संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1218, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११८९
मर्त्य पितर बोले—दिव्य पितृगण! हम मनुष्योंके पितर हैं। अपने कर्मोंद्वारा मर्त्यलोकसे स्वर्गमें आकर देवताओंके साथ निवास करते हैं। परंतु यहाँ हमें अत्यन्त भयंकर भूख और प्यासका कष्ट होता है। जान पड़ता है, हम आगमें जल रहे हैं। यहाँके नन्दन आदि वनोंमें बड़े सुन्दर-सुन्दर वृक्ष हैं। सबमें फल लगे हुए हैं, परंतु उन फलोंको जब हम हाथमें लेते हैं और यलपूर्वक जोर-जोरसे खींचते हैं तो भी वे डालीसे टूटकर अलग नहीं होते। प्याससे पीड़ित होकर यदि हम देवनदी गंगाका जल हाथमें उठाते हैं और पीते हैं, तब हमारे हाथमें उस जलका स्पर्श ही नहीं होता। इस स्वर्गलोकमें कोई खाता-पीता नहीं दिखायी देता। अतः यहाँका निवास हमारे लिये अत्यन्त भयंकर हो गया है। यहाँ जो देवता और गुह्यक आदि हैं, वे सब विमानमें बैठे हुए प्रसन्नचित्त दिखायी देते हैं। इन्हें भूख-प्यासका कष्ट नहीं है। ये अनेक प्रकारके भोगोंसे सम्पन्न हैं। क्या हम सब लोग भी कभी ऐसे हो सकेंगे? भूख-प्यासके कष्टसे रहित हो परम सन्तोष पा सकेंगे?
दिव्य पितरोंने कहा—इन्द्र आदि केवल दूसरे-दूसरे कार्योंमें व्यग्र होकर जब हमारे लिये श्राद्ध नहीं करते, दान नहीं देते, तब हमलोगोंकी भी ऐसी ही कष्टपूर्ण दशा हो जाती है। उस समय हम वहाँसे आकर देवताओंसे कहते हैं, प्रार्थना करते हैं। उसके बाद जब ये लोग श्राद्ध-तर्पणद्वारा हमें तृप्त करते हैं, तब हमें तृप्ति प्राप्त होती है। इसी प्रकार तुम लोगोंके जो वंशज एकाग्रचित्त हो तुम्हारे लिये श्राद्धका दान देते हैं, उससे तुमलोग भी क्यों नहीं तृप्त होओगे? अब प्रमादी वंशज पितरोंका तर्पण नहीं करते, तब उनके पितर स्वर्गमें रहनेपर भी भूख-प्याससे व्याकुल हो जाते हैं; फिर जो यम लोकमें पड़े हैं, उनके कष्टका तो कहना ही क्या है?
इतना कहकर दिव्य पितरोंने मर्त्य पितरोंको साथ ले ब्रह्माजीके समीप गमन किया और उनकी तथा अपनी शाश्वत तृप्तिके लिये उपाय पूछा। तब ब्रह्माजीने कहा—'पितरो! यदि मनुष्य पिता, पितामह और प्रपितामहके उद्देश्यसे तथा मातामह, प्रमातामह और वृद्धप्रमातामहके उद्देश्यसे श्राद्ध-तर्पण करेंगे तो उतनेसे ही उनके पिता और मातामहसे लेकर मुझतक सभी पितर तृप्त हो जायँगे। जिस अन्नसे मनुष्य अपने पितरोंकी तुष्टिके लिये श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त करेगा और उसीसे भक्तिपूर्वक पितरोंके निमित्त पिण्डदान भी देगा, उससे तुम्हें सनातन तृप्ति प्राप्त होगी। अमावस्याके दिन वंशजोंद्वारा श्राद्ध और पिण्ड पाकर पितरोंको एक मासतक तृप्ति बनी रहेगी। सूर्यदेवके कन्याराशिपर स्थित रहते समय आश्विन कृष्णपक्ष (पितृपक्ष या महालय)-में जो मनुष्य मृत्यु-तिथिपर पितरोंके लिये श्राद्ध करेंगे, उनके उस श्राद्धसे पितरोंको एक वर्षतक तृप्ति बनी रहेगी। उस समय शाकके द्वारा भी जो तुम्हारा श्राद्ध नहीं करेगा, वह धनहीन चाण्डाल होगा। जो मनुष्य उसके साथ बैठना, सोना, खाना, पीना, छूना-छुलाना अथवा वार्तालाप आदि व्यवहार करेंगे, वे भी महापापी माने जायँगे। उनके सन्तानकी वृद्धि नहीं होगी। किसी प्रकार भी उन्हें सुख और धन-धान्यकी प्राप्ति नहीं होगी। यदि मनुष्य गयाशीर्षमें जाकर एक बार भी श्राद्ध कर देंगे तो उसके प्रभावसे तुम सभी पितर सदाके लिये तृप्त हो जाओगे।'
भर्तृयज्ञ कहते हैं—राजन् ! ऐसा जानकर विज्ञ पुरुषको चाहिये कि पितरोंको तृप्त करनेकी इच्छा रखकर वह उक्त समयोंमें श्राद्ध अवश्य करे। इहलोक और परलोकमें उसकी उन्नति चाहनेवाले पुरुषको विशेषतः गयाशीर्षमें जाकर श्राद्ध करना चाहिये। जो मनुष्य अमावस्याके दिन श्राद्ध नहीं करता, उसके पितर भूख-प्याससे पीड़ित हो बहुत दुःखी होते हैं। मन-ही-मन तृप्तिकी अभिलाषा रखकर वे प्रेतपक्षकी प्रतीक्षा करते