संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
९१८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
कामना पूर्ण होती है। अब तीन अरण्य बताते हैं—पहला पुष्करारण्य, दूसरा नैमिषारण्य तथा तीसरा धर्मारण्य है। जो इन तीनों तीर्थोंमें स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थोंमें स्नानके फलका भागी होता है। तीन पुरियोंके नाम ये हैं—प्रथम वाराणसीपुरी, दूसरी द्वारकापुरी और तीसरी अवन्तीपुरी। ये तीनों लोकोंमें विख्यात हैं। जो इन तीनोंमें स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थोंमें स्नानके फलका भागी होता है। तीन वन ये हैं—पहला वृन्दावन, दूसरा खाण्डववन और तीसरा द्वैतवन। ये तीनों भूतळपर विख्यात हैं। इन तीनोंमें जो स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थोंमें स्नानके फलका भागी होता है। तीन ग्रामोंके नाम इस प्रकार हैं—पहला कालग्राम, दूसरा शालग्राम और तीसरा नन्दिग्राम। जो इन तीनोंमें स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थोंमें स्नानके फलका भागी होता है। तीन तीर्थ हैं—पहला अग्नितीर्थ, दूसरा शुक्लतीर्थ और तीसरा पितृतीर्थ—इन तीनोंमें जो स्नान करता है वह चौबीस तीर्थोंके सेवनका फल पाता है। तीन पर्वत ये हैं—श्रीपर्वत, अर्बुदपर्वत और तीसरा रैवतपर्वत। इन तीनोंमें जो स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थोंके फलका भागी होता है। तीन नदियोंके नाम इस प्रकार हैं—प्रथम गंगा नदी, दूसरी नर्मदा नदी और तीसरी सरस्वती नदी है। जो इन सब तीर्थोंमें स्नान करता है, वह चौबीस तीर्थोंमें स्नानका फल पाता है। जो इन सब तीर्थोंमें स्नान करता है वह यहाँके साढ़े तीन करोड़ तीर्थोंमें स्नानका फल पाता है।
ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन ! हाटकेश्वरक्षेत्रमें जो तीर्थ हैं, उन सबमें स्नान करनेके लिये मनुष्य सौ वर्षोंमें भी समर्थ नहीं हो सकता, अतः निर्धन मनुष्य उन सब तीर्थोंमें स्नानका फल कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
सूतजीने कहा—पूर्वकालमें आनर्तनरेशने विश्वामित्रजीसे प्रश्न किया—'भगवन् ! इस क्षेत्रमें असंख्य तीर्थ हैं। उन सबमें पृथक्-पृथक् स्नानकी विधि बतायी गयी है। कोई भी मनुष्य सौ वर्षोंमें भी यहाँके सब तीर्थोंका फल नहीं पा सकता। अतः ऐसा कोई सुखद उपाय बताइये, जिससे एक ही तीर्थमें स्नान करके भी मनुष्य सब तीर्थोंमें स्नानका फल प्राप्त कर सके।'
विश्वामित्रजी बोले—राजेन्द्र ! सुनो, इस क्षेत्रमें चार प्रमुख तीर्थ हैं, जिनमें स्नान और श्राद्ध करनेपर मनुष्य सब तीर्थोंमें स्नानका फल पा लेता है। यहीं सिद्धेश्वर आदि सत्ताईस लिंग हैं, जो सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। श्रद्धापूर्ण हृदयसे उन सबका दर्शन कर लेनेपर मनुष्य सब देवताओंके दर्शनका फल पाता है। इनमेंसे एक लिंगका भी पूजन करनेपर सब लिंगोंकी पूजा हो जाती है।
राजाने पूछा—मुने ! वहाँ चार प्रसिद्ध तीर्थ कौन हैं?
विश्वामित्रजी बोले—महाराज ! यहाँ एक पुण्यमयी कूपिका है जहाँ कन्याराशिके सूर्यमें कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तथा अमावास्याके दिन गयातीर्थ आश्रय लेता है। जो मनुष्य उस दिन श्रद्धापूर्वक उस तीर्थमें श्राद्ध करता है वह सौ पीढ़ीके पितरोंको तार देता है। दूसरा शंखतीर्थ है जो मानव माघके प्रथम दिन वहाँ स्नान करके भगवान् शंखेश्वरका दर्शन करता है वह सब तीर्थोंका फल पाता है। तीसरा मेरे नामका (विश्वामित्र) तीर्थ है, जो प्रधान है, उसमें भाद्रपद कृष्णा अष्टमीको स्नान करके जो मेरे द्वारा स्थापित विश्वामित्रेश्वर शिवका दर्शन करता है; वह सब तीर्थोंका फल पाता है। चौथा बालमण्डनमें शक्रतीर्थ है। जो आश्विन शुक्ला अष्टमीको उस तीर्थमें स्नान और पूजन करके शक्रेश्वरका दर्शन करता है वह भी सब तीर्थोंका फल पाता है।
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * १९८१
अहल्याका शापोद्धार तथा हाटकेश्वरक्षेत्रमें अहल्या, शतानन्द और गौतमजीकी तपस्या एवं पातालवासी हाटकेश्वरका दर्शन
विश्वामित्रजी कहते हैं—पूर्वकालमें जब महर्षि गौतमके शापसे उनकी धर्मपत्नी अहल्या देवी शिलारूपा हो गयीं, तब उनके पुत्र शतानन्दजीने विनयपूर्वक प्रार्थना करते हुए कहा—'पिताजी! इतिहास, पुराण तथा समस्त उपनिषदोंका चिन्तन करके मेरी माताकी शुद्धिका कोई उपाय बताइये, मैं उसका अनुष्ठान करूँगा, अन्यथा अपने प्राणोंका त्याग कर दूँगा।' यह सुनकर गौतमजीने दीर्घकालतक ध्यान करनेके पश्चात् अपने पुत्रसे कहा—'वत्स! आत्मघात बहुत बड़ा पाप है, उसे करनेका दुःसाहस न करना। मैंने तुम्हारी माताकी शुद्धिका निमित्त जान लिया। जिस समय भगवान् विष्णु रावणका वध करनेके लिये सूर्यवंशमें मनुष्यरूपमें अवतार लेंगे, उस समय उन्हींके चरणोंका स्पर्श होनेसे तुम्हारी माताकी शुद्धि होगी। अतः बेटा! तुम उस शुभ समयकी प्रतीक्षा करो। यह सब मैंने दिव्य दृष्टिसे देखा है।'
यह सुनकर मातृवत्सल शतानन्द बड़े प्रसन्न हुए और 'बहुत अच्छा' कहकर उस शुभ अवसरकी प्रतीक्षा करने लगे। तदनन्तर दीर्घकालके बाद जब श्रीरामचन्द्रजीके रूपमें भगवान् विष्णुका दशरथजीके यहाँ अवतार हुआ, तब मैं अपने यज्ञकी रक्षाके लिये तथा यज्ञकर्मका विनाश करनेवाले राक्षसोंका संहार करानेके लिये उन भगवान् श्रीरामको अपने आश्रमपर ले आया। मेरे यज्ञमें वे सभी भयंकर राक्षस मारे गये। तत्पश्चात् सीताजीके स्वयंवर तथा उसमें राजाओंके शुभागमनका समाचार सुनकर मैं लक्ष्मणसहित श्रीरामको जनकपुर ले गया। मार्गमें गौतमजीका आश्रम मिला। वहाँ महती शिलारूपा अहल्याको देखकर मैंने श्रीरामसे कहा—'वत्स! इस शिलाका स्पर्श करो। ये महर्षि गौतमकी पत्नी अहल्या हैं, जो शापके कारण शिला हो गयी हैं, तुम्हारे स्पर्शसे शुद्ध होकर पुनः मानवस्वरूपको प्राप्त होंगी।' मेरे कहनेसे श्रीरामने कौतूहलवश उस शिलाका स्पर्श किया। उनके स्पर्श करते ही वह शिला दिव्य रूपधारिणी नारी हो गयी। तब उन्होंने अपने पूर्वकर्मको स्मरण करके लज्जित हो गौतमजीको प्रणाम किया और कहा—'प्राणनाथ! मुझे कोई प्रायश्चित्त बताइये, दुष्कर होनेपर भी मैं उसका अनुष्ठान करूँगी।' तब बहुत देरतक सोच-विचारकर गौतमजीने कहा—'सौ चान्द्रायण तथा एक हजार कृच्छ्रव्रत करो। फिर तीर्थयात्रामें तत्पर अड़सठ तीर्थोंमें भ्रमण करके वहाँके देवताओंका दर्शन करो। उन सबके दर्शनसे तुम पूर्णतः शुद्ध हो जाओगी।' 'बहुत अच्छा' कहकर अहल्याने मुनिकी आज्ञा शिरोधार्य की और काशी आदि अड़सठ तीर्थोंमें क्रमशः घूमती हुई वहाँके शिवलिंगोंका भक्तिपूर्वक पूजन किया। अन्तमें वह हाटकेश्वरतीर्थको गयी। वहाँ पातालवासी भगवान् हाटकेश्वरका दर्शन करनेके लिये दुष्कर तपस्या करने लगी। अपने नामसे शिवलिंगकी स्थापना करके चन्दन, फूल और अनुलेपनसे उसका त्रिकाल पूजन करती हुई अहल्याका बहुत समय व्यतीत हो गया। परंतु हाटकेश्वरका दर्शन नहीं हुआ। किसी समय अहल्यानन्दन शतानन्दजी अपनी माताको खोजते हुए हाटकेश्वरक्षेत्रमें आये। वहाँ उन्हें बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न देख प्रणाम करके दुःखी होकर बोले—'माँ! कठोर तपस्यासे क्यों शरीरको कष्ट देती हो? अड़सठ तीर्थोंमें जो शिवलिंग हैं उनका दर्शन तो तुमने कर ही लिया है, यहाँ कोई भी मनुष्य पातालवासी हाटकेश्वरका दर्शन नहीं कर पाता। पिताजीने जो शुद्धि बतायी थी वह तो हो ही गयी। अतः अपने शुभ आश्रमको लौट चलो।'
अहल्या बोलीं—वत्स! जबतक हाटकेश्वर शिवका दर्शन नहीं कर लूँगी, तबतक घर नहीं चलूँगी, ऐसा निश्चय कर लिया है।
११८२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
यह सुनकर शतानन्दने कहा—यदि ऐसी बात है तो मुझे पिताके पास लौटकरं नहीं जाना है। ऐसा कहकर उन्होंने भी शिवलिंगकी स्थापना की और छः-छः दिनोंपर भोजन करते हुए व्रतचर्यामें लग गये। उनका भी बहुत समय बीत गया। परंतु उन दोनोंपर भगवान् शिव सन्तुष्ट नहीं हुए। तदनन्तर दीर्घकालके बाद महामुनि गौतमजी भी पुत्रको देखनेकी इच्छासे वहाँ आ गये। पत्नी और पुत्रको तपस्या करते देख पहले तो वे बड़े प्रसन्न हुए। फिर दुःखी होकर बोले—'अहो! मेरा बेटा बहुत दुर्बल हो गया, अब इसे तपस्यासे निवृत्त करके ले चलूँ।' उनकी बात सुनकर शतानन्दजीने कहा—'तात! मैंने माताजीको तपस्या छोड़कर घर लौटनेके लिये कहा; परंतु ये हाटकेश्वरका दर्शन किये बिना घर लौटनेको राजी नहीं हुईं। अतः मैं भी माताके बिना नहीं लौटूँगा, यह मेरा निश्चय है।'
गौतमजीने कहा—बेटा! यदि तुम्हारा और तुम्हारी माताका यही निश्चय है तो मैं भी तपस्या करता हूँ। मैं अपने तपसे तुम्हारी माँको हाटकेश्वरका दर्शन कराऊँगा।
ऐसा कहकर वे भी तपस्यामें लग गये। सौ वर्षोंतक एक दिनका अन्तर देकर भोजन करते रहे, तदनन्तर छः-छः दिनपर भोजन करने लगे। फिर उतने-उतने ही समयतक क्रमशः फल और जलपर रहे। इसके बाद सौ वर्षोंतक वे केवल वायु पीकर रहे। तब पृथ्वी फोड़कर बारह सूर्योंके समान तेजस्वी शिवलिंग प्रकट हुआ। इसी समय भगवान् चन्द्रशेखरने मुनि गौतमको प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'सुव्रत! मैं तुम्हारी तपस्यासे सन्तुष्ट हूँ। महामुने! यही मेरा हाटकेश्वर लिंग है, जो तुम्हारी भक्ति देखकर पातालसे प्रकट हुआ है। इसीके दर्शनके लिये तुमने पुत्र और पत्नीसहित यहाँ तप किया है। तुम सब लोगोंका मनोरथ सफल हुआ। अब तुम्हारी देवरूपिणी पत्नी इस हाटकेश्वरलिंगका दर्शन करें; जिससे इन्हें अड़सठ क्षेत्रोंकी यात्राका फल प्राप्त हो। तुम भी कोई अभीष्ट वर माँगो।'
गौतमजीने कहा—पातालवासी हाटकेश्वर शिवका एक बार दर्शन करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही पुण्य इस शिवलिंगके दर्शनसे भी प्राप्त हो। जो मनुष्य भक्तिभावसे चैत्र शुक्ला चतुर्दशीमें इसका पूजन करें, वे सब स्वर्गलोकको जायें। इस लिंगके प्रभाव तथा अहल्येश्वरजीके दर्शनसे सबके परस्त्रीसंसर्गजनित पाप दूर हो जायँ। शतानन्देश्वरके दर्शनसे भी सब मनुष्य शुद्ध हों।
शंखतीर्थकी महिमा, राजा दम्भका चरित्र तथा ताम्बूलके दोष, सुर्ती खानेका निषेध
आनर्तनरेश बोले—मुनिश्रेष्ठ! इस समय मुझे शंखतीर्थका माहात्म्य बताइये। उसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी श्रद्धा है।
विश्वामित्रजीने कहा—राजन्! जैसे आजकल तुम आनर्त देशके स्वामी हो, इसी प्रकार पूर्वकालमें 'दम्भ' नामसे प्रसिद्ध राजा इस देशके शासक थे। उनके कोई पुत्र नहीं था। एक दिन ऐसा आया, जब वे सहसा कुष्ठरोगसे ग्रस्त हो गये। इसी समय अनेक शत्रुओंने भी उनपर धावा कर दिया। उनका राज्य छिन गया और वे रैवतक पर्वतपर चले गये। वहाँ जानेपर भी चोर और बटमार उन्हें सदा सब ओरसे पीड़ा देने लगे। जब हाथी, घोड़े, रथ और खजाने सभी लुट गये, तब वे मन-ही-मन इस चिन्तामें पड़े कि 'अब मैं क्या करूँ?' यही सब सोचते-विचारते हुए वे देवर्षि नारदजीका दर्शन करनेके लिये गये। उस दिन एकादशी तिथि थी। नारदजी तीर्थयात्राके प्रसंगसे भगवान् दामोदरका दर्शन करनेके निमित्त वहाँ आये थे। राजा दम्भने उनके समीप जा चरणोंपर मस्तक रखकर प्रणाम किया
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११८४
और हाथ जोड़ दीन भावसे उनके आगे बैठकर कहा—'मुनिश्रेष्ठ! मैं सब ओरसे शत्रुओं द्वारा सताया गया, अतः राज्य छोड़कर रैवतक पर्वतपर चला आया। वनमें आनेपर भी मुझे शान्ति नहीं मिली। पापी लुटेरोंने सब ओरसे मुझे पीड़ा दी और मेरे पास जो कुछ भी हाथी, घोड़े, रथ, खजाना आदि वस्तुएँ तथा स्त्रियाँ थीं, उन सबको लूट लिया। इन सब कष्टोंके कारण मेरे मनमें इस जीवनसे वैराग्य हो गया है। मुने! दूसरे जन्मोंमें मैंने कौन-सा ऐसा भयंकर पाप किया है, जिससे सहसा मुझे इस दुर्दशाकी प्राप्ति हुई है?'
