संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११७९
त्यों-ही-त्यों उसके अति उत्तम तेजकी वृद्धि हुई। तदनन्तर भगवान् चन्द्रशेखरने गौरीदेवीके साथ प्रसन्न होकर ब्राह्मण-कन्याको प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'वत्से! मेरी आज्ञासे अब तपस्या छोड़ो और अभीष्ट वर माँगो।'
ब्राह्मण-कन्या बोली—देवेश्वर! आपका दर्शन हुआ, इतनेसे ही मेरा सब अभीष्ट पूर्ण हो गया, क्योंकि मनुष्योंको स्वप्नमें भी आपका दर्शन दुर्लभ है।
भगवान् बोले—तपस्विनि! मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं होता, अतः कोई वर अवश्य माँगो।
ब्राह्मण-कन्या बोली—मेरी यशस्विनी एवं साध्वी सखी रत्नवती मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय है। शूद्रयोनिमें स्थित होनेपर भी इसने मेरे समान ही तप किया है। जगन्नाथ! यदि यह तपस्यासे निवृत्त हो जाय तो मैं अनायास ही तपसे अलग हो जाऊँगी। इसके प्रति स्नेह होनेके कारण ही मैंने विवाह नहीं किया, अतः इसीके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि कीजिये।
ब्राह्मण-कन्याका यह वचन सुनकर भगवान् चन्द्रशेखरने राजकुमारीके पास जाकर कहा—सुन्दरी! अब तुम तपस्या छोड़ो और तुम्हारा जो मनोरथ हो, उसकी सिद्धिके लिये वर माँगो।
रत्नवतीने कहा—जहाँ परम साध्वी ब्राह्मण-कन्याने सदा तपस्या की है, वह तीर्थ उसके नामसे प्रसिद्ध हो और मेरी तपस्याका स्थूलभूत यह जलाशय मेरे नामसे प्रसिद्धि लाभ करे। देवदेव! जो यहाँ रहकर श्रद्धापूर्वक स्नान करे उसका सदा स्वर्गलोकमें निवास हो। हम दोनों सखियाँ कुमारी ही सदा महान् तपमें संलग्न रहें और मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा सदैव आपकी आराधना करती रहें।
इसी समय धरती फोड़कर सूर्यके समान तेजस्वी शिवलिंग प्रकट हुआ। तब भक्तवत्सल भगवान् शिवने उन दोनों कन्याओंकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर कहा—'ये दोनों शूद्रितीर्थ और ब्राह्मणीतीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात होंगे। जो चैत्र शुक्ला चतुर्दशी सोमवारके दिन श्रद्धापूर्वक इन दोनों तीर्थोंमें नहाकर कमल संग्रह करके इन तीर्थोंके जलसे मेरे इस लिंगमय विग्रहको नहलायेगा और कमलपुष्पोंसे पूजन करेगा, वह समस्त पापोंसे मुक्त होगा।'
ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। वे दोनों सखियाँ वृद्धता और मृत्युसे रहित हो सौ कल्पोंकी आयु प्राप्त करके नित्य तपस्यामें संलग्न हुईं। तभीसे वे दोनों तीर्थ भूमण्डलमें प्रसिद्ध हुए। वहाँ स्नान और शिवपूजन करके उस तीर्थके प्रभावसे मनुष्य निःसन्देह स्वर्गलोकको प्राप्त होता है।
आगे चलकर इन्द्रने उन दोनों तीर्थोंको धूलसे भर दिया। आज भी उन दोनों तीर्थोंकी उत्तम मिट्टी लेकर स्नानके पश्चात् उससे तिलक करना चाहिये, इससे सब पापोंकी शुद्धि होती है। सोमवार और चतुर्दशीके योगमें जो पुरुष उन दोनों तीर्थोंके समीप श्राद्ध करता है, उसे गया-श्राद्धकी क्या आवश्यकता है।
त्रिविध क्षेत्र, अरण्य और पुरी आदिका वर्णन, हाटकेश्वरक्षेत्रके चार प्रसिद्ध तीर्थोंकी महिमा
ऋषियोंने पूछा— महाभाग! इस लोकमें तीन क्षेत्र, तीन अरण्य, तीन पुरियाँ, तीन वन, तीन ग्राम, तीन पर्वत और तीन नदियाँ कौन-कौन हैं?
सूतजीने कहा— प्रथम उत्तम क्षेत्र कुरुक्षेत्रके नामसे विख्यात है। दूसरा हाटकेश्वरक्षेत्र है और तीसरा प्राभासिकक्षेत्र। ये तीनों क्षेत्र सब पातकोंका नाश करनेवाले हैं। इन तीनों क्षेत्रोंका विधिवत् दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो जिस कामनाका चिन्तन करके इन क्षेत्रोंमें भक्तिपूर्वक स्नान करता है, उसकी वह अभीष्ट