संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९८८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
होती है। पितृलोक या देवलोकके पितर तो श्राद्धकालमें सूक्ष्म शरीरसे आकर श्राद्धीय ब्राह्मणोंके शरीरमें स्थित होकर श्राद्धभाग ग्रहण करते हैं; परंतु जो पितर कहीं शुभाशुभ भोगमें स्थित हैं या जन्म ले चुके हैं, उनका भाग दिव्य पितर आकर ग्रहण करते हैं और जीव जहाँ जिस शरीरमें होता है—वहाँ तदनुकूल भोगकी प्राप्ति कराकर उसे तृप्ति पहुँचाते हैं। ये दिव्य पितर नित्य एवं सर्वज्ञ होते हैं। पितरोंके उद्देश्यसे सदा ही अन्न और जलका दान करते रहना चाहिये। जो नीच मानव पितरोंके लिये अन्न और जल न देकर आप ही भोजन करता या जल पीता है, वह पितरोंका द्रोही है। उसके पितर स्वर्गमें अन्न और जल नहीं पाते हैं। इसलिये शक्तिके अनुसार अन्न और जल उनके लिये अवश्य देने चाहिये। श्राद्धद्वारा तृप्त किये हुए पितर मनुष्यको मनोवांछित भोग प्रदान करते हैं।
श्राद्धकी आवश्यकता तथा समय
आनर्त्तनरेशने पूछा—ब्रह्मन्! श्राद्धके लिये और भी तो नाना प्रकारके पवित्रतम काल हैं; फिर अमावास्याको ही विशेषरूपसे श्राद्ध करनेकी बात क्यों कही गयी है?
भर्तृयज्ञने कहा—महाराज! यह सत्य है कि श्राद्धके योग्य और भी बहुत-से समय हैं। मन्वादि तिथि, युगादि तिथि, संक्रान्तिकाल, व्यतीपात, गजच्छाया, चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहण—इन सभी समयोंमें पितरोंकी तृप्तिके लिये श्राद्ध करना चाहिये। पुण्यतीर्थ, पुण्यमन्दिर, श्राद्धयोग्य ब्राह्मण तथा श्राद्धके योग्य उत्तम पदार्थ प्राप्त होनेपर बुद्धिमान् पुरुषोंको बिना पर्वके भी श्राद्ध करना चाहिये। अमावास्याको जो विशेषरूपसे श्राद्ध करनेका आदेश दिया गया है, इसका कारण बताता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। सूर्यकी सहस्रों किरणोंमें जो सबसे प्रमुख है, उसीका नाम 'अमा' है; उस 'अमा' नामक प्रधान किरणके ही तेजसे सूर्यदेव तीनों लोकोंको प्रकाशित करते हैं। उसी अमामें तिथिविशेषको चन्द्रदेव निवास करते हैं, इसलिये उसका नाम 'अमावास्या' है। यही कारण है कि अमावास्या प्रत्येक धर्मकार्यके लिये अक्षय फल देनेवाली बतायी गयी है। श्राद्धकर्ममें तो इसका विशेष महत्त्व है ही। अग्निष्वात्त, बर्हिषद, आज्यप, सोमप, रश्मिप, उपहूत, आयन्तुन, श्राद्धभुक् तथा नान्दीमुख—ये नौ दिव्य पितर बताये गये हैं। आदित्य, वसु, रुद्र तथा दोनों अश्विनीकुमार भी केवल नान्दीमुख पितरोंको छोड़कर शेष सभीको तृप्त करते हैं। ये पितृगण ब्रह्माजीके समान बताये गये हैं; अतः पद्मयोनि ब्रह्माजी उन्हें तृप्त करनेके पश्चात् सृष्टिकार्य प्रारम्भ करते हैं।
इनके सिवा, दूसरे भी ऐसे मर्त्य-पितर होते हैं, जो स्वर्गलोकमें निवास करते हैं। वे दो प्रकारके देखे जाते हैं; एक तो सुखी हैं और दूसरे दुःखी। मर्त्यलोकमें रहनेवाले वंशज जिनके लिये श्राद्ध करते और दान देते हैं, वे सभी वहाँ हर्षमें भरकर देवताओंके समान प्रसन्न होते हैं। जिनके लिये उनके वंशज कुछ भी दान नहीं करते, वे भूख-प्याससे व्याकुल और दुःखी देखे जाते हैं। एक समयकी बात है, अग्निष्वात्त आदि सभी पितर देवराज इन्द्रके पास गये। महाराज! इन्द्रने उन्हें आया देख सम्पूर्ण देवताओंके साथ भक्तिपूर्वक उनका पूजन किया। इसके बाद जब वे देवदुर्लभ पितृलोकको जाने लगे, तब क्षुधा-पिपासासे पीड़ित रहनेवाले मर्त्य पितरोंने दिव्य स्तोत्रोंसे, पितृसूक्तके मन्त्रोंसे तथा पितरोंको सन्तुष्ट करनेवाले अन्यान्य वैदिक स्तोत्रोंसे उन सबकी स्तुति करके दीनतापूर्ण वचनोंद्वारा उन्हें प्रसन्न किया। तब वे दिव्य पितर प्रसन्न होकर उनसे बोले—'सुव्रतो! हम सब तुम लोगोंपर प्रसन्न हैं, बोलो तुम क्या चाहते हो?'