भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1222
  • नागरखण्ड-उत्तरार्ध * ११९३ उन्हींका दूध और घी उत्तम माना गया है। विधाताने मानवप्रजाकी सृष्टि करते समय सबसे पहले श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उत्पन्न किया था, इसलिये वे श्राद्धमें उत्तम एवं पितरोंकी तृप्ति करनेवाले माने गये हैं। देवताओंकी सृष्टि करते समय ब्रह्माजीने सबसे पहले विश्वेदेवोंको बनाया है। अतः श्राद्धकर्म आरम्भ होनेपर पहले उन्हींकी पूजा की जाती है। वे विधिपूर्वक तृप्त किये जाने और प्रथम पूजित होनेपर श्राद्धमें जो छिद्र (दोष) उत्पन्न होते हैं, उनका नाश कर देते हैं। जो मनुष्य इन सब वस्तुओंसे सांगोपांग श्राद्धका अनुष्ठान करता है, उसका वह श्राद्ध घरमें ही गयाश्राद्धके समान फल देता है। शास्त्रोक्त विधिसे श्राद्ध सम्पन्न हो जानेपर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर श्राद्धकर्ता पुरुष स्वयं भी सबके अन्तमें मौन भावसे भोजन करे। श्राद्धान्नका भोजन दिनमें ही हो जाना चाहिये। जो श्राद्धकर्ता पुरुष सूर्यास्त होनेपर भोजन करता है, उसका वह श्राद्ध व्यर्थ हो जाता है। अतः रातमें भोजन नहीं करना चाहिये। आनर्तने कहा - महामते! अब आप एकोद्दिष्ट श्राद्धकी विधि बताइये और पार्वणका भी जैसा विधान कहा गया है, उसका वर्णन कीजिये। भर्तृयज्ञ बोले - अस्थिसंचयनके पहले तीन श्राद्ध बताये गये हैं। जिस स्थानपर मृत्यु हुई हो, वहाँ एक श्राद्ध करे। फिर मार्गमें जहाँ विश्राम कराया गया हो, वहाँ एक श्राद्ध करना चाहिये। तत्पश्चात् अस्थिसंचयनके स्थानपर तृतीय श्राद्ध करना उचित है। इसके सिवा, मृत्युके प्रथम, तृतीय, पंचम, सप्तम, नवम तथा ग्यारहवें दिन भी एक-एक श्राद्ध किया जाता है। इस प्रकार सब मिलकर नौ श्राद्ध होते हैं। वैतरणी-दानकी प्राप्ति होनेपर प्रेत तृप्त होता है। एकोद्दिष्ट श्राद्ध विश्वेदेवसे रहित होता है। उसमें अग्निकरणकी क्रिया भी नहीं की जाती। एकोद्दिष्ट बिना आवाहनके ही करना चाहिये। एक बार 'तृप्तोऽसि ? स्वदितम् ?' 'क्या आप तृप्त हो गये? भोजन स्वादिष्ट लगा है न ?' इत्यादि रूपसे तृप्तिविषयक प्रश्न करना चाहिये। फिर 'अभिरम्यताम्' कहकर ब्राह्मणका विसर्जन करना चाहिये। जिसका अग्रभाग कटा या फटा न हो, ऐसे कुश-पत्रको बीचसे काटकर दो तृणके रूपमें कर ले और उसीको पवित्री बनावे। एकोद्दिष्टमें ऐसी ही पवित्री बनानेका विधान है। आसन आदिके अर्पण करते समय सर्वत्र 'पितः' इस प्रकार संबोधनान्त उच्चारण करना चाहिये। तर्पणमें 'पिता' (तृप्यताम्)- का (पितृ शब्दके प्रथमान्तरूपका) प्रयोग करना चाहिये। संकल्प-वाक्यमें 'पित्रे' (इस प्रकार चतुर्थ्यन्त रूप) - का उच्चारण करना चाहिये और अक्षय्योदक दिलाते समय 'पितुः' इस षष्ठ्यन्त रूपका प्रयोग करना उचित है। इसी प्रकार जहाँ 'पितः' का प्रयोग होता है, ऐसे स्थलोंमें सर्वत्र 'अमुक गोत्र' इस प्रकार स्वरान्त (संबोधनान्त) उच्चारण करना चाहिये। तर्पणमें 'गोत्रः' का, संकल्पवाक्यमें 'गोत्राय' का और अक्षय्य- वाक्यमें 'गोत्रस्य' का उच्चारण उचित है। ऐसे ही अर्घ्य आदि देते समय 'अमुक गोत्र' के साथ 'अमुक शर्मन्' का प्रयोग करना चाहिये। तर्पणमें शर्मा, संकल्पवाक्यमें 'शर्मणे' और अक्षय्योदक त्यागके समय 'शर्मणः' का प्रयोग उचित है। इसी प्रकार माताके लिये क्रमशः आसन, तर्पण, संकल्प एवं अक्षय्य वाक्यमें 'मातः' 'माता' 'मात्रे' और 'मातुः' का प्रयोग आवश्यक है। उसके साथ गोत्रका विशेषण लगानेपर 'अमुक गोत्रे' '.... गोत्रा' '...गोत्रायै' तथा '...गोत्रायाः' का प्रयोग करना चाहिये। माताओंके नामके साथ देवीका प्रयोग करना हो तो उक्त स्थलोंमें क्रमशः 'देवि' 'देवी' 'देव्यै' और 'देव्याः' का प्रयोग करना चाहिये। इस तरह यथास्थान प्रथमा आदि विभक्तियोंका प्रयोग होता है। प्रथमा, चतुर्थी और षष्ठी विभक्तिका यथावत् प्रयोग श्राद्धकी सिद्धिके लिये आवश्यक है। जो श्राद्ध विभक्तिका ठीक