उसका वह वचन सुनकर मुनिवर नारदजीने दिव्य दृष्टिसे सब वृत्तान्त जान लिया और इस प्रकार कहा—महाराज! पूर्व शरीरमें तुमने कोई कुकर्म नहीं किया है। मैंने दिव्य दृष्टिसे तुम्हारे पूर्व-जन्मक सब हाल जान लिया है।
दम्भ बोले—प्रभो! यदि पूर्वजन्ममें मैंने पाप नहीं किया है, तो इस जन्ममें कोई पाप किया हो, यह याद नहीं आता। फिर क्या कारण है कि सहसा मेरा राज्य छिन गया। इस समय मुझे इस बातका भलीभाँति अनुभव हो गया है कि संसारमें धन-वैभवसे रहित मनुष्यका जीवन व्यर्थ हो जाता है। जिसकी लक्ष्मी चली गयी, वह मनुष्य मानो मर गया। जहाँ कोई राजा नहीं है, वह राज्य भी मरे हुएके ही समान है। जो दान वेदके विद्वान्को नहीं दिया गया है, वह नष्टप्राय है तथा जिसमें दक्षिणा नहीं दी गयी हो, वह यज्ञ भी नष्ट ही है। जब मनुष्यका धन नष्ट हो जाता है, तब उसके भाई-बन्धु भी पराये हो जाते हैं। 'कहीं यह मुझसे द्रव्य न माँगने लगें' इस भयसे उसे देखकर दूसरी ओर मुड़ जाते हैं। जैसे इस समय लोग मुझे देखकर मुँह मोड़ लेते हैं। ब्रह्मन्! जिन्हें मैंने भलीभाँति धन देकर तृप्त किया है, वे भी मुझे देखकर बहुत दूर खिसक जाते हैं कि यह मुझसे कुछ माँग न बैठे। जैसे पक्षी सूखे वृक्षको छोड़कर चल देते हैं, उसी प्रकार निर्धन अवस्थामें उत्तम प्रकृतिके कुलीन एवं उत्तम मनुष्यको भी देखकर स्वजन भी दूसरी ओर चले जाते हैं। दरिद्र मनुष्य उस धनीका ही कार्य करनेके लिये उसके घर आता हो तो भी धनीलोग उसे फटकार देते हैं और उसके पास नहीं जाते। परंतु दूसरा धनाढ्य मनुष्य उसके समीप कुछ माँगनेके लिये आता हो, तो भी मनुष्यके चित्तमें यही भाव पैदा होता है कि 'यह मुझे कुछ देगा।' इस संसारमें धनियोंके आगे खड़े होकर लोग प्रायः यह कहते हैं कि 'हम और आप तो पहलेसे ही एक कुलके हैं, आपके पिताजी मेरे पितापर सदा ही बड़ा स्नेह रखते थे।' कुलीन मनुष्य भी धनके लोभसे पापियोंके यहाँ उपस्थित देखे जाते हैं। ये काम और क्रोध दो प्रकारके मनुष्योंके लिये अत्यन्त कड़वे और तीक्ष्ण दोष हैं, तथा शरीरके शत्रु हैं—एक तो उस मनुष्यके लिये जो निर्धन होकर भी कामना करता है और दूसरे उसके लिये जो असमर्थ होकर भी क्रोध करता है। धनके लोभी मनुष्य रातमें श्मशानका भी सेवन करते हैं और पिताको भी छोड़कर बहुत दूर चले जाते हैं। जिसके घरमें धन है, वह अत्यन्त मूर्ख हो तो भी विद्वान् माना जाता है, कुलीन न हो तो भी उत्तम कुलमें उत्पन्न कहा जाता है। इसके विपरीत धन न रहनेपर कुलीन भी अकुलीन और विद्वान् भी मूर्ख माना जाता है। इसलिये मुनिश्रेष्ठ! मुझे इस जीवनसे वैराग्य हो गया है। मैं दरिद्र हूँ, कोढ़ी हूँ और शत्रुओंसे अपमानित भी हो चुका हूँ, यदि कोई पूर्वपाप नहीं है, तो यह सब कष्ट मुझे किस कारणसे प्राप्त हुआ है? यह बताइये।
राजाका यह वचन सुनकर नारदजीने बहुत देरतक सोच-विचारकर कहा—राजन्! मैं तुम्हें पुनः राज्यकी प्राप्ति एवं आरोग्यका उपाय बताता हूँ। तुम्हारे राज्यमें अति सुन्दर हाटकेश्वर नामक पुण्यमय तीर्थ है, जहाँ सब पातकोंका नाशक शंखतीर्थ बहुत प्रसिद्ध है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक वैशाखमासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको रविवारके दिन सूर्योदयके समय उसमें स्नान
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करता है, वह सब प्रकारके कुष्ठरोगोंसे मुक्त हो सूर्यके समान तेजस्वी हो जाता है। जो जिस-जिस कामनाका चिन्तन करके उस तीर्थमें स्नान और शंखेश्वरका दर्शन करता है, वह अत्यन्त दुर्लभ मनोरथको भी प्राप्त कर लेता है। क्या स्वदेशमें निवास करते समय तुमने उस तीर्थका माहात्म्य नहीं सुना था, जो यहाँ आये हो? नृपश्रेष्ठ! वहीं जाकर विधिपूर्वक स्नान करके भगवान् सूर्यनारायणका पूजन करो।
विश्वामित्रजी कहते हैं—देवर्षि नारदजीकी बात सुनकर राजा सिद्धसेन (दम्भ) वैशाख शुक्ला अष्टमी एवं रविवारका उत्तम योग आनेपर शंखतीर्थमें गये और सूर्योदयके समय उसमें स्नान करके ज्यों ही सूर्यदेवका पूजन करने लगे, उसी समय कुष्ठरोगसे मुक्त हो गये। तब दिव्य शरीर पाकर उनके मनमें बड़ा सन्तोष हुआ। तदनन्तर उनसे पूर्वकालमें जो एक भूल हुई थी उसका प्रायश्चित्त किया। भूल यह हुई थी कि उन्होंने किसी समय चूर्णपत्र (सूरती)-के साथ ताम्बूल पान भक्षण कर लिया था, उसीका यह फल था कि उनपर कष्टपूर्ण दशा आयी थी। प्रायश्चित्त करनेपर वे उत्तम लक्ष्मीको प्राप्त हुए और पहलेकी ही भाँति पिता-पितामहोंके राज्यका शासन करने लगे।
यह सुनकर आनर्तनरेशको बड़ा आश्चर्य हुआ। तब विश्वामित्रजीने उनसे कहा—तुम्हारे मनमें यह जाननेकी उत्सुकता है कि चूर्णपत्र (सुर्ती) खानेसे दोष क्यों होता है, सो मैं तुम्हें बताता हूँ। प्राचीन कालकी बात है, देवताओंने समुद्रसे मन्थनद्वारा अमृत प्राप्त करके उसे नन्दनवनमें रखा। वहीं ऐरावत हाथीके बाँधनेका खम्भा भी था। नागराज ऐरावत रात-दिन उस अमृतकी दिव्य सुगन्ध लेता रहता था। एक समय उस अमृत-कलशसे एक लता प्रकट हुई और वह फैलती हुई नागराज ऐरावतके आलान (बाँधनेके खम्भे) पर चढ़ गयी। देवता लोग उस अपूर्व सुगन्धित लताके पत्र तोड़कर मुखशुद्धिके लिये खाते थे और खाकर बड़े प्रसन्न होते थे। तदनन्तर धन्वन्तरि वैद्यने उसे देखकर कहा—'यह नाग (हाथी)-के आलानपर फैली है, इसलिये नागवल्लीके नामसे प्रसिद्ध होगी और मेरे वचनसे यह सदा कामदेवका स्थान (उद्दीपन करनेवाली) होगी।' तत्पश्चात् उन्होंने उसके साथ सुपारी, चूना और कत्थेका संयोग करके उसके द्वारा इन्द्रदेवताको तृप्त किया।
तब इन्द्रने कहा—राजन्! वर माँगो।
धन्वन्तरिने कहा—यह नागवल्ली कृपा करके मुझे भी दीजिये, मर्त्यलोकमें इसका प्रचार हो।
'तथास्तु' कहकर इन्द्रने नागवल्ली (पानकी बेल) उन्हें दे दी। राजाने अपने नगरमें जाकर उसे उद्यानमें आरोपित किया। तदनन्तर शीघ्र ही उसका सब ओर प्रचार हो गया। उसे खा-खाकर मनुष्य काम-भोगमें आसक्त हो गये। कोई भी यज्ञ आदि सत्कर्म न तो करता था और न कराता ही था। समस्त धार्मिक क्रियाएँ लुप्त हो गयीं। देववृन्द यज्ञभागसे वंचित हो गये और क्षुधासे पीड़ित हो ब्रह्माजीके समीप जाकर बोले—'सुरश्रेष्ठ! मर्त्यलोकमें समस्त धर्मकार्य बंद हो गये। सारा जगत् ताम्बूल भक्षण करके कामासक्त होता जा रहा है। अतः हमलोगोंपर कृपा कीजिये, जिससे हमारा यज्ञकार्य नष्ट न होने पावे।'
इसी समय ब्रह्माजी यज्ञके लिये पुष्करतीर्थमें आये। उस समय दारिद्र्यने उनके पास जा प्रणाम करके विनयपूर्वक कहा—'देव! मैं तो ब्राह्मणोंके घरमें रहकर उपवास करते-करते ऊब गया हूँ, अब कोई धनवानोंका अच्छा-सा घर मेरे रहनेके लिये बताइये, जहाँ खूब पेट भरकर भोजन मिले और सदा तृप्ति बनी रहे।'
उसका वचन सुनकर ब्रह्माजीने देरतक सोच-विचारकर कहा—'दारिद्र्य! तुम्हें चूर्णपत्र (सुर्ती)-में सदा निवास करना चाहिये। ताम्बूलके पत्तेके अग्रभागमें पत्नीके साथ रहो तथा वृन्तमें पुत्रके साथ निवास करो। रात होनेपर तुम तीनों
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कत्थेमें निवास करना।' इस प्रकार धनवानोंके यहाँ छिद्र उत्पन्न करनेके लिये दरिद्रताको ये चार स्थान दिये गये हैं*। राजन्! राजा दम्भने न जाननेके कारण उन सब दोषोंसे युक्त पान खा लिये थे, इसीलिये उन्हें सहसा ऐश्वर्यसे हाथ धोना पड़ा था।
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विश्वामित्रतीर्थ एवं रत्नादित्यकी महिमा, धन्वन्तरि आदिकी कुष्ठरोगसे मुक्ति
ऋषि बोले—हाटकेश्वरक्षेत्रमें जो तीन पुण्य-दायक क्षेत्र हैं, उनका वर्णन हमने सुना, अब हम विश्वामित्रजीके तीर्थका माहात्म्य सुनना चाहते हैं।
