रात्रियोंमें जो स्नान करेगा अथवा श्रद्धापूर्वक श्राद्धका अनुष्ठान करेगा, उसका वह पुण्यकर्म अक्षय होगा। मैं भी उस समय ब्रह्मलोकसे आकर पाँच राततक इस तीर्थमें निवास करूँगा।
ब्राह्मणोंने कहा— प्रपितामह! हम इस स्थानमें आपकी मूर्ति स्थापित करेंगे। अतः प्रभो! आपको सदा यहाँ शुभागमन करना चाहिये। साथ ही आपका पुष्करतीर्थ भी सदाके लिये यहाँ आकाशसे उतर आवे। समस्त लोकोंके पापोंका नाश करनेके लिये उस स्वयंनिर्मित तीर्थको आप अवश्य यहाँ ले आवें।
ब्रह्माजी बोले— मन्त्रोच्चारणपूर्वक आवाहन करनेपर वह श्रेष्ठ पुष्करतीर्थ आकाशमार्गसे हाटकेश्वरक्षेत्रमें उतर आवेगा। जो द्विज इस तीर्थमें आकर स्नानपूर्वक मेरी मूर्तिके आगे बैठकर पैल और मैत्रेयका स्मरण करके चारों समय अघमर्षण मन्त्रका जप करेगा, उसके उस जप और मन्त्र-पाठको मैं ब्रह्मलोकसे आकर सुनूँगा।
ऋषियोंने पूछा— सूतनन्दन! मरणधर्मा मनुष्योंको ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति कैसे होगी?'
सूतजीने कहा— ब्रह्मर्षियो! मुझमें ऐसी क्या शक्ति है, जो इस विषयका वर्णन कर सकूँ। परंतु हाटकेश्वरक्षेत्रमें दो शुभ तीर्थ हैं, जो मनुष्योंको ब्रह्मज्ञान प्रदान करनेवाले हैं। शूद्री और ब्राह्मणी दो कुमारियोंने उन दोनों तीर्थोंको प्रकट किया है। जो मनुष्य अष्टमी और चतुर्दशीको उन दोनों तीर्थोंमें स्नान करता है, फिर भक्तिपूर्वक कुमारीद्वारा पूजित और कुण्डके भीतर स्थित युगल पादुकाओंका पूजन करता है, उसे एक वर्ष बीतनेपर ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है। वे पादुकाएँ मोक्षकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको ब्रह्मज्ञानका सुख देनेवाली हैं और आत्मज्ञानकी पुष्टिके लिये शक्तिसे स्थापित की गयी हैं। मेरे पिताजी उस तीर्थमें गये और ज्ञानवान् हो गये। उन्हींकी आज्ञासे मैंने भी वहाँ जाकर एक वर्षतक निवास और पादुकाओंका पूजन किया, इससे मुझे ज्ञानकी प्राप्ति हो गयी। लोकमें पुराणसम्बन्धी जितना भी साहित्य है, सबका मुझे ज्ञान है। यदि आपलोगोंको भी मोक्ष पानेकी इच्छा हो, तो वहीं जाइये। पुनरागमनके चक्रमें डालनेवाले इन स्वर्गसाधक यज्ञोंसे क्या लेना है? आपलोग वहीं जाकर मनुष्योंको सिद्धि प्रदान करनेवाली उन पादुकाओंकी आराधना करें, जिससे वर्षके अन्तमें ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो जाय।
ऋषि बोले— महाभाग सूतजी! आपको धन्यवाद। आपने आज बहुत अच्छा उपदेश दिया; इसके द्वारा हमें संसार-सागरसे तार दिया। हमारा यह यज्ञ बारह वर्षोंतक चलनेवाला है, इसके समाप्त होते ही हम सब लोग वहाँ जायँगे, इस बातका हमने भलीभाँति निश्चय कर लिया है।
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