संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९७८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
आनर्तनरेशने कहा— बेटी! अभी तो वचन-मात्रसे मैंने तुम्हें दशार्णराजको देनेकी प्रतिज्ञा की थी। परंतु उन्होंने ब्राह्मण, अग्नि तथा गुरुजनोंके समक्ष तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं किया है। ऐसी दशामें वे तुम्हारे पति कैसे हो गये?
रत्नवती बोली— पिताजी! किसी भी कार्यका पहले मनमें निश्चय किया जाता है, फिर उसे वाणीद्वारा प्रकट किया जाता है, तत्पश्चात् कार्यरूपमें परिणत किया जाता है। प्रभो! मैंने अपने-आपको मनद्वारा दशार्णराजके चरणोंमें समर्पित कर दिया है, आपने भी मनसे निश्चय करके वाणीद्वारा मेरा दान किया है; फिर वे मेरे पति कैसे नहीं हुए? अतः अब मैं कौमारव्रत धारण करके तपस्या करूँगी, दूसरेको पति नहीं बनाऊँगी।
पुत्रीकी यह बात सुनकर माता मृगावतीने कहा— बेटी! तुम्हें तपस्याके लिये साहस नहीं करना चाहिये। तुम अभी बालिका हो, तुम्हारे अंग सुकुमार हैं तथा तुम सदैव सुखमें पली हो। भला कन्द, मूल, फल खाकर और चीर एवं वल्कल पहनकर तुम तपस्या कैसे कर सकोगी? मैं तुम्हें किसी श्रेष्ठ राजाके साथ ब्याह दूँगी।
रत्नवती बोली— माँ! यदि तुम मुझे जीवित रहने देना चाहती हो, तो फिर कभी ऐसी बात मुँहसे न निकालना। यदि हठ करके मेरी तपस्यामें विघ्न डालोगी तो मैं शरीर त्याग दूँगी।
मातासे ऐसा कहकर रत्नवती ब्राह्मण-कन्यासे बोली— कल्याणी! अब मेरे भेजनेसे तुम अपने पिताके घर जाओ, जिससे तुम्हारे पिता किसी महात्मा नागरके साथ तुम्हारा विवाह कर दें। मैंने तुम्हारे प्रति जो असत्य या अनुचित वचन कहा हो, उसे क्षमा करना। तुमने भी मुझसे जो कुछ कहा हो, वह सब मैंने क्षमा कर दिया।
ब्राह्मण-कन्याने कहा— शुभे! तुम्हारे सम्पर्कमें रहकर मैंने अपनी कौमारावस्था व्यतीत कर दी। अब मेरा सोलहवाँ वर्ष भी बीत गया। मैं अब रजस्वला होने लगी हूँ। अतः स्मृति-वाक्यका अर्थ जाननेवाला कोई भी नागर ब्राह्मण यहाँ मेरा पाणिग्रहण नहीं करेगा।
अतः शुभे! मैं भी तुम्हारे साथ तपस्या करूँगी, मुझे पिता-मातासे कोई प्रयोजन नहीं है।
ऐसा निश्चय करके वे दोनों कन्याएँ वहाँ गयीं, जहाँ महामुनि भर्तृयज्ञजी रहते थे। उनकी तपस्याके प्रभावसे वहाँ मनुष्य एवं पशु-पक्षीकी योनिमें पड़े हुए जीवोंके मनमें भी क्रोधका भाव नहीं देखा जाता था। नेवले सर्पोंके साथ और बिलाव चूहोंके साथ क्रीडा करते थे। मृग सिंहोंके साथ और कौए उल्लुओंके साथ खेलते थे। उस स्थानमें भर्तृयज्ञ मुनि एक आसनपर सुखपूर्वक बैठे थे। दोनों कन्याओंने उनके समीप जा हाथ जोड़ विनयपूर्वक प्रणाम किया। उसके बाद ब्राह्मण-कन्याने कहा—'भगवन्! अपनी सखी राजकन्याके साथ मैं तपस्याके लिये आयी हूँ, अतः आप कृपा करके तपस्याकी विधि बतावें।'
भर्तृयज्ञ बोले— मैं तपस्याकी विधि बताता हूँ, सुनो—उससे मोक्षतककी प्राप्ति होती है, फिर स्वर्गकी तो बात ही क्या है? राग-द्वेषरहित पुरुषोंद्वारा पालित कृच्छ्र, चान्द्रायण एवं त्रिरात्र आदि व्रत तपस्याके द्वार हैं; तपस्यासे ही सबके मनोवांछित पदार्थोंकी सिद्धि होती है। जब मनमें शत्रु-मित्र तथा पत्थर एवं रत्नके प्रति समान बुद्धि हो जाय, तब मोक्षकी प्राप्ति होती है। जो तपस्वीका वेष धारण करके भी क्रोध-परायण होता है, उसका सब कुछ राखमें दी हुई आहुतिके समान व्यर्थ है।
तब 'ऐसा ही होगा' यह प्रतिज्ञा करके ब्राह्मण-कन्या राजकुमारी रत्नवतीको साथ ले स्वच्छ जलसे भरे हुए, कमलवनसे सुशोभित किसी जलाशयके तटपर गयी। उसने तपस्याके पहले चान्द्रायण किया, फिर कृच्छ्र एवं सान्तपन व्रतका पालन किया। इसके बाद उसने तीन वर्षोंतक छः-छः दिनोंके बाद भोजन किया। उसी समय शूद्रराजकन्याने भी बड़ी प्रसन्नताके साथ दूसरे जलाशयके तटपर जाकर उसी प्रकार कठोर तपस्या की। उसने ज्यों-ज्यों तपस्या की,