सूतजीने कहा—विप्रवरो! विश्वामित्रजीके गुणोंका पार नहीं है। वे क्षत्रियकुलमें उत्पन्न होकर भी अपनी तपस्याके प्रभावसे ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो गये। राजा त्रिशंकु अन्त्यजभावको प्राप्त थे, तो भी उनके यज्ञमें उन्होंने प्रत्यक्ष यज्ञभागभोगी देवताओंका निर्माण किया। पूर्वकालमें ब्रह्माजीके साथ स्पर्धा करके विश्वामित्रजीने नूतन सृष्टि रचना प्रारम्भ की थी। उस समय देवताओंने उनके चरणोंपर गिरकर उन्हें इस कार्यसे विरत किया था। श्रेष्ठ ब्राह्मणो! महात्मा विश्वामित्रने हाटकेश्वरक्षेत्रमें बिना किसी शस्त्रके केवल अपने हाथसे कुण्ड-निर्माण किया था, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। उसके भीतर ध्यान करके उन्होंने पातालगंगाको बुलाया, उनका निर्मल जल पातालसे मर्त्यलोकमें प्रकट हुआ है, जो परम स्वादिष्ट तथा स्नान करनेसे सब पातकोंका नाश करनेवाला है। उन्होंने वहाँ भगवान् सूर्यदेवको भी स्थापित किया है। जो मनुष्य सप्तमी एवं रविवारके संयोगमें माघमासके शुक्ल पक्षमें सूर्योदयके समय उस शुभ कुण्डमें स्नान करता है, वह समस्त कुष्ठ रोगों और पापोंसे मुक्त होता है। उस कुण्डके पश्चिम और उत्तर कोणमें धन्वन्तरिद्वारा निर्मित एक वापी है, जो महान् जलराशिसे परिपूर्ण है। वह सब रोगोंका नाश करनेवाली है। पूर्वकालमें वहाँ उदारबुद्धि धन्वन्तरिजीने एकाग्रतापूर्वक सूर्यदेवका ध्यान करते हुए तपस्या की। दीर्घकालके पश्चात् भगवान् सूर्य उनपर सन्तुष्ट हुए और बोले—'वर माँगो।'
धन्वन्तरिने कहा—प्रभो! जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कुण्डमें स्नान करे, उसके सब रोगोंका नाश हो जाय।
श्रीभगवान् बोले—आजके उत्तम दिन रविवार एवं सप्तमीके शुभ योगमें जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो सूर्योदय कालमें स्नान करेगा, उसके सब रोग नष्ट हो जायेंगे।
ऐसा कहकर सुरश्रेष्ठ सूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। ब्राह्मणो! एक समय पूर्वकर्मोंके फलस्वरूप राजा धन्वन्तरिको कोढ़का रोग हुआ, जिसकी चिकित्सा तीनों लोकोंमें असम्भव हो गयी। संसारमें कोई ऐसी दवा नहीं थी, जो उन्होंने न की हो। कोई दान नहीं, जो उन्होंने न दिया हो। वे ज्यों-ज्यों दवा करते और दान देते थे, त्यों-त्यों रोग बढ़ता ही जाता था और उससे उनका शरीर अत्यन्त दुर्बल होता जाता था। तब उन्हें इस जीवनसे वैराग्य हो गया और उन्होंने पुत्रको राज्यपर बिठाकर अग्निमें प्रवेश कर जानेकी इच्छा की। ब्राह्मणोंको दान देकर देवताओंका पूजन किया, फिर मित्रों एवं हितैषियोंसे मिल-
* इस प्रसंगसे जान पड़ता है, पान न खाना सर्वोत्तम है। दोषसे बचकर खाना हो तो, पानमें सुर्ती तो कभी डाले ही नहीं, क्योंकि उसमें सदा दारिद्रयका वास है। देखा भी जाता है गरीब लोग ही अधिक सुर्ती खानेवाले हैं। रातमें भी पान न खाये, क्योंकि कत्थेमें उस समय दरिद्रताका वास है। पानके पत्तेका अग्रभाग और डंठल तोड़कर केवल दिनमें बिना सुर्तीका पान देवताको अर्पण करके खानेमें दोष नहीं है। शायद इसीसे पानका डंठल और अगला भाग तोड़नेकी प्रथा है।
१९८६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
जुलकर वार्तालाप करके पुत्रको कर्तव्यका उपदेश दिया। इसके बाद वे अग्निमें प्रवेश करनेको तैयार हुए। इतनेमें ही स्वेच्छानुसार घूमता हुआ कोई दिव्यरूपधारी तीर्थयात्री वहाँ आ पहुँचा। उसने राजाके सम्पूर्ण नगरको व्याकुल देखकर किसीसे पूछा—'यह समस्त नगर व्याकुल क्यों है?' उसने कहा—'यहाँके राजा कुष्ठरोगसे पीड़ित हैं, अतः स्त्रीसहित अग्निमें प्रवेश कर जायँगे। इसीसे सम्पूर्ण नगरमें व्याकुलता छा रही है।'
यह सुनकर वह तीर्थयात्री शीघ्र ही राजाके समीप गया और सबको जीवनदान देता हुआ बोला—राजन्! एक तीर्थ है, जहाँ सब रोगों और व्याधियोंका नाश हो जाता है। उसके रहते हुए आप अग्निमें प्रवेश न करें। भूपाल! जैसा आज आपका शरीर है, ऐसा ही पहले मेरा भी था। रविवार और सप्तमीका योग आनेपर जो रोगी मनुष्य सूर्योदयके समय उस तीर्थमें स्नान करता है, वह क्षणभरमें सब रोगों और पापोंसे मुक्त हो दिव्य शरीर पा लेता है—उसका काया-कल्प हो जाता है।
राजाने पूछा—ऐसा तीर्थ किस देशमें है? शीघ्र बतलाओ।
कार्पटिक (तीर्थयात्री) बोला—इस भूतलपर नगर नामसे प्रसिद्ध उत्तम क्षेत्र है। वहाँ भगवान् जलशायीके पश्चिम और उत्तर दिशामें विश्वामित्रजीका परम पुण्यमय तीर्थ है। वहाँ जाकर तुम भी रविवार और सप्तमीके योगमें स्नान करो, जिससे तुम्हारा रोग और पातक नष्ट हो जाय।
यह सुनकर राजा धन्वन्तरि उस तीर्थयात्रीके साथ शीघ्र उक्त तीर्थमें गये और वहाँ माघ मासकी सप्तमी एवं रविवारके योगमें स्नान किया। स्नान करते ही वे तत्काल कुष्ठरोगसे मुक्त हो गये और उनका शरीर दिव्य हो गया। तत्पश्चात् उन्होंने उस तीर्थयात्रीसे कहा—'भैया! तुम्हारे ही प्रसादसे मैं इस भयंकर रोगसे छुटकारा पा सका हूँ; अब तुम अपने घर जाओ, मैं यहीं झरनेके समीप स्त्रीसहित रहकर तपस्या करूँगा। राज्यसिंहासनपर अपने पुत्रको बिठा दिया है। वह राज्य शासन करनेमें पूर्णतः समर्थ है।' ऐसा कहकर राजाने उस तीर्थयात्रीको तथा अन्यान्य सेवकोंको अपने-अपने घर भेज दिया और स्वयं अपनी स्त्रियोंसहित सुन्दर आश्रम बनाकर रहने लगे। समयानुसार तपस्यासे उन्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई। तत्पश्चात् वह तीर्थ उन्हींके नामसे तीनों लोकोंमें विख्यात हुआ। वह सब रोगोंका नाश करनेवाला, सुन्दर तथा समस्त पापोंका नाशक है। महात्मा राजाने वहाँ देवाधिदेव भगवान् सूर्यकी भी स्थापना की थी, जो रत्नादित्यके नामसे विख्यात हुए। जो मनुष्य रविवार और सप्तमीके योगमें वहाँ स्नान करके रत्नादित्यका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो सूर्यलोकमें जाता है।
विप्रवरो! हाटकेश्वरक्षेत्रके समीप किसी गाँवमें कोई पुरुष रहता था, जो बूढ़ा और कोढ़ी था। फिर भी वह सदा दूसरोंके पशुओंको चराता और उनका पालन किया करता था। एक समयकी बात है, एक पशु घासके लोभसे रास्ता छोड़कर पर्वतके नीचे चला गया और उस तीर्थके जलमें गिर पड़ा। उस दिन रविवार और सप्तमी तिथिका योग था। उस बूढ़ेने जाते हुए पशुको नहीं देखा। जब वह भोजन करनेके लिये अपने घर गया, तब उस पशुका स्वामी उसे फटकारता हुआ आया और बोला—'आज मेरा वह पशु घर क्यों नहीं आया? शीघ्र जाकर उसे ले आ नहीं तो तेरे प्राण ले लूँगा।'
यह सुनकर वह कोढ़ी भयसे थर-थर काँपता हुआ शीघ्र उस स्थानपर गया। रातकी अँधेरी छायी हुई थी। उसने दूरसे महाकुण्डमें गिरे हुए पशुका आर्तनाद सुना। तब उस गर्तमें पहुँचकर उसने बड़े कष्टसे उस पशुको खींचकर कीचसे बाहर निकाला। फिर उसे साथ ले धीरे-धीरे घरको लौटा और उसके स्वामीको पशु सौंपकर
| * नागरखण्ड-उत्तरार्ध * | १९८७ |
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अपनी झोंपड़ीमें गया। रातको तो वह सो गया। सबेरे उठनेपर उस बड़भागी पुरुषने जब अपने शरीरपर दृष्टिपात किया, तब उसे कुष्ठरोगसे रहित तथा उत्तम शोभासे सम्पन्न देखा। फिर उसने आश्चर्यमें पड़कर सोचा, यह क्या है, रोगका नाश कैसे हो गया? निस्सन्देह, यह उसी तीर्थके जलका प्रभाव है, जिसमें मैंने पशुको निकालनेके लिये प्रवेश किया था। तब वह उस उत्तम तीर्थमें जाकर भगवान् सूर्यका ध्यान करता हुआ तपस्या करने लगा। अन्तमें उसने देवदुर्लभ सिद्धि प्राप्त कर ली। इसलिये पूर्णतः प्रयत्न करके वहाँ स्नान और भगवान् सूर्यदेवकी पूजा करे। आजके कलिकालमें भी जो मनुष्य रविवार और सप्तमीका योग आनेपर उस पुण्य जलाशयमें स्नान करता है और भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यको पूजता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो वहाँ सूर्यदेवके सम्मुख आठ हजार गायत्रीका जप करता है, वह समस्त रोगों और पापोंसे छूट जाता है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक भगवान् सूर्यकी प्रसन्नताके लिये वहाँ गोदान करता है, उसकी तो बात ही क्या है। उसके वंशमें भी कोई रोग-व्याधिसे ग्रस्त नहीं होता।
श्राद्धकल्प
सूतजी कहते हैं—उस तीर्थमें विश्वामित्रजीके द्वारा स्थापित गणेशजी भी हैं, जो मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाले हैं। जो माघमासके शुक्ल पक्षकी चतुर्थी तिथिको उनकी पूजा करता है, वह एक वर्षतक सब प्रकारके विघ्नोंसे छुटकारा पा जाता है।
एक समय महामुनि मार्कण्डेयजी राजा रोहिताश्वके यहाँ पधारे और यथायोग्य सत्कार ग्रहण करनेके बाद उन्हें कथा सुनाने लगे। कथाके अन्तमें राजा रोहिताश्वने कहा—'भगवन्! मैं श्राद्धकल्पका यथार्थरूपसे श्रवण करना चाहता हूँ।'
मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! यही बात आनर्त्तनरेशने भर्तृयज्ञसे पूछी थी। वही प्रसंग सुनाता हूँ।
आनर्त्तने पूछा—ब्रह्मन्! श्राद्धके लिये कौन-सा समय विहित है? श्राद्धोपयोगी द्रव्य कौन हैं? श्राद्धके लिये कौन-कौन-सी वस्तुएँ पवित्र मानी गयी हैं? कैसे ब्राह्मण श्राद्धकर्ममें सम्मिलित करने योग्य हैं और कैसे ब्राह्मण त्याज्य माने गये हैं?
