भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1216
* नागरखण्ड-उत्तरार्ध *१९८७

अपनी झोंपड़ीमें गया। रातको तो वह सो गया। सबेरे उठनेपर उस बड़भागी पुरुषने जब अपने शरीरपर दृष्टिपात किया, तब उसे कुष्ठरोगसे रहित तथा उत्तम शोभासे सम्पन्न देखा। फिर उसने आश्चर्यमें पड़कर सोचा, यह क्या है, रोगका नाश कैसे हो गया? निस्सन्देह, यह उसी तीर्थके जलका प्रभाव है, जिसमें मैंने पशुको निकालनेके लिये प्रवेश किया था। तब वह उस उत्तम तीर्थमें जाकर भगवान् सूर्यका ध्यान करता हुआ तपस्या करने लगा। अन्तमें उसने देवदुर्लभ सिद्धि प्राप्त कर ली। इसलिये पूर्णतः प्रयत्न करके वहाँ स्नान और भगवान् सूर्यदेवकी पूजा करे। आजके कलिकालमें भी जो मनुष्य रविवार और सप्तमीका योग आनेपर उस पुण्य जलाशयमें स्नान करता है और भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यको पूजता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो वहाँ सूर्यदेवके सम्मुख आठ हजार गायत्रीका जप करता है, वह समस्त रोगों और पापोंसे छूट जाता है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक भगवान् सूर्यकी प्रसन्नताके लिये वहाँ गोदान करता है, उसकी तो बात ही क्या है। उसके वंशमें भी कोई रोग-व्याधिसे ग्रस्त नहीं होता।


श्राद्धकल्प

सूतजी कहते हैं—उस तीर्थमें विश्वामित्रजीके द्वारा स्थापित गणेशजी भी हैं, जो मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाले हैं। जो माघमासके शुक्ल पक्षकी चतुर्थी तिथिको उनकी पूजा करता है, वह एक वर्षतक सब प्रकारके विघ्नोंसे छुटकारा पा जाता है।

एक समय महामुनि मार्कण्डेयजी राजा रोहिताश्वके यहाँ पधारे और यथायोग्य सत्कार ग्रहण करनेके बाद उन्हें कथा सुनाने लगे। कथाके अन्तमें राजा रोहिताश्वने कहा—'भगवन्! मैं श्राद्धकल्पका यथार्थरूपसे श्रवण करना चाहता हूँ।'

मार्कण्डेयजी बोले—राजन्! यही बात आनर्त्तनरेशने भर्तृयज्ञसे पूछी थी। वही प्रसंग सुनाता हूँ।

आनर्त्तने पूछा—ब्रह्मन्! श्राद्धके लिये कौन-सा समय विहित है? श्राद्धोपयोगी द्रव्य कौन हैं? श्राद्धके लिये कौन-कौन-सी वस्तुएँ पवित्र मानी गयी हैं? कैसे ब्राह्मण श्राद्धकर्ममें सम्मिलित करने योग्य हैं और कैसे ब्राह्मण त्याज्य माने गये हैं?

भर्तृयज्ञने कहा—राजन्! विद्वान् पुरुषको अमावास्याके दिन अवश्य श्राद्ध करना चाहिये। क्षुधासे क्षीण हुए पितर श्राद्धान्नकी आशासे अमावास्या तिथिके आनेकी प्रतीक्षा करते रहते हैं। जो अमावास्या तिथिको जल या शाकसे भी श्राद्ध करता है, उसके पितर तृप्त होते हैं और उसके समस्त पातकोंका नाश हो जाता है।

आनर्त्तने पूछा—ब्रह्मन्! विशेषतः अमावास्याको श्राद्ध करनेका विधान क्यों है? मरे हुए जीव तो अपने कर्मानुसार शुभाशुभ गतिको प्राप्त होते हैं; फिर श्राद्धकालमें वे अपने पुत्रके घर कैसे पहुँच पाते हैं?

भर्तृयज्ञने कहा—महाराज! जो लोग यहाँ मरते हैं, उनमेंसे कितने ही इस लोकमें जन्म ग्रहण करते हैं, कितने ही पुण्यात्मा स्वर्गलोकमें स्थित होते हैं और कितने ही पापात्मा जीव यमलोकके निवासी हो जाते हैं। कुछ जीव भोगानुकूल शरीर धारण करके अपने किये हुए शुभ या अशुभ कर्मका उपभोग करते हैं। राजन्! यमलोक या स्वर्गलोकमें रहनेवाले पितरोंको भी तबतक भूख-प्यास अधिक होती है, जबतक कि वे माता या पितासे तीन पीढ़ीके अन्तर्गत रहते हैं—जबतक वे श्राद्धकर्ता पुरुषके—मातामह, प्रमातामह या वृद्धप्रमातामह एवं पिता, पितामह या प्रपितामह पदपर रहते हैं, तबतक श्राद्धभाग ग्रहण करनेके लिये उनमें भूख-प्यासकी अधिकता