संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
नागर ब्राह्मण जो वचन कहते हैं, वह वैसा ही होता है; अन्यथा नहीं होता। वेद-विद्यालयमें बैठे हुए नागर ब्राह्मणोंने (परिहासमें) जो कुछ कहा है, वह किसी प्रकार अन्यथा नहीं किया जा सकता। परावसुके मित्रोंने हँसीमें उससे कहा था कि 'रत्नवतीके स्तनोंको हाथमें लेकर जब तुम उसके अधरका आस्वादन करोगे तभी मद्यपानसम्बन्धी अशुद्धि दूर होकर तुम्हें शुद्धि प्राप्त होगी।' वही उपाय इस ब्राह्मणके लिये सुखद होगा। महर्षि पराशरके मतसे ब्राह्मणवचनको आदर देकर यदि उक्त प्रायश्चित्त वह करेगा, तो उसकी शुद्धि हो जायगी।
ब्राह्मण बोले— यदि यह बात राजाके कानोंमें पड़ जाय तो वे क्रोधमें आकर समस्त ब्राह्मणोंका वध कर डालेंगे।
भर्तृयज्ञने कहा— आनर्तनरेश बड़े नीतिमान्, विज्ञ, धर्मात्मा, सर्वशास्त्रनिपुण तथा देव-ब्राह्मणोंके भक्त हैं। अतः सब नागर मेरे साथ उनके घर चलें। किसी मध्यवर्ती पुरुषको आगे रखकर उसीके मुखसे परावसुके मद्यपानका वृत्तान्त, उसके मित्रोंकी हास्यमिश्रित वार्ता तथा पराशर-स्मृतिका वचन आदि कहलावें। यह सब सुनकर यदि राजा ईर्ष्या और रोषके वशीभूत हो जायँगे, तब उनको मैं राहपर लाऊँगा।
भर्तृयज्ञकी यह बात सुनकर सब नागर बड़े सन्तुष्ट हुए और उनकी प्रशंसा करके परम सुहृद् हरिभद्र और भर्तृयज्ञको आगे रखकर माता-पितासहित परावसुको साथ ले राजद्वारके समीप आये। द्वारपालने जाकर राजाको उन सबके आगमनकी सूचना दी। राजद्वारपर ब्राह्मणोंका शुभागमन सुनकर आनर्तनरेशने पुरोहितके साथ आगे आ उनकी अगवानी की। तत्पश्चात् भर्तृयज्ञ, हरिभद्र तथा अन्य चार हजार ब्राह्मणोंके लिये क्रमशः अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क और विष्टर आदि निवेदन किये। फिर उन सबके शुभाशीर्वाद प्राप्तकर सभामण्डपमें आये तथा सबको क्रमशः सोनेके सिंहासनोंपर बिठाया। सबके बैठ जानेपर राजा स्वयं भूमिपर बैठे और हाथ जोड़कर बोले—'मैं धन्य हूँ, मुझपर आपलोगोंकी बड़ी कृपा है, जिससे आज मेरे घरपर समस्त नागर ब्राह्मणोंका समुदाय उपस्थित हुआ है। आपलोग इस सेवकको आज्ञा दें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?'
तब हरिभद्रने जिस प्रकार उसने मदिरापान किया, जैसा उसके मित्रोंने परिहासमें कहा, जिस प्रकार तपाये हुए घृत पीनेको प्रायश्चित्त बताया गया और जिस तरह सान्त्वना देकर भर्तृयज्ञ सबको राजाके पास ले आये, इत्यादि परावसुका सब वृत्तान्त राजासे आदरपूर्वक कह सुनाया। सब बातें सुनकर राजा बड़े प्रसन्न हुए और हाथ जोड़कर बोले—'मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ, जिसके ऊपर तीन ब्राह्मणोंकी प्राणरक्षाका भार रखकर नागर ब्राह्मणोंने महान् अनुग्रह किया है। धन्य है मेरी पुत्री, जो मरणका निश्चय किये हुए तीन ब्राह्मणोंके प्राणोंकी रक्षा करेगी।'
यह कहकर राजाने उसी समय कन्याको बुलाया और कहा—'विप्रवरो! आपके आदेशसे मैंने अपनी इस कन्याको बुला दिया है, अब परावसु भर्तृयज्ञके बताये अनुसार कार्य करें।' तब भर्तृयज्ञने परावसुको बुलाकर उस कन्याके सामने कहा—'यदि तुम इस कन्याके अधरका स्पर्श करते हुए अपने मनमें इसे माता मानोगे तो अवश्य तुम्हारी शुद्धि हो जायगी। यदि आसक्त होकर अधरपान करोगे, तो तुम्हारे मुँहमें खून भर जायगा और यदि तुम्हारा भाव शुद्ध होगा तो मुँहमें दूध आ जायगा। इसमें सन्देह नहीं है। यदि तुम्हारे पीनेपर इसके स्तनोंमें दूध उतर आये तो तुम्हारी शुद्धि मानी जायगी। यदि रक्त निकला तो शुद्धि नहीं मानी जायगी।'
परावसुसे ऐसा कहकर भर्तृयज्ञने राजकुमारीसे कहा— बेटी! तुम इसे पुत्रकी भाँति देखो, जिससे तुम्हारे ओष्ठका स्पर्श करके यह शुद्ध हो जाय। तुम्हारे स्तनोंके स्पर्शसे इसके सखाओंने शुद्धि बतायी है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो इसकी मृत्यु हो जायगी।
'बहुत अच्छा' कहकर राजकन्याने लजाते