भर्तृयज्ञने कहा—राजन्! विद्वान् पुरुषको अमावास्याके दिन अवश्य श्राद्ध करना चाहिये। क्षुधासे क्षीण हुए पितर श्राद्धान्नकी आशासे अमावास्या तिथिके आनेकी प्रतीक्षा करते रहते हैं। जो अमावास्या तिथिको जल या शाकसे भी श्राद्ध करता है, उसके पितर तृप्त होते हैं और उसके समस्त पातकोंका नाश हो जाता है।
आनर्त्तने पूछा—ब्रह्मन्! विशेषतः अमावास्याको श्राद्ध करनेका विधान क्यों है? मरे हुए जीव तो अपने कर्मानुसार शुभाशुभ गतिको प्राप्त होते हैं; फिर श्राद्धकालमें वे अपने पुत्रके घर कैसे पहुँच पाते हैं?
भर्तृयज्ञने कहा—महाराज! जो लोग यहाँ मरते हैं, उनमेंसे कितने ही इस लोकमें जन्म ग्रहण करते हैं, कितने ही पुण्यात्मा स्वर्गलोकमें स्थित होते हैं और कितने ही पापात्मा जीव यमलोकके निवासी हो जाते हैं। कुछ जीव भोगानुकूल शरीर धारण करके अपने किये हुए शुभ या अशुभ कर्मका उपभोग करते हैं। राजन्! यमलोक या स्वर्गलोकमें रहनेवाले पितरोंको भी तबतक भूख-प्यास अधिक होती है, जबतक कि वे माता या पितासे तीन पीढ़ीके अन्तर्गत रहते हैं—जबतक वे श्राद्धकर्ता पुरुषके—मातामह, प्रमातामह या वृद्धप्रमातामह एवं पिता, पितामह या प्रपितामह पदपर रहते हैं, तबतक श्राद्धभाग ग्रहण करनेके लिये उनमें भूख-प्यासकी अधिकता
१९८८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
होती है। पितृलोक या देवलोकके पितर तो श्राद्धकालमें सूक्ष्म शरीरसे आकर श्राद्धीय ब्राह्मणोंके शरीरमें स्थित होकर श्राद्धभाग ग्रहण करते हैं; परंतु जो पितर कहीं शुभाशुभ भोगमें स्थित हैं या जन्म ले चुके हैं, उनका भाग दिव्य पितर आकर ग्रहण करते हैं और जीव जहाँ जिस शरीरमें होता है—वहाँ तदनुकूल भोगकी प्राप्ति कराकर उसे तृप्ति पहुँचाते हैं। ये दिव्य पितर नित्य एवं सर्वज्ञ होते हैं। पितरोंके उद्देश्यसे सदा ही अन्न और जलका दान करते रहना चाहिये। जो नीच मानव पितरोंके लिये अन्न और जल न देकर आप ही भोजन करता या जल पीता है, वह पितरोंका द्रोही है। उसके पितर स्वर्गमें अन्न और जल नहीं पाते हैं। इसलिये शक्तिके अनुसार अन्न और जल उनके लिये अवश्य देने चाहिये। श्राद्धद्वारा तृप्त किये हुए पितर मनुष्यको मनोवांछित भोग प्रदान करते हैं।
श्राद्धकी आवश्यकता तथा समय
आनर्त्तनरेशने पूछा—ब्रह्मन्! श्राद्धके लिये और भी तो नाना प्रकारके पवित्रतम काल हैं; फिर अमावास्याको ही विशेषरूपसे श्राद्ध करनेकी बात क्यों कही गयी है?
भर्तृयज्ञने कहा—महाराज! यह सत्य है कि श्राद्धके योग्य और भी बहुत-से समय हैं। मन्वादि तिथि, युगादि तिथि, संक्रान्तिकाल, व्यतीपात, गजच्छाया, चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण—इन सभी समयोंमें पितरोंकी तृप्तिके लिये श्राद्ध करना चाहिये। पुण्यतीर्थ, पुण्यमन्दिर, श्राद्धयोग्य ब्राह्मण तथा श्राद्धके योग्य उत्तम पदार्थ प्राप्त होनेपर बुद्धिमान् पुरुषोंको बिना पर्वके भी श्राद्ध करना चाहिये। अमावास्याको जो विशेषरूपसे श्राद्ध करनेका आदेश दिया गया है, इसका कारण बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। सूर्यकी सहस्रों किरणोंमें जो सबसे प्रमुख है, उसीका नाम 'अमा' है; उस 'अमा' नामक प्रधान किरणके ही तेजसे सूर्यदेव तीनों लोकोंको प्रकाशित करते हैं। उसी अमामें तिथिविशेषको चन्द्रदेव निवास करते हैं, इसलिये उसका नाम 'अमावास्या' है। यही कारण है कि अमावास्या प्रत्येक धर्मकार्यके लिये अक्षय फल देनेवाली बतायी गयी है। श्राद्धकर्ममें तो इसका विशेष महत्त्व है ही। अग्निष्वात्त, बर्हिषद, आज्यप, सोमप, रश्मिप, उपहूत, आयन्तुन, श्राद्धभुक् तथा नान्दीमुख—ये नौ दिव्य पितर बताये गये हैं। आदित्य, वसु, रुद्र तथा दोनों अश्विनीकुमार भी केवल नान्दीमुख पितरोंको छोड़कर शेष सभीको तृप्त करते हैं। ये पितृगण ब्रह्माजीके समान बताये गये हैं; अतः पद्मयोनि ब्रह्माजी उन्हें तृप्त करनेके पश्चात् सृष्टिकार्य प्रारम्भ करते हैं।
इनके सिवा, दूसरे भी ऐसे मर्त्य-पितर होते हैं, जो स्वर्गलोकमें निवास करते हैं। वे दो प्रकारके देखे जाते हैं; एक तो सुखी हैं और दूसरे दुःखी। मर्त्यलोकमें रहनेवाले वंशज जिनके लिये श्राद्ध करते और दान देते हैं, वे सभी वहाँ हर्षमें भरकर देवताओंके समान प्रसन्न होते हैं। जिनके लिये उनके वंशज कुछ भी दान नहीं करते, वे भूख-प्याससे व्याकुल और दुःखी देखे जाते हैं। एक समयकी बात है, अग्निष्वात्त आदि सभी पितर देवराज इन्द्रके पास गये। महाराज! इन्द्रने उन्हें आया देख सम्पूर्ण देवताओंके साथ भक्तिपूर्वक उनका पूजन किया। इसके बाद जब वे देवदुर्लभ पितृलोकको जाने लगे, तब क्षुधा-पिपासासे पीड़ित रहनेवाले मर्त्य पितरोंने दिव्य स्तोत्रोंसे, पितृसूक्तके मन्त्रोंसे तथा पितरोंको सन्तुष्ट करनेवाले अन्यान्य वैदिक स्तोत्रोंसे उन सबकी स्तुति करके दीनतापूर्ण वचनोंद्वारा उन्हें प्रसन्न किया। तब वे दिव्य पितर प्रसन्न होकर उनसे बोले—'सुव्रतो! हम सब तुम लोगोंपर प्रसन्न हैं, बोलो तुम क्या चाहते हो?'
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११८९
मर्त्य पितर बोले—दिव्य पितृगण! हम मनुष्योंके पितर हैं। अपने कर्मोंद्वारा मर्त्यलोकसे स्वर्गमें आकर देवताओंके साथ निवास करते हैं। परंतु यहाँ हमें अत्यन्त भयंकर भूख और प्यासका कष्ट होता है। जान पड़ता है, हम आगमें जल रहे हैं। यहाँके नन्दन आदि वनोंमें बड़े सुन्दर-सुन्दर वृक्ष हैं। सबमें फल लगे हुए हैं, परंतु उन फलोंको जब हम हाथमें लेते हैं और यलपूर्वक जोर-जोरसे खींचते हैं तो भी वे डालीसे टूटकर अलग नहीं होते। प्याससे पीड़ित होकर यदि हम देवनदी गंगाका जल हाथमें उठाते हैं और पीते हैं, तब हमारे हाथमें उस जलका स्पर्श ही नहीं होता। इस स्वर्गलोकमें कोई खाता-पीता नहीं दिखायी देता। अतः यहाँका निवास हमारे लिये अत्यन्त भयंकर हो गया है। यहाँ जो देवता और गुह्यक आदि हैं, वे सब विमानमें बैठे हुए प्रसन्नचित्त दिखायी देते हैं। इन्हें भूख-प्यासका कष्ट नहीं है। ये अनेक प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न हैं। क्या हम सब लोग भी कभी ऐसे हो सकेंगे? भूख-प्यासके कष्टसे रहित हो परम सन्तोष पा सकेंगे?
दिव्य पितरोंने कहा—इन्द्र आदि केवल दूसरे-दूसरे कार्योंमें व्यग्र होकर जब हमारे लिये श्राद्ध नहीं करते, दान नहीं देते, तब हमलोगोंकी भी ऐसी ही कष्टपूर्ण दशा हो जाती है। उस समय हम वहाँसे आकर देवताओंसे कहते हैं, प्रार्थना करते हैं। उसके बाद जब ये लोग श्राद्ध-तर्पणद्वारा हमें तृप्त करते हैं, तब हमें तृप्ति प्राप्त होती है। इसी प्रकार तुम लोगोंके जो वंशज एकाग्रचित्त हो तुम्हारे लिये श्राद्धका दान देते हैं, उससे तुमलोग भी क्यों नहीं तृप्त होओगे? अब प्रमादी वंशज पितरोंका तर्पण नहीं करते, तब उनके पितर स्वर्गमें रहनेपर भी भूख-प्याससे व्याकुल हो जाते हैं; फिर जो यम लोकमें पड़े हैं, उनके कष्टका तो कहना ही क्या है?
इतना कहकर दिव्य पितरोंने मर्त्य पितरोंको साथ ले ब्रह्माजीके समीप गमन किया और उनकी तथा अपनी शाश्वत तृप्तिके लिये उपाय पूछा। तब ब्रह्माजीने कहा—'पितरो! यदि मनुष्य पिता, पितामह और प्रपितामहके उद्देश्यसे तथा मातामह, प्रमातामह और वृद्धप्रमातामहके उद्देश्यसे श्राद्ध-तर्पण करेंगे तो उतनेसे ही उनके पिता और मातामहसे लेकर मुझतक सभी पितर तृप्त हो जायँगे। जिस अन्नसे मनुष्य अपने पितरोंकी तुष्टिके लिये श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त करेगा और उसीसे भक्तिपूर्वक पितरोंके निमित्त पिण्डदान भी देगा, उससे तुम्हें सनातन तृप्ति प्राप्त होगी। अमावस्याके दिन वंशजोंद्वारा श्राद्ध और पिण्ड पाकर पितरोंको एक मासतक तृप्ति बनी रहेगी। सूर्यदेवके कन्याराशिपर स्थित रहते समय आश्विन कृष्णपक्ष (पितृपक्ष या महालय)-में जो मनुष्य मृत्यु-तिथिपर पितरोंके लिये श्राद्ध करेंगे, उनके उस श्राद्धसे पितरोंको एक वर्षतक तृप्ति बनी रहेगी। उस समय शाकके द्वारा भी जो तुम्हारा श्राद्ध नहीं करेगा, वह धनहीन चाण्डाल होगा। जो मनुष्य उसके साथ बैठना, सोना, खाना, पीना, छूना-छुलाना अथवा वार्तालाप आदि व्यवहार करेंगे, वे भी महापापी माने जायँगे। उनके सन्तानकी वृद्धि नहीं होगी। किसी प्रकार भी उन्हें सुख और धन-धान्यकी प्राप्ति नहीं होगी। यदि मनुष्य गयाशीर्षमें जाकर एक बार भी श्राद्ध कर देंगे तो उसके प्रभावसे तुम सभी पितर सदाके लिये तृप्त हो जाओगे।'
भर्तृयज्ञ कहते हैं—राजन् ! ऐसा जानकर विज्ञ पुरुषको चाहिये कि पितरोंको तृप्त करनेकी इच्छा रखकर वह उक्त समयोंमें श्राद्ध अवश्य करे। इहलोक और परलोकमें उसकी उन्नति चाहनेवाले पुरुषको विशेषतः गयाशीर्षमें जाकर श्राद्ध करना चाहिये। जो मनुष्य अमावस्याके दिन श्राद्ध नहीं करता, उसके पितर भूख-प्याससे पीड़ित हो बहुत दुःखी होते हैं। मन-ही-मन तृप्तिकी अभिलाषा रखकर वे प्रेतपक्षकी प्रतीक्षा करते
१९९० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
रहते हैं, ठीक उसी तरह जैसे किसानलोग रात-दिन वर्षाकी राह देखते हैं। पितृपक्ष बीत जानेपर भी जब उन्हें श्राद्धका अन्न नहीं मिलता, तब वे जबतक कन्या राशिपर सूर्य रहते हैं, तबतक अपनी सन्तानोंद्वारा किये हुए श्राद्धकी प्रतीक्षा करते हैं। उसके भी बीत जानेपर कुछ पितर तुलाराशिके सूर्यतक पूरे कार्तिकमासमें अपने वंशजोंद्वारा किये जानेवाले श्राद्धकी राह देखते हैं। जब सूर्यदेव वृश्चिक राशिपर चले जाते हैं, तब वे पितर दीन एवं निराश होकर अपने स्थानपर लौट जाते हैं। राजन् ! इस प्रकार पूरे दो मासतक भूख-प्याससे व्याकुल पितर वायुरूपमें आकर घरके दरवाजोंपर खड़े रहते हैं। अतः जबतक कन्या और तुलापर सूर्य रहते हैं, तबतक तथा अमावस्याके दिन सदा पितरोंके लिये श्राद्ध करना चाहिये। विशेषतः तिल और जलकी अंजलि देनी चाहिये। कन्या और तुलामें श्राद्ध न हो तो अमावास्याको अवश्य करे। वह भी न हो तो एक बार गयाजीमें आकर श्राद्ध कर दे, जिससे नित्य श्राद्धका फल प्राप्त होता है।
श्राद्धकी विधि, विहित और निषिद्ध ब्राह्मण तथा मन्वादि एवं युगादि पुण्यतिथियोंका वर्णन
आनर्त्तने पूछा—मुनीश्वर! सब मनुष्योंको किस विधिसे श्राद्ध करना चाहिये?
