संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कामना पूर्ण होती है। अब तीन अरण्य बताते हैं—पहला पुष्करारण्य, दूसरा नैमिषारण्य तथा तीसरा धर्मारण्य है। जो इन तीनों तीर्थोंमें स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थोंमें स्नानके फलका भागी होता है। तीन पुरियोंके नाम ये हैं—प्रथम वाराणसीपुरी, दूसरी द्वारकापुरी और तीसरी अवन्तीपुरी। ये तीनों लोकोंमें विख्यात हैं। जो इन तीनोंमें स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थोंमें स्नानके फलका भागी होता है। तीन वन ये हैं—पहला वृन्दावन, दूसरा खाण्डववन और तीसरा द्वैतवन। ये तीनों भूतळपर विख्यात हैं। इन तीनोंमें जो स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थोंमें स्नानके फलका भागी होता है। तीन ग्रामोंके नाम इस प्रकार हैं—पहला कालग्राम, दूसरा शालग्राम और तीसरा नन्दिग्राम। जो इन तीनोंमें स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थोंमें स्नानके फलका भागी होता है। तीन तीर्थ हैं—पहला अग्नितीर्थ, दूसरा शुक्लतीर्थ और तीसरा पितृतीर्थ—इन तीनोंमें जो स्नान करता है वह चौबीस तीर्थोंके सेवनका फल पाता है। तीन पर्वत ये हैं—श्रीपर्वत, अर्बुदपर्वत और तीसरा रैवतपर्वत। इन तीनोंमें जो स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थोंके फलका भागी होता है। तीन नदियोंके नाम इस प्रकार हैं—प्रथम गंगा नदी, दूसरी नर्मदा नदी और तीसरी सरस्वती नदी है। जो इन सब तीर्थोंमें स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थोंमें स्नानका फल पाता है। जो इन सब तीर्थोंमें स्नान करता है वह यहाँके साढ़े तीन करोड़ तीर्थोंमें स्नानका फल पाता है।
ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन ! हाटकेश्वरक्षेत्रमें जो तीर्थ हैं, उन सबमें स्नान करनेके लिये मनुष्य सौ वर्षोंमें भी समर्थ नहीं हो सकता, अतः निर्धन मनुष्य उन सब तीर्थोंमें स्नानका फल कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
सूतजीने कहा—पूर्वकालमें आनर्तनरेशने विश्वामित्रजीसे प्रश्न किया—'भगवन् ! इस क्षेत्रमें असंख्य तीर्थ हैं। उन सबमें पृथक्-पृथक् स्नानकी विधि बतायी गयी है। कोई भी मनुष्य सौ वर्षोंमें भी यहाँके सब तीर्थोंका फल नहीं पा सकता। अतः ऐसा कोई सुखद उपाय बताइये, जिससे एक ही तीर्थमें स्नान करके भी मनुष्य सब तीर्थोंमें स्नानका फल प्राप्त कर सके।'
विश्वामित्रजी बोले—राजेन्द्र ! सुनो, इस क्षेत्रमें चार प्रमुख तीर्थ हैं, जिनमें स्नान और श्राद्ध करनेपर मनुष्य सब तीर्थोंमें स्नानका फल पा लेता है। यहीं सिद्धेश्वर आदि सत्ताईस लिंग हैं, जो सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। श्रद्धापूर्ण हृदयसे उन सबका दर्शन कर लेनेपर मनुष्य सब देवताओंके दर्शनका फल पाता है। इनमेंसे एक लिंगका भी पूजन करनेपर सब लिंगोंकी पूजा हो जाती है।
राजाने पूछा—मुने ! वहाँ चार प्रसिद्ध तीर्थ कौन हैं?
विश्वामित्रजी बोले—महाराज ! यहाँ एक पुण्यमयी कूपिका है जहाँ कन्याराशिके सूर्यमें कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तथा अमावास्याके दिन गयातीर्थ आश्रय लेता है। जो मनुष्य उस दिन श्रद्धापूर्वक उस तीर्थमें श्राद्ध करता है वह सौ पीढ़ीके पितरोंको तार देता है। दूसरा शंखतीर्थ है जो मानव माघके प्रथम दिन वहाँ स्नान करके भगवान् शंखेश्वरका दर्शन करता है वह सब तीर्थोंका फल पाता है। तीसरा मेरे नामका (विश्वामित्र) तीर्थ है, जो प्रधान है, उसमें भाद्रपद कृष्णा अष्टमीको स्नान करके जो मेरे द्वारा स्थापित विश्वामित्रेश्वर शिवका दर्शन करता है; वह सब तीर्थोंका फल पाता है। चौथा बालमण्डनमें शक्रतीर्थ है। जो आश्विन शुक्ला अष्टमीको उस तीर्थमें स्नान और पूजन करके शक्रेश्वरका दर्शन करता है वह भी सब तीर्थोंका फल पाता है।