संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९९० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
रहते हैं, ठीक उसी तरह जैसे किसानलोग रात-दिन वर्षाकी राह देखते हैं। पितृपक्ष बीत जानेपर भी जब उन्हें श्राद्धका अन्न नहीं मिलता, तब वे जबतक कन्या राशिपर सूर्य रहते हैं, तबतक अपनी सन्तानोंद्वारा किये हुए श्राद्धकी प्रतीक्षा करते हैं। उसके भी बीत जानेपर कुछ पितर तुलाराशिके सूर्यतक पूरे कार्तिकमासमें अपने वंशजोंद्वारा किये जानेवाले श्राद्धकी राह देखते हैं। जब सूर्यदेव वृश्चिक राशिपर चले जाते हैं, तब वे पितर दीन एवं निराश होकर अपने स्थानपर लौट जाते हैं। राजन् ! इस प्रकार पूरे दो मासतक भूख-प्याससे व्याकुल पितर वायुरूपमें आकर घरके दरवाजोंपर खड़े रहते हैं। अतः जबतक कन्या और तुलापर सूर्य रहते हैं, तबतक तथा अमावस्याके दिन सदा पितरोंके लिये श्राद्ध करना चाहिये। विशेषतः तिल और जलकी अंजलि देनी चाहिये। कन्या और तुलामें श्राद्ध न हो तो अमावास्याको अवश्य करे। वह भी न हो तो एक बार गयाजीमें आकर श्राद्ध कर दे, जिससे नित्य श्राद्धका फल प्राप्त होता है।
श्राद्धकी विधि, विहित और निषिद्ध ब्राह्मण तथा मन्वादि एवं युगादि पुण्यतिथियोंका वर्णन
आनर्त्तने पूछा—मुनीश्वर! सब मनुष्योंको किस विधिसे श्राद्ध करना चाहिये?
भर्तृयज्ञने कहा—उत्तम कर्मोंद्वारा उपार्जित धनसे पितरोंका श्राद्ध करना उचित है। छल, कपट, चोरी और ठगीसे कमाये हुए धनसे कदापि श्राद्ध न करे। अपनी वर्णोचित वृत्तिके द्वारा उपार्जित धनसे श्राद्धके लिये सामग्री एकत्र करे। पहले सन्ध्याकाल आनेपर काम-क्रोधसे रहित एवं पवित्र हो श्राद्धकर्मके योग्य श्रेष्ठ ब्रह्मचर्यपरायण ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। उनके अभावमें ब्रह्मज्ञानपरायण, अग्निहोत्री, वेदविद्यामें निपुण गृहस्थ ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे। जिनका कोई अंग विकल न हो, जो नीरोग, आहारपर संयम रखनेवाले तथा पवित्र हों, ऐसे ब्राह्मण श्राद्धके योग्य बताये गये हैं।
जो किसी अंगसे हीन हों या जिनका कोई अंग अधिक हो, जो सर्वभक्षी हों, निकाले गये हों, जिनके दाँत काले हों अथवा जिनके दाँत गिर गये हों, जो वेद बेचनेवाले और यज्ञवेदीको नष्ट करनेवाले हों, जिनमें वेद-शास्त्रोंका ज्ञान न हो, जिनके नख खराब हो गये हों, जो रोगी, निर्धन, दूसरोंकी हिंसा करनेवाले, दूसरे लोगोंपर लांछन लगानेवाले, नास्तिक, नाचनेवाले, सूदखोर, बुरे कर्मोंमें संलग्न, शौचाचारसे शून्य, अत्यन्त लंबे, अति दुर्बल, बहुत मोटे, अधिक रोमवाले तथा रोमरहित हों, ऐसे ब्राह्मणोंको श्राद्धमें त्याग दे। जो पितरोंका गौरव रखना चाहे, उसे ऐसा अवश्य करना चाहिये। जो परायी स्त्रीमें आसक्त, शूद्रजातीय स्त्रीसे सम्पर्क रखनेवाले, नपुंसक, मलिन, चोर, क्षत्रिय तथा वैश्यकी वृत्तिवाले, माता-पिताका त्याग करनेवाले, गुरुस्त्रीगामी, निर्दोष पत्नीको छोड़नेवाले, कृतघ्न, खेती करनेवाले, शिल्पसे जीविका चलानेवाले, भाला बेचकर या भाला चलाकर जीनेवाले, चमड़ेके व्यापारसे जीवन-निर्वाह करनेवाले तथा अज्ञात कुलवाले हों, ऐसे ब्राह्मणोंको भी श्राद्धमें त्याग देना चाहिये।
अब उन ब्राह्मणोंका परिचय देता हूँ, जो श्राद्धकार्यमें प्रशस्त माने गये हैं। त्रिणाचिकेत (नाचिकेत नामक विविध अग्निका सेवन करनेवाले), 'मधुवाता' आदि तीन ऋचाओंका जप करनेवाले, छहों अंगोंके ज्ञाता, त्रिसुपर्ण नामक ऋचाओंका पाठ करनेवाले, विद्या एवं व्रतको पूर्ण करके जो स्नातक हो चुके हों वे, धर्मद्रोण (धर्मशास्त्र)-के पाठक, पुराणवेत्ता, ज्ञानी, ज्येष्ठसामके ज्ञाता, अथर्वशीर्षके विद्वान्, ऋतुकालमें