भर्तृयज्ञने कहा—उत्तम कर्मोंद्वारा उपार्जित धनसे पितरोंका श्राद्ध करना उचित है। छल, कपट, चोरी और ठगीसे कमाये हुए धनसे कदापि श्राद्ध न करे। अपनी वर्णोचित वृत्तिके द्वारा उपार्जित धनसे श्राद्धके लिये सामग्री एकत्र करे। पहले सन्ध्याकाल आनेपर काम-क्रोधसे रहित एवं पवित्र हो श्राद्धकर्मके योग्य श्रेष्ठ ब्रह्मचर्यपरायण ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। उनके अभावमें ब्रह्मज्ञानपरायण, अग्निहोत्री, वेदविद्यामें निपुण गृहस्थ ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे। जिनका कोई अंग विकल न हो, जो नीरोग, आहारपर संयम रखनेवाले तथा पवित्र हों, ऐसे ब्राह्मण श्राद्धके योग्य बताये गये हैं।
जो किसी अंगसे हीन हों या जिनका कोई अंग अधिक हो, जो सर्वभक्षी हों, निकाले गये हों, जिनके दाँत काले हों अथवा जिनके दाँत गिर गये हों, जो वेद बेचनेवाले और यज्ञवेदीको नष्ट करनेवाले हों, जिनमें वेद-शास्त्रोंका ज्ञान न हो, जिनके नख खराब हो गये हों, जो रोगी, निर्धन, दूसरोंकी हिंसा करनेवाले, दूसरे लोगोंपर लांछन लगानेवाले, नास्तिक, नाचनेवाले, सूदखोर, बुरे कर्मोंमें संलग्न, शौचाचारसे शून्य, अत्यन्त लंबे, अति दुर्बल, बहुत मोटे, अधिक रोमवाले तथा रोमरहित हों, ऐसे ब्राह्मणोंको श्राद्धमें त्याग दे। जो पितरोंका गौरव रखना चाहे, उसे ऐसा अवश्य करना चाहिये। जो परायी स्त्रीमें आसक्त, शूद्रजातीय स्त्रीसे सम्पर्क रखनेवाले, नपुंसक, मलिन, चोर, क्षत्रिय तथा वैश्यकी वृत्तिवाले, माता-पिताका त्याग करनेवाले, गुरुस्त्रीगामी, निर्दोष पत्नीको छोड़नेवाले, कृतघ्न, खेती करनेवाले, शिल्पसे जीविका चलानेवाले, भाला बेचकर या भाला चलाकर जीनेवाले, चमड़ेके व्यापारसे जीवन-निर्वाह करनेवाले तथा अज्ञात कुलवाले हों, ऐसे ब्राह्मणोंको भी श्राद्धमें त्याग देना चाहिये।
अब उन ब्राह्मणोंका परिचय देता हूँ, जो श्राद्धकार्यमें प्रशस्त माने गये हैं। त्रिणाचिकेत (नाचिकेत नामक विविध अग्निका सेवन करनेवाले), 'मधुवाता' आदि तीन ऋचाओंका जप करनेवाले, छहों अंगोंके ज्ञाता, त्रिसुपर्ण नामक ऋचाओंका पाठ करनेवाले, विद्या एवं व्रतको पूर्ण करके जो स्नातक हो चुके हों वे, धर्मद्रोण (धर्मशास्त्र)-के पाठक, पुराणवेत्ता, ज्ञानी, ज्येष्ठसामके ज्ञाता, अथर्वशीर्षके विद्वान्, ऋतुकालमें
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * १११९
अपनी पत्नीके साथ सहवास करनेवाले, उत्तम कर्मपरायण, सद्यःप्रक्षालक (तत्काल पात्र धो डालनेवाले अर्थात् एक ही समयके लिये अन्न संग्रह करनेवाले), शुक्ल (गौर वर्ण अथवा शुक्ल जातीय), पुत्रीके पुत्र, दामाद, भानजे, परोपकारी, मिष्टान्न खाने और पचानेमें समर्थ, मीठे वचन बोलनेवाले, एवं सदा जपमें तत्पर रहनेवाले—ये सभी ब्राह्मण पंक्तिपावन (पंगतको पवित्र करनेवाले) जानने चाहिये। ये पितरोंकी तृप्ति करते हैं। इसलिये थोड़ी विद्यावाले होनेपर भी कुल और आचारमें जो श्रेष्ठ हों, उन्हींको श्राद्धमें नियुक्त करना चाहिये।
इस प्रकार ब्राह्मणोंका ज्ञान करके सव्यभावसे उनके चरणोंका स्पर्श करते हुए प्रणाम करे और विश्वेदेव श्राद्धके लिये दो ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे। दाहिना घुटना पृथ्वीपर टेककर इस मन्त्रका उच्चारण करे—
आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः।
भक्त्याह्वता मया चैव त्वं चापि व्रतभागभव ॥
‘मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक बुलाये हुए परम सौभाग्यशाली महाबली विश्वेदेवगण इस श्राद्धकर्ममें पधारें और हे ब्राह्मणदेव! आप भी व्रतके भागी, क्रोधरहित, शौचपरायण तथा ब्रह्मचर्यपालक हों।’
तत्पश्चात् अपसव्यभावसे पितरोंके लिये तथा मातामह आदिके लिये भी ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। फिर पितृभक्त पुरुष श्रद्धासे ब्राह्मणका चरण-स्पर्श करके कहे—‘विप्रवर! इस श्राद्धकर्ममें मेरे पिता, पितामह तथा प्रपितामह आपमें स्थित होकर पधारें और आप भी ब्रह्मचर्य आदि व्रतका पालन करें।’
इस प्रकार पितरों और मातामह आदिका भी आवाहन करके घर आवे। निमन्त्रित ब्राह्मणोंको उस दिन विशेष संयमसे रहना चाहिये। यजमान भी शान्तचित्त एवं ब्रह्मचर्यसे युक्त रहे। वह रात बीत जानेपर प्रातःकाल शयनसे उठकर मनुष्य दिनभर किसीपर क्रोध न करे। उस दिन स्वाध्याय बंद रखे और कोई कुत्सित कर्म अपने द्वारा न होने दे। तेल लगाना, परिश्रम करना, सवारी या वाहन आदिको दूरसे ही त्याग दे।
तदनन्तर जब दोपहर बीतनेपर 'कुतप' संज्ञक मुहूर्त आवे, उस समय स्नान करके श्वेत वस्त्र धारणकर देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेके पश्चात् निमन्त्रित ब्राह्मणोंको भी संतुष्ट करे। उसके बाद उन्हें बुलाकर श्राद्ध प्रारम्भ करे। पवित्र, सुन्दर, एकान्त गृहमें, जिसमें दक्षिण दिशाकी भूमि कुछ नीची हो, जहाँ पापी क्रूरकर्मी मनुष्योंकी दृष्टि न पड़े, श्राद्ध करना चाहिये। जिस श्राद्धको रजस्वला स्त्री देख लेती है अथवा जिसपर किसी पतित मनुष्य या सूअरकी दृष्टि पड़ जाती है, वह व्यर्थ हो जाता है। जिसमें बासी अन्न, तेलका बना हुआ पदार्थ अथवा केश आदिसे दूषित भोजन परोसा जाय, वह श्राद्ध भी व्यर्थ हो जाता है। जिस श्राद्धमें अन्नका बलिवैश्वदेवके अनुसार यथायोग्य विभाग न किया गया हो, मौनव्रतका पालन न हुआ हो अथवा दक्षिणा न दी गयी हो, वह श्राद्ध भी व्यर्थ हो जाता है। जहाँ घरघराहटकी ध्वनि, ओखलीके कूटनेका शब्द अथवा सूपके फटकनेकी आवाज होती हो, वह श्राद्ध भी व्यर्थ हो जाता है। जिस श्राद्धमें रसोई तैयार करते समय कलह होता है, विशेषतः पंक्तिभेद किया जाता है, जहाँ ब्राह्मण और यजमान ब्रह्मचर्यका पालन किये बिना ही भोजन करता तथा दान देता है, वह श्राद्ध भी सफल नहीं होता।
जिन तिथियोंमें श्रद्धापूर्ण हृदयसे स्नान करके पितरोंके लिये दिया हुआ तिलमिश्रित जल भी उनके लिये अक्षय तृप्तिका साधक होता है, उनका वर्णन करता हूँ—आश्विन शुक्ला नवमी, कार्तिककी द्वादशी, माघ तथा भादोंकी तृतीया, फाल्गुनकी अमावास्या, पौषकी एकादशी, आषाढ़की दशमी, माघकी सप्तमी, श्रावण कृष्णा अष्टमी, आषाढ़, कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठ मासकी पूर्णिमाएँ—ये मन्वादि तिथियाँ कही गयी हैं।
१९९२
- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
इनमें स्नान करके जो मनुष्य पितरोंके उद्देश्यसे तिल और कुशमिश्रित जल भी देता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। कार्तिक शुक्ला नवमी तथा वैशाख शुक्ला तृतीया, माघकी अमावास्या और श्रावणकी तृतीया—ये क्रमशः सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुगकी आदि तिथियाँ हैं। ये स्नान, दान, जप, होम और पितृतर्पण आदि करनेपर अक्षय पुण्य उत्पन्न करनेवाली और महान् फल देनेवाली होती हैं। जब सूर्य मेषराशि अथवा तुलाराशिपर जाते हैं, उस समय अक्षय पुण्यदायक 'विषुव' नामक योग होता है *। जिस समय सूर्य मकर और कर्क राशिपर जाते हैं, उस समय 'अयन' नामक काल होता है। सूर्यका एक राशिसे दूसरीपर जाना 'संक्रान्ति' कहलाता है। ये सब स्नान, दान, जप और होम आदिका महान् फल देनेवाले हैं। इस प्रकार संक्रान्ति और युगादि तिथियोंका वर्णन किया गया। इनमें दी हुई वस्तुका पुण्य अक्षय होता है।
श्राद्धकर्ता और श्राद्धभोक्ताके लिये नियम, एकोद्दिष्ट और सपिण्डीकरणके विषयमें कुछ ज्ञातव्य बातोंका निर्देश
भर्तृयज्ञ कहते हैं—राजन्! ब्राह्मणके चरणका जल जो भूमिपर गिरता है, उससे उन सगोत्र पुरुषोंकी तृप्ति होती है, जो पुत्रहीन रहकर मृत्युको प्राप्त हुए हैं। जबतक घरकी भूमि ब्राह्मणके चरणोदकसे भीगी रहती है, तबतक पितृगण पुष्कर-पात्रोंमें जल पीते हैं। श्राद्ध करते समय पृथ्वीपर जो कुछ भी पुष्प, गन्ध, जल और अन्न गिरता है, उससे पशु, पक्षी, सर्प, कृमि और कीट-योनिमें पड़े हुए पूर्वज परम तृप्तिको प्राप्त होते हैं। अपने कुलमें उत्पन्न हुए जो पुरुष अपमृत्युसे मरे हैं अथवा जो प्रेतभावको प्राप्त हुए पूर्वज हैं, वे ब्राह्मणोंके उच्छिष्ट पात्र धोनेसे गिरी हुई जूठनसे तृप्त होते हैं। जो संस्कारहीन होकर मरे हैं अथवा जो कुलवती स्त्रियोंका त्याग करनेवाले हैं, उन उच्छिष्टभागी पुरुषोंके लिये वह अन्न है, जो कुशोंपर बिखेरा जाता है। उसे विकरान्न कहते हैं। विकरान्न देनेसे वे सब-के-सब तृप्त होते हैं। श्राद्धकर्ममें जो मन्त्र, काल और विधि आदिकी त्रुटि रह जाती है, उसकी पूर्ति पर्याप्त दक्षिणा देनेसे होती है। अतः विद्वान् पुरुषको दक्षिणारहित श्राद्ध कदापि नहीं करना चाहिये। श्राद्धसम्बन्धी दान देकर श्राद्धकर्ताको और श्राद्धान्न भोजन करके ब्राह्मणको न तो स्वाध्याय करना चाहिये और न दूसरे ग्राममें ही जाना चाहिये। जो श्राद्धान्न भोजन करनेवाला तथा श्राद्धकर्ता मनुष्य मैथुनका सेवन करता है, उसके पितर एक वर्षतक वीर्य भोजन करते हैं। इसमें संदेह नहीं है। जो अधम मनुष्य श्राद्ध करके अथवा श्राद्धान्न भोजन करके दूसरे ग्राममें जाता है, उसका वह श्राद्ध व्यर्थ हो जाता है। श्राद्धका निमन्त्रण आनेपर ब्राह्मणको अपने घर भोजन नहीं करना चाहिये। जो मोहवश भोजन कर लेता है, वह अधोगतिको प्राप्त होता है। यजमानको भी श्राद्ध करके दोबारा भोजन नहीं करना चाहिये। जो दोबारा भोजन कर लेते हैं, वे निश्चय ही नरकमें जाते हैं। जो श्राद्ध-भोजन अथवा श्राद्ध-दान करके युद्ध या कलह करता है, वह उस सम्पूर्ण श्राद्धको व्यर्थ कर देता है।
