संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
इनमें स्नान करके जो मनुष्य पितरोंके उद्देश्यसे तिल और कुशमिश्रित जल भी देता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। कार्तिक शुक्ला नवमी तथा वैशाख शुक्ला तृतीया, माघकी अमावास्या और श्रावणकी तृतीया—ये क्रमशः सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुगकी आदि तिथियाँ हैं। ये स्नान, दान, जप, होम और पितृतर्पण आदि करनेपर अक्षय पुण्य उत्पन्न करनेवाली और महान् फल देनेवाली होती हैं। जब सूर्य मेषराशि अथवा तुलाराशिपर जाते हैं, उस समय अक्षय पुण्यदायक 'विषुव' नामक योग होता है *। जिस समय सूर्य मकर और कर्क राशिपर जाते हैं, उस समय 'अयन' नामक काल होता है। सूर्यका एक राशिसे दूसरीपर जाना 'संक्रान्ति' कहलाता है। ये सब स्नान, दान, जप और होम आदिका महान् फल देनेवाले हैं। इस प्रकार संक्रान्ति और युगादि तिथियोंका वर्णन किया गया। इनमें दी हुई वस्तुका पुण्य अक्षय होता है।
श्राद्धकर्ता और श्राद्धभोक्ताके लिये नियम, एकोद्दिष्ट और सपिण्डीकरणके विषयमें कुछ ज्ञातव्य बातोंका निर्देश
भर्तृयज्ञ कहते हैं—राजन्! ब्राह्मणके चरणका जल जो भूमिपर गिरता है, उससे उन सगोत्र पुरुषोंकी तृप्ति होती है, जो पुत्रहीन रहकर मृत्युको प्राप्त हुए हैं। जबतक घरकी भूमि ब्राह्मणके चरणोदकसे भीगी रहती है, तबतक पितृगण पुष्कर-पात्रोंमें जल पीते हैं। श्राद्ध करते समय पृथ्वीपर जो कुछ भी पुष्प, गन्ध, जल और अन्न गिरता है, उससे पशु, पक्षी, सर्प, कृमि और कीट-योनिमें पड़े हुए पूर्वज परम तृप्तिको प्राप्त होते हैं। अपने कुलमें उत्पन्न हुए जो पुरुष अपमृत्युसे मरे हैं अथवा जो प्रेतभावको प्राप्त हुए पूर्वज हैं, वे ब्राह्मणोंके उच्छिष्ट पात्र धोनेसे गिरी हुई जूठनसे तृप्त होते हैं। जो संस्कारहीन होकर मरे हैं अथवा जो कुलवती स्त्रियोंका त्याग करनेवाले हैं, उन उच्छिष्टभागी पुरुषोंके लिये वह अन्न है, जो कुशोंपर बिखेरा जाता है। उसे विकरान्न कहते हैं। विकरान्न देनेसे वे सब-के-सब तृप्त होते हैं। श्राद्धकर्ममें जो मन्त्र, काल और विधि आदिकी त्रुटि रह जाती है, उसकी पूर्ति पर्याप्त दक्षिणा देनेसे होती है। अतः विद्वान् पुरुषको दक्षिणारहित श्राद्ध कदापि नहीं करना चाहिये। श्राद्धसम्बन्धी दान देकर श्राद्धकर्ताको और श्राद्धान्न भोजन करके ब्राह्मणको न तो स्वाध्याय करना चाहिये और न दूसरे ग्राममें ही जाना चाहिये। जो श्राद्धान्न भोजन करनेवाला तथा श्राद्धकर्ता मनुष्य मैथुनका सेवन करता है, उसके पितर एक वर्षतक वीर्य भोजन करते हैं। इसमें संदेह नहीं है। जो अधम मनुष्य श्राद्ध करके अथवा श्राद्धान्न भोजन करके दूसरे ग्राममें जाता है, उसका वह श्राद्ध व्यर्थ हो जाता है। श्राद्धका निमन्त्रण आनेपर ब्राह्मणको अपने घर भोजन नहीं करना चाहिये। जो मोहवश भोजन कर लेता है, वह अधोगतिको प्राप्त होता है। यजमानको भी श्राद्ध करके दोबारा भोजन नहीं करना चाहिये। जो दोबारा भोजन कर लेते हैं, वे निश्चय ही नरकमें जाते हैं। जो श्राद्ध-भोजन अथवा श्राद्ध-दान करके युद्ध या कलह करता है, वह उस सम्पूर्ण श्राद्धको व्यर्थ कर देता है।
कमलयोनि ब्रह्माजीने श्राद्धके योग्य ब्राह्मणोंको निश्चय करते समय दौहित्रों (धेवतों)-को प्रथम स्थान दिया है। अतः दौहित्र यदि पवित्रतासे रहित, हीनांग अथवा अधिकांग भी हो तो पितरोंके संतोषके लिये उसे श्राद्धमें अवश्य सम्मिलित करे। ब्रह्माजीने पशुओंकी सृष्टि करते समय सबसे पहले गौओंको रचा है; अतः श्राद्धमें
* यदा स्यान्मेषगो भानुस्तुलां वाथ यदा व्रजेत्। तदा स्याद् विषुवाख्यस्तु कालः पुण्यप्रदायकः॥
(स्क० पु०, ना० उ० २०७)