भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1203

१९७४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कन्याका यह निश्चय जानकर ब्राह्मण दुःखी हो उसे वहीं छोड़कर घर लौट गये। वह पिताका स्नेह त्यागकर राजकुमारीके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने और क्रीडा करने लगी। इधर आनर्तनरेशने भी अपनी पुत्रीको विवाहके योग्य हुई जानकर मन-ही-मन कहा—अब मैं अपनी पुत्रीका योग्य वरके साथ विवाह करूँगा। जो किसी कार्य-कारणसे या लोभवश अयोग्य वरके साथ अपनी कन्याका विवाह कर देता है, वह नरकमें जाता है*। इस प्रकार योग्य वरका अनुसन्धान करते हुए उनका बहुत समय व्यतीत हो गया, तथापि उन्हें अपनी कन्याके योग्य उत्तम वर नहीं दिखायी दिया। तब राजाने विश्वविख्यात चित्रकारोंको बुलवाया और उन्हें भेजते हुए कहा—'तुमलोग मेरे आदेशसे जाओ और भूतलके समस्त राजाओंका चित्रपट तैयार करके ले आओ। वे सब चित्र मेरी पुत्रीको दिखाओ, जिससे वह उन्हींमेंसे किसी अभीष्ट पतिका चुनाव स्वयं कर ले, इससे मुझे दोष नहीं लगेगा।'

राजाका यह वचन सुनकर सब चित्रकार पृथ्वीपर रहनेवाले सम्पूर्ण राजाओंके घर गये। जो राजा तरुण, रूप, उदारता आदि गुणोंसे युक्त एवं योग्य थे, उन सबका चित्र बनाकर ले आये। उन सब चित्रोंको क्रमशः उन्होंने रत्नवतीके आगे रखकर दिखाया। रत्नवतीने उन सब चित्रोंमेंसे राजा बृहद्बलको पसंद किया और कहा—'मैंने दशार्णराज बृहद्बलको पति बनानेके लिये वरण किया।' यह सुनकर आनर्तनरेश बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने दशार्णराजके यहाँ दूतोंको भेजा और उनसे कहा—तुम सब लोग राजा बृहद्बलसे विनयपूर्वक कहना—राजन्! आप विवाहके लिये आनर्तनरेशके यहाँ चलें, वे आपके साथ अपनी त्रिभुवनसुन्दरी कन्या रत्नवतीका विवाह करेंगे।'

राजाका यह आदेश पाकर दूत शीघ्र ही दशार्णराजके यहाँ गये और आनर्तनरेशका सन्देश कह सुनाया। सुनकर राजा बृहद्बलको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने अपनी विशाल सेना साथ ले आनर्त-राजधानीकी ओर प्रयाण किया।


परावसुके द्वारा मद्यपानका प्रायश्चित्त, राजकन्या रत्नवती और परावसुका सुदृढ़ आत्मसंयम

सूतजी कहते हैं—उन्हीं दिनों चमत्कारपुरमें विश्वावसु नामसे प्रसिद्ध एक नागर थे, जो वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् थे। उन्हें प्रौढ़ावस्थामें एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो प्राणोंके समान प्रिय था। उसका नाम परावसु था। वह युवावस्था प्राप्त होनेपर इष्ट-मित्रोंके साथ वेदोंका स्वाध्याय करने लगा। किसी समय माघमास आनेपर परावसु अपने अध्यापकके घर अध्ययन करता था। वह रातको भी वहीं रहता था। एक दिन आधी रातको वह चुपकेसे उठा और अपने सहपाठियोंसे छिपकर वेश्याके घरमें जा उसीके साथ सो गया। जब थोड़ी-सी रात बाकी रही, तब उसे बड़े जोरकी प्यास लगी। नींदके आलस्यमें ही उठकर उसने चारपाईके नीचे रखे हुए वेश्याके मदिरापात्रको उठा लिया और पानीके भ्रमसे मदिराको ही पी लिया। मुँहमें पड़ते ही उसे मद्यका ज्ञान हो गया और उस पात्रको फेंककर वह बहुत दुःखी हुआ। उसके मनमें बड़ी घृणा उत्पन्न हुई और वह इस प्रकार पश्चात्ताप करने लगा—अहो! मैंने नींदके आलस्यमें यह कैसा अपकर्म कर डाला; जलके धोखेमें अत्यन्त निन्दित मद्यको ही मुँहमें डाल लिया। क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? कैसे मेरी शुद्धि होगी? अब मैं इसके लिये अत्यन्त दुष्कर प्रायश्चित्त भी करूँगा।'


* अनर्हाय च यो दद्याद्वप्राय निजकन्यकाम्। कार्यकारणलोभेन नरकं स प्रगच्छति॥ (स्क० पु०, ना० उ० १८६। २-३)