भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1220
  • नागरखण्ड-उत्तरार्ध * १११९

अपनी पत्नीके साथ सहवास करनेवाले, उत्तम कर्मपरायण, सद्यःप्रक्षालक (तत्काल पात्र धो डालनेवाले अर्थात् एक ही समयके लिये अन्न संग्रह करनेवाले), शुक्ल (गौर वर्ण अथवा शुक्ल जातीय), पुत्रीके पुत्र, दामाद, भानजे, परोपकारी, मिष्टान्न खाने और पचानेमें समर्थ, मीठे वचन बोलनेवाले, एवं सदा जपमें तत्पर रहनेवाले—ये सभी ब्राह्मण पंक्तिपावन (पंगतको पवित्र करनेवाले) जानने चाहिये। ये पितरोंकी तृप्ति करते हैं। इसलिये थोड़ी विद्यावाले होनेपर भी कुल और आचारमें जो श्रेष्ठ हों, उन्हींको श्राद्धमें नियुक्त करना चाहिये।

इस प्रकार ब्राह्मणोंका ज्ञान करके सव्यभावसे उनके चरणोंका स्पर्श करते हुए प्रणाम करे और विश्वेदेव श्राद्धके लिये दो ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे। दाहिना घुटना पृथ्वीपर टेककर इस मन्त्रका उच्चारण करे—

आगच्छन्तु महाभागा विश्वेदेवा महाबलाः।
भक्त्याह्वता मया चैव त्वं चापि व्रतभागभव ॥

‘मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक बुलाये हुए परम सौभाग्यशाली महाबली विश्वेदेवगण इस श्राद्धकर्ममें पधारें और हे ब्राह्मणदेव! आप भी व्रतके भागी, क्रोधरहित, शौचपरायण तथा ब्रह्मचर्यपालक हों।’

तत्पश्चात् अपसव्यभावसे पितरोंके लिये तथा मातामह आदिके लिये भी ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। फिर पितृभक्त पुरुष श्रद्धासे ब्राह्मणका चरण-स्पर्श करके कहे—‘विप्रवर! इस श्राद्धकर्ममें मेरे पिता, पितामह तथा प्रपितामह आपमें स्थित होकर पधारें और आप भी ब्रह्मचर्य आदि व्रतका पालन करें।’

इस प्रकार पितरों और मातामह आदिका भी आवाहन करके घर आवे। निमन्त्रित ब्राह्मणोंको उस दिन विशेष संयमसे रहना चाहिये। यजमान भी शान्तचित्त एवं ब्रह्मचर्यसे युक्त रहे। वह रात बीत जानेपर प्रातःकाल शयनसे उठकर मनुष्य दिनभर किसीपर क्रोध न करे। उस दिन स्वाध्याय बंद रखे और कोई कुत्सित कर्म अपने द्वारा न होने दे। तेल लगाना, परिश्रम करना, सवारी या वाहन आदिको दूरसे ही त्याग दे।

तदनन्तर जब दोपहर बीतनेपर 'कुतप' संज्ञक मुहूर्त आवे, उस समय स्नान करके श्वेत वस्त्र धारणकर देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेके पश्चात् निमन्त्रित ब्राह्मणोंको भी संतुष्ट करे। उसके बाद उन्हें बुलाकर श्राद्ध प्रारम्भ करे। पवित्र, सुन्दर, एकान्त गृहमें, जिसमें दक्षिण दिशाकी भूमि कुछ नीची हो, जहाँ पापी क्रूरकर्मी मनुष्योंकी दृष्टि न पड़े, श्राद्ध करना चाहिये। जिस श्राद्धको रजस्वला स्त्री देख लेती है अथवा जिसपर किसी पतित मनुष्य या सूअरकी दृष्टि पड़ जाती है, वह व्यर्थ हो जाता है। जिसमें बासी अन्न, तेलका बना हुआ पदार्थ अथवा केश आदिसे दूषित भोजन परोसा जाय, वह श्राद्ध भी व्यर्थ हो जाता है। जिस श्राद्धमें अन्नका बलिवैश्वदेवके अनुसार यथायोग्य विभाग न किया गया हो, मौनव्रतका पालन न हुआ हो अथवा दक्षिणा न दी गयी हो, वह श्राद्ध भी व्यर्थ हो जाता है। जहाँ घरघराहटकी ध्वनि, ओखलीके कूटनेका शब्द अथवा सूपके फटकनेकी आवाज होती हो, वह श्राद्ध भी व्यर्थ हो जाता है। जिस श्राद्धमें रसोई तैयार करते समय कलह होता है, विशेषतः पंक्तिभेद किया जाता है, जहाँ ब्राह्मण और यजमान ब्रह्मचर्यका पालन किये बिना ही भोजन करता तथा दान देता है, वह श्राद्ध भी सफल नहीं होता।

जिन तिथियोंमें श्रद्धापूर्ण हृदयसे स्नान करके पितरोंके लिये दिया हुआ तिलमिश्रित जल भी उनके लिये अक्षय तृप्तिका साधक होता है, उनका वर्णन करता हूँ—आश्विन शुक्ला नवमी, कार्तिककी द्वादशी, माघ तथा भादोंकी तृतीया, फाल्गुनकी अमावास्या, पौषकी एकादशी, आषाढ़की दशमी, माघकी सप्तमी, श्रावण कृष्णा अष्टमी, आषाढ़, कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठ मासकी पूर्णिमाएँ—ये मन्वादि तिथियाँ कही गयी हैं।