भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1215

१९८६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

जुलकर वार्तालाप करके पुत्रको कर्तव्यका उपदेश दिया। इसके बाद वे अग्निमें प्रवेश करनेको तैयार हुए। इतनेमें ही स्वेच्छानुसार घूमता हुआ कोई दिव्यरूपधारी तीर्थयात्री वहाँ आ पहुँचा। उसने राजाके सम्पूर्ण नगरको व्याकुल देखकर किसीसे पूछा—'यह समस्त नगर व्याकुल क्यों है?' उसने कहा—'यहाँके राजा कुष्ठरोगसे पीड़ित हैं, अतः स्त्रीसहित अग्निमें प्रवेश कर जायँगे। इसीसे सम्पूर्ण नगरमें व्याकुलता छा रही है।'

यह सुनकर वह तीर्थयात्री शीघ्र ही राजाके समीप गया और सबको जीवनदान देता हुआ बोला—राजन्! एक तीर्थ है, जहाँ सब रोगों और व्याधियोंका नाश हो जाता है। उसके रहते हुए आप अग्निमें प्रवेश न करें। भूपाल! जैसा आज आपका शरीर है, ऐसा ही पहले मेरा भी था। रविवार और सप्तमीका योग आनेपर जो रोगी मनुष्य सूर्योदयके समय उस तीर्थमें स्नान करता है, वह क्षणभरमें सब रोगों और पापोंसे मुक्त हो दिव्य शरीर पा लेता है—उसका काया-कल्प हो जाता है।

राजाने पूछा—ऐसा तीर्थ किस देशमें है? शीघ्र बतलाओ।

कार्पटिक (तीर्थयात्री) बोला—इस भूतलपर नगर नामसे प्रसिद्ध उत्तम क्षेत्र है। वहाँ भगवान् जलशायीके पश्चिम और उत्तर दिशामें विश्वामित्रजीका परम पुण्यमय तीर्थ है। वहाँ जाकर तुम भी रविवार और सप्तमीके योगमें स्नान करो, जिससे तुम्हारा रोग और पातक नष्ट हो जाय।

यह सुनकर राजा धन्वन्तरि उस तीर्थयात्रीके साथ शीघ्र उक्त तीर्थमें गये और वहाँ माघ मासकी सप्तमी एवं रविवारके योगमें स्नान किया। स्नान करते ही वे तत्काल कुष्ठरोगसे मुक्त हो गये और उनका शरीर दिव्य हो गया। तत्पश्चात् उन्होंने उस तीर्थयात्रीसे कहा—'भैया! तुम्हारे ही प्रसादसे मैं इस भयंकर रोगसे छुटकारा पा सका हूँ; अब तुम अपने घर जाओ, मैं यहीं झरनेके समीप स्त्रीसहित रहकर तपस्या करूँगा। राज्यसिंहासनपर अपने पुत्रको बिठा दिया है। वह राज्य शासन करनेमें पूर्णतः समर्थ है।' ऐसा कहकर राजाने उस तीर्थयात्रीको तथा अन्यान्य सेवकोंको अपने-अपने घर भेज दिया और स्वयं अपनी स्त्रियोंसहित सुन्दर आश्रम बनाकर रहने लगे। समयानुसार तपस्यासे उन्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई। तत्पश्चात् वह तीर्थ उन्हींके नामसे तीनों लोकोंमें विख्यात हुआ। वह सब रोगोंका नाश करनेवाला, सुन्दर तथा समस्त पापोंका नाशक है। महात्मा राजाने वहाँ देवाधिदेव भगवान् सूर्यकी भी स्थापना की थी, जो रत्नादित्यके नामसे विख्यात हुए। जो मनुष्य रविवार और सप्तमीके योगमें वहाँ स्नान करके रत्नादित्यका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो सूर्यलोकमें जाता है।

विप्रवरो! हाटकेश्वरक्षेत्रके समीप किसी गाँवमें कोई पुरुष रहता था, जो बूढ़ा और कोढ़ी था। फिर भी वह सदा दूसरोंके पशुओंको चराता और उनका पालन किया करता था। एक समयकी बात है, एक पशु घासके लोभसे रास्ता छोड़कर पर्वतके नीचे चला गया और उस तीर्थके जलमें गिर पड़ा। उस दिन रविवार और सप्तमी तिथिका योग था। उस बूढ़ेने जाते हुए पशुको नहीं देखा। जब वह भोजन करनेके लिये अपने घर गया, तब उस पशुका स्वामी उसे फटकारता हुआ आया और बोला—'आज मेरा वह पशु घर क्यों नहीं आया? शीघ्र जाकर उसे ले आ नहीं तो तेरे प्राण ले लूँगा।'

यह सुनकर वह कोढ़ी भयसे थर-थर काँपता हुआ शीघ्र उस स्थानपर गया। रातकी अँधेरी छायी हुई थी। उसने दूरसे महाकुण्डमें गिरे हुए पशुका आर्तनाद सुना। तब उस गर्तमें पहुँचकर उसने बड़े कष्टसे उस पशुको खींचकर कीचसे बाहर निकाला। फिर उसे साथ ले धीरे-धीरे घरको लौटा और उसके स्वामीको पशु सौंपकर