कमलयोनि ब्रह्माजीने श्राद्धके योग्य ब्राह्मणोंको निश्चय करते समय दौहित्रों (धेवतों)-को प्रथम स्थान दिया है। अतः दौहित्र यदि पवित्रतासे रहित, हीनांग अथवा अधिकांग भी हो तो पितरोंके संतोषके लिये उसे श्राद्धमें अवश्य सम्मिलित करे। ब्रह्माजीने पशुओंकी सृष्टि करते समय सबसे पहले गौओंको रचा है; अतः श्राद्धमें
* यदा स्यान्मेषगो भानुस्तुलां वाथ यदा व्रजेत्। तदा स्याद् विषुवाख्यस्तु कालः पुण्यप्रदायकः॥
(स्क० पु०, ना० उ० २०७)
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११९३ उन्हींका दूध और घी उत्तम माना गया है। विधाताने मानवप्रजाकी सृष्टि करते समय सबसे पहले श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया था, इसलिये वे श्राद्धमें उत्तम एवं पितरोंकी तृप्ति करनेवाले माने गये हैं। देवताओंकी सृष्टि करते समय ब्रह्माजीने सबसे पहले विश्वेदेवोंको बनाया है। अतः श्राद्धकर्म आरम्भ होनेपर पहले उन्हींकी पूजा की जाती है। वे विधिपूर्वक तृप्त किये जाने और प्रथम पूजित होनेपर श्राद्धमें जो छिद्र (दोष) उत्पन्न होते हैं, उनका नाश कर देते हैं। जो मनुष्य इन सब वस्तुओंसे सांगोपांग श्राद्धका अनुष्ठान करता है, उसका वह श्राद्ध घरमें ही गयाश्राद्धके समान फल देता है। शास्त्रोक्त विधिसे श्राद्ध सम्पन्न हो जानेपर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर श्राद्धकर्ता पुरुष स्वयं भी सबके अन्तमें मौन भावसे भोजन करे। श्राद्धान्नका भोजन दिनमें ही हो जाना चाहिये। जो श्राद्धकर्ता पुरुष सूर्यास्त होनेपर भोजन करता है, उसका वह श्राद्ध व्यर्थ हो जाता है। अतः रातमें भोजन नहीं करना चाहिये। आनर्तने कहा - महामते! अब आप एकोद्दिष्ट श्राद्धकी विधि बताइये और पार्वणका भी जैसा विधान कहा गया है, उसका वर्णन कीजिये। भर्तृयज्ञ बोले - अस्थिसंचयनके पहले तीन श्राद्ध बताये गये हैं। जिस स्थानपर मृत्यु हुई हो, वहाँ एक श्राद्ध करे। फिर मार्गमें जहाँ विश्राम कराया गया हो, वहाँ एक श्राद्ध करना चाहिये। तत्पश्चात् अस्थिसंचयनके स्थानपर तृतीय श्राद्ध करना उचित है। इसके सिवा, मृत्युके प्रथम, तृतीय, पंचम, सप्तम, नवम तथा ग्यारहवें दिन भी एक-एक श्राद्ध किया जाता है। इस प्रकार सब मिलकर नौ श्राद्ध होते हैं। वैतरणी-दानकी प्राप्ति होनेपर प्रेत तृप्त होता है। एकोद्दिष्ट श्राद्ध विश्वेदेवसे रहित होता है। उसमें अग्निकरणकी क्रिया भी नहीं की जाती। एकोद्दिष्ट बिना आवाहनके ही करना चाहिये। एक बार 'तृप्तोऽसि ? स्वदितम् ?' 'क्या आप तृप्त हो गये? भोजन स्वादिष्ट लगा है न ?' इत्यादि रूपसे तृप्तिविषयक प्रश्न करना चाहिये। फिर 'अभिरम्यताम्' कहकर ब्राह्मणका विसर्जन करना चाहिये। जिसका अग्रभाग कटा या फटा न हो, ऐसे कुश-पत्रको बीचसे काटकर दो तृणके रूपमें कर ले और उसीको पवित्री बनावे। एकोद्दिष्टमें ऐसी ही पवित्री बनानेका विधान है। आसन आदिके अर्पण करते समय सर्वत्र 'पितः' इस प्रकार संबोधनान्त उच्चारण करना चाहिये। तर्पणमें 'पिता' (तृप्यताम्)- का (पितृ शब्दके प्रथमान्तरूपका) प्रयोग करना चाहिये। संकल्प-वाक्यमें 'पित्रे' (इस प्रकार चतुर्थ्यन्त रूप) - का उच्चारण करना चाहिये और अक्षय्योदक दिलाते समय 'पितुः' इस षष्ठ्यन्त रूपका प्रयोग करना उचित है। इसी प्रकार जहाँ 'पितः' का प्रयोग होता है, ऐसे स्थलोंमें सर्वत्र 'अमुक गोत्र' इस प्रकार स्वरान्त (संबोधनान्त) उच्चारण करना चाहिये। तर्पणमें 'गोत्रः' का, संकल्पवाक्यमें 'गोत्राय' का और अक्षय्य- वाक्यमें 'गोत्रस्य' का उच्चारण उचित है। ऐसे ही अर्घ्य आदि देते समय 'अमुक गोत्र' के साथ 'अमुक शर्मन्' का प्रयोग करना चाहिये। तर्पणमें शर्मा, संकल्पवाक्यमें 'शर्मणे' और अक्षय्योदक त्यागके समय 'शर्मणः' का प्रयोग उचित है। इसी प्रकार माताके लिये क्रमशः आसन, तर्पण, संकल्प एवं अक्षय्य वाक्यमें 'मातः' 'माता' 'मात्रे' और 'मातुः' का प्रयोग आवश्यक है। उसके साथ गोत्रका विशेषण लगानेपर 'अमुक गोत्रे' '.... गोत्रा' '...गोत्रायै' तथा '...गोत्रायाः' का प्रयोग करना चाहिये। माताओंके नामके साथ देवीका प्रयोग करना हो तो उक्त स्थलोंमें क्रमशः 'देवि' 'देवी' 'देव्यै' और 'देव्याः' का प्रयोग करना चाहिये। इस तरह यथास्थान प्रथमा आदि विभक्तियोंका प्रयोग होता है। प्रथमा, चतुर्थी और षष्ठी विभक्तिका यथावत् प्रयोग श्राद्धकी सिद्धिके लिये आवश्यक है। जो श्राद्ध विभक्तिका ठीक
१९९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
प्रयोग किये बिना ही किया जाता है, वह नहीं किये हुएके समान है; पितरोंको उसकी प्राप्ति नहीं होती। अतः विज्ञ ब्राह्मणको प्रयत्नपूर्वक यथोक्त विभक्तियोंके प्रयोगके साथ श्राद्धविधिका अनुष्ठान करना चाहिये।
तदनन्तर वर्षके पश्चात् सपिण्डीकरण श्राद्धका अनुष्ठान होना चाहिये। यदि वर्षके भीतर कोई विवाह आदि आभ्युदयिक कार्य आनेवाला हो तो वर्ष पूर्ण होनेके पहले भी सपिण्डीकरण किया जा सकता है। सपिण्डीकरण श्राद्ध पार्वणोक्त विधिसे किया जाता है। किंतु इसमें विश्वेदेवोंका आवाहन आदि नहीं होता। प्रेतके पिता, पितामह और प्रपितामह—ये तीन उसके प्रधान देवता हैं। राजन्! उसमें प्रेतके उद्देश्यसे एकोद्दिष्ट करना चाहिये। प्रेतके लिये जो अर्घ्यपात्र निश्चित किया गया हो, उसे लेकर उसके पिता आदिके तीनों अर्घ्यपात्रोंमें विधिपूर्वक उसका जल आदि डाले। इसी प्रकार प्रेत-पिण्डके तीन भाग करके तीनों पितृ-पिण्डोंमें एक-एक भाग मिलावे। उस समय 'ये समानाः' इत्यादि दो मन्त्रोंका उच्चारण करता रहे। तत्पश्चात् पितासे लेकर प्रपितामहपर्यन्त सबके लिये क्रमशः अवनेजन देकर पुनः गन्ध, पुष्प आदि सब कुछ निवेदन करे। चौथा अवनेजन पात्र न दे। कोई-कोई प्रेतको लक्ष्यमें रखकर चौथा अवनेजन भी देते हैं; परंतु यह मेरा मत नहीं है। सपिण्डीकरणके बाद क्षयाह तिथि और शस्त्राहतके लिये चतुर्दशी तिथिको छोड़ और कभी एकोद्दिष्ट श्राद्ध नहीं करना चाहिये। जो सपिण्डीकृत प्रेतके लिये पृथक् पिण्डदान करता है, उसका वह श्राद्ध नहीं किये हुएके तुल्य है। यह वैसा करके पितृहत्याके पापका भागी होता है। जिसके पिता मर गये हों और पितामह जीवित हों, वह पहले पिताका नाम लेकर फिर पितामहका उच्चारण करे। उस समय पितामह प्रत्यक्ष भोजन करके पिण्डग्रहण करें। पितामहकी क्षयाह तिथिपर पार्वण श्राद्ध करना चाहिये (एकोद्दिष्ट नहीं), अपने पिताको छोड़कर किसी प्रकार पितामहको पिण्ड देना उचित नहीं है। उस दशामें पितामहका एकोद्दिष्ट श्राद्ध न करनेसे पितरोंकी ओरसे तनिक भी भय नहीं मानना चाहिये। पिताकी मृत्यु हो गयी हो तो प्रत्येक अमावास्याको पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। पिताकी मृत्यु हो जानेपर जबतक उसका सपिण्डन (वार्षिक श्राद्ध) न हो जाय, तबतक बीचमें पिता आदि पितरोंका पार्वण श्राद्ध नहीं करना चाहिये। इस बीचमें श्राद्धपक्ष (महालय) आवे तो उसमें पितामह आदिका ही श्राद्ध करना चाहिये (पिताको साथ रखकर नहीं)। क्योंकि पिताका सपिण्डीकरण न होनेसे पितरोंकी श्रेणीमें उनका प्रवेश नहीं हुआ है।
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सपिण्डनकी आवश्यकता, तीन गति, भीष्मद्वारा मृत्युके बादकी स्थितिका निरूपण
**भर्तृयज्ञ कहते हैं—**पितृपिण्डोंके साथ प्रेतके पिण्डका मेलन करनेसे प्रेतको सपिण्ड (पितरोंके साथ बैठकर पिण्डग्रहणका अधिकारी) बनाया जाता है; इस कारण जबतक सपिण्डता नहीं होती, तबतक उसके प्रेतभावकी निवृत्ति भी नहीं होती। इसीलिये मुनियोंने सपिण्डीकरण श्राद्धको आवश्यक बताया है। जीव अन्यत्र जाकर जिस-जिस योनिमें जन्म लेता है, वहीं रहकर अपने पूर्व वंशजोंद्वारा दी हुई प्रत्येक वस्तुको अपने वर्तमान शरीरके अनुकूल पदार्थके रूपमें प्राप्त करता है।
