संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११७७
हुए परावसुसे कहा—बेटा! आओ और मातृत्वका आश्रय लेकर आत्म-शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करो। मैंने तुम्हें अपना पुत्र मान लिया।
परावसुने भी रत्नवतीको अपनी माता मानकर उसके समीप आ सबके देखते-देखते उसके स्तनोंका स्पर्श किया। स्पर्श करते ही उन स्तनोंसे दूधकी दो धाराएँ बह निकलीं। फिर ज्यों ही उसके ओष्ठका स्पर्श किया त्यों ही वहाँसे भी दूध प्रकट हो गया। यह देख सब ब्राह्मण प्रसन्न होकर बोले—‘अब यह ब्राह्मण शुद्ध हो गया।’ परावसुने भी रत्नवतीकी परिक्रमा करके कहा—‘मा! तुम पुत्रवत्सला माता हो।’ यह महान् आश्चर्यकी बात देखकर आनर्तनरेशको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने प्रायश्चित्त देनेवाले भर्तृयज्ञकी प्रशंसा करते हुए कहा—‘अहो! मैं बड़ा सौभाग्यशाली हूँ, जिसके घरपर ऐसे महान् नागर ब्राह्मण पधारे हुए हैं तथा मेरी आज्ञाके अधीन रहनेवाली यह मेरी पुत्री भी महासती, परम सौभाग्यशालिनी एवं सत्य तथा सदाचारसे सम्पन्न है। ये परावसु भी साधारण ब्राह्मण नहीं हैं, जो ऐसी कन्याका स्पर्श करके भी विकारको नहीं प्राप्त हुए।’
ऐसा कहकर राजाने सब ब्राह्मणोंको विदा कर दिया और स्वयं अपनी पुत्रीके साथ राजमहलमें पदार्पण किया।
ब्राह्मणकन्या और शूद्रराजकन्याकी तपस्या, भगवान् शिवका वरदान तथा उनके नामसे दो प्रसिद्ध तीर्थोंका प्रादुर्भाव
सूतजी कहते हैं—इसी समय दशार्णराज बृहद्बल रत्नवतीसे विवाह करनेके लिये उस नगरमें आये। यहाँ आनेपर जब उन्होंने रत्नवती और परावसुका वृत्तान्त सुना तो उनके मनमें बड़ी विरक्ति हुई और वे अपनी राजधानीकी ओर लौट गये। यह सुनकर आनर्तनरेश उन्हें वापस लानेके लिये उनके पीछे-पीछे गये और निकट जाकर बोले—‘राजन्! मेरी कन्याका पाणिग्रहण किये बिना ही तुम क्यों लौटे जाते हो?’
दशार्णनरेशने कहा—‘महाराज! आपके जीते-जी ही आपकी कन्याके अधरों और स्तनोंका स्पर्श पराये पुरुषने कर लिया है, अतः यह पुनर्भू (द्वितीय पतिवाली) हो चुकी है। पुनर्भू स्त्री यदि किसी प्रकार किसी पुत्रको उत्पन्न करे तो वह पुत्र दस पीढ़ी पहलेतकके पूर्वजोंको, दस पीढ़ी बादतककी सन्तानपरम्पराको तथा इक्कीसवें अपने-आपको भी निस्सन्देह नरकमें डाल देता है। इस कारण मैं आपकी कन्याका पाणिग्रहण नहीं करूँगा।
ऐसा कहकर राजा बृहद्बल अपने नगरको चले गये। आनर्तनरेश भी दुःखसे व्याकुल हो घर आये और अपनी पत्नी मृगावती तथा पुत्री रत्नवतीसे सब हाल कह सुनाया। यह सब बात सुनकर मन्त्रियोंको भी बड़ा दुःख हुआ और वे राजाको आश्वासन देते हुए बोले—‘महाराज! पृथ्वीपर असंख्य राजा हैं, उन्हींमेंसे किसीको अपनी कन्या ब्याह दीजिये।’ तब आनर्तनरेशने वहाँ बैठी हुई अपनी कन्यासे कहा—‘बेटी! तुमने चित्रपटमें सब राजाओंको देखा है, उन्हींमेंसे किसीका वरण करो!’
रत्नवती बोली—पिताजी! मैं दशार्णराजको छोड़कर दूसरे किसीको किसी तरह भी पति नहीं बनाऊँगी; क्योंकि राजा एक बार कोई बात कहते हैं, ब्राह्मण भी एक ही बार कहते हैं और कन्या भी एक ही बार किसीको दी जाती है। ये तीन बातें एक-एक बार ही होती हैं। इन्हें बदला नहीं जाता*। तात! ऐसा जानकर आप मुझे दूसरे किसी राजाको न दें; क्योंकि यह कार्य शास्त्रदृष्टिसे धर्म नहीं माना जा सकता।
* सकृज्जल्पन्ति राजानः सकृज्जल्पन्ति च द्विजाः। सकृत् कन्या प्रदीयते त्रीण्येतानि सकृत् सकृत्॥
(स्क० पु०, ना० उ० १८८। १७-१८)