संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * | ११७५ ---|---
मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके प्रातःकाल उसने शंखतीर्थमें जाकर शिखासहित मुण्डन कराया और स्नान किया। इसके बाद शीघ्र ही उस स्थानपर गया, जहाँ वेद-विद्यालयमें शिष्योंसहित उपाध्याय वेदमन्त्रोंका पाठ कर रहे थे। वहाँ पहुँचकर परावसु दूर ही बैठा। उसके सहपाठियोंने जब उसे दाढ़ी-मूंछसे रहित देखा, तब वे हँसी करते हुए हाथोंसे बार-बार उसके मस्तकपर ठोंकने लगे। उपाध्यायने उसे इस दशामें देखकर आदरपूर्वक पूछा—‘वत्स! तुम ऐसे क्यों हो रहे हो? आओ मेरे निकट बैठो, बताओ, किसने तुम्हारा अपमान किया है।’
परावसु बोला—गुरुदेव! अब मैं आपकी सेवाके योग्य नहीं रहा। वेश्याके घरमें गया था। वहाँ अपना कमण्डलु समझकर उसके मदिरापात्रको मुँहमें लगा लिया। अतः मेरी शुद्धिके लिये मद्यपानका प्रायश्चित्त बताइये।
तब गुरुके समीप बैठे हुए धृष्ट छात्रोंने उसकी हँसी उड़ाते हुए कहा—‘राजकन्या रत्नवतीके स्तन पकड़कर जब उसके अधर पान करोगे, तब शुद्धि होगी, अन्यथा नहीं।’
परावसु बोला—मित्रो! मैं संकटमें पड़ा हूँ। यह मेरे साथ परिहासका समय नहीं है। यदि तुम्हारा मुझपर स्नेह हो तो अन्य ब्राह्मणोंको बुलाकर मेरे लिये कोई प्रायश्चित्त बताओ।
तब वे मित्र परिहास छोड़कर उसके दुःखसे दुःखी हुए और विश्वावसुके समीप जाकर उन्होंने सब बातें बतायीं। यह सुनकर विश्वावसु अपनी पत्नीके साथ वहाँ आये और शोकसे व्याकुल होकर बोले—‘हाय! बेटा! तुमने यह क्या किया? परावसुने अपना सब वृत्तान्त कह सुनाया और अपना विचार प्रकट किया—‘मैं अपनी शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करूँगा।’ तब विश्वावसुने वेदों तथा धर्मशास्त्रोंके विद्वान् ब्राह्मणोंको बुलवाया। परावसुने हाथ जोड़कर खड़े हो आदिसे ही अपना सब वृत्तान्त उनको बताया—‘मैंने रातमें अपना कमण्डलु समझकर वेश्याके मदिरापात्रको मुँहसे लगा लिया; अतः मुझे यथायोग्य प्रायश्चित्त दें, जिससे मेरी शुद्धि हो।’ यह सुनकर स्मृतिके ज्ञाता विद्वानोंने धर्मशास्त्र देखकर कहा—जो ब्राह्मण जान-बूझकर मदिरापान करता है, वह उस मदिराके बराबर सुवर्णको आगमें तपाकर पी जाय, तब शुद्ध होता है और यदि अनजानमें वह मदिरा पी लेता है, तब उतना ही घी आगमें खूब तपाकर पी ले तभी उसकी शुद्धि होती है। यही प्रायश्चित्त है। यदि तुम कर सको तो करो।’
परावसु बोला—मैंने एक कुल्ला मदिरा पी लिया है, अतः उतना ही घृत आगमें अच्छी तरह तपाकर पी लूँगा।
यह सुनकर विश्वावसु अत्यन्त दुःखित हो ब्राह्मणोंसे बोले—ब्राह्मणो! मैं इस पुत्रकी शुद्धिके लिये सर्वस्व दे दूँगा, परंतु ऐसा प्रायश्चित्त किसी प्रकार भी करने न दूँगा।
पिताका यह वचन सुनकर पुत्रने कहा—पिताजी! स्नेह छोड़िये, मेरे प्रायश्चित्तमें विघ्न न डालिये। मैंने निश्चय कर लिया है कि प्रायश्चित्त करूँगा।
तब परावसुकी माता बोली—बेटा! यदि तुम्हें अपनी शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करना ही है तो मैं ही पहले पतिदेवके साथ तुम्हारे सामने अग्निमें प्रवेश करूँगी। तुम्हें अग्निके समान खौलते हुए घी पीकर मरते नहीं देख सकूँगी।
पिताने भी कहा—बेटा! तुम्हारी माताने जो कुछ कहा है, वही मैं भी चाहता हूँ।
सूतजी कहते हैं—यह सब वृत्तान्त सुनकर उनके हितैषी लोग आये और परावसुको प्रायश्चित्तसे निवृत्त होनेके लिये समझाने लगे। जब वे पिता-पुत्रोंमेंसे किसीको भी प्राण त्यागके निश्चयसे न डिगा सके तब वास्तुपदतीर्थमें सर्वज्ञ भर्तृयज्ञके समीप गये और परावसुका सारा हाल सुनाकर बोले—‘महाभाग! यदि इस ब्राह्मणकी शुद्धिके लिये मद्यपानका कोई दूसरा प्रायश्चित्त हो तो वही बताइये; क्योंकि आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है।’
भर्तृयज्ञ बोले—ब्राह्मण और उनमें भी विशेषतः