**आनर्तने पूछा—**जिस मनुष्यका यहाँ कोई पुत्र नहीं है, उसका सपिण्डीकरण कैसे करना चाहिये?
**भर्तृयज्ञने कहा—**जिसका यहाँ कोई औरस पुत्र नहीं है, वह चारों पितरोंमेंसे चौथा कैसे हो सकता है? वह दूसरोंद्वारा खींच-तानमें पड़कर इधर-उधर ले जाया जाता है, इसलिये प्रेत
- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११९५
कहलाता है। पुत्र, भाई अथवा उसकी पत्नीको ही उसका सपिण्डीकरण श्राद्ध करना चाहिये। अन्यथा वह किसी तरह पितरोंमें मिलकर चतुर्थ स्थान नहीं प्राप्त करता। मनीषी पुरुष कर्मलोपकी अपेक्षा क्षेत्रज आदि ग्यारह प्रकारके पुत्रोंको पुत्रका प्रतिनिधि बताते हैं। अतः उन्हींके द्वारा क्रिया करानी चाहिये। राजेन्द्र ! यदि समयपर प्रेतकी उत्तरक्रिया सविधि न हो सके तो प्रेतत्वविनाशक नारायणबलिका अनुष्ठान करना चाहिये। जैसे अपमृत्युको प्राप्त हुए अथवा आत्मघात करनेवाले मनुष्योंके लिये ब्राह्मणद्वारा नारायणबलिका अनुष्ठान कराना आवश्यक होता है, उसी प्रकार उसका भी करना चाहिये।
आनर्तने पूछा—महामते! मनुष्य यहाँ कैसे मृत्युको प्राप्त होता है? किस कर्मसे वह स्वर्ग या नरकमें जाता है? अथवा महाभाग! कैसे उसकी मुक्ति होती है? यह सब मुझे विस्तारपूर्वक बताइये।
भर्तृयज्ञने कहा—राजन्! इस जगत्में तीन प्रकारके मनुष्य होते हैं—धर्मी, पापी तथा ज्ञानी। इन तीनोंकी पृथक्-पृथक् तीन गतियाँ मानी गयी हैं। धर्मसे स्वर्ग, पापसे नरक और ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। श्रीकृष्णसहित धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिरने शान्तनुनन्दन पितामह भीष्मसे इसी विषयको इस प्रकार पूछा था।
युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! यमलोकमें कितने नरक बताये गये हैं। उन सबमें जीव किस पापसे जाते हैं?
भीष्मजी बोले—वत्स! यमलोकमें प्रधानतः इक्कीस नरक बताये गये हैं, जिनमें जीव अपने-अपने कर्मके अनुसार जाते हैं। वहाँ चित्र और विचित्र नामक दो लेखक हैं। चित्र सब प्राणियोंका धर्म लिखते हैं और विचित्र यत्नपूर्वक सब पातकोंका उल्लेख करते हैं। धर्मराजके आठ दूत हैं, जो सदा अपने वशमें आये हुए मनुष्योंको मर्त्यलोकसे यमलोकमें ले जाते हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—कराल, विकराल, वक्रनास, महोदर, सौम्य, शान्त, नन्द और सुवाक्य। इनमें पहलेके चार दूत बड़े भयंकर बताये गये हैं। ये सब पापियोंको यमलोकमें ले जाते हैं। शेष चार सौम्य रूप और सौम्य शरीर धारण करनेवाले हैं। वे धर्मात्मा मनुष्यको विमानद्वारा धर्मराजके नगरमें ले जाते हैं। इन सबके असंख्य किंकर हैं। इनकी सहायताके लिये यमने ज्वरसे लेकर यक्ष्मातक एक सौ आठ रोग बनाये हैं। वे रोग ही पहले जाकर मनुष्यको अपने वशमें करते हैं। तत्पश्चात् यमदूत सब लोगोंसे अलक्षित रहकर वहाँ जाते हैं और नाभिके मूलभागमें स्थित हुए वायुरूपधारी सूक्ष्म शरीराभिमानी जीवको लेकर यमलोकके मार्गसे जाते हैं। वहाँ पापी जीवको वे भूमिपर खड़ा करके पैदल चलाते हैं। यमलोकमें जानेके छियासी हजार मार्ग हैं, उन सबमें पहले सब ओरसे बहती हुई वैतरणी नदी प्राप्त होती है। जिसके एक स्रोतमें रक्त और तीखे अस्त्र-शस्त्र बहते हैं। जो मनुष्य मृत्युकालमें ब्राह्मणको धेनु-दान करते हैं, वे उसीकी पूँछ पकड़कर उस नदीके पार हो जाते हैं। दूसरे लोगोंको वह सौ योजन विस्तृत नदी हाथोंसे ही तैरकर पार करनी पड़ती है। वैतरणीका दूसरा स्रोत जलमय है। उस मार्गसे धर्मात्मा पुरुष ही यात्रा करते हैं। जो लोग मृत्युकालमें गोदान करते हैं, वे उसकी पूँछ पकड़कर वैतरणीके पार होते हैं। दूसरे गोदानरहित पुरुष अपनी बाँहोंसे ही तैरकर उसके पार होते हैं।
वैतरणी पार होनेपर पापी और धर्मात्मा पुरुषोंके मार्ग अलग हो जाते हैं। पापी पाप-मार्गसे पैदल जाते हैं और धर्मात्मा धर्ममार्गसे श्रेष्ठ विमानपर बैठकर यात्रा करते हैं। वैतरणीके उस पार पाँच योजन विस्तृत असिपत्र नामक वन है, जो पापियोंको महान् दुःख देनेवाला है। वहाँ एक-एक वृक्षकी एक-एक टहनीमें लोहेके ही सौ-सौ पत्ते हैं, जो तलवारकी तरह सब ओरसे मनुष्योंके शरीरको छिन्न-भिन्न कर देते हैं। जिन
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दुरात्माओंने दूसरोंका धन और परायी स्त्रियोंका अपहरण किया है, उनको असिपत्रवनकी यातना सहनी पड़ती है। नौ श्राद्धोंसे उससे छुटकारा मिलता है। उसके आगे बहुत ऊँचा सुविख्यात कूटशाल्मलि है, जो सब ओरसे काँटोंसे भरा हुआ है। सदा निर्दयतापूर्ण बर्ताव करनेवाले विश्वासघाती मनुष्य उस वृक्षकी डालमें नीचे मुँह करके लटका दिये जाते हैं और नीचे आग जलाकर उन्हें दिन-रात संताप दिया जाता है। एकादशाह श्राद्ध करनेपर उस कष्टसे छुटकारा मिलता है। वहाँसे आगे भयानक आकारवाला नरक है, जो तैलयन्त्रके समान है। उसमें ब्रह्महत्यारे तथा अन्यान्य पापकर्मी जीव पेरे जाते हैं। द्वादशाह श्राद्ध एवं दान करनेपर जीवको उस संकटसे छुटकारा मिलता है। उसके बाद बहुत-से लोहेके तपे-तपाये खम्भे खड़े किये गये हैं; परायी स्त्रियोंमें अनुरक्त होनेवाले मनुष्योंको उन खम्भोंका आलिंगन करना पड़ता है। मासिक श्राद्ध करनेसे जीव उस कष्टसे छुटकारा पाते हैं। उससे आगे लोहेके समान दाढ़ोंवाले भयंकर कुत्ते खड़े रहते हैं, जो मांसभक्षी मनुष्योंको खाते हैं। त्रैपाक्षिक श्राद्ध करनेपर उन्हें इस कष्टसे मुक्ति मिलती है। तदनन्तर लोहेकी-सी चोंचवाले कौवे उपस्थित रहते हैं, जो उन मनुष्योंकी आँखें नोंच लेते या फोड़ देते हैं, जिन्होंने आसक्तिपूर्वक परायी स्त्रियोंकी ओर दृष्टिपात किया है। द्वितीय मासिक श्राद्धके द्वारा उस कष्टसे रक्षा होती है। तदनन्तर शाल्मलिकूट और अन्य लोहकण्टक हैं; चुगली करनेवाले मनुष्य उनके बीचसे ले जाये जाते हैं। त्रैमासिक श्राद्धद्वारा उस यातनासे बचाव होता है। उसके बाद रौरव नामसे प्रसिद्ध महाभयंकर नरक है, उसमें बड़ी भारी पीड़ा होती है। ब्रह्महत्या करनेवाले पापियोंको उसी नरकमें डालनेका आदेश दिया जाता है। कृतघ्न पुरुष भी उसीमें ऊपर पैर और नीचे मुँह करके लटकाये जाते हैं। चातुर्मासिक श्राद्धके दानसे उस संकटसे छुटकारा मिलता है। तदनन्तर कुम्भीपाक नामक भयंकर आकारवाला नरक है; जो लोग यहाँ दम्भ और पाखण्डमें संलग्न एवं नरहत्या करते देखे जाते हैं, वे कुम्भीपाकके खौलते हुए तैलमें डाल दिये जाते हैं। ऊनषाण्मासिक श्राद्धके द्वारा उससे मुक्ति प्राप्त होती है। विश्वासघाती मानव रौद्र नरकमें गिरते हैं और षाण्मासिक श्राद्धके दानद्वारा उस संकटसे छुटकारा पाते हैं। दूसरा नरक साँपों और बिच्छुओंसे भरा हुआ है। जो इस संसारमें पाखण्ड फैलाते हैं, वे नीच मनुष्य उसीमें गिराये जाते हैं। सप्तम मासिक श्राद्धमें दिये हुए दानके द्वारा उस संकटसे मुक्ति मिलती है। उससे भिन्न संवर्तक नामक नरक बताया गया है। जो वेदोंको नष्ट करनेवाले, साधु पुरुषोंके निन्दक और दुरात्मा हैं, उनकी जीभको आगमें तपाये हुए सँड़सोंद्वारा उखाड़ लिया जाता है। जो लोग अपना काम बनानेके लिये और दूसरेके लिये भी झूठ बोलते हैं, उनके सब अंगोंको वहाँ कुत्ते नोंच-नोंचकर खाते हैं। अष्टम मासिक श्राद्धके दान द्वारा उनकी उस संकटसे मुक्ति होती है। इसके बाद महातप्त अग्निकूप नामक अत्यन्त भयंकर नरक है, जिसमें झूठी गवाही देनेवाले मूढ़ मानव गिराये जाते हैं। वे अत्यन्त दुःखी होकर वहाँकी भयंकर यातना सहन करते हैं। नवम मासिकश्राद्ध उनको परम आह्लाद प्रदान करनेवाला होता है। उस नरकके आगे दूसरा भयानक नरक है, जो सब ओर लोहेकी कीलोंसे भरा हुआ है। वहाँ आग लगाने और स्त्री-हत्या करनेवाले पापात्मा यमदूतोंकी मार खाते और दुःखसे आतुर होकर चारों ओर भागते हैं। दशम मासिक श्राद्धके द्वारा उन्हें उस संकटसे छुटकारा मिलता है। तत्पश्चात् अंगारराशिसे व्याप्त भयंकर नरक है; उसमें स्वामीसे द्रोह करनेवाले मनुष्य सब ओर घुमाये जाते हैं। एकादश मासिक श्राद्धका दान उन्हें उस संकटसे बचाता है। उसके बाद तपी हुई बालूसे भरा हुआ एक भयंकर नरक है। जो मनुष्य स्वामीको आया हुआ देख उनकी यथायोग्य सेवा न करके भाग
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खड़े होते हैं, वे वहाँ दुःखी होकर यातना भोगते हैं। उनके पास द्वादश मासिक श्राद्ध पहुँचता और उन्हें संकटसे बचाता है। मरे हुए पुरुषके लिये उसके भाई-बन्धुओंद्वारा वर्षके भीतर जो कुछ भी अन्न और जल दिया जाता है, उसे वे यमलोकके मार्गमें भोगते हैं।
तत्पश्चात् वर्ष पूरा होनेपर वे धर्मराजके समीप पहुँचकर अपने शुभाशुभ कर्मका फल पाते हैं। इस प्रकार पंद्रह नरकोंका सेवन करके मनुष्य पुनः मर्त्यलोकमें जन्म ग्रहण करते हैं। जो लोग हेतुवादी (कोरे तर्कका सहारा लेनेवाले) हैं, उनका जन्म विदेशमें (भारतवर्षसे भिन्न देशमें) होता है। नित्य तर्पण करनेसे उनकी तृप्ति होती है। जो स्वामीसे द्रोह रखनेवाले हैं, वे कुराज्यमें जन्म पाते हैं। एकोद्दिष्ट श्राद्धसे उनकी तृप्ति होती है। जो मनुष्य देवता, पितर और ब्राह्मणोंको दिये बिना ही भोजन करते हैं, उन्हें उस पापके कारण ऐसे देशमें जन्म लेना पड़ता है जो दुर्भिक्षसे पीड़ित रहता हो। ऐसे लोगोंको उनकी क्षयाह तिथिमें श्राद्ध होनेपर तृप्ति प्राप्त होती है। जो लोग परस्पर अनुरागपूर्वक रहनेवाले पति-पत्नीमें एक-दूसरेसे झूठी बातें कहकर भेद (कलह एवं फूट) पैदा करते हैं, उनको दुष्टा स्त्री प्राप्त होती है, जो कि एक बात कहनेपर क्रोधपूर्वक दस बात सुनाती है। ऐसे लोगोंको कन्यादानके फलसे सुख प्राप्त होता है। जो मनुष्य कन्यादानमें विघ्न डालते हैं, अथवा कन्याका विक्रय करते हैं, वे केवल कन्याओंको जन्म देते हैं, पुत्रको नहीं। उनकी वे कन्याएँ पुंश्चली, विधवा और दुर्भाग्यवती होती हैं। उन्हें भी कन्यादानका फल प्राप्त होनेसे ही सुख मिलता है। जिन्होंने रत्नों और शास्त्रोंकी चोरी की है, वे निर्धन, गूँगे, लँगड़े और अन्धे होते हैं। शास्त्रदानके पुण्यसे उन्हें सुख प्राप्त होता है। इस प्रकार ये मर्त्यलोकमें स्पष्ट दिखायी देनेवाले नरक बताये गये हैं।
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नरकों और पापोंसे मुक्त होनेका उपाय तथा भगवान् जलशायीकी महिमा
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह ! नरकोंके स्वरूपका वर्णन तो मुझे बड़ा भयानक प्रतीत हुआ है। उन पापी जीवोंको भी कैसे नरक-यातनासे छुटकारा मिल सकता है? किन व्रतों, नियमों, हवनादि कर्मों तथा तीर्थोंके सेवनसे उनकी सद्गति हो सकती है?
