संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1202, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११७३
ब्राह्मणकन्या और राजकन्याका अनुपम प्रेम, राजकुमारीका दशार्णराजके साथ विवाहका निश्चय
ऋषियोंने पूछा—सूतजी ! आपने हाटकेश्वरक्षेत्रमें जिन दो शूद्रीतीर्थ और ब्राह्मणीतीर्थकी चर्चा की है, उनका निर्माण किसके द्वारा हुआ ?
सूतजीने कहा—छान्दोग्य नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे। जो सामवेदके ज्ञाता होनेके साथ ही गृहस्थाश्रम-धर्मके पालनमें तत्पर रहते थे। उनके बुढ़ापेमें एक कन्या उत्पन्न हुई, जो विशाल नेत्रोंवाली और मनुष्योंका मन मोहनेवाली थी। जिस दिन महात्मा छान्दोग्यके कन्या हुई, उसी दिन आनर्त देशके शूद्र जातीय नरेशके घरमें भी एक कन्याका जन्म हुआ। वह भी ब्राह्मण-कन्याकी ही भाँति परम सुन्दरी थी। यद्यपि उसका जन्म रातमें हुआ, तथापि उसने अपनी अंगकान्तिसे सम्पूर्ण सूतिकागृहको प्रकाशित कर दिया, मानो रत्नराशिकी प्रभासे सारा घर उद्भासित हो उठा हो। इसीलिये राजकुमारीके पिताने उसका नाम रत्नवती रखा। उस राजकन्या और ब्राह्मणकुमारीमें सखीका सम्बन्ध हुआ। वे निरन्तर साथ-साथ रहती थीं, कभी उनमें वियोग नहीं होता था। एक आसन, एक शय्या और एक-से अन्नका भोजन उन दोनोंको साथ-साथ प्राप्त होता था।
ब्राह्मण-कन्याकी आयु जब आठ वर्षकी हुई, तब उनके पिताने उसके विवाहके लिये वर ढूँढ़ना प्रारम्भ किया। पिताका यह प्रयत्न देखकर कन्याको दुःख हुआ। सखीसे वियोग न हो जाय, इस डरसे उसने सब बात रत्नवतीसे कही—'सखी ! अब पिताजी मेरा विवाह करेंगे। विवाह हो जानेपर मेरा-तुम्हारा साथ कभी नहीं होगा।' राजकुमारी यह वज्रपातके समान दुःसह वचन सुनकर सखीके गलेसे लिपट गयी और स्नेहसे विकल होकर रोने लगी।
पुत्रीका रुदन सुनकर उसकी माता मृगावती सहसा वहाँ आयी और बोली—बेटी ! क्यों रोती हो। किसने तुम्हारा दिल दुखाया है?
रत्नवती बोली—मा ! यह ब्राह्मण-कन्या मुझे प्राणोंके समान अत्यन्त प्रिय है। अतः इसका विवाह होगा और यह कल्याणी अपने पतिके घर चली जायगी। इससे अलग होकर मैं किसी प्रकार जीवित नहीं रह सकती। देवि ! इसी कारणसे मैं दुःखी होकर रोती हूँ।
मृगावतीने कहा—बेटी ! यदि ऐसी बात है तो मैं तुम्हारी इस प्रिय सखीका विवाह वहीं करूँगी, जिससे इसके साथ तुम्हारा मिलना-जुलना हो सके।
ऐसा कहकर रानी मृगावतीने द्विजश्रेष्ठ छान्दोग्यको बुलवाकर विनयपूर्वक प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'ब्रह्मन् ! आपकी पुत्री मेरी राजकुमारी रत्नवतीको अत्यन्त प्यारी है, इसलिये मेरी कन्या जब किसी राजाके साथ ब्याही जाय, उस समय उसके पुरोहितसे आप अपनी कन्याका विवाह कर दें, जिससे ये दोनों एक-दूसरीसे विलग न हों; एक स्थानपर प्रसन्नतापूर्वक रह सकें।'
छान्दोग्य बोले—देवि ! नागर ब्राह्मणोंने यह मर्यादा बाँध रखी है कि जो नागर, नागर ब्राह्मणके सिवा दूसरे किसी ब्राह्मणको कन्या देता है अथवा नागरके अतिरिक्त अन्य किसी ब्राह्मणकी कन्या ग्रहण करता है, वह पंक्तिदूषक है। इस पापके कारण उसे यहाँ निवास करनेका अधिकार नहीं है। अतः मैं अपनी कन्या नागरको छोड़कर किसी दूसरे ब्राह्मणको नहीं दूँगा।
यह सुनकर ब्राह्मणकन्याने कहा—पिताजी ! यदि ऐसी बात है तो मैं कुमारी एवं ब्रह्मचारिणी रहूँगी। विवाहके लिये घर नहीं चलूँगी। जहाँ मेरी प्यारी सखी ब्याही जायगी, वहीं इसके साथ जाऊँगी। यदि आप बलपूर्वक हठसे मेरा विवाह करेंगे तो विष खा लूँगी अथवा आगमें जल मरूँगी। मेरे इस निश्चयको जानकर आपको जो उचित प्रतीत हो, वह कीजिये।