भीष्मजीने कहा— वत्स! इस लोकमें जिनकी हड्डियाँ गंगाजीमें डाली जाती हैं, वे नरकमें हों तो भी वहाँकी आग उनपर कोई प्रभाव नहीं डालती। जिनके नामसे उनके पुत्र गंगातटपर श्राद्ध करते हैं, वे विमानपर चढ़कर नरकसे ऊपर चले जाते हैं। जो पापोंका शास्त्रोक्त प्रायश्चित्त करते हैं तथा जो स्वर्ण आदि दान देते हैं, उनको भी नरककी प्राप्ति नहीं होती। शेष मनुष्य अपने कर्मका यथोचित फल भोगते हैं। जो अपने स्वामीके आगे खड़े हो धारातीर्थ (रणभूमि)-में प्राणत्याग करते हैं, वे नरकोंसे बहुत दूर उत्तम स्थानको प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य काशी, कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य, नागरपुर (हाटकेश्वरक्षेत्र या चमत्कारपुर), प्रयाग अथवा प्रभासक्षेत्रमें शरीर छोड़ते हैं, वे नरकको नहीं देखते। जिसके वंशज उसकी मृत्युतिथिको नील वृषका उत्सर्ग करते (साँड़ छोड़ते) हैं, वह नरकको नहीं देखता। जो मनुष्य भगवान् विष्णुका हृदयमें ध्यान करते हुए मनुष्योंको यथायोग्य भोजन देता है, वह भी नरकको नहीं देखता। जो सूर्यके वृषराशिपर रहते समय ज्येष्ठमासमें जलका और मकरसंक्रान्ति होनेपर माघमें तिलकी गायका दान करता है, उसे नरकका दर्शन नहीं होता। सोमवारके दिन या चन्द्रग्रहणके समय समुद्र और सरस्वती नदीके संगममें स्नान करके जो सोमनाथका दर्शन करता है, वह नरकमें नहीं जाता। रविवारको एवं सूर्यग्रहणके समय जो कुरुक्षेत्रमें स्नान करता
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है वह नरकको नहीं देखता। जो कार्तिककी पूर्णिमाको कृत्तिका नक्षत्रके योगमें मौन भावसे तीनों पुष्कर तीर्थोंकी परिक्रमा करता है, वह नरक नहीं देखता। मकरसंक्रान्ति होनेपर रविवारको जो चण्डीश्वरका दर्शन करते हैं, वे मनुष्य नरकमें नहीं जाते हैं। जो गायको कीचड़से, ब्राह्मणको जीविका न होनेके कारण दासता करनेसे और द्विजको वध-स्थानसे छुड़ा देता है, वह जन्मसे लेकर मृत्युकतके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। गौ तथा ब्राह्मणको वधसे और साधु ब्राह्मणको चोरोंके भयसे जो मुक्त करता है, वह जन्मसे लेकर मृत्युकतके सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है।
जो विलद्वारपर शयनके लिये स्थित हुए जलशायी भगवान् विष्णुका दर्शन करता है, वह पापी हो तो भी पापसे मुक्त हो जाता है। सम्पूर्ण लोकोंके आश्रयभूत परम पवित्र विलद्वारमें स्नान करके जो शेषशय्यापर शयन करनेवाले श्रीहरिका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह जीवनभरके पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मानव वर्षके चार महीनेतक जलमें शयन करनेवाले देवेश्वर विष्णुका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह इस लोकमें फिर जन्म नहीं लेता। वहाँ विलद्वारमें या जलमात्रमें पहलेके महाभाग मुनिने भगवान् शेषशायीकी आराधना की और उनके शुभ निवासस्थानसे मृत्तिका ग्रहण की। इससे वे भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त हुए। सब तीर्थों और सम्पूर्ण यज्ञोंमें जो फल प्राप्त होता है, वही फल चौमासेमें भगवान् शेषशायीकी पूजासे भी प्राप्त होता है। गोशालामें मृत्युको प्राप्त हुए मनुष्य जिस फलको पाते हैं, वही चौमासेमें जलशायीकी पूजासे भी पा लेते हैं। उन देवाधिदेव, निर्गुण, गुणस्वरूप, अव्यक्त, अप्रमेय, सर्वदेवमय, सर्वेश्वर, सबके एकमात्र आवासस्थान तथा सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा श्रीहरिको नमस्कार है। उन भगवान् विष्णुके शयन और बोधनके दिन एकादशी तिथिमें जो कुछ भी उत्तम कर्म किया जाता है, वह अविनाशी होता है। उस दिन जो अन्न खाता है, वह मनुष्य पापात्मा है। अतः विज्ञ पुरुषको अन्य एकादशी तिथियोंके आनेपर भी प्रयत्नपूर्वक अन्नसे बचना चाहिये।
## चातुर्मास्य व्रतके पालनीय नियम और उनकी महिमा
**ऋषि बोले—** सूतजी ! शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुके शयन करनेपर जो कोई भी पालन करने योग्य नियम, व्रत आदि हो, वह हमें बताइये।
**सूतजीने कहा—** ब्राह्मणो ! भगवान् विष्णुके शयन करनेपर चातुर्मास्यमें जो कोई नियम पालित होता है, वह अनन्त फल देनेवाला होता है—ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। अतः विज्ञ पुरुषको सर्वथा प्रयत्न करके कोई नियम ग्रहण करना चाहिये। विप्रवरो ! भगवान् विष्णुके संतोषके लिये नियम, जप, होम, स्वाध्याय अथवा व्रतका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये। जो मानव भगवान् वासुदेवके उद्देश्यसे केवल शाकाहार करके वर्षके चार महीने व्यतीत करता है, वह धनी होता है। जो भगवान् विष्णुके शयनकालमें प्रतिदिन नक्षत्रोंका दर्शन करके ही एक बार भोजन करता है, वह धनवान्, रूपवान् और माननीय होता है। द्विजवरो! जो एक दिनका अन्तर देकर भोजन करते हुए चौमासा व्यतीत करता है, वह सदा वैकुण्ठधाममें निवास करता है। जो जनार्दनके शयन करनेपर छठे दिन भोजन करता है, वह राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञोंका सम्पूर्ण फल पाता है। जो सदा तीन रात उपवास करके चौथे दिन भोजन करते हुए चौमासा बिताता है, वह इस संसारमें फिर किसी प्रकार जन्म नहीं लेता। जो श्रीहरिके शयनकालमें
* नागरखण्ड-उत्तरार्ध *
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व्रतपरायण होकर चौमासा व्यतीत करता है, वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है। जो भगवान् मधुसूदनके शयन करनेपर अयाचित अन्नका भोजन करता है, उसको अपने भाई-बन्धुओंसे कभी वियोग नहीं होता। जो वर्षाके चार महीनेतक तैल और घी लगाना छोड़ देता है, वह स्वर्गीय भोगका भागी होता है। जो मानव ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक चौमासा व्यतीत करता है, वह श्रेष्ठ विमानपर बैठकर स्वेच्छासे स्वर्गलोकमें जाता है। द्विजवरो! जो चौमासेभर नमकीन वस्तुओं एवं नमकको छोड़ देता है, उसके सभी पूर्तकर्म सफल होते हैं। जो चौमासेमें प्रतिदिन स्वाहान्त विष्णुसूक्तके मन्त्रोंद्वारा तिल और चावलकी आहुति देता है, वह कभी रोगी नहीं होता। जो चातुर्मास्यमें प्रतिदिन स्नान करके भगवान् विष्णुके आगे खड़ा हो पुरुषसूक्तका जप करता है, उसकी बुद्धि बढ़ती है। जो अपने हाथमें फल लेकर मौनभावसे भगवान् विष्णुकी एक सौ आठ परिक्रमा करता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता। जो अपनी शक्तिके अनुसार चौमासेमें—विशेषतः कार्तिकमासमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको मिष्ठान्न भोजन कराता है, वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है। जो वर्षाके चार महीनोंतक नित्यप्रति वेदोंके स्वाध्यायसे भगवान् विष्णुकी आराधना करता है, वह सर्वदा विद्वान् होता है। जो चौमासेभर भगवान्के मन्दिरमें रात-दिन नृत्य-गीत आदिका आयोजन करता है, वह गन्धर्व भावको प्राप्त होता है। यदि चार महीनोंतक नियम पालन करना सम्भव न हो तो, एक कार्तिकमासमें ही सब नियमोंका पालन करना चाहिये। जो ब्राह्मण सम्पूर्ण कार्तिकमासमें कांस, मांस, क्षौरकर्म, मधु, दुबारा भोजन और मैथुन छोड़ देता है, वह पूर्वोक्त सभी नियमोंका फल पाता है*। जिसने कुछ उपयोगी वस्तुओंको चौमासेभर त्याग देनेका नियम लिया हो, उसे वे वस्तुएँ ब्राह्मणको दान करनी चाहिये। ऐसा करनेसे ही वह त्याग सफल होता है। जो मनुष्य नियम, व्रत अथवा जपके बिना ही चौमासा बिताता है, वह मूर्ख है।
श्रावणमें कृष्ण पक्षकी द्वितीयाको श्रवण नक्षत्रमें प्रातःकाल उठे। पापी, पतित और म्लेच्छ आदिसे वार्तालाप न करे। फिर दोपहरमें स्नान करके धुले वस्त्र पहनकर पवित्र हो जलशायी श्रीहरिके समीप जा इस मन्त्रसे पूजन करे—
श्रीवत्सधारिञ्छ्रीकान्त श्रीधाम श्रीपतेऽव्यय।
गार्हस्थ्यं मा प्रणाशं मे यातु धर्मार्थकामदम्॥
पितरौ मा प्रणश्येतां मा प्रणश्यन्तु चाग्नयः।
तथा कलत्रसम्बन्धो देव मा मे प्रणश्यतु॥
लक्ष्म्या त्वशून्यशयनं यथा ते देव सर्वदा।
शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथा जन्मनि जन्मनि॥
‘श्रीवत्सचिह्न धारण करनेवाले लक्ष्मीकान्त! श्रीधाम! श्रीपते! अविनाशी परमेश्वर! धर्म, अर्थ एवं काम देनेवाला मेरा गार्हस्थ्य आश्रम नष्ट न हो। मेरे माता-पिता नष्ट न हों, मेरे अग्निहोत्र गृहकी अग्नि कभी न बुझे। मेरी स्त्रीसे सम्बन्धविच्छेद न हो। देव! जैसे आपका शयनगृह लक्ष्मीजीसे कभी शून्य नहीं होता, उसी प्रकार प्रत्येक जन्ममें मेरी भी शय्या धर्मपत्नीसे शून्य न रहे।’
द्विजवरो! ऐसा कहकर अर्घ्य दे अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणकी पूजा करे। इसी प्रकार भाद्रपद, आश्विन और कार्तिकमासमें भी जलशायी जगदीश्वरका पूजन करे। खारी वस्तु और नमकसे रहित अन्न भोजन करे। व्रत समाप्त होनेपर श्रेष्ठ ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक दान दे। जौ, धान्य, शय्या, वस्त्र तथा सुवर्ण दक्षिणामें दे। जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो इस प्रकार भलीभाँति व्रतका पालन करता है, उसके ऊपर जलशायी जगद्गुरु भगवान् विष्णु बहुत सन्तुष्ट होते हैं। किसी भी जन्ममें उसकी शय्या धर्मपत्नीसे शून्य नहीं होती। जानकर या अनजानमें आठ मासतक किये हुए सब पापको वह व्रत तत्काल नष्ट
* कांसं मांसं क्षुरं क्षौद्रं पुनर्भोजनमैथुने। कार्तिके वर्जयेद् यस्तु सम्पूर्णे ब्राह्मणः सदा॥
पूर्वोक्तानां च सर्वेषां नियमानां फलं लभेत्॥ (स्क० पु०, ना० ख० २१९। ३०, ३१)